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होसे सारामागो : अपने पात्रों का शागिर्द

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- विजय शर्मा 'दुनिया कितनी सुन्दर है और कितने दु:ख की बात है कि मुझे मरना है. - होसे सारामागो जिस व्यक्ति ने देश के इतिहास में संशोधन क...

- विजय शर्मा

'दुनिया कितनी सुन्दर है और कितने दु:ख की बात है कि मुझे मरना है. - होसे सारामागो जिस व्यक्ति ने देश के इतिहास में संशोधन की हिमाकत की हो और इतने पर ही रुक न गया हो, भविष्य को भी सुधारने का प्रयास किया हो. उसे यदि नोबेल पुरस्कार मिलता है तो अपने स्वार्थ के लिए यथास्थिति को बरकरार रखने वालों को यह कदापि सहन न होगा. और यही हुआ होसे सारामागो (Jose Saramago) के साथ. जब उन्हें 1998 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला तो न केवल उनके देश पुर्तगाल में वरन यूरोप के अन्य देशों और अमेरिका में भी खूब हलचल मची. यह हलचल सकारात्मक न थी. यह हलचल उनके काम को लेकर न थी. यह हलचल उनकी मार्क्सवादी विचारधारा को लेकर थी. हाँ उनकी मार्क्सवादी विचारधारा को लेकर उनकी खूब आलोचना हुई और इस हंगामे में उनके रचनात्मक कार्य को अनदेखा करने का कार्य जम कर हुआ. इसीलिए वे अपने नोबेल भाषण में भी इस बात पर बोलने से नहीं चूकते हैं. अपने भाषण में वे बताते हैं कि कैसे रचना के चरित्र रचनाकार के मालिक बन जाते हैं और रचनाकार स्वयं एक शागिर्द है जो आजीवन सीखता रहता है. इस आलेख में उनके नोबेल भाषण, उनकी विचारधारा, उनके कार्यों तथा जीवन को समेटने का प्रयास किया गया है.

मार्केस ने कहानी कहने की विधि अपनी नानी से सीखी थी. दादी नानी कहानियों का अजस्र स्रोत हुआ करती हैं. पर होसे सारामागो ने बचपन में अपने नाना से कहानियाँ सुनी थी और आगे चल कर नाना की कहानियाँ और नाना का जीवन, नाना के आसपास का परिवेश उनके लिए लेखन का प्रेरणा स्रोत बना. वे अपने नोबेल भाषण में कहते हैं कि वे स्वयं को एक शागिर्द (अपरेंटिस) कहना पसन्द करते हैं क्योंकि उन्होंने जीवन भर सीखा है. बचपन में जिस वातावरण में वे रहे उससे उन्हें लिखने की सामग्री मिली और लिखने के दौरान उन्होंने अपने द्वारा निर्मित चरित्रों से बहुत कुछ सीखा. उनके पात्रों ने उनको गढा है. जब वे एक रचना करते हैं तो उससे बहुत कुछ सीखते हैं और यह सीखना उन्हें अगले लेखन के लिए प्रेरणा प्रदान करता है.

1998 के नोबेल पुरस्कार विजेता ने अपने जीवन में सबसे बुद्धिमान जिस आदमी को जाना था वह लिखना- पढ़ना नहीं जानता था. जब फ्रांस की जमीन पर एक नए दिन की संभावना झूलती होती थी यह व्यक्ति चार बजे भोर में अपने तखत से उठता और खेतों की ओर जाता, अपने साथ अपने पालतू आधा दर्जन सूअरों को भी चराने ले जाता. सूअर जिनसे उसका और उसकी पत्नी का पोषण होता था. यह व्यक्ति और कोई नहीं होसे के नाना थे. सारामागो की माँ के मातापिता न्यूनतम पर जीते थे, सूअरों को पाल कर जिन्हें वे रिबाटेजो इलाके के एजिनहागा गाँव के पास के बाजार में बेचते और उससे जो आ मद नी होती उससे गुजर-बसर करते थे. उनके नाना का नाम जेरोनिमो मेरिन्हो तथा नानी का नाम होसेफा कैक्सिन्हा था और दोनों अनपढ़ थे. सर्दियों में जब तापमान बहुत नीचे चला जाता और घर में बरतनों में रखा पानी जमने लगता वे सूअरबाड़े में जा कर सूअर के कमजोर बच्चों को अपने बिस्तर में ले आते. खुरदुरे कम्बलों में वे अपने बदन की गर्मी देकर जानवरों के उन बच्चों को सर्दी से मरने से बचाते. वे दोनों दयालु थे पर यह उनकी दयालुता नहीं होती थी. उन्हें इस कार्य के लिए जो उकसाता था वह था उनका अपना स्वार्थ. वे इन जानवरों को बिना किसी दया की विशिष्ट भावना के सुरक्षा देते थे ताकि उनकी अपनी रोजी-रोटी चलती रहे.

जैसा कि स्वाभाविक था जीवन ने उन्हें सिखा दिया था कि जरूरत के लिए क्या करना है, क्या नहीं करना है. जीवन ने उन्हें सिखा दिया था कि उनका जीवन इन जानवरों पर निर्भर है, ये जानवर ही उनका और उनके परिवार का भरण पोषण करते हैं. अत: उन्होंने यह भी सीख लिया था कि इन जानवरों के जीवन की रक्षा करना आवश्यक है.

होसे सरामागो ने बचपन में बहुत बार सूअरों की देखभाल में अपने नाना की सहायता की, घर से जुड़े किचेन गार्डन के लिए जमीन की खुदाई की, जलाने के लिए लकडियाँ फाडीं और बड़े चक्के को बहुत बार घुमाया जिसकी सहायता से पम्प से पानी निकाला जाता था. बहुत बार वे सामुदायिक कुँए से पानी निकाल कर अपने कंधे पर रख कर घर लाते. भोर में सूअरों की रखवाली कर रहे होते अपने नाना की आँख बचाकर बहुत बार वे भुट्टे के खेतों की ओर अपनी नानी के संग रस्सी डोरी और बोरे ले कर खेत से बचा खुचा पुआल बटोरने जाते ताकि सूअरों को खिलाया जा सके.

और कभी-कभी गर्मियों की रात में खाना खाने के बाद उनके नाना कहते, 'होसे चलो आज हम दोनों अंजीर के पेड़ के नीचे सोएँगे. उनके यहाँ अंजीर के तीन पेड़ थे परंतु यह तीसरा पेड़ खास था. यह बड़ा और सबसे पुराना था. वहाँ अंजीर पेड़ के नीचे लेट कर वे आकाश गंगा निहारते. पत्तों के बीच से तारों की लुका छिपी देखते और उनके नाना उन्हें तरह-तरह की कहानियाँ, लोगों के किस्से और अपने अनुभव सुनाते. इनमें साहसी कथाएँ, प्रसिद्ध कहानियाँ, लोक कथाएँ, डरावनी, मृत्यु की कहानियाँ, प्रेरणादायक कहानियाँ आदि तरह-तरह की कहानियाँ होती थीं. वे पूर्वजों की बातें बताते, अनोखी दास्तानें सुनाते और बालक होसे इन्हें सुनते हुए जागता भी रहता, साथ ही उसके लिए ये लोरी का काम भी करतीं. पता नहीं चलता था कि उनके नाना कभी-कभी क्यों चुप हो जाते थे. शायद यह सोच कर कि बालक सो गया है या कुछ और विचार करते हुए या फिर अपने अनुभवों में खो कर जब वे चुप हो जाते तो थोड़ी देर बाद बालक पूछता. 'फिर क्या हुआ उसके बाद? जैसा कि बच्चे करते हैं. ठीक वैसे ही जैसे राहुल यशोधरा से पूछता है, 'माँ ! फिर क्या होगा उसके बाद? पता नहीं होसे के नाना स्वयं को याद दिलाने के लिए बार-बार वे ही कहानियाँ दोहराते थे या पुरानी कहानियों को नया करने के लिए उसमें हर बार इजाफा करते जाते थे. एक समय था जब बालक होसे सोचता था कि उनके नाना दुनिया की सब बातें जानते हैं. उनका जन्म एक भूमिहीन परिवार में एल्मोंडा नदी से करीब सौ किलोमीटर दूर रिबाटेजो नामक क्षेत्र के अजिन्हागा गाँव में 1922 को हुआ था. उनके पिता का नाम होसे डि सूजा तथा माता का नाम मारिया ड पिएडाड़े था. उनका अपना नाम भी हेसे डि सूजा हो सकता था यदि रजिस्टार ने अपनी मनमर्जी से यह सारामागो न जोड़ दिया होता.

असल में सारामागो उनके पिता के इलाके में पाए जाने वला एक जंगली पौधा है जिसका गरीब लोग खाने के लिए प्रयोग करते थे. उनके पिता का परिवार इसी पौधे के नाम से जाना जाता था अत: जब बच्चे का नाम लिखने का समय आया तो रजिस्ट्रार ने उनके नाम के सामने डि सूजा न लिख कर सारामागो लिख दिया और सात साल की उम्र में जब पहली बार स्कूल जाने के सिलसिले में उनके दस्तावेज स्कूल में प्रस्तुत किए गए तब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका पूरा नाम होसे डि सूजा सारामागो है. वे अपने बारे में एक और बात बताते हैं कि उनकी जन्म तिथि को लेकर भी ऐसे ही गड़बड़ हुई है उनका वास्तविक जन्म दिन 16 नवम्बर को है परंतु दस्तावेजों में यह दो दिन बाद यानि 18 नवम्बर दर्ज है. पढ़ने में तेज थे लिखने में वर्तनी की कोई भूल नहीं करते थे. उन्हें कक्षा तीन में डबल प्रमोशन मिला और इस तरह उन्होंने कक्षा तीन और चार की पढ़ाई एक ही साल में पूरी कर ली. परंतु आर्थिक अभावों में शिक्षा जारी न रह सकी. उनके पिता ने प्रथम विश्वयुद्ध में एक सैनिक के रूप में भग लिया था. उनके पिता ज्यादा पढ़े लिखे न थे, मात्र थ्री आर्स (रीडिंग, राइटिंग तथा रिथमेटिक) जानते थे और अपने अनुभवों के कारण उन्होंने 1924 में खेती छोड़ कर लिस्बन में रहने का निश्चय किया.

