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आनंद का अनुपम स्रोत हैं तीज-त्यौहार और मेले-ठेले

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- सीताराम गुप्ता भारत उत्सव प्रधान देश है। हर दिन कोई न कोई त्यौहार मनाया ही जाता है। एक-एक दिन में कई-कई उत्सव अनेकानेक आयोजन। श्राद्ध स...

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- सीताराम गुप्ता

भारत उत्सव प्रधान देश है। हर दिन कोई न कोई त्यौहार मनाया ही जाता है। एक-एक दिन में कई-कई उत्सव अनेकानेक आयोजन। श्राद्ध समाप्त हुए तो नवरात्र प्रारंभ हो गए। दशहरे से लेकर दीपावली तक उत्सव का समाँ ही तो बंध जाता है। हफ्तों नहीं महीनों तक चलते हैं कई उत्सव तो। नववर्ष की शुरुआत से लेकर अगले नववर्ष की पूर्व संध्या तक उत्सव ही उत्सव। आखिर क्यों मनाए जाते हैं ये तीज-त्यौहार और विभिन्न पर्व? क्या मात्रा किसी की याद ताजा करने के लिए अथवा किसी के योगदान से प्रेरणा लेने के लिए? वस्तुत: त्यौहार हमें आनंद प्रदान करते हैं। त्यौहार मनाने से आनंद की अनुभूति होती है। आनंद की अवस्था में हमारे शरीर में तनाव कम करने वाले तथा शरीर में रोग अवरोधक क्षमता उत्पन्न करने वाले रसायन उत्सर्जित होते हैं जो हमें स्वस्थ बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। इस प्रकार त्यौहारों के आयोजन का सीधा संबंध हमारे उत्तम स्वास्थ्य तथा रोगमुक्ति से है।

त्यौहार का शाब्दिक अर्थ भी ख़ुशी ही है। मुस्लिम या पारसी त्यौहारों के नाम से पहले एक शब्द जुड़ा होता है 'ईद' जैसे ईदुलफित्र, ईदुज्जुहा, ईदे-मीलादुन्नबी, ईदे-नौरोश आदि। इनका शाब्दिक अर्थ हुआ फित्र की ख़ुशी, कुर्बानी या समर्पण की ख़ुशी, नबी के जन्मदिन की ख़ुशी तथा नये दिन की ख़ुशी। जिस प्रकार 'ईद' शब्द ख़ुशी या प्रसन्नता या पर्व का पर्यायवाची है उसी प्रकार त्यौहार, पर्व या उत्सव भी खुशी के ही पर्यायवाची हैं। किसी भी धर्म अथवा समुदाय के तीज-त्यौहार या पर्व हों हमें खुशी प्रदान करते हैं। जब हम ख़ुद कोई त्यौहार मनाते हैं तब तो आनन्द की अनुभूति होती ही है साथ ही दूसरों को त्यौहार मनाते देख भी कम आनन्दानुभूति नहीं होती। यही कारण है कि आज अनेक उत्सव, तीज-त्यौहार और मेले-ठेले पर्यटन से जुड़ते जा रहे हैं। ब्रज की होली देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं तो भारत में होली और दूसरे पर्वों का आनंद उठाने के लिए विदेशों से अनेक पर्यटक त्यौहारों के दिनों में ही आते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि ये तीज त्यौहार हमें खुशी तो प्रदान करते हैं पर कैसे? त्यौहारों के आयोजन और उनके मनाने के तरीकों पर नजर डालिए। त्यौहारों के अवसर पर जो सबसे पहला काम किया जाता है वह है घरों की साफ-सफाई। साफ-सफाई और रंग-रोगन के बाद घरों को सजाया जाता है। रात को रोशनी की जाती है तथा आतिशबाजी भी की जाती है। पूजा-पाठ और विभिन्न अनुष्ठान किये जाते हैं जो पर्यावरण की शुद्धि के साथ-साथ शरीर की शुद्धि करने में भी सक्षम हैं। अनुष्ठान से पूर्व व्रत आदि भी रखे जाते हैं। इस्लाम में ईदुलफित्र से पूर्व तीस रोजे रखे जाते हैं। हिंदू ही नहीं पारसी और इसाई भी रोजे या फास्ट रखते हैं। यह शरीर शुद्धि का परंपरिक तरीका है। शरीर शुद्धि के बाद मन की शुद्धि भी अनिवार्य है। विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान इसमें सहायक होते हैं। त्यौहारों के अवसर पर दान देने की भी व्यवस्था है। दान की भावना व्यक्ति को प्रसन्नता प्रदान करती है। उसके अंदर सहयोग और करुणा की भावना का विकास होता है।

