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विश्वजीत सपन की कहानी : वह पागल

कहानी

वह पागल

vidwan

-विश्वजीत सपन

'ऐ इधर आओ।`

'क्या बात है ?`

'कुछ नहीं।`

'फिर बुलाया क्यों ?`

'मेरी मर्जी।`

'मेरी मर्जी ! क्या मतलब मेरी मर्जी ?`

'मेरी मर्जी।`

'पागल हो क्या ?`

'हा....हा....हा` - जोरदार हँसी।

'यह दुनिया भी अजीब है। लोग अपने आपको पहचानने से पहले दूसरों को पहचानने की कोशिश करते हैं।` वह आदमी बोलता गया और अजीबो-गरीब हरकतें करते उस व्यक्ति की तरफ ही बढ़ने लगा।

'अजीब आदमी है।` - वह व्यक्ति भुनभुनाया -'पहले तो बुलाया, अब मुझे ही सीख दे रहा है। पागल कहीं का।`

'अरे भाई ! वह सचमुच ही पागल है।` किसी राहगीर ने उन्हें अवगत कराया।

उस व्यक्ति ने भी यही अंदाज़ा लगाया था। पागल ही होगा, वरना ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करता ? उसने दिल ही दिल में उस पागल को कोसा, जिसने सुबह-सुबह ही उसका मूड खऱाब कर दिया था और बड़ी तेजी से एक ओर भाग खड़ा हुआ। लेकिन पागल भी न जाने क्यों उसकी तरफ ही बढ़ा चला जा रहा था। अब उसे डर लगा। पागल का क्या भरोसा, पता नहीं क्या कर बैठे? साथ ही वह बीच-बीच में पीछे मुड़कर भी देखता जा रहा था कि कहीं वह सचमुच ही पीछा तो नहीं कर रहा था ? सौभाग्य से वह पागल कुछ दूर उसके पीछे चलने के बाद रुक गया। वह व्यक्ति तेजी से कदम बढ़ाकर उस पागल की नज़रों से ओझल हो गया।

तभी गली के कुछ आवारा बच्चे चिल्लाते हुए उस पागल के सामने आ खड़े हुए। पहले तो वे सभी कुछ देर तक उस पागल की अजीबो-गरीब हरकतों को तमाशा समझकर देखते रहे, फिर जब धीरे-धीरे बच्चों की एक अच्छी-खासी टोली जमा हो गई, तो उन्होंने उसे छेड़ना शुरू कर दिया। कोई उसकी फटी कमीज खींचकर भाग जाता तो कोई उसे पीछे से धक्का मारकर भाग जाता। कभी बचने की कोशिश में तो कभी ज़ोर से धक्का लगने के कारण वह कई बार गिरते-गिरते बचा। जब कभी वह गुस्से में बच्चों को मारने को दौड़ता तो क्षणभर में ही वे बच्चे शोर मचाते उसकी पहुँच से दूर हो जाते। पागल कुछ देर पीछा करता, फिर थककर ज़मीन पर बैठ जाता। उसके बैठते ही बच्चे पुन: एकजुट होकर उसे तंग करने लगते।

मैं प्रतिदिन की तरह नित्य नियम से अपने लॉन में बैठा अखबार पढ़ रहा था। इन बातों से मेरा ध्यान बार-बार अखबार से हटकर उनकी तरफ चला जाता था। सुबह-सवेरे अखब़ार की गरमा-गरम खब़र का आनंद न ले पाने से मुझे परेशानी होती थी। दरअसल ऑफिस में उन्हीं खब़रों से तो बातचीत का आगाज़ हुआ करता था। भला मैं इस सुख से महरूम कैसे रहता ? तब मैं भलमनसाहत का ज़ामा पहनते हुए बच्चों को मना करता, लेकिन असफल रहता। बच्चे बड़े ही उद्दण्ड किस्म के थे। मेरा कहा मानना तो दूर उल्टा मुझे ही मुँह बिचकाकर चिढ़ाने लगते। मैं अपने लॉन से ही चाहरदीवारी के पास आकर गरज़कर उन्हें फटकारता, लेकिन वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आते थे। लाचार होकर मैं अखब़ार में अपना मन लगाने की कोशिश करता। लेकिन उस शोर-गुल में ध्यान केन्द्रित करना नामुमकिन होता था।

