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आर. के. भंवर के कुछ व्यंग्य

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व्यंग्य राष्ट्रीय समस्याओं के व्यवहारिक हल · आर. के. भँवर एक : नवाब साहब बेहद चिंतित थे। क्यों न आखिर ! राज्य में भ्रष्टाचार चरम प...

व्यंग्य

राष्ट्रीय समस्याओं के व्यवहारिक हल

· आर. के. भँवर

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एक :

नवाब साहब बेहद चिंतित थे। क्यों न आखिर ! राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर था। बिना पैसे लिए किसी का काम होना बिल्कुल नामुमकिन ! मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा था। सिर्फ पैसा, बकिया कुछ नहीं .... यही लोगों की सबसे बड़ी तमन्ना बन गई राज्य की व्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई थी। बड़े-बड़े ओहदेदार छोटे-छोटे काम के लिए मुंहखोल कर पैसा मांगते। ऐसे में ईमानदार आदमी सिसक रहा था। वह बिल्कुल टूट चुका था। ऐसा नहीं था कि राज्य के सबसे जिम्मेदार लोग यह सब नहीं जानते थे। बेहतर जानते थे और बखूबी समझते थे।

नवाब साहब उस समय और दुखी हुए जब रियाया को उनसे मिलाने के वास्ते उनके अर्दली पैसा वसूलने लगे। नवाब साहब का मूड अच्छा है या बुरा, यह बताने की खातिर अलग-अलग कीमतें तक तय हो गयी थीं। राज्य में भ्रष्टाचार की बदहजमी इस हद तक स्वीकार कर लेना नवाबसाहब के जमीर से बाहर की बात थी। मायूस और मजबूर दिखने लगे थे वह ! तनावग्रस्त हो गये थे। इससे उनका ब्लडप्रेशर बढ़ गया था। तनाव का एक कारण यह भी था कि उनकी औलादों के साथ-साथ सारी इंतजामिया भी पैसा उगाहने में मशगूल थे। एक दिन जनता दर्शन में उनका साबका एक ऐसे ईमानदार व्यक्ति से हुआ, जो ईमानदारी से काम करने के कारण अपने काबिल बच्चों को न ऊंची तालीम दे पाया , न अपनी जवान लड़कियों का ब्याह ही रचा पाया था। अपनी आपबीती सुनाते-सुनाते वह फफक-फफक कर रो पड़ा। उस समय नवाब साहेब की भी आंखें भर आईं थीं।

'बस बहुत हो गया। या तो मैं रहूंगा या यह भ्रष्टाचार। यह खत्म होकर रहेगा, चाहें इसके लिए मेरी जान ही क्यों न चली जाए ' - नवाब साहब की अचानक इस घोषणा से सब दंग रह गये। तभी उनका बड़ा बेटा बोला - वालिद साहब ! आप के जजबात का हम आदर करते है। आप से मेरी अर्ज है कि सिर्फ चौबीस घण्टें की हमें मोहलत दें, इसके बाद आप देखियेगा कि राज्य से भ्रष्टाचार ऐसे गायब मिलेगा जैसे गधे के सर से सींग।

इसके लिए हमें क्या करना होगा - नवाब साहब में उम्मीद जगी थी तो सवाल किया।

आपको राज्य की बागडोर मेरे हाथों में देनी होगी - बेटा बोला ।

तभी एक वजीर दूसरे वजीर से फुसफुसाया - बड़े साहबजादे से भी कोई ज्यादा भ्रष्ट होगा ? ये क्या खाक खत्म करेंगे भ्रष्टाचार। दरअसल बड़े साहेबजादे खुद कई घोटाले में संलिप्त थे। वे अपने घोटाले की जांच इतनी लंबी खिंचवा देते थे कि जांच करने वाला रिटायर हो जाता था। पर नवाब साहब को अचानक उस पर भरोसा हो गया। बोले - ठीक, पर शर्त यह है कि राज्य से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हुआ तो तुम्हें राज्य से बेदखल कर दिया जायेगा। बोलो, मंजूर ? उसने कहा - मंजूर।

अब क्या था। फरमान जारी हो गया। नवाब साहब आराम फरमाने लगे और नये नवाब ने घूसखोरी को रोकने का फरमान जारी कर दिया। फरमान इस प्रकार से था :-

राज्य से मिलने वाली पगार में साठ फीसदी की कटौती।

अब सिर्फ चालीस फीसदी पगार पर जीवन बसर करना होगा।

घूसखोरी राज्य का नया मजहब माना जायेगा।

लोगों को खुलेआम पैसा कमाने की छूट। पैसा कमाना मजहबी कारगुजारी मानी जायेगी।

बेईमानी करने के लिए ईमानदारों का एक विशेष मोटीवेशनल ट्रेनिंग स्कूल राज्य की सहायता से चलाया जायेगा जिससे ईमानदार लोगों में हिम्मत पैदा हो तथा भ्रष्टाचार की बारीकियों को बखूबी सीख सकें।

अधिक से अधिक धन कमाने वाले आमदनी टैक्स से मुक्त रहेंगे।

कम पैसा कमाने या पैसों की कमी से मरने वाले गद्दार कहलाये जायेंगे तथा उन पर आमदनी कर लगाया जायेगा।

