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नईम की कविताएँ : लिखने जैसा लिख न सका मैं

दो कविताएँ

chari (WinCE)

-नईम

 

लिखने जैसा

लिखने जैसा लिख न सका मैं

सिकता रहा भाड़ में लेकिन,

ठीक तरह से सिक न सका मैं.

गत दुर्गत जो भी होना थी, खुद होकर मैं रहा झेलता,

अपने हाथों बना खिलौना, अपने से ही रहा खेलता.

परम्परित विश्वास भरोसों पर

यक़ीन से टिक न सका मैं.

अपने बदरंग आईनों में, यदा-कदा ही रहा झांकता.

थी औक़ात, हैसियत, लेकिन अपने को कम रहा आंकता.

ऊँची लगी बोलियाँ लेकिन,

हाट-बज़ारों बिक न सका मैं.

अपने करे-धरे का अबतक, लगा न पाया लेखा-जोखा.

चढ़ न सकेगा अपने पर अब भले रंग हो बिलकुल चोखा.

चढ़ा हुआ पीठों मंचों पर

कभी आपको दिख न सका मैं.

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बातों का क्या

बातों का क्या है

बातें तो चलती रहतीं

कतई जरूरी नहीं कि कोई बड़ी बात हो,

आड़ी, तिरछी हो या कोई खड़ी बात हो.

अनगढ़ सांचों में

लेकिन वो ढलती रहती.

छोटा हो या बड़ा भले हो कोई मसला,

नहीं चाहिए इन्हें अलग से कोई असला.

ख़ुशबू सी कुछ को

पर कुछ को खलती रहती.

शब्द नहीं होते, तब भी ये बाज न आतीं,

संकेतों सेनों से अपनी धाक जमातीं

गिरी गिर गयीं

उठकर रोज संभलती रहती.

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संपर्क:

7/6 राधा गंज

देवास – 455001

फोन – 07272-256311

(साभार - नया ज्ञानोदय, अक्तूबर 2007)

4 टिप्पणियाँ

  1. नईम जी को मेरी बहुत सारी बधाइयाँ..अच्छा कहन है.....
    आपको धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. नीम की यह कविता "बातों का क्या"पढने के बाद ये बात तो स्पस्ट ही हो गया कि बात सदैव चलते ही रहते हैं । ये बात सही है कि बातों की अपनी स्थिति होती है और वह उसके अनुसार चलती रहती है। यह स्थिति से नहीं बल्कि स्थिति इनसे होती है।

    जवाब देंहटाएं
  3. नईम जी की कविताओं को पढ़ना रुचिकर लगा। बहुत दिनों बाद उनकी कवितायें पढ़ने को मिलीं मुझे "रचनाकार" के माध्यम से। नईम जी को कई बरस पहले से पढ़ता आ रहा हूँ, एक बार दिल्ली में रू-ब-रू सुनने का सौभाग्य भी मिल चुका है। उनकी रचनाओं को पढ़ना, जीवन को पढ़ने जैसा लगता रहा है। कवि तो अपनी इतनी बेहतरीन कविताओं के लिए बधाई का पात्र है ही, " रचनाकार" को भी बधाई कि उसने इन्हें प्रकाशित किया।

    जवाब देंहटाएं

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