लगभग प्रतिदिन यह तमाशा देर तक चला करता। कम ही ऐसे दिन होते जब वह पागल वहाँ नहीं होता या फिर वे बच्चे नहीं होते या फिर पागल पूरी तरह से लाचार होकर एक तरफ भाग खड़ा होता। बच्चे फिर भी उसके पीछे ही होते थे। जितना ही वह बचने की कोशिश करता, बच्चे उतना ही छेड़ने को उतारु होते जाते थे। अपने आपको बचाने की फिक्र में वह सड़क पर बेतरतीब मारा-मारा फिरता। लेकिन कोई उसकी मदद को नहीं आता था। कुछ राहगीर रुककर तमाशा देखते और कुछ बिना रुके ही चले जाते। वह भागता-भागता सड़क के पार किसी गली में जाकर मेरी नज़रों से ओझल हो जाता, तभी मेरी परेशानियों का निवारण हो पाता था और मैं अखबार का आनंद ले पाता था।

मेरा मन उचट जाता। मैं खब़रों में मन लगाकर इसे भूल जाना चाहता, लेकिन मन में किसी अजनबी पीड़ा का एहसास होता था। कोई अनजानी वेदना कुछ कहने का प्रयास करती थी। मैं उसे जान-बूझकर अनसुना कर देता था। उस एहसास को दबा देता था। फिर भी बात नहीं बनती थी तो अपने मन को ललकारता कि यह कौन-सी नई बात है ? यहाँ तो आए दिन ऐसे ही न जाने कितने तमाशे होते रहते हैं। और फिर हो भी क्यों न ? जब तक हम जैसे मूक तमाशबीन होंगे तब तक ऐसे तमाशे रोज़ होते ही रहेंगे। लेकिन यह एक ऐसा तमाशा था, जिससे मैं प्रभावित था। मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या प्रभावित थी। इसलिए मैं चिंतित था। न जाने क्यों, उस पागल को भी मेरे ही लॉन के सामने सड़क पर बैठना था और उसके बैठते ही फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता था जैसे चिर-परिचित फिल्म पर्दे पर सिमटती चली जा रही हो।

क्या वह पागल था ? या फिर यूँ ही पागलपने का नाटक कर रहा था ? तब कभी-कभी मुझे लगता था कि वह पागल नहीं था। बस लोगों को बरगलाने के लिए पागलपने का ढोंग कर रहा था। लेकिन दुनिया वाले कहते थे कि वह सचमुच में ही विक्षिप्त था। तो क्या वे सही कहते थे ? या फिर उन्हें भी मेरी ही तरह कोई भ्रम था ? जब सोचने की क्षमता जवाब देने लगती तो मुझे लगता कि वे लोग शायद ठीक ही कहते होंगे। और यह सोचकर मैं खुद से खुद को अलग कर लेता था। मुझे क्या लेना-देना था कि वह कौन था ? क्यों था ? अपने कार्यों से फुर्सत मिले तब तो किसी और के बारे में सोचें ! वैसे भी ऐसे वि शय पर विचार करने का समय ही कहाँ मिलता है ? काम हो न हो हम व्यस्त रहने का नाटक तो करते ही हैं। हमारा जीवन भी तो बस एक नाटक ही है। वह पागल भी अगर नाटक कर रहा है तो इसमें बुरा ही क्या है ? अब सोचना बंद करो और अपने सुखमय जीवन को और सुखमय बनाने का प्रयत्न करो। इसी से ज़िन्दगी चलती है। बाकी सब बकवास है। मुझे यह महामंत्र सबसे सुखकर प्रतीत होता था।

