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सब कर्मों की ही माया है ।

art13

-साधना दुग्गड़

 

अच्छे बुरे कर्मों का प्रतिफल

अपना ही यह साया है ।

 

कहीं अमीरी कहीं गरीबी

सब कर्मों की ही माया है ।

 

ये तन माटी का पुतला है

क्षण भंगुर यह काया है ।

 

जन्म मरण के इस मर्म को

मानव समझ न पाया है ।

 

मृग तृष्णा में भटक रहा है

क्या खोया क्या पाया है।

 

खाली हाथ ही आया जग में

खाली हाथ ही जाना है।

 

फिर व्यर्थ की बातों में

क्यो जीवन को उलझाया है ।

 

जीवन का सारांश यही है

मिल बांट कर खाना है।

 

जिओ और जीने दो का संदेश

घर घर में पहुंचाना है।

 

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श्रीमती साधना दुग्गड़

21 रवि नगर रायपुर

2 टिप्पणियाँ

  1. सही कहा "ये तन माटी का पुतला है,

    क्षण भंगुर यह काया है ।

    मानव क्यों ये समझ न पाए , क्षण-भंगुर हम तन ये लाए.

    जवाब देंहटाएं
  2. rajesh5:23 pm

    phir bhe samagh te nahi hai

    जवाब देंहटाएं

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