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व्यंग्य : ख़ुराक

- सीताराम गुप्ता

sitaram gupta संतलाल से मेरा थोड़ा परिचय जरूर था पर मित्रता नहीं। परिचय का कारण था एक ही डिपार्टमेंट में काम करना और संतलाल का और मेरा गाँव एक ही बस के रूट पर होना। एक दिन रविवार को दोपहर बाद लगभग पाँच बजे संतलाल मेरे घर आया और कहने लगा, ''तुम्हारे गाँव में मेरे कई रिश्तेदार रहते हैं। मुझे किसी काम से दीनदयाल जी के घर जाना है। चल मेरे साथ चल उनके घर तक।`` मैंने पूछा, ''क्या आप उनका घर नहीं जानते?`` ''जानता क्यों नही? मेरे ख़ास रिश्तेदार हैं``, संतलाल ने बताया। ''फिर मैं क्या करूँगा आपके साथ जाकर? आप खुद ही चले जाओ``, मैंने कहा।

संतलाल उठकर जाने लगा तो मैंने कहा ''ऐसे नहीं पहली बार हमारे घर आए हो चाय पीकर जाना।`` संतलाल बैठ गया और बोला, ''चाय की तो ख़ास इच्छा नहीं पर वापसी में आऊँगा और खाना खा के जाऊँगा।`` ''अच्छी बात है ये तो भाई साहब``, मैंने कहा। संतलाल चाय पीकर चला गया। मैंने पत्नी से कहा कि शाम को जल्दी खाना बना लेना। आठ बजे के बाद कोई बस भी नहीं जाती। आख़िरी बस निकल गई तो ये यहीं डेरा डाल देगा।

पत्नी खाना बनाने लगी तो मैंने कहा कि जरा ज्यादा सब्जी बना लेना। घी गरम कर लेना और बूरा निकाल लेना। गुंधा हुआ आटा देखकर मैंने कहा कि इतना ही आटा और गूंध लो वरना कम पड़ेगा। ''तुम्हें ज्यादा पता है खाना बनाने के बारे में? एक आदमी खाना खाने आएगा या पूरी बारात आएगी? एक नहीं दो आदमियों का ज्यादा आटा डाल दिया है,`` पत्नी ने आश्वस्त किया। मुझे खाने की नहीं इस बात की चिंता ज्यादा हो रही थी कि यदि संतलाल ने आने में देर कर दी तो उसके ठहरने की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। सारी रात कान खाएगा सो अलग। लेकिन संतलाल जल्दी ही लौट आया।

खाने की शुरूआत हुई घी-बूरा और पराँठों से। चार-पाँच पराँठों के बाद थाली का सारा बूरा ख़त्म हो गया तो संतलाल ने कहा, ''भई तुम्हारा बूरा स्वादिष्ट है। बूरा और है तो थोड़ी और दे नहीं है तो कोई बात नहीं। लगभग आधा किलो बूरा था जो संतलाल तीन बार में पूरी की पूरी चट कर गया। अब सब्जी की बारी आई। पद्रह-सोलह पराँठे आने के बाद मैंने देखा कि गुँधा हुआ आटा टैं बोलने वाला था सो मैंने पत्नी से कहा, ''भागवान क्या कर रही हो? आटा ख़त्म होने वाला है और गूँध लो फटाफट।`` पत्नी ने अविश्वास से मेरी ओर देखा और चार-पाँच रोटियों का आटा निकालकर गूंधने लगी। इसमें उस बेचारी का कोई दोष नहीं था पर मैं संतलाल की रग-रग से वाकिफ़ था। मैंने पत्नी से कहा कि इतना ही आटा और डाल लो नहीं तो फिर गूँधना पड़ेगा। पत्नी ने मेरी चेतावनी की ओर ध्यान नहीं दिया लेकिन उसे इसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ा तीसरी बार आटा गूँध कर।

दुबली-पतली काया के स्वामी संतलाल बाईस-चौबीस पराँठे उदरस्थ कर चुके थे। मैं अत्यंत श्रद्धा भाव से उन्हें भोजन करा रहा था जिसमें बाद में उपेक्षा का भाव भी सम्मिलित हो गया था लेकिन संतलाल को कहाँ किसी की परवाह थी। अंत में जब एक और पराँठा उसकी थाली में रखने लगा तो संतलाल कहने लगा, ''बस यार बहुत हो गया। पहले ही एक रोटी ज्यादा खिला दी। मैं अपने हिसाब से खाता हूँ ज्यादा नहीं खाता।`` मैंने भी कह ही दिया, ''हाँ हिसाब से ही खाना चाहिए। ज्यादा खाना भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।`` ''इतना ज्यादा भी नहीं खाया है जितना तू अहसान जता रहा है। अब घर जाकर दोबारा थोड़े ही खाने बैठूँगा। मुझे बार-बार खाने की आदत भी नहीं है। हाँ जब खाना खाने बैठता हूँ तो पेट भर खाकर ही उठता हूँ,`` संतलाल ने मेरी पत्नी के किये कराये पर पानी फेरते हुए कहा। खैर किसी तरह धक्का देकर संतलाल को बस स्टैंड तक ले गया और एक बस में बिठाकर चैन की साँस ली।

इस अविस्मरणीय घटना को कई साल गुजर गए। एक दिन संतलाल ट्रांसफर होकर मेरे ही ऑफिस में आ गया। लंच के दौरान एक दिन यूँ ही गपशप चल रही थी। लोग अपनी-अपनी ख़ुराक के बारे में बता रहे थे कि संतलाल कहने लगा, ''लोग पता नहीं कैसे इतना खा जाते हैं। मेरी ख़ुराक तो बहुत कम है। एक बार में दो रोटी से ज्यादा नहीं खाता। हर से हद तीन रोटी।`` हमारे एक सहयोगी कृष्ण कुमार कहने लगे, ''संतलाल तभी तो इतने दुबले-पतले हो।``

मैं चुपचाप सारी बातें सुन रहा था। जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने कहा, ''संतलाल उस दिन गाँव में मेरे घर आए थे तो अकेले ने तीन बार आटा गुँधवा दिया था। बीस से उपर पराँठे खा गए थे।`` पास बैठे कृष्ण कुमार ने कहा ''नहीं वर्मा जी मुझे तो विश्वास नहीं होता कि संतलाल बीस पराँठे खा सकता है।`` संतलाल ने भी कुटिल मुस्कान बिखरते हुए कहा, ''ओए वर्मा, क्यों मुझे मुफ्त़ में बदनाम करने पर तुला है? मैं कभी तेरे घर गया ही नहीं फिर खाना वैफसे खाता? हाँ मेरी ख़ुराक देखनी है तो किसी दिन चलता हूँ तेरे घर। इन सब भाइयों को भी ले चलते हैं। बोल कब चलें?``

मेरी आँखों के सामने उस दिन का वो दृश्य घूम गया जब मैं संतलाल को बस में बिठाकर घर वापस आया और देखा कि माँ सब्जी काट रही थी और पत्नी चौथी बार आटा गूँध रही थी।

मैंने तुरंत मना किया – “नहीं, नहीं, तुम्हारी दुबली काया को देख कर मैं भी माने लेता हूँ कि तुम्हारी ख़ुराक दो रोटी से ज्यादा हो ही नहीं सकती!”

सीताराम गुप्ता

ए.डी.-१०६-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-११००३४

फोन नं. ०११-२७३१३९५४

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