जगह-जगह पब्लिसिटी की जायेगी कि घूसखोरी राज्य के खुशूसी बंदोबस्त की खूबी है, आईये इसे जिन्दा बनाये। ' ' राज्य का गहना : भ्रष्टाचरण का बढ़ना ' वगैरह वगैरह।

इस तरह बड़े साहबजादे ने राज्य में सुशासन कायम कर दिखाया तथा नवाब साहेब को दिखा दिया कि मजबूत इच्छा शक्ति हो तो बड़ी से बड़ी जीत हासिल की जा सकती है।

राज्य में फिर कभी घूसखोरी पनपने नहीं पायी।

और नतीजतन एक समय ऐसा आया कि घूस आम आदमी की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी। राज्य की आमदनी लगातार बढ़ रही थी, साथ ही लोगों में आत्मनिर्भरता भी .....।

 

दो :

एक न्यायप्रिय राजा ने प्रजा की तकलीफों से रू-ब-रू होने के वास्ते जहांगीरी स्टाइल में अपने शयनद्वार के निकट एक बड़ा घंटा टंगवाया तथा उसकी रस्सी सड़क की और करवाई। उसने एलान करा दिया कि प्रजा को कभी भी कोई तकलीफ हो तो वह सीधे राजा से फरियाद कर सकती है।

प्रजा राजा की न्यायप्रियता से बेहद प्रभावित हुई। उसे अपने राजा से ऐसी ही उम्मीद थी।

अब क्या था, जिसे जब भी कोई तकलीफ होती वह राजा के यहां जाकर रस्सी खींचता और घंटा बज उठता। राजा कैसी भी नींद में हो तुरंत उठ कर उनकी सुनता और फैसला करता था। कितने-कितने काम होने लगे। जोखू का गुम हुआ गधा मिला तो रमधनिया की चोरी गयी करघनी। न्याय आननफानन होता था, इससे राजा की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी थी। राजा तनाव में रहता तो था किन्तु तारीफ के टानिक से वह तनाव दूर कर लेता।

इस नयी व्यवस्था से जो लोग सबसे ज्यादा परेशान थे, उनमें उनके वजीर, मंत्री, संत्री, कोतवाल, मुंशी और ऐसे ही कुछ ओहदेदार।

लेकिन रियाया खुश थी। मजाल है कि कोई भी गड़बड़ हो।

एक दिन वजीर ने दिमाग लगाया। कोतवाल को बुलाया, कहा - सारी समस्याओं की जड़ ये कमबख्त घण्टे का घुण्डा है। तो सुनो, आज की दुपहरी में इस कमबख्त घण्टे का घुण्डा गायब हो जाना चाहिए।

घण्टे से घुण्डा गायब हो गया।

तब से उस राज्य की समस्याएं बची ही नहीं। राजा को एक सप्ताह बाद वजीरों ने बताया कि महराज आपके राज्य में इसी घण्टे के जरिये मिलने वाले न्याय से ही अमन-चैन कायम है।

और अब कोई घण्टा क्यों नहीं बजाता - राजा ने भोलेपन से सवाल किया।

महराज, अब कोई समस्याएं ही नहीं।

राजा खुश था। अपनी सूझबूझ पर आत्ममुग्ध हो उठा वह।

 

तीन

लोगों में तनाव इस कदर बढ़ गया था कि काम के समय बात बात पर आपस में ही गुस्सा करते गालियां तक देते थे। मारपीट में तो एक दूसरे का खून तक निकाल लेते थे। शुरू-शुरू में सब ठीक था, लेकिन अचानक सब कुछ बदल गया था। मैंनेजमेंट के लोग अपने बिजनेस के चालिस प्रतिशत लोगों की इस नासमझी से काफी चिंतित थे। अचानक एक वर्कशॉप आयोजित की गई, ट्रेनिंग की आवश्यकता पर चर्चा हुई।

सर्वसम्मति से तय हुआ कि कारखाने के पिछले भाग में जो सड़ागला व निष्प्रयोज्य कबाड़ (पुरानी गाड़िया, टाईप मशीन, जनरेटर, ए.सी., कूलर आदि-आदि) पड़ा है, उसका निस्तारण किया जायेगा। चालिस प्रतिशत लोगों को बारी-बारी कारखाने में लाया गया तथा उन्हें एक-एक हैमर (हथौड़ा) दे दिया गया । उनसे अपेक्षा की गई कि उसे नष्ट करें। सभी की डयूटी इतनी ही है कि दस बजे आयें और इसे नष्ट करने में लग जायें। देर समय तक काम करने पर ओवरटाईम अनुमन्य होगा।

अनुभव किया गया कि लोगों में तनाव खतम होने लगा है। अंदर का गुस्सा धीरे-धीरे बाहर के रास्ते कब और कैसे गुम हो गया, ये उन्हें पता ही न चला। अब लोगों के कौशल में वृद्धि और उनकी क्षमता में बेहतर विकास होने लगा था। प्रबंधन अपने फैसले पर खुशी का आसमान छू रहा था।

 

चार

एक : आवाम का हमदर्द शासक कौन ?

