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व्यंग्य : मायके वाले /बुशसाहब से शिकायत

 

- वीरेन्द्र जैन

Virendra Jainकल रात मेरी पत्नी कई घन्टे इन्टरनेट पर जाने क्या तलाशती रही और अमेरिका में होने वाली सुबह के समय फोन घुमाने लगी।

“ हैल्लो, हैल्लो में इन्डिया से श्रीमती जैन बोल रही हूं, बुश साहब से बात कराइये''

पता नहीं वहां से क्या कहा गया पर वह फोन रख कर प्रतीक्षा करने लगी जिससे लगा कि शायद उसे वहॉं से कालबैक की उम्मीद रही होगी। मुझ से नहीं रहा गया तो मैंने पूछा- किससे बात करनी है?

“शैतान से'' वह कुढ और गुस्से के मिले जुले के भाव में बोली।

मैं समझ गया कि वह सचमुच ही बुश से बात करना चाहती है। क्रोध में आदमी तो क्या औरतें तक झूठ नहीं बोल पातीं। झूठ बोलने के लिए एक गम्भीर किस्म की शांति चाहिये होती है।

“तो तुम बुश से बात करना चाहती हो'' मैंने फिर भी कनफर्म कर लेना ठीक समझा क्योंकि वैश्वीकरण से निरंतर घिरती जा रही इस दुनिया में दूसरा भी कोई शैतान या उसका दलाल हो सकता है।

“हॉं करना चाहती हूं! बोलो?'' उसके तेवर ढीले नहीं पढे थे।

“बुश साहब अमरीका के प्रेसीडेंट हैं और अभी कुछ महीने उनका कार्यकाल बाकी है। जाते जाते उन्हें ढेर सारे दूसरे काम भी निबटाने हैं। ईराक में साढे छह लाख लोगों को मारने के बाद भी उनके सैनिक वहॉं सुरक्षित नहीं हैं उन्हें बचाना है। ईराक में ही लोगों को मारने के बाद वहॉं रासायनिक हथियारों की कोई शीशी ढूंढ कर दुनिया को दिखानी है। ईराक में सद्दाम हुसैन के डुप्लीकेट तलाशना है तो अफगानिस्तान में लादेन को खोजना है। नेपाल में राजा को बनाये रखना है। हिन्दुस्तान में उसकी सेना के साथ संयुक्त सैनिक अभ्यास कराते रहना है। पाकिस्तान को मदद करना है इत्यादि इत्यादि लाखों काम करने के लिए बाकी पड़े हैं, आखिर उसे तुमसे बात करने की फुरसत कहॉं मिलेगी''

“तुम से मतलब?'' पत्नी ने उसी तुर्सी के साथ कहा

“ आखिर मैं तुम्हारा पति हूं और मेरी तुम्हारी विधिवत शादी हुयी है, हमने साथ साथ फेरे खाये हैं, वचन लिये हैं और मैं तुम्हारी रक्षा करता आ रहा हूं..... आखिर तुम्हें उस क्लिंटन के उत्तराधिकारी से क्या बात करनी है, मुझे भी बताओ, मेरे साथ बैठ कर बात करो हो सकता है कि मैं कुछ मदद कर सकूं!''

मैंने अपना इतिहास भूगोल समाजशास्त्र, राजनीति, परंपरा आदि सारा ज्ञान लगाने की कोशिश की पर उसका हाल तो यह था कि बन्द किवार किये बैठे हैं अब आये कोई समझाने''

“मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी, जो कुछ भी कहना है बुश से कहूंगी। उसे बताऊंगी कि तुम मुझे प्यार नहीं करते, घर में मेरी कोई बात चलने नहीं देते बाहर तो बाहर घर की रसोई में भी ऊर्जा के इस्तेमाल के मामले में भी दखल देते हो, घर में क्या पकेगा उसमें भी हस्तक्षेप करते हो, स्वल्पाहार का ऐसा भूत सवार है कि ना तो खुद कुछ खाते हो और ना ही बच्चों तक को खाने देते हो। वे नाराज हो गये तो मैं कहीं की नहीं रहूंगी। पिज्जा बर्गर मैगी कोकाकोला सब बन्द कर रखा है। पड़ोसी के बच्चों को देखो कैसे खा खा कर मोटे ताजे हो गये हैं और हमें बोलने तक नहीं देते। भीतर मैकनाल्ड और केंटुकी चिकिन खाते हैं और बाहर चन्दन लगा कर निकलते हैं। तुम तो अपने ही घर के विकास विरोधी हो और हमेशा सामने वाले झुग्गियों की ओर देखते रहते हो..................।'' वह शुरू हो गयी थी।

मैंने उसे बीच में टोक कर जां निसार अख्तर साहब का शेर पढा-

जिगर का दर्द जिगर में रहे तो अच्छा है

ये घर की बात है, घर में रहे तो अच्छा है

इतना सुन कर तो वह बिफर ही पड़ी “ अच्छा तो अब तुम्हें हमारे मायके वाले भी अच्छे नहीं लगते क्योंकि मैं तुम्हारे लगवाये टेलीफोन से बात कर रही हूं! ठीक है नहीं करती मैं तुम्हारे टेलीफोन से बात''

उसने चप्पलें पहनीं और बाहर एसटीडी पीसीओ आइएसडी की ओर चली गयी। वहॉं से इतने जोर जोर से हैल्लो बुश साहब, हैल्लो बुश साहब कर रही है जैसे टेलीफोन से नहीं सीधे बात कर रही हो या अपनी बालकनी से सामने वाली पड़ोसिन से बोल रही हो।

मैं एक जिम्मेवार, बेचारे, निरीह, पति की तरह सब कुछ देख सुन रहा हूं।

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संपर्क:

 

वीरेन्द्र जैन

२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.

फोन ९४२५६७४६२९ .

2 टिप्पणियाँ

  1. भई वाह विरेन्द्र जी, क्या कलप्ना की है, एक ही लेख में इत्ते सारे मुद्दे खींच लिए और वो भी इतने रोचक तरीके से …साहब, आप की लेखनी को सलाम

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  2. apne sachche wastawikata se parichay karawaya . dhanyawad.

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