ठीक ही तो है। अपने जीवन का भार उठाना ही हम सबके लिए कठिन है तो किसी और के बारे में सोचकर अपने मन पर बोझ डालना हितकर नहीं हो सकता। लेकिन इतना तो तय था कि मेरे दिल के किसी कोने में कोई ऐसी सोच घर कर गई थी जो मुझे बार-बार उसके बारे में सोचने पर विवश किया करती थी। मैं पूर्वजन्म में विश्वास नहीं रखता, वरना पिछले जन्म का कोई रिश्ता या फिर किसी ऋण की बात मानकर उसकी मदद को उतारु हो जाता। ऐसे में मन को बहलाना पड़ता था। अरे पागल ही होगा सभी तो उसे पागल ही कहते और मानते हैं। मेरे एक के मानने से क्या फ़र्क पड़ जाएगा ? अब मैंने भी फैसला दे दिया, नहीं तो वह मेरी कार का शीशा क्यों तोड़ता ? वह तो भगवान् का लाख-लाख शुक्र था कि पत्थर का टुकड़ा मेरे सिर पर नहीं लगा, वरना ...। और उस दिन मैं भी बरस पड़ा था। पता नहीं कितने लात-घूँसों से उसकी मरम्मत कर डाली थी। आज न जाने क्यों दयाभाव उमड़ रहा था ? तो क्या वह दया का पात्र नहीं था ? हर कोई उसे धक्के मारता था, कोई उसकी मदद नहीं करता था, कोई उससे हमदर्दी नहीं दिखाता था। उसकी इस पात्रता के बारे में मैं अपनी उधेड़बुन में होता कि तभी श्रीमती जी की पुकार सुनाई पड़ती और मैं रत्ती भर भी समय गँवाए बिना पुन: सांसारिक मायामोह के अधीन हो जाता।

उस दिन सुबह सवेरे एक दोस्त के घर जाना पड़ गया। उसके पिता अचानक ही चल बसे थे। मैं उसे ढाढस बँधाकर लौट रहा था। अभी घर के करीब पहुँचा ही था कि न जाने कहाँ से वह पागल मेरी कार के सामने आ गया। मेरे पैर ब्रेक पर चरमराये। लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता उसने एक बड़ा-सा पत्थर उठाकर फेंका और मेरी कार का शीशा तोड़ दिया। मेरा मन पहले से ही उदास था, इस घटना से मेरा गुस्सा उबल पड़ा। कार से उतर कर उस पर झपट पड़ा। फिर आव देखा न ताव उसे बालों से पकड़कर कई थप्पड़ उसकी गाल पर रसीद कर दिए। मेरे दो हाथ पड़ते ही न जाने और कितने हाथ उस पर बरस पड़े। लगता था सबको सिर्फ इसी मौके की तलाश थी। भागा भी तो नहीं वह। अधमरा होकर वहीं बैठ गया। मेरा मन खिन्न हो गया। उसकी दशा मेरे दिल के किसी कोने में दया के भाव जगाने ही वाली थी कि स्वार्थी मन ने उसे दबा दिया - 'तुम बार-बार, बेकार ही उस पर दया दिखाने की चे टा करते हो। वह पागल है, वह सचमुच ही पागल है। वह किसी को नहीं जानता है और न पहचानता है। तुम्हारी हमदर्दी उसकी समझ में नहीं आएगी।`

मैं गुस्से से भरा घर में दाखिल हुआ और आते ही बूढ़े नौकर बिरंची पर बरस पड़ा। बेचारा बूढ़ा सकपका गया। ज़िन्दगी में पहली बार उसे ऐसी डाँट पड़ी थी। वह चुपचाप सुनता रहा, सिर झुकाये जैसे ज़र-खऱीद गुलाम हो। शायद नमक बीच में आ गया था।

मेरा गुस्सा दूध की तरह उफान लेकर पुन: शान्त हो गया। मैंने बिरंची को बुलाया। वह चुप था - पूर्ववत्। उसकी सागर-सी चुप्पी मुझे खटकने लगी। मैं अपने आपको कोसने लगा। उससे अपनी नाराज़गी का कारण बताया, पर अपनी मालिकता बरक़रार रखते हुए। अनुभवी बिरंची ताड़ गया और बोला - 'बाबूजी, उस पागल और मुझमें बहुत समानता है। वह सरे-आम धक्के खाता है और मैं दिल ही दिल में।`

मुझे पछतावा होने लगा कि बेकार ही उस बूढ़े का दिल दुखाया। उसकी गलती ही क्या थी ? वह तो कभी चूँ-चपड़ भी नहीं करता है। कितना ही काम ले लो, गधे की तरह खटता रहता है। ऊपर से वफ़ादार है और पुश्तैनी भी। मेरे पिता ने भी शायद ही कभी उसे इस तरह से फटकारा होगा। हम इंसानों में यही तो एक बड़ी कमजोरी होती है कि हमें अपनी भावनाओं पर कोई नियंत्रण नहीं होता और उसका खमियाज़ा किसी और को भुगतना पड़ता है। इसलिए अक्सर हम किसी का गुस्सा किसी पर निकालकर स्वयं को व्यावहारिक बनाने का असफल प्रयास करते हैं।