दो : जो एक कान से बहरा हो।

एक : उससे क्या होगा ?

दो : बहरा वाला कान आवाम की ओर और सुनने वाला कान परिवार की ओर रक्खेगा।

 

पांच

' वंचितों ने तय किया कि वे अब इस देश में नहीं रह सकते है। उनके लिए एक अलग भारत बनाया जाये। ' वंचितो का भारत। ' - वंचितों के अखिल भारतीय सम्मेलन में एक वंचित ने बड़े जोरदार ढंग से यह बात उठाई। सब ने ध्वनिमत से प्रस्ताव का समर्थन किया। सर्वसम्मति से यह भी प्रस्ताव पारित किया गया कि सुविधा नगर के श्रीमन विकृति राज नायक को अभियान का संयोजक मनोनीत किया जाए। आंदोलन जब चरम पर चढ़ने लगा तो सुविधानगर के लोग वंचितों में अपना पंजीकरण कराने में जोड़-तोड़ पर उतारू हो गये थे। साथ ही मौके की तलाश में थे कि कब वंचितो का भारत बने और सुविधापूर्वक कोई मंत्री पद हठिया लिया जाए।

 

छह

सरकारी महकमे में कार्यरत कर्मियों में मोटीवेशनल चेंज के लिए जरूरी है कि उस महकमे में सौ वर्गमीटर की जगह चिड़ियाघर के लिए आरक्षित की जाए। चिड़ियाघर में सभी प्रकार के जानवरों को रखने का प्रबंध किया जाए। सभी कर्मियों को यह अनिवार्य रूप से हिदायत दे दी जाए कि वे कार्यालय में उपलब्ध मनोवैज्ञानिक एवं पशुविज्ञानी से अपनी जांच कराये। जांच इस तरह से कि जैसे अमुक कर्मचारी में आज्ञाकारिता का भाव नहीं है तो उसे कुत्तो से सीखने के लिए कहा जाए। यही कुत्त उसका आदर्श होगा और सभी रोजाना अपने अपने कार्यालय आकर कुत्तों से प्रेरणा ग्रहण करेंगे। इसी तरह से विभिन्न गतिविधियों के लिए जानवरों की कार्य प्रक्रिया का ही अनुकरण-अनुसरण किया जायेगा।

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व्यंग्य

अब ऊपर फैलिए

· आर.के.भँवर

एक किताब में कभी पढ़ा था कि सुबह को ताजातरीन होकर निकले पतिदेव देर रात सकुशल घर आ भी जाते होंगे तो पत्नियों का मन अपने पतियों की आरती उतारने का अवश्य होता होगा। आ भी जाते का मतलब साफ है कि सड़कों पर छोटी-बड़ी गाड़ियां इस कदर छा जाती है कि उन्हें पार करना टेढ़ी खीर हो जाती है। बायां पैर बढ़ाया कि सूमो निकली और जैसे दायें पैर को बराबरी का दर्जा दिया ही था कि सर्राटे से सिटी बस गुजर गई। अब सहमे सहमे दोनों पैर जहां थे, वही ठहर जाने के अलावा कोई चारा नहीं। ऐसी गंभीर संकट की घड़ी में वह घर वापस लौट रहा है। पत्नी अपने बाखैरियत लौटे पति की आरती उतारने की इच्छा को भला कैसे रोक सकती है ! आदमी बढ़े, गाड़ियां बढ़ीं लेकिन सड़कों का चौड़ीकरण उनके अनुपात में नहीं बढ़ा। अब सड़के रबर या गेटिस तो है नहीं कि खींच कर चौड़ा कर ले। दिल्ली के एक मित्र ने सुनाया - बोला दिल्ली के कुत्तों से गांव का कुत्त बोला - ये दुम दबाने की आदत कहां से सीखी ? गांववाला बोला - यहां इतनी जगह कहां कि दुम हिलाऊं।

स्थान सीमित है। आजादी के समय ही यह तय हो गया होता कि यहां तक गांव रहेंगे और वहां तक शहर, तो आज भू-माफियां भुखमरी के कगार पर आ जाते। हमारे पुराने नेता दूरंदेशी सोच के थे। जियो और जीने दो की भावना की समझ थी, उन्हें। और आज गांव धीरे-धीरे शहर की साजिश के षिकार हो रहे हैं। शहरों में बनावटी फार्म हाऊस बड़के साहबों की ऐशगाह बनकर कोढ़ में खाज की तरह उभर चुके है। शहरों में कुकरमुत्तों की तरह बढ़ती आबादी और उनके लिए छत का प्रबंध अब आसान काम नहीं है। मकान बनेंगे कहां ? जगह भी तो हो। शहरों में जगह नहीं तो गांवों में घुस चलते हैं। गांवों में खेती होती है तो क्या, खेती अब गमलों में भी की जा सकती है। गांव नहीं बचेंगे तो शहरी जनता आसमान की ओर बढ़ेंगी। आबादी बाढ़ का पानी है जो परिवार नियोजन के सारे बांधों की मां-बहन कर देगा। इसलिए आबादी को रोक पाना बेहद कठिन काम है। मान कर चलो, वह मानवीय स्वभाव और नियति का खेल है। पर सब को छत तो देना ही है। मिल-जुल कर देंगे - निजी क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र। निजी क्षेत्र मलाईदार लोगों के लिए और सरकारी क्षेत्र मंत्रियों को फोटो खेंचाने के लिए। काम कम और कामगारों, जरूरतमंदों और छतविहीनों को मकान देने का ख्वाब परोसने का ज्यादा काम करेंगे ये।