लिस्बन जाने के बाद उन लोगों की माली हालत थोड़ी सुधर गई परंतु वे कभी भी बहुत सम्पन्न न बन सके. वहाँ जाते ही उन लोगों पर दु:ख का पहाड़ टूट पड़ा. होसे से दो साल बड़ा उनका भाई फ्रांसिसको गुजर गया. तेरह चौदह वर्ष की उम्र में जाकर ही वे उस घर में रहने लगे जिसे अपना कहा जा सकता था. हालाँकि यह घर बहुत बड़ा नहीं था पर अपना था, इसके पहले वे सदा दूसरों के घर में रह रहे थे. बालक होसे बहुत समय तक अपने नाना-नानी के पास ही रहा.

जब सुबह होती चिडिया चहकने लगती उनके नाना उन्हें सोता छोड़ कर अपने पशुओं के साथ खेतों की ओर निकल जाते. चौदह वर्ष की उम्र तक सारामागो ने जूते नहीं पहने थे और वे नंगे पैर अपना खुरदुरा कम्बल समेट कर घर की ओर जाते जहाँ उनकी नानी पहले ही उठ चुकी होती और उनके लिए एक बड़े कटोरे में कॉफी और ब्रेड लिए इंतजार कर रही होती. जब वे खा रहे होते वे पूछतीं क्या वह मजे में सोए, यदि कभी वे अपने किसी बुरे सपने के बारे में बताते तो वे कहतीं 'चिंता मत करो सपने ठोस नहीं होते हैं. पहले वे सोचते थे कि उनकी नानी बुद्धिमान तो हैं पर नाना की तुलना में वे ठहर न पाती क्योंकि नाना अंजीर के पेड़ के नीचे लेटे कुछ ही शब्दों में जैसे उनकी दुनिया घुमाते थे और उनकी दुनिया उथल पुथल कर देते थे वे ऐसा नहीं करती थीं. लेकिन बाद में, बहुत सालों के बाद जब उनके नाना गुजर गए, वे स्वयं बड़े हो गए तब जाकर उन्हें नानी का महत्व पता चला. उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी नानी भी सपनों में विश्वास करती थीं. नाना की मृत्यु के बाद वे घर में अकेली रहती थीं और वहीं एक दिन अपनी झोपड़ी के दरवाजे पर बैठी हुई बड़े और छोटे तारों को निहारते हुए उन्होंने कहा था, 'दुनिया कितनी सुन्दर है और कितने दु:ख की बात है कि मुझे मरना है. वे मरने से डरती नहीं थीं पर मरना दु:खद था. अपने कठोर जीवन के अंत की ओर जाते हुए उपहार के रूप में उन्होंने सौंदर्य को पाया था, जब उन्होंने यह बात कही वे दरवाजे पर जैसे बैठी थीं वह दृश्य सारामागो के मन मस्तिष्क पर सदा के लिए अंकित हो गया.

यह वह घर था जहाँ के लोग सूअरों के साथ वैसे ही सोते थे जैसे लोग अपने बच्चों के साथ सोते हैं. जिस घर के लोग जीवन से बिछुड़ने पर इसलिए दु:खी होते क्योंकि जिन्दगी खूबसूरत है. सारामागो के सूअर पालने वाले नाना, कहानी सुनाने वाले नाना को जब भान हुआ कि मृत्यु आ रही है और उन्हें ले जाएगी वे अपने बाड़े के हरेक पेड़ से विदा लेने गए, हर पेड़ को एक-एक करके उन्होंने गले लगाया, रोए और उससे विदा ली और कहा कि अब वे उन्हें नहीं देख पाएँगे. ये बातें आज पढ़ने वालों को बेकार की बकवास लग सकती हैं, मजाक लग सकती हैं. आज जीवन इतना ज्यादा यांत्रिक हो गया है, इतनी तेजी से भाग रहा है कि हमें आदमियों से सम्बंध बनाने की फुर्सत नहीं है, जानवरों और पेड़ पौधों की बात तो दूर है. यदि संवेदनशील हृदय से इन बातों को पढ़ा और अनुभव किया जाए तो ये किसी और जगत की, स्वप्न लोक की बातें लगती हैं, जब अपने पॉइंट फोर प्रोग्राम के तहत अमेरिका ने मिश्र के किसानों को मॉडल गाँव बसा कर रखा तो उन्हें नींद नहीं आती थी. वे किसान रात-रात भर सो नहीं पाते थे क्योंकि इसके पहले वे कभी भी अपने पशुओं से अलग नहीं सोए थे.

वे सदा अपने पशुओं के संग एक ही स्थान पर सोने के आदी थे, गोबर की गंध उनके जीवन का अनिवार्य अंग थी. पशु ही इन भूमिहीन लोगों की सबसे बड़ी सम्पत्ति होते थे. पशु उनके जीवन का अभिन्न अंग थे वे उनके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते थे. एक समय ऐसा ही था. मनुष्य अपने पर्यावरण से एकाकार था प्रकृति से इतना जुड़ा हुआ था कि जब वह दु:खी होता तो प्रकृति दुखी होती और जब वह प्रसन्न होता तो पूरा वातावरण खिल उठता. प्रकृति के साथ उसका पूर्ण तादात्म्य था. यहाँ एक कहानी बताने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रही हूँ. श्रीमद भागवत महात्म्य के प्रारम्भ में शुक की स्तुति में यह श्लोक आता है शुक मुनि जिनका अभी उपनयन भी नहीं हुआ है वे निरे बालक मात्र हैं दुनिया त्याग करके जा रहे हैं तो पीछे से उनके पिता वैशम्पायन विरह कातर हो कर पुकारते हैं बेटा! बेटा! कहाँ जा रहे हो? तो प्रकृति से तन्मय हो चुके शुक की ओर से समस्त वन से उत्तर आता है. ऐसे मुनि को मेरा प्रणाम.

'यं प्रव्रजंतं अनुपेतं अपेतकृत्यं

द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव

पुत्रेति तन्मयतया तरवोभिनेदु:

तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोस्मि.

मेरे एक मित्र जो काफी समय तक आश्रम में थे और आश्रम छोड़ने के बाद भी मन से सन्यासी हैं, वे मुक्ति की कामना नहीं करते हैं. दुनिया इतनी सुन्दर है कि वे बार-बार यहाँ आना चाहते हैं पुनर्जन्म हो या नहीं वे इस दुनिया में बार-बार जन्म लेना चाहते हैं. उन्नीस वर्ष की अवस्था में पहली बार सारामागो किताब खरीद सके वह भी एक दोस्त से राशि उधार ले कर. मात्र अपनी उत्सुकता और सीखने की इच्छा के कारण उन्होंने पढ़ने की आदत विकसित की और उसे सुसंस्कृत बनाया. होसे का जीवन बहुत अभावों में बीता. पढ़ाई भी अधिक न हो सकी और तो और अपने विचारों के कारण उन्हें बहुत परेशानियाँ भी झेलनी पडीं. 1944 में जब उनकी शादी हुई तब तक वे कई पेशे बदल चुके थे और उस समय सोशल वेल्फेयर सर्विस में थे, एक तरह के एडमिनिस्ट्रेटिव सिविल सर्वेंट थे. उनकी पत्नी रेलवे कम्पनी में टाइपिस्ट थीं. कई सालों के बाद, बाद में वे पुर्तगाल की एक प्रसिद्ध शिल्पकार हुई परंतु उन दोनों के एकमात्र बेटे के जन्म के समय वे गुजर गईं. 1986 में सारामागो स्पेनिस पत्रकार पिलार ड़ेल रिओ से मिले और दो साल बाद उन लोगों ने विवाह कर लिया. 1947 में उनके जीवन में एक साथ कई महत्वपूर्ण बातें हुई उनके एकमात्र बच्चे का जन्म और साथ ही उनकी पहली पुस्तक 'द विडो का प्रकाशन. बाद में इस पुस्तक का प्रकाशन 'द लैंड ऑफ सिन के नाम से हुआ. राजनीतिक कारणों से 1975 में असिस्टेंट एड़ीटर का काम छोड़ना पड़ा. उन्होंने फिर एकाध प्रोजेक्ट शुरु करके बीच में छोड़ दिए. 1966 में 'पोसीबल पोयम्स के साथ उनकी वापसी हुई.

फिर तो काम चल पड़ा. 'प्रोबबली जॉय, 'फ्रॉम दिस वर्ल्ड एंड दि अदर, 'द ट्रेवल्स बैगेज तथा अखबारों को लिखे आलेख के दो संग्रह आए. आलोचकों का कहना है कि सारामागो को समझने के लिए इन आलेखों को पढ़ना अत्यावश्यक है. आय बढाने तथा अच्छा लगने के कारण उन्होंने खूब अनुवाद कार्य किया. कोलेट, मॉपांसा, टॉल्स्टॉय, बॉडलेयर, हीगल और ना जाने किस-किस को अनुवादित कर डाला. इसके साथ ही साहित्यिक आलोचक का कार्य भी बखूबी निभाया. 1969 में प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की परंतु पार्टी के प्रति आलोचनात्मक रवैया बना रहा. 1980 के बाद से वे अपने सृजनात्मक साहित्यिक कार्य में डूब गए. सारी जिन्दगी उन्हें बार-बार बेरोजगारी का सामना करना पड़ा. बहुत साल के बाद अपने नाना जेरोनीमो और नानी होसेफा के बारे में लिखते हुए होसे सारामागो को भान हुआ कि वे सामान्य व्यक्तियों को साहित्यिक चरित्रों में ढाल रहे थे. लोग बताते थे कि उनकी नानी जवानी में बहुत खूबसूरत थीं. शायद यह सारामागो का तरीका था अपने उन लोगों को न भुलाने का. अपनी स्मृति के सहारे वे उन लोगों को बार-बार विभिन्न कोणों से चित्रित करते हैं. वे उन लोगों की एकरस उबाऊ जिन्दगी को, क्षितिज विहीन दैनंदिनी रोजमर्रा की जिन्दगी को अपनी यादों के सहारे अलौकिक ढंग से वर्णित करते हैं. उन लोगों को, जिन्होंने सारी जिन्दगी एक गाँव में बिताई.

