हिन्दी वेब पत्रकारिता पर संगोष्ठी

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रिपोर्ट - डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल हिन्दी वेब पत्रिका ’इन्द्रधनुष इण्डिया’ के प्रकाशन का एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ...

रिपोर्ट

- डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

Indradhanush's First Anniversary Function 009 (WinCE)

हिन्दी वेब पत्रिका ’इन्द्रधनुष इण्डिया’ के प्रकाशन का एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ की जयपुर इकाई ने वानिकी प्रशिक्षण संस्थान के खखाखच भरे सभागार में ‘हिन्दी वेब पत्रकारिता’ विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया. चर्चा में भाग लेते हुए युवा पत्रकार, डेली न्यूज़ के सम्पादक राम कुमार सिंह ने समाज में बढती जा रही कम्प्यूटर की तीव्र पैठ की चर्चा करते हुए कहा कि आज इण्टरनेट साहित्य का डी टी एच (डाइरेक्ट टू होम) बन गया है. वह साहित्य को आपके घर के भीतर ले आया है. अब आपको किसी साहित्यिक पत्रिका को पढने के लिए उसे खरीदने के लिए बाज़ार जाने की ज़रूरत नहीं रह गई है, बल्कि अब तो इण्टरनेट के ज़रिये वह आपके घर के भीतर चली आई है. इसी के साथ, इस तकनीक के कारण साहित्य का प्रबल जनतांत्रिकरण भी हुआ है. ब्लॉग़्ज़ के प्रचलन के कारण अब हरेक के लिए यह सम्भव हो गया है कि वह अपने लिखे को औरों तक पहुंचा सकता है. श्री सिंह ने कहा कि नई तकनीक बहुत आसान है और जो इससे नितांत अपरिचित हैं, उनके लिए भी इसे सीखना बहुत आसान है. रामकुमार की ही बात को आगे बढाया कथाकार रतन जांगिड ने. आपने कहा कि जिन लोगों के पास अपना कम्प्यूटर नहीं है वे भी सायबर कैफे के माध्यम से इस तकनीक का उपयोग कर सकते हैं. जांगिड का विचार था कि भविष्य वेब पत्रिकाओं का ही है. विचारक राजाराम भादू ने अपनी बात यहां से शुरू की कि इस बात से तो अधिक असहमति नहीं है कि इण्टरनेट भविष्य का माध्यम है, और न इस बात से कि परिवर्तन जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है, मूल प्रश्न यह है कि जो परिवर्तन आ रहे हैं, उनसे हमारा रिश्ता कैसा बनता है? अगर नए परिवर्तनों का प्रयोग विस्तृत जन समूह के अनुकूल होता है तब तो हम प्रगति करते हैं, अन्यथा स्थिति भिन्न हो जाती है. इस सन्दर्भ में विचारणीय यह भी है कि सायबर जगत पर नियंत्रण किसका है, और जिसका नियंत्रण है, उसके इरादे क्या हैं! भादू ने कहा कि तकनीक का अच्छा या बुरा होना उसके प्रयोक्ता पर निर्भर है. इसलिए देखा जाना चाहिए कि नई तकनीक के इस्तेमाल में हम कैसी भूमिका अदा कर रहे हैं. अपनी बात को विस्तार देते हुए भादू ने कहा कि हिन्दी के साहित्यकार ने मुद्रण माध्यम का तो भरपूर उपयोग किया लेकिन बाद में वह पिछडता गया. जब रेडियो आया तो इस श्रव्य माध्यम के उपयोग में हिन्दी साहित्यकार पीछे रहा, दूरदर्शन आया तो इस दृश्य माध्यम के उपयोग के मामले में तो उसने मैदान ही छोड दिया. इस पलायन की परिणति भी हमारे सामने है. लेकिन परिवर्तन से कतराने से काम नहीं चलने का, क्योंकि मुद्रण माध्यम भी अब वैसा नहीं रह गया है, जैसा पहले था. इसलिए परिवर्तन को समझना और उसके साथ चलना, उसका अपनी मंशाओं के अनुरूप उपयोग करना ज़रूरी है. भादू ने स्वीकार कियाकि नई पीढी ने हमें यह सबक दिया है कि तकनीक से दूरी रखने से काम नहीं चलने का. हमें न केवल तकनीक से वरन ज्ञान के अन्यान्य अनुशासनों से भी रिश्ता बनाना चाहिए, क्योंकि साहित्य का अंतर-अनुशासनीय क्षितिज भी व्यापक होता जा रहा है. इण्टरनेट की चर्चा करते हुए भादू ने कहा कि समकालीन जीवन की हलचलें इस पर सर्वाधिक हैं. वेब पत्रिका के सन्दर्भ में उनका विचार था कि इसकी सबसे बडी विशेषता यह है कि इसे दुनिया के किसी भी कोने में पढा जा सकता है. ‘इद्रधनुष इण्डिया’ की चर्चा करते हुए उन्होंने सलाह दी कि इस वेब पत्रिका को अपनी प्रकृति निश्चित करनी चाहिए ताकि उस प्रकृति के पाठक इसे अपने लिए अपरिहार्य मानने लगें.