त्यौहारों पर उपहारों का आदान-प्रदान भी होता है। उपहार लेना और देना दोनों ख़ुशी प्रदान करते हैं। विभिन्न प्रकार के विशेष स्वादिष्ट भोजन और मिष्ठान तैयार किये जाते हैं और दोस्तों और रिश्तेदारों के यहाँ भेजे जाते हैं। त्यौहारों पर इस प्रकार की क्रियाएँ अत्यंत आनंदप्रद होती हैं। नये-नये कपड़े पहनते हैं। हर प्रकार की ख़रीददारी होती है। घरों और बाजारों में सब जगह गहमागहमी होती है। इस गहमागहमी का हिस्सा बनना भी कम प्रसन्नता प्रदान नहीं करता। ध्यान से देखें तो त्यौहारों से जुड़ी सारी क्रियाएँ या तैयारियाँ ख़ुशी प्रदान करती हैं तथा हमारे परिवेश और जीवन स्तर को उन्नत बनाती हैं।

ये बात तब की है जब व्यक्ति इतना समर्थ नहीं था। सब चीजें व्यक्ति स्वयं बनाता था। साफ-सफाई और सजावट से लेकर खाने-पीने की चीजें और उपहार की वस्तुएँ घर में ही तैयार होती थीं। आज सब चीजें बाजार में सुलभ हैं अत: इन वस्तुओं और क्रियाओं द्वारा सृजन का सुख नहीं मिल पाता है। यही कारण है कि त्यौहार वास्तविक प्रसन्नता प्रदान करने में सक्षम प्रतीत नहीं होते।

लेकिन क्या आज भी ये सब आयोजन या त्यौहार आनन्द प्रदान करने में सक्षम हो सकते हैं? वस्तुत: आनंद मन का एक भाव है अत: त्यौहार के मनाने का संबंध मन से होना चाहिए। लेकिन आज इसमें अनेक आयाम जुड़ गए हैं। त्यौहार मनाना बहुत जटिल कार्य हो गया है। जटिलता में आनंद कहाँ और आनंद के अभाव में शरीर में लाभदायक रसायनों का उत्सर्जन असंभव है। यही वास्तविक स्वास्थ्य है और स्वास्थ्य के अभाव में आनंद कहाँ?

एक समय था जब किसी पर्व के आगमन से हफ्तों और महीनों पहले तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। सारा काम हाथ से होता था। साफ-सफाई और सजावट से लेकर खाने-पीने की चीजें मिष्ठान्न तथा कपड़े-लत्ते तैयार करने का सारा काम हाथों से घर में ही होता था। इन सब कामों को हाथ से करने में सृजन का सुख मिलता था। इसमें पैसे का प्रदर्शन नहीं भावना जुड़ी होती थी। त्यौहार मनाने में जहाँ पैसा मुख्य हो जाता है वहाँ आर्थिक स्तर महत्वपूर्ण हो जाता है। मन के भावों का स्थान गौण हो जाता है। त्यौहार को धूम-धम से मनाना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाता है। इससे त्यौहार की मूल भावना का ह्रास होकर त्यौहार एक औपचारिकता या मजबूरी बन जाता है जिससे आनंद की प्राप्ति असंभव है।

जब समाज में अत्यधिक आर्थिक विषमता मौजूद हो तो वहाँ पैसे वालों के लिए त्यौहार मनाना उनके अहं की तुष्टि का कारण बनता है। उनमें अहंकार की भावना अध्कि पुष्ट होती है। जो कमशोर हैं उनमें हीनता की भावना आती है। इस प्रकार त्यौहार के आयोजन से किसी को आत्मिक सुख नहीं मिलता। ऐसे में त्यौहार की क्या प्रासंगिकता हो सकती है?