वैसे भी जमीन पर बढ़ पाना आसान नहीं है। इसलिए ऊपर फैलने का वक्त आ गया है। चुनांचे अब हर शहर में एक न्यूयार्क को पैदा करना होगा। मुन्ना को तीसरी मंजिल पर पढ़ने, दूसरी पर चाकलेट लाने, आठवीं पर घूमने, चौथी पर टयूशन जाने, पांचवी पर मम के साथ किटी पार्टी वगैरह, वगैरह। जमीन को छूने की कोई जरूरत नहीं। सीधे गगनबिहारी और वैकुण्ठवासी बनने का सुनहरा अवसर हाथ में है। पूरी जिंदगी लिफ्ट और लंबाई में रहेगी।

पहले आदमी घर गृहस्थी के सारे काम निपटा लेने के बाद अपना मकान भी हो, सोचता था। अब ऐसा नहीं है। अब तो दिमागदानी में रत्ती भर की समझ आई भर, कि मकान लो, उसे दुगने या डेढ़ गुने में बेचो, फिर कम में खरीदो, उसमें कुछ दिन रहो, जितने दिन रहो, उतने दिन ग्राहक तलाशो, मिले तो दुगने या डेढ़ गुने में बेच दो, मुनाफा बैंक में डालो। फिर यही क्रम, चलने दो । दुनिया तो अठ्न्नी की तरह है। एक दिन आयेगा जब बैंक की पासबुक के सारे कॉलम पैसों से भरे होंगे। बस, अब एक सफल कालोनाईजर बनने का पहला पाठ आरंभ। पेट के अंदर और बाहर के बच्चों को गिन-गिनाकर एक सोसाइटी बनाईए, पंजीकरण कराइये। जमीन लीजिए, भूखण्ड काटिये। एक भूखण्ड तीन तीन लोगों के हाथ बेंचिये। इससे विवाद में आयेंगे। विवाद में रहेंगे तो प्रचार पायेंगे। ये रास्ता थोड़ा कठिन जरूर है, पर तरक्कीपसंद लोगों को कठिनाईयों से क्या डरना ? भूखण्ड तो एक है सो एक को ही मिलेगा, शेष दो आपका मुफ्त में गुणगान करेंगे। हो सकता है कि गुणगान करने वाली पार्टी कुछ जबर हो, तो आपकी आरती भी उतार सकती है। तरक्कीपसंद लोग विपदाओं से कत्तई नहीं डरते। सोसाइटी और रजिस्ट्री विभाग साथ रहे तो चांद पर जाकर वहां की जमीन भी बेंच दें और रजिस्ट्री भी करा दे।

लोगों को एक मकान देने का ख्वाब बेहद संवेदनशील होता है। हम उनमें एक भूख जगाते है। बहुत हो गया किराये के मकान में रहते हुए, उठो और कर्जा लेकर मकान लो। आदमी मकान पाने के वास्ते लंगोट कसकर तैयार है। अखबार में विज्ञापन पढ़ता है, अंकित लागत के किनारे एक नन्हें से स्टार को अनदेखा कर देना, उसे कितना भारी पड़ता है। यह तो उसके हालात से रू ब रू होकर जाना जा सकता है। ये नन्हा स्टार बड़ा मायावी होता है। ऊपर लिखा होगा कि 1500 रूपये में आपका अपना मकान, 1500 रूपये पर नन्हा सा स्टार होगा। विज्ञापन के ठीक नीचे स्टार के साथ प्रतिदिन 1500 रूपये दस वर्षो तक जमा करने के बाद मकान आपके हाथ में। मकान पाना कितना आसान है। हम लाये है तूफान से कश्ती निकालने वाला जमाना गया। यहां तो घुसहों के तूफान से मकान निकालने की बात है, जो कठिन है। चौड़ाई में मकान न मिले तो लंबाई में मिल जाये, मिले तो सही।

बड़े शहरों में बहुमंजिली आवासीय भवनों का मजा ही कुछ और है, दरवाजा खटखटायेंगे राधेश्याम जी का, पर खुलेगा सीताराम जी का दरवाजा। दरअसल चार मकानों के दरवाजे एक जैसे साथ-साथ टंगे होते दीखते है। इसलिए गड़बड़ी प्राय: सभी से हो ही जाती है। सामुदायिक व्यवस्था न के बराबर रहती है। सब्जी वाली, बरेठा, दूध और अखबार वाला यह ऐसी प्रजातियां है, जो अपार्टमेंट में समरसता का प्रबंघ किये रहते है। ये बहुत बड़े सूचनातंत्री और भेदी होते है।