गोष्ठी के अगले वक्ता थे वेब पत्रकारिता के पुरोधा और भास्कर समूह की लोकप्रिय पत्रिका ‘अहा ज़िन्दगी’ के सम्पादक यशवंत व्यास. अपनी अप्रतिम शैली में श्रोता समुदाय को सम्मोहित करते हुए यशवंत ने पहले तो तकनीक के अनेक चमत्कारों और इसके फैलाव की चर्चा की और फिर कहा कि तकनीक का उपयोग न तो महान बनाता है और न इससे अपरिचय तुच्छ बनाता है, लेकिन, इसके बावज़ूद, तकनीक के इस्तेमाल के बारे में जाना तो जाना ही चाहिए. तकनीक की व्याप्ति की चर्चा करते हुए यशवंत ने कहा कि आज अगर कोई अपना खींचा हुआ कोई वीडियो ‘यू ट्यूब’ पर डाल देता है तो उसे साढे तीन लाख लोग देख सकते हैं. इसी तरह, उनके अपने ब्लॉग को भी हर सप्ताह कोई दस से पन्द्रह हज़ार लोग देखते हैं. इतने बडे समुदाय तक कोई और माध्यम आपको नहीं पहुंचाता. इसी तरह, ब्लॉगपोस्ट जबसे निशुल्क उपलब्ध हुआ है, अपनी बात कहने वालों का एक सैलाब ही उमड पडा है. लेकिन, जहां गम्भीरता का अभाव होता है वहां अराजकता भी अपने आप चली आती है. आज ब्लॉग जगत में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. उन्होंने सलाह दी कि हमें तकनीक की ताकत का इस्तेमाल अपनी बात कहने के लिए करना चाहिए.

विमर्श के अंतिम वक्ता थे सुपरिचित वरिष्ठ कवि और दूरदर्शन केन्द्र जयपुर के निदेशक नंद भारद्वाज. तकनीक के इस्तेमाल की ही बात को आगे बढाते हुए आपने कहा कि यह बात सारे ही माध्यमों पर लागू होती है कि तकनीक का इस्तेमाल कौन कर रहा है. हमारा उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि हम तकनीक का अधिकाधिक इस्तेमाल मनुष्यता के हित में करें. अपने कार्य क्षेत्र से अनेक उदाहरण देते हुए आपने कहा कि तकनीक समय बचाती है और आपको अधिक तीव्रता से काम करने की क्षमता प्रदान करती है. हिन्दी वेब पत्रकारिता की चर्चा करते हुए आपने कहा कि आज हिन्दी की सारी उम्दा साहित्यिक पत्रिकाएं नेट पर उपलब्ध हैं, क्योंकि यह तकनीक भौगोलिक सीमाओं से मुक्ति देने की सामर्थ्य रखती है. आप कहीं भी हों, अपनी प्रिय पत्रिका को पढ सकते हैं. वस्तुत: इस नए माध्यम में अत्यधिक सामर्थ्य है, ज़रूरत इस बात की है कि हम खुद को इसके स्तर तक लाएं. नंद जी का स्पष्ट मत था कि तकनीक और यह माध्यम साहित्य के लिए क़तई खतरा नहीं है. और, अगर कुछ लोगों को लगता है कि यह एक खतरा है, तो फिर खतरा तो हर तकनीक में अंतर्निहित है तथा हम उस खतरे से जूझने के लिए ही तो लिखते हैं. नन्द जी ने तकनीक और ज़िक्र करते हुए कहा कि नई तकनीक ने आज शोध का काम बहुत आसान कर दिया है. किसी भी सर्च एंजिन पर जाकर आप अनेकानेक सन्दर्भ प्राप्त कर सकते हैं. हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में वेब जगत की चर्चा करते हुए श्री भारद्वाज ने कहा कि उनका सपना है कि हर बडे लेखक का एक समग्र हो और वह नेट पर उपलब्ध हो ताकि हरेक उससे लाभान्वित हो सके. ऐसा होने पर ही हम अंतर्राष्ट्रीय फलक पर टिक सकेंगे. हिन्दी की साहित्यिक वेब पत्रकारिता की चर्चा करते हुए उन्होंने सलाह् दी कि सभी साहित्यिक पत्रिकाओं को अपनी समानधर्मा पत्रिकाओं की सूचना प्रकाशित करनी चाहिए ताकि इनका अधिकाधिक प्रसार हो. उनका एक महत्वपूर्ण सुझाव यह भी था कि वेब पत्रिकाओं को केवल पाठ्य सामग्री तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए. इन्हें मल्टी मीडिया बनना चाहिए, जैसे किसी मुद्रित कविता के साथ उसके पाठ का श्रव्य (ऑडियो) क्लिप भी हो और किसी कहानी या नाटक के साथ उसके मंचन का वीडियो भी हो. इससे माध्यम का प्रभाव बढेगा.