घर का नौकर था बिरंची, लेकिन उम्र और तज़ुर्बे में काफी बड़ा था मुझसे। मेरा क्या अधिकार बनता था कि बिना किसी गलती के उसपर बरस पड़ूँ। मुझे इस गलती का एहसास तो था, लेकिन कबूलना नहीं चाहता था। फिर भी उसके दिल को हल्का करने के लिए और वक्त की नज़ाकत देखकर मैंने उससे पूछा।

'बिरंची लाल, क्या तुम्हें वह पागल सचमुच का पागल लगता है ?`

'हाँ मालिक।` सीधा-सा जवाब था।

'लेकिन मैं नहीं मानता।`

'मानता तो मैं भी नहीं हूँ मालिक।` स्वर गंभीर था।

'मानते नहीं तो उसे पागल क्यों कह रहे हो ?` मेरा प्रश्न था।

'लोग कहते हैं।` स्वर पुन: शान्त था।

मैंने सोचा, उसका कहना कितना सटीक था। आज तो बहुमत की सत्ता होती है। अकेलों और कमज़ोरों की तो बिसात ही नहीं होती। फिर मेरा दिल भी तो उसे पागल नहीं मानता था। कितनी ही बार दिल की आवाज़ को उठने से पहले ही दबा चुका था मैं, इस भ्रम में कि वह मुझे सुनाई नहीं देती थी। और लोगों के कहे अनुसार उसे पागल ही समझता आया था।

'बाबूजी।` बिरंची लाल उदास होकर बोला।

'वह पागल मेरा पड़ोसी था। बड़ा ही नेक इन्सान था। मजाल है, किसी को भी उससे कोई ठेस पहुँच जाये। अपनी लुटाकर भी दूसरों की मदद करना उसकी आदत थी। बड़ा ही हँसमुख और दिलचस्प आदमी था। भगवान् की दया से पेट भर जुटा ही लेता था। मूंगफली का खौंचा लगाता था। न ऊधो का लेना न माधो का देना। शाम तक पैसे जुटाकर घर लौटता तो बेटे को स्कूल से लेता आता था। दीपू अकेला सहारा था उस बूढ़े का।`

अब मुझे भी इस कहानी में रस आने लगा था। मैंने चाय की ख्वा़हिश जाहिर की ताकि आराम से कहानी का आनंद ले सकूँ। बिरंची चाय बनाकर ले आया। मैं चाय की चुस्कियाँ लेता आगे की कहानी सुनने लगा। बिरंची ने कहानी की कड़ियों को जोड़ा।

'रामदीन की पत्नी का निधन दीपू के जन्म के साथ ही हो गया था। उसके जीवन का लक्ष्य दीपू ही था। रामदीन उसे माँ-बाप दोनों का प्यार देता था। उसकी दिली तमन्ना थी कि दीपू बड़ा होकर एक बड़ा अफसर बने। इसलिए सरकारी स्कूल में पढ़ाने लगा। स्कूल ले जाते और वहाँ से लाते वक्त वह उसे एक ही बात कहता था कि वह खूब मन लगाकर पढ़े और परीक्षा में अच्छे नंबरो से पास हो। दीपू भी पढ़ने में ठीक ही कर रहा था। रामदीन हमेशा सोचता कि वह दिन दूर नहीं जब उसकी गरीबी का अंत हो जाएगा। उस छोटे से ज़मीन के टुकड़े पर उसका अपना मकान होगा। और वह भी समाज में सिर उठाकर जी सकेगा। लेकिन होनी बलवान् थी। गोपी पहलवान ने रंगदारी जमाने के लिए उससे पैसे माँगे। बेचारा गरीब कहाँ से देता - नतीजा, खौंचे से हाथ धोना पड़ा। लाला गिरधारी मल ने गोपी पहलवान की मदद से डरा-धमका कर उसकी ज़मीन भी हथिया ली। बेचारा भटकने लगा। दीपू का सहारा ही उसे जीने के लिए मजबूर करता रहा था। तब वह स्टेशन पर सामान उठाता हुआ भी खुश रहने लगा, क्योंकि दीपू के रूप में उसे भवि य के सपने सामने नज़र आते थे। पर, ईश्वर को शायद यह भी मंजूर नहीं था। इस मकान के ठीक सामने उसके ज़िगर के टुकड़े का एक्सीडैंट एक कार से हो गया। वह सफेद कार किसी नेता की थी। और नेता बरी हो गया, लेकिन दीपू अपनी मौत से बरी न हो सका। दीपू का गम़ रामदीन सहन न कर सका और उसी दिन से उल्टी-सीधी हरकतें करने लगा। इसलिए लोग उसे पागल कहते हैं।`