त्यौहार हमेशा मिल-जुलकर मनाए जाते हैं। अकेला व्यक्ति हमेशा तनावग्रस्त रहता है। त्यौहारों के कारण मिलना-जुलना तनावमुक्ति का एक अच्छा स्रोत है। तनावमुक्ति मनुष्य के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण तत्व है। अत: त्यौहारों का सामाजिक पक्ष भी सीध हमारे स्वास्थ्य से जुड़ता है। त्यौहारों पर मिलना-जुलना तभी संभव है जब आर्थिक असमानता का अभाव हो अथवा त्यौहारों को अत्यंत सादगी से आडंबर-रहित होकर मनाया जाए। आडम्बर-रहित होना वास्तव में सही रूप में आनन्द प्रदान करता है।

बाजारवाद ने धीरे-धीरे त्यौहारों को पैसा कमाने का माध्यम बना दिया है। समाज के विभिन्न वर्ग भी किसी न किसी स्वार्थ से जुड़कर त्यौहार मनाने को विवश हैं। त्यौहारों पर व्यावसायिकता इस कदर हावी हो गई है कि त्यौहार मनाने की मूल भावना या उद्देश्य कहीं भी नजर नहीं आता। त्यौहारों के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपयों का व्यापार हो रहा है। व्यापार बुरी बात नहीं लेकिन त्यौहारों को माध्यम बनाकर संसाधनों का अपव्यय और खाद्यों की बिक्री तकलीफदेह है। नये-नये रूपों में त्यौहार मनाने से अपसंस्कृति को बढ़ावा मिलता है।

नई पीढ़ी कुछ हद तक दिशाभ्रमित हो चुकी है। उनके लिए त्यौहारों का अर्थ है उपहारों का आदान-प्रदान और अय्याशी। आनंद उपहारों के आदान-प्रदान और भौतिक सुख में नहीं। सच्चा आनंद है मन की प्रसन्नता में। स्वयं भी प्रसन्न रहो और दूसरों को भी प्रसन्नता प्रदान करो। त्यौहारों के माध्यम से ये बख़ूबी किया जा सकता है लेकिन त्यौहारों के माध्यम से आनंद की प्राप्ति तभी संभव है जब हम आडंबर-रहित होकर सादगी से त्यौहार मनाना सीख लें।

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संपर्क:

सीताराम गुप्ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110034

फोन नं. 011-27313954

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. दीवाली की आपको हार्दिक शुभकामनाएँ।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सम्यक विचार प्रस्तुत किया है आपने। हमारे पर्व त्यौहारों में जटिलता, दिखावा, शोरशराबा, प्रदूषण, बर्बादी, उर्जा का अपव्यय आदि बहुत ही शोचनीय पहलू हैं। सभी विचारशील लोगों को इन भ्रष्ट रीतियों के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिये। इसी से हमारा भविष्य अक्षय आनन्द वाला बना रह सकेगा।

    दूसरी बात यह है कि त्यौहारों की संख्या के हिसाब से भी हम अति के भी पार हैं। यदि हमेशा त्यौहार ही मनाते रहेंगे तो सृजन, उत्पादन, अध्ययन, अभ्यास, चिन्तन के लिये समय कब मिलेगा?

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: आनंद का अनुपम स्रोत हैं तीज-त्यौहार और मेले-ठेले
आनंद का अनुपम स्रोत हैं तीज-त्यौहार और मेले-ठेले
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