इसी तरह से वे अपने पिता का चित्रण भी अपने लेखन में करते हैं. उनके एक चरित्र बेरबेर के बाबा का जब वे चित्रण कर रहे थे तो उनके मन में अपने माता-पिता का एक फोटो था. इस फोटोग्राफ में उनके माता-पिता जो उस समय जवान और खूबसूरत थे फोटोग्राफर की ओर मुँह करके खड़े हैं. उनके चेहरे पर एक गम्भीरता का भाव है शायद कैमरे का सामना करने का डर था. वह डर जो मात्र उस क्षण था जब कैमरे का लेंस उन्हें पकड़ रहा था, डर जो शायद उन्हें फिर कभी नहीं लगा. क्योंकि उनके लिए आने वाला कठोर दिन, दूसरा दिन होगा. फोटो में उनकी माँ अपनी बाई कोहनी एक लम्बे खम्बे से टिकाए खड़ी हैं उनका दायाँ हाथ, जिसमें एक फूल है, उनके शरीर से सटा हुआ है. उनके पिता ने उनकी माँ को पीछे से अपनी बाँह के घेरे में ले रखा है. उनका खुरदुरा हाथ माँ के कंधे पर से एक पंख की तरह दीख रहा है. वे लोग शर्माए से एक कार्पेट पर खड़े हैं और फोटो के पीछे बैकग्राउंड के रूप में एक कैनवास है जिस पर नव अभिजात वास्तुकला का नमूना है. इस फोटो के अपने साहित्यिक चित्रण में अंत में वे पात्र के मुँह से कहलवाते हैं कि एक दिन आएगा जब मैं यह सब बातें कहूँगा. हालाँकि उनकी कहानी के बेरबेर का बाबा दक्षिण अफ्रीका से है. वे कहते हैं कि पशुपालक नाना, खूबसूरत नानी, गम्भीर और सुन्दर माता-पिता और पिक्चर में एक फूल इससे बढिया वंशावली उन्हें कहाँ मिलेगी? इससे बेहतर सहारा उन्हें कहाँ मिलेगा? ये बातें उन्होंने नोबेल पुरस्कार मिलने के करीब तीस साल पहले लिखीं थीं और उनका उद्देश्य उन लोगों और उस जीवन को पुनर्निर्मित करना था जिन्होंने उनके अस्तित्व का निर्माण किया था और जो उनके बहुत करीब थे. उन्होंने इसलिए इनका सृजन किया था ताकि लोगों को यह न बताना पड़े कि वे कहाँ से आते हैं उनका मूल कहाँ से है. वे किस मिट्टी से बने हैं और धीरे-धीरे वे क्या बन गए हैं. पर वे ठीक नहीं सोच रहे थे क्योंकि बॉयलॉजी ठीक इसी तरह काम नहीं करती है और जेनेटिक्स बहुत ही रहस्यमय राह अपनाती है. एक व्यक्ति के निर्माण में उसकी वंशावलि के अलावा और बहुत कुछ योगदान करता है. बहुत सारे तत्व मिल कर एक व्यक्तित्व को बनाते हैं. वंशावलि, पर्यावरण के अलावा व्यक्ति का अपना कार्य अपनी सोच भी इसमें योगदान करती है. और यही सारामागो के साथ भी हुआ, उन्होंने जिन पात्रों को निर्मित किया वे पात्र अपने साथ-साथ उनका भी निर्माण करते चले गए.

जब वे अपने नाना-नानी, माता-पिता को साहित्य में चित्रित कर रहे थे, सामान्य हाड मांस के लोगों को चरित्रों में रूपायित कर रहे थे, वे नए और भिन्न रूप में अपने जीवन निर्माताओं को रच रहे थे, बिना जाने हुए, अनजाने में वे उन चरित्रों का रास्ता साफ कर रहे थे जिन्हें वे बाद में चित्रित करने वाले थे. वास्तविक साहित्यिक चरित्र जो आगे चलकर उनके लिए सामग्री और वे औजार लाएँगे, जिनसे अच्छे या बुरे, लाभ या हानि जो भी हो उनके अपने व्यक्तित्व का निर्माण होगा. इन चरित्रों के निर्माण के साथ साथ वे अपना चरित्र भी निर्मित कर रहे थे. वे कह रहे हैं कि चरित्रों की सृष्टि होते-होते, उन चरित्रों के द्वारा स्वयं उनका सृजन हो गया. वे विश्वास करते हैं कि अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द, पन्नेपन्ने, किताब-दर-किताब उन्होंने जिन चरित्रों का सृजन किया इस प्रक्रिया में उन चरित्रों के द्वारा स्वयं उनका भी निर्माण हुआ. वे विश्वास करते हैं कि उन साहित्यिक चरित्रों के बगैर वे वह न होते जो वे आज हैं, उनके बिना सारामागो के जीवन की सफलता न होती वह मात्र स्केच बन कर रह जाते. केवल एक वायदा बन कर रह जाते, एक अस्तित्व जो अंत में होता तो पर अस्तित्व के रूप में मैनेज नहीं होता.

आज वे स्पष्ट रूप से देख पा रहे हैं कि जिन लोगों ने उन्हें जीवन के लिए गहनता से कठोर मेहनत करनी सिखाई, जो उनके जीवन के निर्माता थे, उनके उपन्यासों और नाटकों के वे दर्जनों पात्र उनकी नजरों के सामने घूम रहे हैं. कागज कलम स्याही से रचे गए वे आदमी औरत जिन्होंने विश्वास किया कि वे एक लेखक होने के नाते उन्हें राह दिखा रहे थे, नरेटर होने के नाते वे अपनी मनमर्जी से रचने का तरीका चुन रहे थे, लेखक होने के कारण आज्ञाकारी के रूप में उनके पात्र उनकी बात मान रहे थे, कठपुतली की तरह उनके इशारों पर नाच रहे थे, जिनके कार्यों का लेखक पर कोई असर नहीं पड रहा था, केवल डोरी का भार और तनाव उस पर था. पर सच्चाई यह नहीं है इन चरित्रों ने न केवल उन्हें जीवन के विषय में बहुत कुछ सिखाया बल्कि उनके आज जो वे हैं उस व्यक्तित्व का निर्माण भी किया. नि:सन्देह इन मास्टर्स में से पहला उनकी कहानी 'मैनुआल ऑफ पैंटिंग एंड कैलीग्राफी (Manual of Painting and Calligraphy) का मुख्य चरित्र एक चित्रकार है. वे उसे 'एच मात्र एक सरल-सा नाम देते हैं. उसने उन्हें बिना किसी चिढ़ या फ्रस्ट्रेशन के ईमानदारी का निरीक्षण करना और उसे स्वीकार करना सिखाया. एक गुण जो वे मानते हैं कि पहले उनमें न था. वे बचपन के अपने छोटे से क्षेत्र से ऊ पर नहीं उठ पा रहे थे, उठना नहीं चाहते थे. बस उसी को खोद कर जडों की ओर जा रहे थे. उसे ही वे संसार माने बैठे थे. उनके कार्य का मूल्यांकन करना दूसरों का काम है दूसरे यह जाँचें कि उनका प्रयास कैसा रहा. पर वे मानते हैं कि 'मैनुअल ऑफ पैंटिंग एंड कैलीग्राफी के बाद उनके कार्य ने उस सिद्धांत को माना है कि बिना चिढ़े हुए या बिना कुंठित हुए ईमानदारी को मानना और स्वीकारना चाहिए.

नोबेल पुरस्कार मिलने के काफी पहले से होसे सारामागो प्रसिद्ध थे परंतु उनका लेखन एलीट की श्रेणी में न आने के कारण नोबेल समिति उन्हें पुरस्कार देने का निर्णय नहीं कर पा रही थी. साथ ही नोबेल समिति का उनकी भाषा, पुर्तगाली भाषा के प्रति भी बहुत लगाव का ना था. आज स्थिति बदल चुकी है मार्क्सवादी विचारधारा के लेखकों को भी नोबेल पुरस्कार की अनुशंसा प्राप्त है. बहुत सारे मार्क्सवादी विचारधारा के लेखकों को साहित्य ही नहीं अन्य विधाओं में भी नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है. पर एक समय था जब मार्क्सवादी लेखक को इस पुरस्कार के लिए नामित करने की बात सोची भी न जा सकती थी. हाँ यदि कोई रचनाकार रूस या कम्युनिस्ट शासन की आलोचना करता तो समिति उसे सिर आँखों पर बैठाती थी. यह भी एक कारण था सारामागो को पहले पुरस्कार प्राप्त न होने का. उनकी मार्क्स के प्रतिबद्धता भी उनके चुनाव न होने की एक वजह रही थी. पर वे अपना लेखन करते गए, उनका काम उनकी पहचान बन गया उनके लेखन का जादू लोगों के सिर चढकर बोलने लगा. एक समय आया जब समिति के लिए उनकी उपेक्षा करना सम्भव न रह गया और हार कर समिति को उन्हें इस पुरस्कार से नवाजना पड़ा. ये सारी बातें गुप्त न थीं इसीलिए पुरस्कार ग्रहण के समय दिए अपने भाषण में वे परोक्ष रूप से इन बातों का हवाला देते हैं और एक तरह से समिति पर कटाक्ष भी करते हैं.

सारामागो को पुरस्कार मिलने की घोषणा से धर्म के ठेकेदारों को सबसे ज्यादा परेशानी हुई. वतिकान ने सरे आम इसकी आलोचना की. और जब वतिकान किसी बात के खिलाफ हो तो पश्चिम के बहुत कम अखबार और आलोचक उस बात का समर्थन करने की हिम्मत जुटा पाते हैं. नतीजतन अखबारों के लेख और सम्पादकीय में भी उनके कार्य का सही मूल्यांकन होने के स्थान पर मात्र उनकी आलोचना ही प्रकाशित होती रही. देखना यह है कि क्या सरामागो मात्र मार्क्सवादी कठमुल्ला हैं? यदि उनके साहित्य का निरपेक्ष तरीके से मूल्यांकन किया जाए तो यह बात स्पष्ट होती है कि वे कभी भी मार्क्सवाद की रूढियों का समर्थन नहीं करते हैं वरन जब भी ऐसा मौका आता है वे आपने लेखन में और लेखन के द्वारा इसका विरोध करते नजर आते हैं. धार्मिक कठमुल्लाओं की आँख में तो वे काफी पहले से गड रहे थे.