एक आवासीय विभाग ने गरीब आश्रयहीनों के लिए निहायत सस्ते में मकान बनाये। शुभ काम का श्रीफल शुभ हो इस वास्ते उस विभाग ने बड़े मंत्री से उन्हीं मकानों का कब्जा-पत्र निराश्रितों को दिलवाया। सभी परमतुष्टि में थे। दरिद्रनारायण की सेवा करने का एक अवसर तो हाथ में आया। पर सात दिन बाद पता चला कि दरिद्रनारायण उसे चौड़े मुनाफे में बेंच कर किसी और विभाग को अपनी सेवा का अवसर देने हेतु प्रस्थान कर गये। समाज में इस प्रकार के लोग भी है। इसके विपरीत ऐसे भी लोग भी है जो पत्थरों को तोड़कर, आस्मां को ओढ़कर, एक घर जो चाहते है, सारी पूंजी जोड़कर, उनके लिए जितने भी मार्ग है, और मार्ग के जितने रास्ते है, वह इतनी कंकरीली, पथरीली जमीन से होकर गुजरते है, ऐसे में वे वहां सफल नहीं हो पाते है। वहां पर उनके पास गरीबी रेखा के नीचे जीने का प्रमाण पत्र नहीं है। ये ऐसे लोग है जो सदैव गरीबी की रेखा के नीचे रहे और फिल्मी रेखा के साथ जिये, वे ऐसे प्रमाण पत्र के रास्ते की रूकावटों को देखकर ही घबड़ा जाते है। मकान है, पर लेने की पात्रता नहीं। चुनांचे पात्रता बनाने बिगाड़ने के समीकरण के लिए चतुर सुजान की जरूरत होती है। वह कहां है ? उसे खोजिये ।

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और एक ये हैं

· आर.के.भँवर

लोग उनकी बात बड़ी ध्यान से सुनते हैं। वे जहां भी जाते, उनकी बात सुनने वालों की एक जमात उनके साथ जरूर हो जाती थी। ऐसा नहीं है कि वे ज्ञानी, मानी व ध्यानी है, ताबीज बांटने वाले तांत्रिक है, या हाथ की रेखाएं देख कर आगे का हाल बताने वाले ज्योतिषी। न .. न .. ऐसी कोई सिफत उनमें नहीं। दरअसल जब वे चलती ट्रेन में होते थे तो बरबस उनकी कलाई पर बंधी घड़ी देख कर कोई यह पूछ बैठता - भाई साहेब यह घड़ी कितने की मिली , तो तपाक से उनका उत्तर होता कि चालीस रूपये में। अब इतने संक्षिप्त उत्तर में इतनी गति की मार होती थी कि ट्रेन के बर्थ पर उनींदा आदमी दम छोड़कर उनकी घड़ी को कटखैनी नजर से देखने लगता। आस-पास के लोगों का कहना ही क्या, वे सभी घड़ी-देख प्रतियोगिता में पूरी तन्मयता से लग जाते थे। बात यह नहीं कि वह घड़ी चालीस रूपये में ही मिली होगी। थोड़ी ही देर में लोगों की प्रश्नावली उन पर आक्रमण करने के लिए तैयार थी।

सच्च, भई वाह !

इत्ती सस्ती, विश्वास ही नहीं होता है, कहां मिलती है,

नहीं, न न हो ही नहीं सकता, ये होगी कोई तीन सौ या चार सौ के करीब,

मजा आ गया, चालीस रूपये में घड़ी, बाप रे बाप, क्या खूब।

अब आप शांत बैठकर चौव्वा करते रहिए। लोगों को यह भी नहीं मालूम पड़ेगा कि अब कौन सा स्टेशन आया है या गाड़ी यूं ही रूकी या कोई स्टेशन है।

मैंने उनसे एक बार पूछा कि वाकई घड़ी चालीस में मिली है ? बोले - खाक चालीस, अरे पूरे तीन सौ की है। तो आपने वहां, गांड़ी में, चालीस क्यों कहा ? क्यों कहा, अरे मैंने देखा लोगों के चेहरों पर बड़ी मनहूसियत थी, सोचा कि इसी बात में कुछ दम लगता है, बस। बात यह भी है कि अभी इसका सही रेट बताता , तो उत्सुकता उतनी न होती, पर कम कीमत पर उनका आंख फाड़ना वाजिब था। लोगबाग बार-बार क्वालिटी की बात करेगें, पर सस्ती वस्तुओं का आकर्षण कुछ अलग ही होता है। नाक-भौं सिकोड़ने वाले लोग भी सस्ते सामान पर मूर्च्छा में नहीं गिरते है, अपितु पूरे होशोहवास में ही लुढ़कते है। मैंने उनकी इस आदत विशेष पर गौर किया। वे अक्सर बाजार से लाई गई किसी भी सामग्री का जो दिया गया मूल्य होता था, उसे आधा करके अपने पास पड़ोस में बताते थे। अगला जब ये कहता कि एक हमें भी दिला दो, तो छूटते ही उनका जवाब होता कि दुकानदार जल्दी में था, सो बेंचा और भागा। अब कल देखेंगे, होगा तो इसी रेट में दिला देंगे। वे बुद्धिमानी का बिछौना बिछाकर लोगों की ईर्षा ओढ़ते थे।

