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ब्रजेश्वर मदान की कविताएं

parinde

-1-

एक लड़की को देखते हुए

देखता हूं

मिलने लगा है उससे मेरा चेहरा

उसकी तरह ही फुलाने लगा हूं गाल

या सहलाने लगता हूं

अपने सिर के बाल

कभी कभी

उसकी तरह ही

रख लेता हूं नाक के नीचे उंगली

और उसकी की हरकत

महसूस करता हूं

अपने हाथों की उंगलियों में

लिखते समय कभी कभी

उसकी तरह ही

कुर्सी को कभी आगे

कभी पीछे खिसकाता हूं

या सिर उठाकर ऐसे देखता हूं

जैसे वह पास होते हुए भी

देख रही है बहुत दूर

अपने आप से दूर

देह और दुनिया से दूर।

 

-2-

जब उसे किसी लड़की से

बातें करते देखता हूं

तो सोचता हूं कितनी बातें

होती हैं लड़कियों के पास

करने के लिए

बातें करते करते बूढ़ी हो जाती हैं

और फिर भी खत्म नहीं होती बातें

मां के पास भी कितनी बातें होती थीं

करने के लिए

बातें करते करते भूल जाती थी

अंगीठी पर रखी दाल

पिता के आने का समय

नहीं सुनती थी

हम बच्चों की आवाज

लेकिन बातें औरतों से ही करती थी

नहीं याद आता कि कभी उसे देखा हो

पिता से बातें करते

बोलती भी थी

शायद कभी कोई शब्द

जैसे उस लड़की से

मेरा रिश्ता है नि:शब्द।

 

-3-

देखता हूं उसे

बैठी है कम्प्यूटर के आगे कुर्सी पर

झुका हुआ है उसका चेहरा

की बोर्ड पर दौड़ रही हैं अंगुलियां

पीठ पर हिलते हैं उसके बाल

कभी कभी सिर के बालों को

उठाता है उसका हाथ

कभी सहलाती है

कभी खुजलाती है

अपने केश

कभी की बोर्ड से उठाकर हाथ

भींचती है अपनी मुट्ठी

जैसे पकड़ रही हो कोई विचार

या जैसे उसके हाथ से

निकला जा रहा हो कोई ख्याल॥

2 टिप्पणियाँ

  1. सही है आपकी सोंच और कल्पनाएँ विल्कुल वर्तमान स्थिति के अनुकूल है। आज का ऐसा कोई भी युवा मन ऐसा नहीं होगा जो किसी लड़की को देखने के बाद ऐसा न सोंचता हो। समसामयिक मानवीय भावनावों को जनसमुदाय के बीच प्रस्तुत करने का इससे सुंदर तरीका शायेद ही ढूँढा जा सके ।

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  2. बेनामी1:50 pm

    Hi Avaneesh,

    Mujhe bahut achcha laga tumhari kavita ko padhkar...

    Dost keep it up this is good coz this is the way through which you can spread your thought to the world...

    Really you have done very admirable job you really deserve to it...

    जवाब देंहटाएं

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