उन पर पुर्तगाल के ईसाइयों की भावनाओं का अपमान करने का आरोप लगा था. उन्हें 'हठी कम्युनिस्ट, 'धर्म विरोधी जैसे विशेषणों से नवाजा गया था. उन्होंने अपने नाना-नानी के स्थान के लोगों, एलेंटेजो के लोगों का चित्रण किया जो दरिद्रता में जीवन बिताने को अभिशप्त थे. ये भूमिहीन लोग कड़ी मेहनत के बावजूद किसी तरह बड़ी मुश्किल से जीवित रह पाते. संघर्ष ही जिनका जीवन था और निराला के शब्दों में दु:ख ही जिसकी कथा रही, क्या कहूँ जो अब तक न कही. पर सारामागो ने इस लोगों की कथा कही और खूब कही. हम सभ्य लोग जिसे जीवन कहते हैं वह भी इन लोगों को नसीब न था. सारामागो ने इन्हीं सामान्य जन को अपने साहित्य का विषय बनाया. चर्च जिसे राज्य और जमींदारों दोनों का बल और साथ प्राप्त है, सामान्य जन का कैसे शोषण करता है, कैसे धोखा देते है उन्होंने देखा था, अनुभव किया था और अपने साहित्य में इसे दिखाया. कैसे इन सीधे-सादे लोगों को पुलिस दिन-रात तंग करती है, कैसे ये लोग अक्सर अन्याय का शिकार बनते हैं. ये कहानियाँ मात्र पुर्तगाल के सामान्य जन की न रह कर दुनिया के सब अभावों वाले जीवन की कहानियाँ बन जाती हैं. क्या यह हमारे अपने देश की कहानी नहीं है? दुनिया के किस देश में गरीब समन और शोषण का शिकार नहीं है? अपने इस उपन्यास 'रिजन फॉर्म द ग्राउंड’ में सारामागो अपने बचपन के गाँव के एक परिवार बाडवीदरस की तीन पीढियों की कहानी कहते हैं यह सदी के प्रारम्भ से शुरु हो कर 1974 के एप्रिल तक चलती है, जिसमें सामान्य जनता तानाशाही का तख्ता पलट देती है. ये लोग मिट्टी से उठे हुए वास्तविक लोग थे बाद में वे साहित्य के पात्र बन गए हैं. आठवें दशक में पुर्तगाल यूरोपियन कम्युनिटी में शामिल हो गया यही कम्युनिटी बाद में यूरोपियन संघ कहलाई. पुर्तगाल में पिछली सदी में खूब राजनीतिक उथल-पुथल रही. होसे ने यह उपन्यास पुर्तगाल की क्रांति को आधार बना कर लिखा है इसे उनके पहले महत्वपूर्ण कार्य की संज्ञा दी जाती है. इसमें उन्होंने एकालाप और सम्वादों के माध्यम से कहानी प्रस्तुत की है. बचपन में देखे दु:खी शोषित लोगों को अपने उपन्यास में संगठित करके उन्होंने उनसे क्रांति करवा दी है.

अपने प्रत्येक लेखन के दौरान उससे वे कुछ न कुछ सीखते जाते हैं और यह ज्ञान उन्हें अपने आने वाले लेखन के लिए प्रेरणा और सामग्री सौंपता चलता है. ' 'रिजन फॉर्म द ग्राउंड’ लिखते हुए उन्होंने सीखा कि कैसे धैर्य रखना चाहिए और समय में निष्ठा और विश्वास रखना चाहिए. समय एक साथ ही हमें बनाता बिगाड़ता है, पुन: बनाने बिगाडने के लिए. आज भी वर्षों पहले सीखे गए पाठ उनकी स्मृति से मिटे नहीं हैं. प्रतिदिन वे उनका अस्तित्व अपनी आत्मा में अनुभव करते हैं. उन्होंने आशा नहीं छोड़ी है जो अस्मिता उन्हें उन लोगों से प्राप्त हुई है वह उनके लिए महानता के उदाहरण हैं. वैसे वे कहते हैं कि यह समय ही बताएगा कि उन्होंने वास्तव में क्या सीखा है. वे आशावादी हैं अथवा नहीं. उन्हें नहीं लगता है कि कठिन परिश्रम से जीवन यापन करने वाले उन लोगों को, उन स्त्री पुरुषों को उनके इस अनुभव ने बहुत नैतिक या उच्च बना दिया है. 'बाल्टाजार एंड ब्लिमुंडा' और छ: साल बाद 1988 में आए उनके उपन्यास 'इयर ऑफ द ड़ेथ ऑफ रिकार्डो कार्डो राइस ने उन्हें विश्व में स्थापित कर दिया उनकी ख्याति पुर्तगाल के बाहर यूरोप तथा अमेरिका तक पहुँच गई. ब्राजील से यूरोप में रिकार्डो राइस के लौटने और अपने आप को नष्ट करने को तत्पर राइस एक सामान्य-सी सेविका के प्रेम में पड़ता है और इसी कहानी के बहाने होसे सारामागो अपने समय से कुछ पहले के आर्थिक और राजनीतिक पतन को इस उपन्यास में चित्रित करते हैं. यह अवनति का एक भयावह चित्रण है. इस उपन्यास में उन्होंने एक नवीन शैली का प्रयोग भी किया है. उन्होंने पुर्तगाली कवि फेरनांडो एंटोनिओ नोगुएरिआ पेसोआ (1888-1935) को अपना विषय बनाया है. पेसोआ ने यूरोपियन साहित्य में अपनी एक खास जगह बनाई थी उसे आधुनिक पुर्तगाली साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है परंतु उसे यह स्थान लिस्बन में उसकी मृत्योपरांत प्राप्त हुआ.

लिस्बन में जन्मे इस कवि का बचपन दक्षिण अफ्रीका में बीता था अत: इंग्लिश उसकी मातृभाषा की भाँति थी. उसने अनुवादक का कार्य करते हुए अपनी कविताएँ इंग्लिश में प्रकाशित करवाई. वह पुर्तगाल के साहित्य में आधुनिक आन्दोलन का अगुआ भी था. पुर्तगाली भाषा में उसने अपनी मृत्यु के बस एक वर्ष पहले अपनी कविताएँ प्रकाशित करवाई. पेसोआ को रिल्के, लोर्का तथा यीट्स के बराबर माना जाता है. उसने अपना सारा जीवन कविताओं को समर्पित कर दिया था और वह अपने आप में एक पूर्ण काव्य आन्दोलन था. वह विभिन्न नामों से कविताएँ लिखता था, जिनके विषय तो भिन्न थे ही उनकी शैली भी अलग-अलग होती थी. कहा जाता है कि उसने छियासी विभिन्न नामों से कविताएँ लिखीं जिनमें से चार नाम प्रसिद्ध हैं ये हैं मालवारो द काम्पोस, अल्बर्टो का इरो, बर्नांडो सोआरेस तथा रिकार्डो राइस. इसी रिकार्डो राइस को सारामागो ने अपनी रचना का माध्यम बनाया है. मरते समय इसने एक बड़े बक्से में ढेरों पांडुलिपियाँ छोड़ी जिनका अध्ययन अब भी मायने रखता है. इसी कवि के भूत को एक चरित्र बना कर सारामागो ने एक फैंटसी रची है.

भाषण में आगे वे कहते हैं कि वे सोलहवीं सदी के पुर्तगाली कवि लुई वाज ड कामोज जिसने 'रिमास रचा उससे कौन सा पाठ लें? इस कवि को वे एक जीनियस मानते हैं और अपने यहाँ के साहित्य में उसे सबसे ऊपर स्थान देते हैं. इस कवि ने 'ओस लुसिआड़ेस में यश, जहाज की दुर्घटना तथा राष्ट्रीय मोहभंग के विषय में कविताएँ रचीं. फरनांडो पिसोआ को इससे जरूर तकलीफ हुई होगी तभी तो उसने 'सुपर केमोज के नाम से कविताएँ लिखीं. पुर्तगाल का यह महान कवि 1524 में जन्मा था इस कुलीन (नोबेल) कवि ने पहले कोर्ट में अपना भाग्य आजमाया फिर उसे एक दासी के प्रेम में पडने के कारण अपना देश छोड़ना पड़ा. वह जब वापस देश लौटा तब तक कंगाल हो चुका था और उसका स्वास्थ्य भी जवाब दे चुका था परंतु वह अपने साथ जो कविताएँ लाया था वे पुर्तगाली साहित्य की धरोहर बन गई. निष्कासन के दौरान वह भारत भी आया था. कहा जाता है कि उसकी 'ओस लुसिआड़ेस कविता वास्को डि गामा की भारत का समुद्री मार्ग खोजने की थीम पर आधारित है. उन दिनों लोग भारत आते थे धनी बनने के लिए और धनी बनते भी थे, शायद कवियों के लिए यह बात सही नहीं है क्योंकि यह कवि एक धनी के रूप में भारत आया और कंगाल बन कर लौटा. अपने महाकाव्य के बावजूद कामोज गरीबी में दस जून 1580 को लिस्बन में गुजरा. उसने नाटक भी लिखे. उसकी कविताओं का मुख्य विषय शारीरिक प्रेम और आध्यात्मिक प्रेम का संघर्ष है. इस कवि ने पुर्तगाली साहित्य में 'यनंग फ्राउट विथ लोनलीनेस एक नई थीम जोड़ी. उसकी कविताएँ अपनी सरलता और गहन सम्वेदना के लिए जानी जाती हैं.