लोगों को समझाने की उनमें जबर्दस्त सामर्थ्य दम भरती है। बिना खाये-पिये दस से बीस घण्टे तक लोगों की काउंसलिंग करने में खूब वाहवाही पाये थे। अतीत से तो इतना चिपके हैं जैसे लंबे समय तक न नहाये बच्चे के साथ मैल। अब देखों मेरी चच्ची, मेरे फूफा और मेरे मौसिया के साथ चार साल पहले यह घटा था। वे इसी में मस्त और घरैतिन इससे त्रस्त, पर वह भी कभी कभी उनकी मस्तियाई में मस्त हो जाती थी। वे अपने लिए कम दूसरे के लिए आंसू बहाने का परमानेंट लाईसेंस लिये थे। ऐसा लाईसेंस जो बिना किसी नवीनीकरण के चलता रहे। वे अपनी बात कहने में तो गुरेज करते पर दूसरे की बात हलक से निकालने में परहेज भी नहीं करते थे। उन्हें आता लगभग सब था। वे मशीनी उपकरण में बिना डिग्री मास्टर थे। मूड हो और उसके साथ अंगूरी भी .... तो कहना ही क्या ? फिर दुनिया चाहे एक तरफ, बांहे चढ़ाकर निपट ही लेंगे, का तुर्रा जरूर मारते थे। अक्सर वे निपटते भी थे। पर वे यह दूरी जरूर बनाये रखते थे कि मामला पुलिस से दूरी का ही रहे। पुलिस से वे कोसों दूर रहते थे। पुलिस को वे आम आदमी नहीं मानते थे, उनकी धारणा थी कि इन्हें विशेषरूप से कुशल कारीगरों से भगवान ने बनवाया होगा। तर्क में यह कहते थे कि उनके बोलने का ढंग, चलने की अकड़, तनी गर्दन यह ऐसे अंदाज है, जो सामान्य जन में नहीं। चूंकि वे सामान्य जन से आते थे और पुलिस सामान्य जन से नहीं आती थी, इस वास्ते उनकी पुलिस से दूरी वाजिब भी थी। इससे उनके चिंतन को समझा जा सकता है। यदि अपने स्कूटर पर दो लोगों को चढ़ाये हुए सुर में है तो चौराहे से दो सौ मीटर पहले ही पीछे बैठे व्यक्ति को उतरने को कह, हिदायत ये देते कि चौराहे से बीस कदम आगे मिलना। चौराहे पर यह असामान्य जन, उनकी भाषा में, अर्थात पुलिस जी, मिलते कि इससे पहले ही वह अपनी कानूनी जरूरतें दुरूस्त कर लेते थे। मैकेनिक तो इतने जबर्दस्त थे कि नई घड़ी आई कि बस, उसका पोस्टमार्टम शुरू। पुर्जा-पुर्जा मेज पर, तउ न छाड़े जिद्द के तई इत्मिनान से चार से आठ घण्टे अस्त-व्यस्त घड़ी पर व्यय कर देते थे। अब घड़ी अपने आकार-प्रकार में आ पायेगी कि नहीं, इससे उनका कोई मतलब नहीं था। एक लंबी प्रक्रिया के बाद घड़ी में सांस आने लगती, तो खुशी में वे गोलगुप्पा बन जाते थे।

दर्शन से उनका गहरा लगाव था, पर अन्य दार्शनिकों से कुछ मायने में वे भिन्न थे। जैसे कुछ पगलाये दार्शनिक पत्नी की एक तेज आवाज में छड़ी को बिस्तर पर और खूंटी पर स्वयं टंगने वाली अदा के वे कतई विलग थे। वे छड़ी और स्वयं दोनों को ही खूंटी पर टांगने की प्रवृत्ति में हस्तपुरूष थे। वे पत्नी की गहरी नींद में खूब सोचाविचारी किया करते थे। कहते भी थे कि दर्शन और पत्नी दोनों एक दूसरे के विलोम है। यह अलग बात है कि पत्नी सुदर्शना है तो वह दर्शन नहीं हो सकती है। पर दर्शन सुदर्शन है तो पत्नी-सम नहीं हो सकता है। वे घूसखोरी के बेहतरीन नुस्खे जानते थे पर उनके प्रयोग में ये नुस्खे पूरी तरह से कुंवारे थे। कभी-कभी वे गुसियाते तो पूरी व्यवस्था को जला डालने की वागची पहल भी कर डालते थे। कुल मिलाकर वे अपने सिद्धान्तों की जड़ों में व्यवहार का मठ्ठा डाला करते थे। लिहाजा उनके सिद्धान्त कभी बेल का रूप नहीं ले पाये। इसलिए एल.एल.बी. की उपाधि लेने के बाद भी वकालत तीन महीने ही कर पाये, क्योंकि वे उस क्षण बेहद परेशान हो जाते थे जब उनका मुवक्किल पैजामे के नाड़े के पास गुमचे हुए रूपये निकालने में काफी देर कर देता, उनकी जिज्ञासा उस समय दम तोड़ देती थी जब गुमचा हुआ नोट बीस रूपये की शक्ल ले लेता था, उनके हिसाब से दो सौ रूपये तो मिलना ही था। खुद झूठ नहीं बोल पाते थे लेकिन दूसरों को झूठ बोलने की टिप्स देने में कभी पीछे नहीं हटते थे। वे छुटके, बड़के सब के साथ खड़े हो जाते थे, पर उनके साथ सुर नहीं मिला पाने के वास्ते अक्सर सर पर कुछ बचे हुए बालों को नोचने में लग जाते थे।