गोष्ठी के प्रारम्भ में वेब पत्रिका ‘इन्द्रधनुष इण्डिया’ की प्रबन्ध सम्पादक अंजली सहाय ने अतिथिगण का स्वागत करते हुए इस पत्रिका के जन्म की अंतर्कथा बताई. आपका कहना था कि विदेशों में रह रहे भारतीयों की मांग पर हमने अपनी पत्रिका में बाल-गीत भी दिये ताकि बच्चों के लिए सामग्री तलाश करते-करते उनके अभिभावक भी साहित्य से जुडें. पत्रिका के सम्पादक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने अपनी सम्पादकीय दृष्टि से अवगत कराते हुए बताया कि हम लोग बहुत जटिल और गरिष्ठ साहित्यिक रचनाओं से गुरेज़ करते हैं क्योंकि हमारा उद्देश्य सहित्य को विशाल जन समुदाय तक ले जाना है. संरचनाअ की दृष्टि से जटिल व गरिष्ठ रचनाओं के पास तो अन्य मंच भी हैं, जैसे साहित्यिक पत्रिकाएं. फिर, नेट की प्रकृति भी कुछ ऐसी है कि यहां पाठक वही पढेगा जिसमें उसका मन रमे. इसलिए हम अपनी बात सरल तरह से कहने वाली रचनाओं के अधिक पक्ष में हैं. अग्रवाल को इस बात से थोडी पीडा थी कि हिन्दी का आम लेखक तकनीक से दूरी बनाये रखने में अपनी महानता मानता है, जबकि, नए आ रहे बदलावों की पदचाप को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए.

अग्रवाल का यह भी मत था कि वेब पत्रकारिता किताब और मुद्रण की विरोधी नहीं अपितु इसकी पूरक ही है, अत: इन्हें पारस्परिक विरोधी की निगाहों से नहीं देखा जाना चाहिए. इन्द्रधनुष इण्डिया को राजस्थान की पहली हिन्दी वेब पत्रिका कहे जाने के सन्दर्भ में उनका कहना था कि यद्यपि यह सच है कि ‘इन्द्रधनुष इण्डिया’ अब तक भी प्रांत की एक मात्र वेब पत्रिका है, किंतु उन्हें तो खुशी तब होगी जब राजस्थान से अगणित वेब पत्रिकाएं निकलने लगेंगी, ठीक उसी तरह जिस तरह कभी यहां से खूब सारी लघु पत्रिकाएं निकला करती थीं. उनकी प्रतिस्पर्धा ही उनकी गुणवत्ता का कारण बनेगी.

इस अवसर पर श्रीमती कमलेश माथुर की नव प्रकाशित पुस्तक ‘ वन्य जीवन की लोककथाएं’ का लोकार्पण भी किया गया.

गोष्ठी का संचालन प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव सुपरिचित कवि प्रेमचन्द गांधी ने किया. गांधी ने अपनी सुविचारित टिप्पणियों से चर्चा को वैचारिक समृद्धि प्रदान की. प्रारम्भ में प्रगतिशील लेखक संघ की जयपुर इकाई के अध्यक्ष जाने-माने कवि गोविन्द माथुर ने स्वागत किया और अंत में कृतज्ञता ज्ञापन किया कवि ओमेन्द्र ने. गोष्ठी में दिवंगत विचारक-दार्शनिक प्रो0 दयाकृष्ण और लेखक लक्ष्मी मल्ल सिंघवी के निधन पर शोकांजलि भी दी गई.

आयोजन में, बकौल नन्द भारद्वाज, ‘शहर की सबसे संज़ीदा जेण्ट्री’ की उपस्थिति थी जो आयोजकों के उल्लास का सबसे बडा कारण रही. विषय की नवीनता और प्रासंगिकता तथा वक्ताओं के सारगर्भित वक्तव्यों के कारण यह गोष्ठी लम्बे समय तक याद रखी जाएगी.

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विवरण: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

ई-2/211, चित्रकूट, जयपुर.

नाम

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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