अपने परवर्ती कवियों के लिए वह प्रेरणा और ईर्षा दोनों का विषय रहा. होसे अपने भाषण में कहते हैं कि इस कवि से मैं कौन-सी सीख लूँ? कोई सीख मेरे लिए उपयुक्त न होगी सरलता के अलावा. वे इस कवि की मानवता से द्रवित हैं यह कवि अपनी कविता के प्रकाशन के लिए दर-दर भटकता रहा, बदले में उसे अपने देश, अपने लोगों, अपने राजा से अपमान मिला. होसे कहते हैं कि दुनिया से कवियों, द्रष्टाओं और बेवकूफों को उपहास ही मिलता है. प्रत्येक लेखक जीवन में कम से कम एक बार इस कवि जैसा बनता है, भले ही उन्होंने 'सोबोलस राइस नहीं लिखी है तब भी. नोबल लोगों, दरबारियों और होली इंक्यूजीशन के प्रतिबंध के बीच कल का प्रेमी आज असमय बूढा, लिखने के दर्द और खुशी को लिए बीमार अवस्था में इंडिया से लौटा है. सेना में अपनी एक आँख गवाँ कर वहाँ से दिवालिया बन कर लौटा है, आत्मा को लहुलुहान करवा कर, यह वही कल का लुभाने वाला व्यक्ति है जो दुर्भाग्य से अब कभी भी कोर्ट की स्त्रियों को आकर्षित नहीं कर पाएगा. इसी कवि को होसे सारामागो अपने नाटक 'ह्वाट शैल आई डू विथ दिस बुक? में स्टेज पर प्रस्तुत करते हैं. यहाँ से बात को और गम्भीर रुख देते हुए इस नाटक के अंत में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं. इस प्रश्न का सच पूछा जाए तो कोई सही उत्तर है भी नहीं. प्रश्न है कि 'इस किताब का क्या करोगे? यह बहुत ही गर्वीला अपमान है कि लेखक एक मास्टरपीस को लेकर घूमता है और दुनिया उसे खारिज करती रहती है.

आज जो किताब लेखक लिखता है उसका कल क्या उद्देश्य होगा और उस पर तत्काल शंका करना कि क्या यह लम्बे समय तक टिकेगी? यह कितने समय तक टिकेगी? लेखक स्वयं को भी आश्वस्त करता रहता है. इससे बड़ी आत्मवंचना नहीं हो सकती है कि हम दूसरों को यह अनुमति दें कि वे हमें धोखा दें. 'बाल्टा 'बाल्टाजार एंड ब्लिमुंडा में बाल्टाजार नाम का एक आदमी है जिसका बायाँ हाथ युद्ध में नष्ट हो गया है और एक औरत है जो दूसरों के पार देखने की क्षमता के साथ पैदा हुई है. आदमी का बुलाने का नाम सेवन संस (सात सूर्य) है और औरत जिसका नाम ब्लिमुंडा है जिसका नाम बाद में सात चाँद पड़ गया. क्योंकि ऐसा लिखा है कि जहाँ सूर्य होगा वहाँ चाँद होगा ही और केवल एक के मिलन और सामंजस्यपूर्ण अस्तित्व और दूसरे की इच्छा और प्रेम से ही पृथ्वी रहने योग्य बनती है. यहाँ बारटोलोमिओ नामक एक जेस्युट प्रीस्ट भी है जिसने एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया है जो बिना किसी ईधन के मात्र मनुष्य की इच्छा शक्ति के बल पर आकाश में उड़ सकता है.

यहाँ लेखक मनुष्य की इच्छा शक्ति पर व्यंग्य भी करता है. इच्छा शक्ति जो आज तक दया जैसी सामान्य और सरल-सी बात का चाँद या सूरज बनने का कार्य न कर सकी, न ही सरल-सी बात आदर का प्रयास उसने किया. सारामागो कहते हैं कि ये अट्ठारहवीं सदी के तीन पुर्तगाली बेवकूफ उस समय में हैं जब देश में अंधविश्वास था और इंक्यूजिशन फलफूल रहा था, एक राजा ने अपने घमंड और अपनी महत्वाकांक्षा के उन्माद में एक कॉन्वेन्ट, एक महल और एक बेसिलिका बनवाई. ये इमारतें ऐसी थी जिन्हें देख कर दुनिया ताज्जुब करे. काश उस दुनिया के पास देखने की आँखें होतीं, ब्लिमुंडा जैसी आँखें होती, वे देख पाते कि क्या छिपा हुआ है. इस किताब में एक भीड भी आती है. अपने खुरदुरे और गन्दे हाथों के साथ हजारों हजार आदमी आते हैं जिनके शरीर बरसों की कड़ी मेहनत के कारण क्लांत हो चुके हैं. यह भीड़ बनाने के लिए निरंतर पत्थर उठाते और उनसे कॉन्वेन्ट की दीवाल, महल के कमरे, खम्बे, भित्ति स्तम्भ, हवा के लिए झरोखे, शून्य में बेसिलिका का गुम्बद बनाते थक चुके हैं. सारामागो के इस वर्णन को पढ़कर ताजमहल बनाने वाले कारीगरों की याद हो आनी स्वाभाविक है. और इन सारे क्रिया कलापों के बीच डोमेनिको स्कारलाटी के हार्प की धुन सुनाई देती है जिसे ठीक से मालूम नहीं है कि उसे हँसना है या रोना है. इस तरह वे अपने नोबेल भाषण में अपनी पुस्तक 'बाल्टा 'बाल्टाजार एंड ब्लिमुंडा की कहानी बताते हैं और कहते हैं कि लेखक अपने नाना जेरोनिमो तथा नानी होसेफा के समय की बातों को उन्हीं की भाषा में लिख सका वह भी काव्यात्मकता के साथ इसके लिए वे अपने नाना-नानी के आभारी हैं. उन्होंने काव्य पंक्तियाँ लिखीं, 'औरतों की बातचीत से अलग, दुनिया को सपने ही अपने धूरी पर घुमाते हैं. लेकिन वे भी सपने ही हैं जो दुनिया को चाँद का मुकुट पहनाते हैं. वे कहते हैं ऐसा ही हो. सारामागो ने काव्य के गुर कैसे सीखे इसके विषय में बताते हुए कहते हैं कि जब वे अपनी किशोरावस्था में लिस्बन में टेक्निकल स्कूल में थे तब उन्होंने अपनी पाठय पुस्तक में काव्य के बारे में जाना था. उन्होंने यहाँ पर एक कारीगर के रूप में ताला बनाने की कला सीखी थी. इस दौरान वे शाम को सार्वजनिक पुस्तकालय चले जाते और घंटों-घंटों जो भी हाथ लगता पढ़ते रहते. उन्हें किसी से गाइडेंस नहीं मिली, किसी ने उनका मार्गदर्शन नहीं किया, सलाह नहीं दी. उन्होंने स्वयं अपनी राह खोजी. 'द इयर ऑफ द देथ ऑफ रोकाड रोकार्डो राइसरो की शुरुआत इंडिस्टियल लाइब्रेरी में हुई तब वे मात्र सत्रह वर्ष के थे. उन्होंने एक पत्रिका 'एटेना में कविताएँ पढी. पहले उन्होंने सोचा कि सच में रिकर्डो राइस नाम का कोई पुर्तगाली कवि है. परंतु उन्हें बहुत जल्द पता चला कि कवि का वास्तविक नाम फेर्नांडो नोगुएरिआ पेसोआ है जो विभिन्न छद्म नमों से कविता लिखता है. ये विभिन्न कवि उसके दिमाग की उपज हैं. उन्होंने रिकार्डो की ढ़ेरों कविताएँ कंठस्थ कर लीं. कम उम्र होते हुए भी यह बात उनके गले नहीं उतरी कि कोई उच्च मस्तिष्क बिना दु:ख के 'वह बुद्धिमान है जो दुनिया के नजारों से संतुष्ट है. जैसी पंक्तियाँ लिख सकता है. और काफी समय बाद जब वे ङौढ हो चुके थे, उन्हें थोड़ी अक्ल आ चुकी थी, तब उन्होंने एक उपन्यास लिखा और उस कवि को 1936 की दुनिया का तमाशा दिखाया.

सारामागो ने अपने इस उपन्यास 'द इयर ऑफ द ड़ेथ ऑफ रिकार्डो राइस’ में कवि को उसके अंतिम दिनों में नाजी काल में रख कर प्रस्तुत किया है. इस समय नाजी सैनिकों ने राइंलैंड पर कब्जा कर लिया है, स्पेनिस रिपब्लिक के खिलाफ फ्रांस युद्ध चल रहा था जिसे सालाजार के पुर्तगाली फासीस्ट ने रचा था. यह लेखक का बताने का अपना तरीका था कि वह शांत, कटु और भव्य नास्तिकतावाद के महान कवि को दिखना चाहता है कि तुम तो अपनी बुद्धिमानी में मस्त हो, मजा लो, देखो, ये है दुनिया का तमाशा.

इस उपन्यास का अंत वे बहुत उदास शब्दों में करते हैं, 'यहाँ समुद्र समाप्त हुआ और जमीन इंतजार करती है. अर्थात पुर्तगाल जो सदा नए नए प्रदेशों की खोज किया करता था अब और अन्वेषण नहीं करेगा, उस भविष्य के लिए अनंत तक प्रतीक्षा करने को वह विवश है जिसकी कल्पना भी नहीं हो सकती है. पर वे कल्पना करते हैं कि शायद कोई तरीका हो मसलन, जमीन को समुद्र में सरका कर जहाजों को वापस समुद्र में भेजने का तरीका. रिकार्डो में ऐतिहासिक कवि को आज के सन्दर्भ में ला खडा किया गया है. कहानी पिछली सदी के तीसरे दशक में आकार लेती है जब हिटलर, मुसोलिनी, फ्रैंको और सालाजर की शक्तियों का उदय हो रहा था. इसमें उन्होंने अपने क्रोध को पुर्तगाल के संगठित क्रोध में परिणत कर दिया है और इस संगठित पुर्तगाल के क्रोध के फल को चित्रित किया है. तत्काल उन्होंने एक और उपन्यास 'द स्टोन राफ्ट लिखा. इसमें वे एक रूपक रचते हैं कि पुर्तगाल का एक प्रायद्वीप आइबेरिया, पूरे यूरोप से टूट कर एक बड़े टापू के रूप में तैर रहा है. बिना किसी पतवार या पाल के अटलांटिक महासागर में दक्षिण की ओर बहा जा रहा है. यह जमीन और पत्थरों का ढ़ेर है जिसमें नगर, गाँव, नदियाँ, फैक्टरीज और जंगल-झाडियाँ तथा लोग-बाग और जानवर भी हैं. अपनी लैटिन अमेरिकी परम्पराओं की तलाश में ये सब एक नए युटोपिया के लिए बहे जा रहे हैं. वे अमेरिकी दमघोटूँ शासन से छुटकारा पाने की दिशा में संकेत कर रहे हैं. अमेरिकी चौधराहट से सारे-के-सारे लैटिन अमेरिकी देश और अब यूरोप के कुछ देश भी परेशान हैं. विकासशील देशों की तो बात ही क्या करना. वे मानते हैं कि इसे राजनीतिक उपन्यास के रूप में देखा जाएगा, एक उदार मानवीय रूपक कि यूरोप समूचा का समूचा दक्षिण की ओर सरके ताकि दुनिया में संतुलन कायम हो सके. पहले की और आज के औपनिवेशिक अपमान के खामियाजे की पूत हो सके.

