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पास आयी दिवाली

2 व्यंग्यजल

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- वीरेन्द्र जैन

(१)

पास आयी दिवाली

घर में उगी है घास पास आयी दिवाली

मैं हो गया उदास पास आयी दिवाली

 

मॉं लक्ष्मी को ऐसे रहीं घूर औरतें

जैसे खड़ी हो सास पास आयी दीवाली

 

बत्ती बना के दीये में डालेंगे डिग्रियॉं

एम.ए. ओ' बी.ए. पास पास आयी दीवाली

 

मॅहगाई को सौतन की तरह कोस रही हैं

हो इसका सर्वनाश पास आयी दीवाली

 

अपना भी अगर होता तो सीधा उसे करते

कोई उलूकदास पास आयी दीवाली

 

सपनों से और यादों से फेंटे ही जा रहे

हम जिन्दगी की ताश पास आयी दिवाली

 

(२)

दिवाली अपनी रही खूब अनमनी यारों

 

न फुलझड़ी, न पटाखा, न रोशनी यारों

दिवाली अपनी रही खूब अनमनी यारों

 

अमीर लोग मिले धन का दिखावा करते

एक भी शख्स न था बात का धनी यारों

 

किसी को ताश मिलाते हुये बरसों गुजरे

किसी को हाथ में बाजी मिली बनी यारों

 

आदमी और अकेला हुआ जमाने में

बस्तियॉं और बसी जाती हैं घनी यारों

 

हमने बुझने न दिया दर्द का दिया दिल में

हमने कर रक्खी अमावस में चांदनी यारों

 

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संपर्क:

वीरेन्द्र जैन

२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.

फोन ९४२५६७४६२९

1 टिप्पणियाँ

  1. दीपावली पर हार्दिक शुभकामनायें | सुन्दर रचना .. |आज आपकी पोस्ट को चर्चा मंच पे रखा गया ..

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