वे सीढ़ियों पर कभी नहीं चढ़े, क्योंकि उनका यह मानना था कि इससे ऊंचाई पर पहुंचना होता है। इसलिए सदैव जमीन को पकड़ कर चलते थे। पैदल चलते थे। सड़क पर लगे साइनबोर्ड को पढ़कर चलते थे। गली-मोहल्लों की गिनती करके चलते थे। पदयात्रा के गुर जानते थे। इसलिए जेब में पैसा रखने से परहेज करते थे। उनकी बहुआयामी अदा से उनके इष्ट-मित्र उन्हें नजरंदाज नहीं कर पाते थे, क्योंकि उनकी राय पूर्णतया नि:शुल्क होती थी। लोगबाग उनका परिचय कराते समय अक्सर कहा करते है कि .. और एक ये हैं।

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स्वर्गीय

· आर. के. भँवर

जिंदगी भर खुद नरक में रहे, उनका पास-पड़ोस और परिवार उनके नरकीय जीवन के साथ घुट-घुट कर जिया। तनाव में पूरे समय जिये और साथ-संगी, पास-पड़ोस को भी तनाव परोसते रहे। मुस्कराहट और जिंदादिली उनसे मीलों दूर रही, क्योंकि इसका वह ककहरा भी नहीं जानते थे। पर एक दिन चल बसे। कैसे मरे, बीमारी या दुर्घटना, यह विषय विवेचना का यहां पर नहीं है। गुजर गये तो गुजर गये। पर जैसे ही मरे, वैसे स्वर्गीय हो गये। इष्टमित्र उनकी मातमपुर्सी में स्वर्गीय लगा लगा कर अफसोस जाहिर कर रहे थे। अफसोस जाहिर करने वाले दिलखोल कर उनके बारे में बातें कर रहे थे, क्योंकि वे अब निश्चिंत थे कि ये जनाब दुबारा उन्हें तंग करने प्रकट नहीं होंगे। बस इसी बात से वे सभी अंदर ही अंदर बेहद खुश थे। और हो भी क्यों न। क्योंकि वे सीधे सादे आदमी से भी कुतर्क कर उसे एक ऐसे तापमान पर छोड़ देते थे कि उसके हिस्से में अपना बाल नोचने के सिवा कुछ भी नहीं बचता था। वे इसी स्थिति से अपने अंदर एक परमसंतुष्टि का अनुभव करने लगते थे। परिवार के सदस्य उनकी उपस्थिति मात्र से ही सहमे रहते थे। पता नहीं किसको क्या कह दे और उनके कहने मात्र से क्या-क्या घट जाए, इसी में वे सभी उन्हें बंद कमरे में जबरिया सुना करते थे। पर अब वे नहीं रहे। उनका न रहना, रहने से अधिक सुकून दे रहा था।

पर, ये मरते ही आदमी स्वर्गीय क्यों हो जाता है ? निश्चित रूप से यह शोध का विषय हो सकता है। वह नरकीय क्यो नहीं होता। शास्त्र, जैसा माना जाता है कि इनके रचनाकार ब्राह्मण ही थे, के अनुसार मरे आदमी के लिए श्रद्धावश, ताकि श्राद्ध के दिनों उनकी खूब चांदी कटे, इन शब्दों का चलन समाज में लाया गया था अथवा मरे आदमी विचार या आलोचना का विषय नहीं होते है क्योंकि वे अब इस धरती पर नहीं है। पर श्रद्धा की कमेस्ट्री इतनी भी बुरी नहीं कि जीते जी पूरा परिवार उसके नरकीय विचारो से त्रस्त रहा हो, वह मरते ही स्वर्गीय हो जाये, ये तो समाज और परिवार के लिए सरासर बेमानी है। यहां यह भी हो सकता है कि लोगबाग मृत्यु जैसे सच से डरे नहीं, इसलिए स्वर्गीय लिखने का विचार घूस के रूप में विकसित हो गया हो। ताकि मरने के बाद यह पूरे समाज में ढोल पीट-पीट कर कहा जा सके कि जो आदमी मरा था, वह ऊपर स्वर्ग में है, मौज में है और ऐश में है। जैसे स्वर्गीय दीना नाथ पाठक की नेमप्लेट स्वर्ग में स्थित एक कक्ष के बाहर लगी हो। इसलिए मरने से घबड़ाना नहीं।