इस उपन्यास में दो औरते और एक आदमी तथा एक कुत्ता पात्र हैं. प्रायद्वीप के द्वारा वे निरंतर यात्रा करते हैं दुनिया बदल रही है और उन्हें मालूम है कि उन्हें स्वयं में नए व्यक्ति की खोज करनी है जो वे बनेंगें. यह उनके लिए पर्याप्त होगा. 'स्टोन राफ्ट' में यूरोप के द्वारा पुर्तगाल को छोड़ दिए जाने की बात कही गई है. इसमें उनका स्वर व्यंग्यात्मक है, प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति, पर्यटन अधिकारी, यूरोपियन कम्युनिटी आदि तमाम लोगों के विचार इसमें व्यक्त हुए हैं. होसे के कई कार्यों में कुत्ता विशेष रूप से आता है. 'स्टोन राफ्ट' में वह एक प्रमुख पात्र है. 'ब्लाइंडनेस में वह प्रमुख पात्र नहीं है परंतु महतव्पूर्ण कार्य करता है वह डॉक्टर की पत्नी के आँसू चाटता है. हमारे देश में सत्ताधारी राजनैतिक पाटयों ने इतिहास की किताबों में उलट फेर करके इतिहास को एक मखौल बना दिया है. ऐसे में होसे सरामागो की किताब 'हिस्ट्री ऑफ द सी सीज ऑफ लिब्सन’ पढ़ना मनोरंजन और आँख खोलने वाला दोनों हो सकते हैं.

इस पूरे भाषण में वे स्वयं को एक शागिर्द के रूप में सम्बोधित करते हैं. वे स्मरण करते हैं कि एक समय जब वे प्रूफ रीडर का काम कर रहे थे उनके मन में विचार आया कि अगर 'स्टोन राफ्ट में उन्होंने भविष्य को संशोधित किया है तो क्यों नहीं एक उपन्यास लिख कर अतीत को संशोधित किया जाए? और यह काम उन्होंने किया, 'हिस्ट्री ऑफ द सी सीज ऑफ लिब्सन लिख कर किया. इसमें एक प्रूफ रीडर इसी नाम की इतिहास की किताब की प्रूफ रीडिंग कर रहा है. लिस्बन के इतिहास को बदल डालने वाले इस ङौढ प्रूफ रीडर राएमुंडो सिल्वा को सारामागो ने नायक बनाया है. वे स्वीकारते हैं कि यह चरित्र असल में वे काफी हद तक स्वयं हैं. किताब में नायक निश्चय करता है कि जो भी 'हाँ है वह उसे 'न में बदल देगा. यह व्यक्ति बिलकुल सीधा सादा इंसान है, एक साधारण व्यक्ति. पर वह भीड से इस मायने में भिन्न है क्योंकि वह विश्वास करता है कि सब बातों के दृश्य और अदृश्य दो पक्ष होते हैं और हम तब तक उनके बारे में कुछ नहीं जान सकते हैं जब तक कि हम दोनों पक्ष देखने में सक्षम नहीं होते हैं. वह कहता है, 'मैं आपको याद दिला दूँ कि प्रूफ रीडर गम्भीर प्रकृति के लोग होते हैं. उन्हें साहित्य और जीवन का काफी अनुभव होता है, भूलो मत कि मेरी किताब इतिहास से सम्बंध रखती है. खैर मेरा इरादा अन्य विरोधाभासों को इंगित करना नहीं है, श्रीमान, मेरे विनीत विचार में, जो भी चीज साहित्य नहीं है वह जिन्दगी है, इतिहास भी, खास करके इतिहास. बिना अप्रसन्न करने की इच्छा के, और पेंटिंग तथा संगीत, संगीत ने जन्म से ही विरोध किया है, यह आता जाता है, यह स्वयं को शब्दों से मुक्त करने का प्रयास करता है, मुझे लगता है डाह के कारण, अंत में समर्पण करता है, और पेंटिंग, अब, पेंटिंग पेंट ब्रश से साहित्य से ज्यादा और कुछ प्राप्त करना नहीं है, मैं विश्वास करता हूँ कि आप भूले नहीं हैं कि मनुष्य लिखना सीखने के पूर्व से पेंटिंग प्रारम्भ कर चुका था, क्या आप इस कहावत से परिचित हैं कि यदि कुत्ता नहीं है तो बिल्ली के साथ शिकार पर जाओ. दूसरे शब्दों में जो आदमी लिख नहीं सकता है पेंट करता है या रेखांकन करता है जैसे कि वह अभी बच्चा है, हाँ, श्रीमान, ठीक वैसे ही जैसे कि मनुष्य तब भी था जब वह बना नहीं था. मुझे यह लगता है कि आप अपने वोकेशन से चूक गए हैं आपको एक फिलॉसफर होना था या इतिहासकार, आपके पास इन विषयों के उपयुक्त जन्मजात प्रवृत्ति और संस्कार हैं मेरे पास आवश्यक प्रशिक्षण की कमी है, श्रीमान, और एक सामान्य आदमी बिना प्रशिक्षण के क्या प्राप्त कर सकता है, मैं भाग्यशाली था कि मेरा जन्म सटीक जींस के साथ हुआ परंतु वे एक कच्ची अवस्था में थे और फिर प्राइमरी स्कूल के बाद कोई शिक्षा नहीं... यहाँ बहुत स्पष्ट हो जाता है कि इस उपन्यास का नायक प्रूफ रीडर कोई और नहीं स्वयं सारामागो ही हैं क्योंकि उनकी भी औपचारिक शिक्षा प्राइमरी स्कूल के आगे नहीं हुई थी और उन्होंने भी स्वाध्याय के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया था. आगे वे अपने इस उपन्यास का और अंश प्रस्तुत करते हैं. 'तुम अपने आपको स्वशिक्षित, अपने प्रयासों के प्रतिफल के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे इसमें शर्म की कोई बात नहीं है. पहले भी समाज स्वशिक्षित लोगों पर गर्व करता आया है. प्रगति ने इन बातों पर पूर्ण विराम लगाया है.

आज स्वशिक्षित लोगों पर मुँह बनाते हैं केवल जो लोग मनोरंजक काव्य या कहानियाँ लिखते हैं वे ही स्व शिक्षित हो सकते हैं भागय्शाली हैं वे. पर जहाँ तक मेरा सवाल है मैं कंफेस करता हूँ कि मेरे पास कभी भी साहित्यिक सृजन के लिए कोई प्रतिभा नहीं थी, एक फिलॉसफर बन गय. तुम्हारे पास हास्य का माद्दा है, श्रीमान, एक खास विडम्बना के लिए प्रवृत्ति, और मैं स्वयं से पूछता हूँ कि तुमने स्वयं को इतिहास के लिए कैसे समर्पित कर दिया, जैसा कि गम्भीर और पूर्ण विषय यह है. मैं असल जीवन में केवल विडम्बना हूँ मुझे सदैव लगा है कि इतिहास यथार्थ जीवन नहीं है. साहित्य है और कुछ नहीं. मगर इतिहास उस समय असल जीवन था जब इसे इतिहास नहीं कहा जाता था. अत: श्रीमान, आप विश्वास कीजिए, इतिहास असल जीवन है. मैं करता हूँ मेरे कहने का मतलब है कि इतिहास असल जीवन था. कोई शक नहीं है. हमारा क्या हुआ होता यदि ...न होता. प्रूफ़ रीडर ने गहरी सांस ली. वे इस तरह अपने उपन्यास के अंश के साथ-साथ अपने विचारों, अपने जीवन को भी अपने भाषण में प्रस्तुत करते हैं. साहित्य के एक और नोबेल पुरस्कृत लेखक जे एम कोट्जी तो अपने एक उपन्यास अंश को ही पूरे नोबेल भाषण में प्रस्तुत कर देते हैं.

इस उपन्यास को लिखते-लिखते सारामागो ने राइमुंडो के साथ-साथ शंका करना सीख लिया. और इसी शंका करने के गुण ने उन्हें उनका अगला उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया. वे अपने भाषण में आगे इसी बात का जिक्र करते हैं. इसी ने इस प्रशिक्षु को 'द गॉस्पल अकोडंग टू जीसस क्राइस्ट’ लिखने के लिए प्रेरित किया. यह शीर्षक एक ओप्टिकल इलूशन का प्रतिफल था. 1991 में आए इस उपन्यास ने जहाँ एक ओर सारामागो को पुर्तगाली लेखक संघ का पुरस्कार दिलाया, वहीं दूसरी ओर यूरोपीय साहित्यिक प्रतियोगिता में पुर्तगाली प्रतिनिधि के रूप में अवसर दिलाया. परंतु कैथोलिक कट्टरपंथियों के गले यह उपन्यास न उतरा और उन लोगों ने पुर्तगाली सरकार पर इतना दबाव डाला कि सरकार ने इस प्रतियोगिता के लिए उनके जाने में अवरोध लगा दिए. इतने पर भी धर्मावलम्बियों को चैन न मिला उन लोगों ने साँठ-गाँठ करके सरकार से इस पुस्तक को प्रतिबंधित भी करा दिया. उन्हें धर्मविरोधी साबित करने के भरसक प्रयास हुए. इस उपन्यास को लेकर बन्दिशें और विवाद इतना बढ गया कि तंग आकर उन्होंने अपना देश ही छोड़ दिया. वे कैनरीज में लैंजारोट के टापू पर रहने लगे. 'सैटेनिक वर्सेस लिख कर शैतान का पक्ष लेने का आरोप रुश्दी पर लगा और उनकी जान के लाले पड गए. धर्म के ठेकेदार विचार वैभिन्न स्वीकार नहीं कर पाते हैं इसीलिए वे विचार स्वातंत्र्य का विरोध करते हैं उन्हें अपना सिंहासन हिलता नजर आता है.