बिरंची लाल थोड़ा रुका। उसने अपनी साँसों को नियंत्रित किया और पुन: बोला - 'मेरा भी जवान बेटा सुजन लाल जब मरा था तो मैं भी विक्षिप्त हो गया था। लेकिन बाबूजी, मुझे मेरे बेटे से शायद उतना प्यार नहीं था, जितना रामदीन को था। वरना, मुझे भी पागल हो जाना चाहिए था।`

मेरा मन उदास हो गया। मैं समझ गया, उस पागल को मेरी कार से क्यों दुश्मनी थी ? मैं आत्मग्लानि से भर उठा। उस दिन ऑफिस में भी जी नहीं लगा। काम खत्म करके सीधा घर आया तो उस संध्या वेला में भी उस पागल को देखने की इच्छा जागृत हो उठी। रात भर मन बेचैन रहा। बार-बार यही खय़ाल आता रहा कि मैं कितना स्वार्थी हूँ। अगर कुछ मदद नहीं कर सकता तो किसी को चोट पहुँचाने का भी हक नहीं है। मैंने किसी तरह रात काटी और मन ही मन में निश्चय किया कि रामदीन की मदद अवश्य करूँगा।

दूसरे दिन का सवेरा मेरे लिए एकदम नया था। जैसे प्रकृति का प्रत्येक तत्त्व नवीन जागृति से प्रेरित हो। मेरा मन सागर की तरह शान्त और निश्चल प्रतीत हो रहा था। सूरज की रोशनी तीखी नहीं थी। मुझे छाँव के लिए किसी वृक्ष अथवा किसी शाखा के सहारे की आवश्यकता नहीं थी। बीच लॉन में ही कुर्सी लगाकर बैठ गया। वह लॉन भी न जाने क्यों कुछ ज्यादा ही सुन्दर लग रहा था। हाथों में आज का अखबार था - नया अखब़ार। खब़रें नयी, पृ ठ नये। लेकिन दृश्य में परिवर्तन नहीं आया।

बच्चों का काफिला पुन: उपस्थित हो गया। आगे-आगे पागल - नहीं रामदीन था और पीछे बच्चे। मैं झटपट उठ खड़ा हुआ। दरवाज़े पर जाकर बच्चों को ज़ोर से आवाज़ लगाई। कुछ रुके, अधिकतर आगे बढ़ गये। मेरी किसी ने नहीं सुनी। मैं दरवाज़े से बाहर आ गया। बच्चों को रोकना मेरा फऱ्ज बन गया था। तभी एक बड़ी-सी एम्पाला तेज़ी से आई। बच्चे बिखर गये, रामदीन नहीं बिखर सका। कार की चपेट में आ गया। उसकी ज़िन्दगी बिखर गई। मैं विस्मित-सा खड़ा देखता रहा। इत्तफाकन कार पुन: किसी नेता की थी। चमचों ने भीड़ हटाई। कार बगल से निकाल ली गई। किसी ने इतनी जहमत भी उठा ली और म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन को फोन घुमा दिया। लाश पर फटी-सी चादर डाल दी गई। मैं देखता रहा। प्रायश्चित का बहाना ढूँढता रहा। लाश सफेद गाड़ी में रख दी गई और आँखों से ओझल भी हो गई। मैं देखता रहा अवाक्, निश्चल, शान्त।

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संपर्क:

-विश्वजीत 'सपन`

१५/२ सर्कुलर रोड, डालनवाला, देहरादून - २४८००१

6 टिप्पणियाँ

  1. अच्छी कहानी हैं

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    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    2. बहुत आभार आपका आशीष जी। हौसला बढ़ा है। सादर

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  3. Dear Kiran ji,
    thank you very much.

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  4. विश्वजीत जी ,
    शायद बिरंची और मुझमें भी कई समानताएं हैं। और शायद कहीं रामदीन के साथ भी।हम सब कहीं न कहीं अपने अपने परिस्थितियों के जाल में फँसे हैं।
    बहुत ही अच्छी कहानी है।

    आपका
    उदय

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