दुनिया के कितने ही लेखकों को कट्टरपंथियों के कारण अपना देश छोड़ना पड़ता है. ऐसे लेखकों तथा अन्य कलाकारों की एक लम्बी सूची है जिससे साहित्य के पाठक भली भाँति परिचित हैं. परंतु यह उस प्रूफ रीडर का शांत उदाहरण था जिसने सारे समय इस नए उपन्यास के लिए जमीन तैयार की. इस बार वे 'न्यू टेस्टामेंट के पन्नों के पीछे नास्तिकता नहीं खोज रहे थे बल्कि उसकी सतह को चमका रहे थे. पेटिंग की तरह एक मद्धम रौशनी के द्वारा उसे चमका रहे थे. सूली और हताशा की छाया में खोज रहे थे. इसी तरह शागिर्द पढ़ता है. इस बार वे ईसाई धर्म सम्बंधी चरित्रों से घिरा हुआ था. जैसे कि पहली बार उसे मासूमों के नरसंहार का चित्रण जाना और पढ़ने के बाद वह समझ न सका कि एक धर्म को तीस साल शहीद शब्द के लिए क्यों इंतजार करना पड़ा जबकि उस धर्म में पहले से ही शहीद थे. वह समझ न सका कि एक मात्र व्यक्ति जो कर सकता था उसने बेथलेहम के बच्चों को बचाने का साहस क्यों नहीं किया. वह समझ नहीं सका कि क्यों इजिप्ट (मिस्र) से अपने परिवार के साथ लौटने पर जोसेफ में जिम्मेदारी की न्यूनतम अनुभूति, पश्चाताप, गिल्ट, या यहाँ तक कि उत्सुकता की भी कमी थी. यह तर्क भी गले नहीं उतरता है कि जीसेस की जिन्दगी बचाने के लिए बेथलेहम के बच्चों का मरना आवश्यक था.

मनुष्य और दैविक सबसे ऊपर एक बहुत सरल-सी बात है कि ईश्वर अपने पुत्र को धरती पर खासतौर पर इस मिशन के लिए भेजेगा कि वह मानवता के द्वारा किए गए पापों के लिए प्रायश्चित करे और इसके लिए हेरोद के सैनिकों द्वारा दो साल की उम्र के बच्चों का शिरोच्छेद हो. सारामागो के द्वारा बहुत आदर के साथ लिखे गए गोस्पल में जोसेफ को अपने गिल्ट का एहसास है और वह पश्चाताप को अपनी सजा के रूप में स्वीकार करता है और मरने के लिए बिना किसी विरोध के चला जाता है, मानो दुनिया से अपना हिसाब चुकता करने का यह उसका अंतिम कार्य हो. नतीजन, होसे सारामागो की 'द गॉस्पल अकोडंग टू जीसस क्राइस्ट’ देवताओं और देवदूतों की प्रेरणादायक कहानियाँ नहीं हैं परंतु वे कुछ मनुष्यों की कहानी है जो एक ताकत के गुलाम हैं जिसके खिलाफ वे लड़ते हैं परंतु जिसे वे पराजित नहीं कर सकते हैं. जीसस जो बहुत से गाँवों की सडकों पर चले अपने पिता की धूल भरी चप्पलें विरासत में पाते हैं इसके साथ ही वे अपने पिता की त्रासद भावनाओं की जिम्मेदारी और गिल्ट भी विरासत में पाते हैं. जो उन्हें कभी नहीं छोड़ती हैं. तब भी नहीं जब वे क्रॉस पर है और वहाँ से कहते हैं, 'इन्हें माफ कर दो क्योंकि ये नहीं जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं. जीसेस न केवल ईश्वर को याद कर रहे हैं वरन अपने असली लौकिक पिता को भी याद कर रहे हैं जिसने उन्हें पाला-पोसा है.

एक स्थान पर वे कहते हैं कि 'गिल्ट एक भेडिया है जो अपने पिता को निगलने के बाद अपने बच्चे को खाता है. जिस भेडिए की बात तुम कर रहे हो वह पहले ही मेरे पिता को खा चुका है. जल्दी ही तुम्हारी बारी आएगी और तुम्हारा क्या,तुम हमेशा से भकोसे गए हो, न केवल भकोसे बल्कि वमन भी किए जा चुके हो. सारामागो कहते हैं कि अब शागिर्द काफी लम्बी यात्रा कर चुका है, उसमें काफी समझ आ चुकी है. सारामागो के जीसेस वैसे नहीं हैं जैसा बाइबिल में उन्हें दिखाया गया है वे लालसा में फँसते हैं. उनके एक समीक्षक कोर्बेट को सारामागो के शुरुआती जोसेफ को पढ़ते हुए 'फिडलर ऑन द रूफ की याद आती है. लेखक बाइबिल की कुछ खाइयों पर ध्यानाकषत करता है. जैसे हरोद को मरते समय बच्चों को मरवाने की क्यों सूझी? जबकि बच्चा राजा बन कर राज्य करेगा यह भविष्यवाणी सदियों पहले हुई थी और उसे ज्ञात थी. लेखक एक सरल सा प्रश्न प्रस्तुत करता है जोसेफ ने अपने बच्चे को बचाया परंतु दूसरे लोगों को क्यों नहीं खबर की कि उनके बच्चों पर खतरा है? जोसेफ इस दोष से स्वयं को कभी मुक्त नहीं कर पाता है इतना ही नहीं अपनी मृत्यु के समय वह यह गिल्ट अपने बेटे जीसेस को दे जाता है. होसे ने चारों गोस्पल से बहुत अलग एक कहानी रची है, यह कहानी धामक न हो कर मानवीय और मनोवैज्ञानिक ज्यादा है. जोसेफ को निरंतर दु:स्वप्न आते हैं. बच्चों की हत्या के बोझ से दबा जोसेफ खूब बच्चे पैदा करता है और 33 वर्ष की अल्पायु में अपने पडोसी की रक्षा करते हुए मरता है, पर गिल्ट से कभी उबर नहीं पाता है हालाँकि उसके दु:स्वप्न बन्द हो जाते हैं. इस उपन्यास में पिता पुत्र के सम्बंध को प्रमुखता और सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है. बच्चा अपने पिता से निरंतर धर्मग्रंथों पर चर्चा करता है. प्रश्न पूछना एक बहुत बड़ी विशेषता है कुछ जानने, कुछ सीखने के लिए मन में प्रश्नों का उठना अनिवार्य है. खासतौर पर धर्म की तथाकथित अवधारणा के प्रति प्रश्न उठना बहुत स्वाभाविक है परंतु ये प्रश्न ही कट्टरपंथियों को नागवार गुजरते हैं और वे तत्काल प्रश्नकर्ता का मुँह साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना कर बन्द करना चाहते हैं. होसे निरंतर प्रश्न उठाते हैं, 'ईश्वर कौन है?, 'वह बुराई, दरिद्रता और दु:ख क्यों होने देता है? और 'ईश्वर तथा शैतान का कितना निकट का सम्बंध है? ईसाई धर्म पितृसत्तात्मक धर्म है दुनिया के तकरीबन सारे धर्म पितृसतात्मक धर्म हैं. ईसाइयत में ईश्वर की कल्पना एक बहुत कठोर व्यक्ति के रूप में की गई है. एक ऐसा पिता जो सदैव दंड देने को तत्पर रहता है.

सारामागो का ईश्वर बहुत कठोर है, वह मनुष्यों को दास की तरह प्रयोग करता है और 'हाँ की बनिस्बत 'न का अधिक प्रयोग करता है. वह जीसेस को बताता है कि उसे मरना होगा ताकि उसकी मृत्यु का ईश्वर अपने लिए उपयोग कर सके, सारी दुनिया में एक धर्म के स्थापना के लिए उपयोग कर सके और इसीलिए कहता है कि प्रक्रिया में हजारों वर्ष लगेंगे और बहुत खून बहेगा. जीसेस इन बातों को सुन कर दहल जाते हैं, भयभीत तथा आश्चर्यचकित हो जाते हैं. सारामागो के जीसेस गॉड के खिलाफ विद्रोह करने की सोचते हैं. वे कोशिश करते हैं परंतु अंत में जीत ईश्वर की होती है. जीसेस क्रिश्चियनिटी के नाम पर खून बहाने का कारण बनते हैं. इस पुस्तक में जीसेस के पुन: उठ खड़े होने 'रिजरक्शन की बात शामिल नहीं की गई है. इस पुस्तक का अंत आते तक लेखक काफी क्रोध में है. चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, मनोरंजन करता है और चौंकाता है. इसे पूरा पढ़ कर ही पूरी तरह से समझा जा सकता है. आलोचक कोर्बेट कहते हैं कि यह किताब अवमाननापूर्ण, गहन गंभीर, सन्देहजनक, विनोदपूर्ण, विधर्मी, गहन दार्शनिक, भडकाने वाली और विवश करने वाला कार्य है. 'द गॉस्पल अकोडंग टू जीसस क्राइस्ट’ के विषय पर नोर्मन मेलर का 'गॉस्पल एकॉडंग टू द सन सन, निकस कजनजाकीस का 'द लास्ट टेम्टेशन ऑफ क्राइस्ट’, जे एस बाख का 'द पैशन एकोडंग टू सेंट मैथ्यू तथा एर्नेस्ट रेनेन का 'लाइफ ऑफ जीसेस भी आधारित है, परंतु इन सबके ट्रीटमेंट बहुत भिन्न-भिन्न हैं. इसके बाद अपने भाषण में वे अपने नाटक 'इन नोमिने ड़ेई कैसे उनके जेहन में आया इसकी चर्चा करते हैं. यदि सम्राट चार्लमैग्ने ने उत्तर जर्मनी में एक मठ स्थापित न किया होता, यदि वह मठ मुंस्टर शहर का मूल न रहा होता, यदि मुंस्टर अपनी बारह सौंवी वर्षगाँठ न मना रहा होता जिसके लिए उस ऑपेरा का प्रदर्शन होता जो सोलहवीं सदी के प्रोटेस्टेंट एनाबैप्टिस्ट्स और कैथोलिक के बीच युद्ध पर आधारित है तो यह शागिर्द (सारामागो) कभी भी अपना नाटक 'इन नोमिने ड़ेई ड़ेई न लिखता. एक बार फिर उन्होंने एक नन्हीं-सी तर्क की रौशनी के आधार पर धामक विश्वासों की भूला भुलैया को भेदने का प्रयास किया है. उन विश्वासों जो आदमी को मरने मारने के लिए आसानी से के लिए तैयार कर देती है. और इस भूलभुलैया में प्रवेश करने पर उसे क्या दीखा? उसे एक बार फिर दीखा असहिष्णुता का वीभत्स मुखौटा, एक असहिष्णुता जो मुनिस्टर में एक पागल दौरा बन गया, एक असहिष्णुता जो उस मूल कारण का ही अपमान करती है जिसके लिए दोनों पाटयाँ दावा कर रहीं थीं. क्योंकि यह दो विरोधी भगवानों के नाम पर युद्ध का प्रश्न न था बल्कि एक ही भगवान के लिए था. अपने अपने विश्वास की अंधता के कारण दोनों मतों के लोग सर्वाधिक विश्वसनीय सबूत को भी देखने में असमर्थ थे. यह सबूत यह बात थी कि जब जजमेंट ड़े में ये दोनों लोग पृथ्वी पर अपनी अपनी करनियों के अनुसार सजा या पुरस्कार पाने के लिए ईश्वर के सामने खड़े होंगे तो यदि मनुष्य के तर्क के अनुसार ईश्वर का निर्णय होगा तो एक सरल से कारण कि वे उसमें विश्वास करते हैं के कारण ईश्वर को दोनों ही पाटयों को पैराडाइज में स्वीकार करना होगा. मुंस्टर का भयानक नरसंहार शागिर्द को सिखा जाता है कि धर्म अपनी सारी प्रतिज्ञाओं के बावजूद कभी भी लोगों को नजदीक न ला सका है और युद्धों में सर्वाधिक बेतुका युद्ध होली वार ही है, यह सोचने की बात है कि ईश्वर चाहे भी तो स्वयं पर युद्ध की घोषणा नहीं कर सकता है. हमारे अपने देश के सन्दर्भ में सारामागो की यह टिप्पणी कितनी सार्थक है. अज्ञेय ने लिखा है, 'स्वतंत्रता के नाम पर मारते हैं, मरते हैं, क्योंकि स्वातंत्र्य से डरते हैं.

जैसे बात में से बात निकलती है और केले के पात में से पात निकलते जाते हैं वैसे ही होसे सारामागो एक के बाद दूसरी किताब लिखते जाते हैं. एक पुस्तक की रचना करते हुए उनके मन में दूसरी पुस्तक की प्रेरणा उत्पन्न होती है. और 'इन नोमिने ड़ेई लिखते हुए उनके मन में विचार आया कि हम अंधे हैं और वे 'ब्लाइंडनेस (अंधता) लिखने बैठ गए. इसको उन्होंने लिखा ताकि जो उसे पढें उन्हें यह याद दिला सकें कि हम जिन्दगी का अपमान करते हैं, हम जीवन को विकृत करते हैं, कि मनुष्य का जीवन प्रतिदिन उनकी दुनिया के बलशाली लोगों के द्वारा अपमानित होता रहता है. अपने उपन्यास 'ब्लाइंडनेस (Blindnes) में होसे न केवल अंधेपन की शारीरिक समस्याओं को उठाते है वरन मनोवैज्ञानिक परेशानियों को भी बड़ी शिद्दत और खूबसूरती से प्रस्तुत करते हैं. इसमें एक अनजान स्थान के सब व्यक्ति एक-एक करके अंधेपन का शिकार हो जाते हैं एक पात्र को छोड़ कर. यह पात्र उनके संरक्षण, अगुआई और नरेटर का कार्य करता है. इस अंधत्व के कारण पूरा सिस्टम ठप्प पड जाता है, सारी व्यवस्था चरमरा उठती है. इन व्यक्तियों को खाने के लाले पड जाते हैं, जीना दूभर हो जाता है. अंधत्व सीमित करता है और प्राकृतिक अवस्था की ओर ले जाता है. और होसे देखने और अवलोकन के फर्क की ओर ध्यान आकषत करते हैं. यह एक एलीगरी है. इसकी तुलना अल्बर्ट कामू के 'प्लेग ेग, काफ्का के ट्राय, विलियम गोल्डिंग के 'लॉर्ड ऑफ द फ्लाइ ाइज तथा एच जी वेल्स के 'द कंट्री ऑफ द ब्लाइंड से की जाती है. कामू की तरह वे बीमारी को सामाजिक और राजनीतिक संकट के रूप में प्रस्तुत करते हैं. मान लीजिए कभी भविष्य में किसी कारण से हमारा सारा बेसिक सिस्टम नष्ट हो जाता है आज के सुविधाभोगी हम लोग तब कैसे जी सकेंगे? जब सारी व्यवस्था ठप्प हो जाएगी तब शायद हमें एक दूसरे का, प्रकृति का महत्व ज्ञात होगा. होसे की यह कृति सोचने पर मजबूर करती है जो दृश्य वे इस पुस्तक में दिखा रहे हैं वह असम्भव तो नहीं है. अभी हम सच में अंधे हैं. इस बार होसे सारामागो ने सीखा कि सार्वजनिक झूठ ने बहु सत्य का स्थान ग्रहण कर लिया है, कि जिस दिन से आदमी ने दूसरों के कारण अपना सम्मान खोया है तब से वह अपना स्वयं का सम्मान करना बन्द कर चुका है. तब शागिर्द ने तर्क के अंधत्व से उत्पन्न राक्षस को निकाल भगाने के लिए अपनी सबसे सरल कहानी लिखनी प्रारम्भ की. यह कहानी है 'ऑल द नेम्स. इसमें एक आदमी का दूसरे आदमी के खोज क्योंकि उसने जाना कि जिन्दगी इससे ज्यादा कुछ और महत्वपूर्ण आदमी से नहीं माँगती है. वे लिखे सारे नाम हैं जीवितों के नाम मृतकों के नाम. 1997 में सारामागो ने 'ऑल द नेम्स लिखा जिसमें उन्होंने काफ्का के ब्यूरोक्रेटिक भूलभुलैया को अपनी श्रद्धांजलि दी है. इसमें एक अदना-सा ऑफीसर एक नाम से ग्रसित होम कर एक अनजान औरत को खोजना प्रारम्भ करता है और इस क्रम में उसके हाथ लगती है ढ़ेर सारी गडबडियाँ और ढ़ेर सारी परेशानियाँ.

सारामागो अपने कार्यों में भी वैकल्पित सच्चाइयों से खेलते नजर आते हैं. भाषा से खेलना उनकी एक विशिष्टता है. वे इन्वर्टेड कॉमाज का प्रयोग नहीं करते हैं और स्वयं कहते हैं कि 'शायद वे उपन्यासकार नहीं, बल्कि एक निबंधकार हैं जो उपन्यास इसलिए लिखता है क्योंकि उसे निबंध लिखना नहीं आता है. सारामगो पर विस्तार से काम करने वाले बॉब कोर्बेट के अनुसार वे हमारे समय के एक महान किस्सागो हैं. उनकी तुलना अतियथार्थवाद (मैजिक रियलिज्म) का सफल प्रयोग करने के लिए गैब्रियल गार्षा मार्केस तथा सलमान रुश्दी से भी की जाती है. लेकिन भाषा और विषय की दृष्टि से वे इन लेखकों से भिन्न हैं. और वे अपने नोबेल भाषण का अंत करते हुए कहते हैं कि जो आवाज इन पन्नों को पढ़ रही है वह मेरे चरित्रों की सम्मिलित आवाजों की प्रतिध्वनि है. उनके पास अलग से कोई आवाज नहीं है जो है वह उनके पात्रों की ही आवाजें हैं. अन्य कई लेखकों का भी कहना है कि वे जो कहना चाहते हैं वे अपनी पुस्तकों में कह चुके हैं नोबेल पुरस्कृत वी एस नॉयपॉल भी अपने भाषण में कहते हैं कि उन्हें जो कुछ भी कहना है वे अपनी पुस्तकों में कह चुके हैं या कहेंगे अलग से कहने के लिए उनके पास कुछ और नहीं है. सारामागो इसी के साथ समाप्त करते हुए कहते हैं कि शायद हो सकता जो बातें मुझे सब कुछ लगती हों आपको मेरी वे बातें तुच्छ लगीं हों यदि ऐसा है तो वे माफी चाहते हैं. 1993 से उन्होंने डायरी लिखनी प्रारम्भ की और अब तक पाँच से ज्यादा वॉल्यूम तैयार हो चुके हैं. वे आज भी सक्रिय हैं.

नोबेल पुरस्कार के बाद 2001 में 'ला कावेमा’ तथा 2002 में 'एल होम्ब्रे डुप्लीकाडो’ उनकी नवीनतम पुस्तकें आई हैं.

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संपर्क:

- विजय शर्मा, 151 न्यू बाराद्वारी, जमशेदपुर 831 001 फोन नं. 0657- 2436251 ई मेल - vijshain@yahoo.com

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,244,लघुकथा,1255,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,327,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2009,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,711,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,798,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,89,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,209,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: होसे सारामागो : अपने पात्रों का शागिर्द
होसे सारामागो : अपने पात्रों का शागिर्द
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