मरते सभी है या सभी को मरना पड़ता है। कोई ऊपर से लिखा कर लाया भी नहीं है। यही सब सोचते सोचते एक दिन मैं ख्वाब में मर गया। वैसे मरने के पहले मुझे कोई पदम-श्री या लाईफ टाईम अचीवमेंट पुरस्कार नहीं मिला था, इस वास्ते मेरी मृत्यु का उत्सव बहुत महिमामंडित नहीं हुआ, थोड़ा बहुत इसका अफसोस रहा। मरने के बाद अखबारों की न्यूज बनने से कतराने की इच्छा मेरी जरूर पूरी हुई। क्योंकि मुझे मीडिया के लोग जानते ही नहीं थे। ये जरूर था कि यह किताब यदि छप जाती तो जुगाड़ करके या सत्ता के गलियारे में धूनी रमा कर कुछ ऐसी तिकड़में जरूर कर लेता कि इसे भारी भरकम पुरस्कार मिल ही जाता। हां, तब मरता तो ज्यादा मुनासिब होता, बस यही बात बहुत गहरे से सदमे की तरह चुभती रही। मरने से पहले मैंने अनेक प्रकाशकों से बात की, पर कोई लेविल तो था नहीं, इसलिए धकिया दिया गया। एक बात मेरे जेहन में आई थी कि ठेके पर अखबार लिखाने की चलन की तरह क्यों न एक जनहित याचिका कोर्ट में डाल दी जाए कि फिक्र तौंसवी की रचनाएं मैं ही लिखता था या शरद जोषी जी के लिए व्यंग्य लेखन का काम यह नाचीज ही करता था। ऐसा करने से बहुत देर में नुकसान मेरा ही होता, पर तत्काल लाभ जरूर मिलता। मसलन अखबार वाले भाई कुछ दिन तक किसी न किसी कॉलम में मुझ पर लिखते रहते। फोटो अलग छापते। अब फिक्र तौंसवी या शरद जोशी जी तो कहने आते नहीं। खैर अब असमय में ही सही। मर गया तो मर गया। अफसोस यह कि एक साधारण आदमी की तरह ही मैं मर गया।

मेरे पास ऐसा कुछ भी न था जिसकी वसीयत लिख छोड़ता। वसीयत लिखता तो क्या लिखता, कुछ हो तो लिखते भी। मरने के बाद मैंने देखा कि मेरी औलादों का विलाप कुछ अधिक था। वे कह रहे थे कि जितना समय जिये कर्ज में जिये। गाड़ी से लेकर मकान तक कर्ज ही कर्ज। मेरी मौत के मातम में एल.आई.सी होम फायनांस का एजेंट भी आया था और सिंडीकेट बैंक का मैनेजर भी। जैसा कि बताया जाता है कि मरने के कुछ समय तक आत्मा पार्थिव शरीर के आसपास मंडराती रहती है, माफ करना ऐसा बताया गया है, मैंने अपने जीते जी अपने बाप के मरने के समय ऐसा कुछ अनुभव नहीं किया था, लेकिन बड़े लोग कहते है, सो मान लेते है। सो मैंने सोचा कि बहुत देर हो गई है पार्थिव शरीर के आसपास मंडराते हुए, ज्यादा देर रूकना ठीक नहीं है। मुझे डर लग रहा था कि कहीं मेरी पत्नी रौद्र रूप में न आ जाए और आधुनिक सावित्री की तरह घोषणा कर डाले कि मैं भी अपने सत्यवान के साथ चलूंगी। ये बड़ा भयानक डर था कि वहां (स्वर्ग) पर कुछ समय डैपुटेशन पर रह कर देख लिया जाए, ऐसे समय पत्नी का रहना इसलिए वाजिब नहीं था क्योंकि वहां पर मल्लिका शेरावत या नेहा धूपिया जैसी ढेरों अप्सराएं मिलेंगी। जीवितावस्था में ये नाम वैसे ही मेरे जेहन में गुदगुदी पैदा करने के लिए पर्याप्त थे। अब मरने के बाद सीधे स्वर्गं में ये सब मिलती है कि नहीं, यह भी सोच का विषय था। शराब के विषय में मैं उमर खैयाम का चेला था, सो जब तक जिया थोड़ा थोड़ा ही पिया, अपनी कम और दूसरों की जेब से ज्यादा पिया , ताकि वहां पर मय के चष्म दिख जाए तो समूचा गटक जाऊ। मैं आसमान की ओर उड़ता जा रहा हूं, यद्यपि ये सुविधा मैंने अपने जीवन काल में कभी नहीं भोगी थी। हेलीकाप्टर तो छोड़िये ए.सी. ट्रेन में सफर मुनासिफ नहीं हुआ। पर मरते ही मैं आसमान में उड़ रहा था। कहां जा रहा हूं और मेरे आगे गनर के समान यमदूत है कि नहीं, ये कुछ नहीं दिख रहा था, बस उड़े जा रहा हूं। कहां पहुंचना है, यह सब अज्ञात, काल कवलित। पर कमबख्त दिमाग वहां भी चल रहा था। स्वर्गीय हुए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ था, इसलिए भगवान जी ने दिमाग वाला स्विच आफ नहीं किया था।

कुछ देर बाद लगा कि अब सोचने और समझने की औकात जाती रही। वहां पर एक आदमी को घेरे हुए ढेर आदमी बैठे हुए है। मैं उनका हिस्सा बनने की नियत से उसमें शामिल हो गया। पता चला कि ये सभी पृथ्वी लोक के महान लोग है तथा स्वर्ग की व्यवस्था पर गंभीर मंत्रणा कर रहे थे। उनमें एक कह रहा था कि यहां पर प्रजातंत्र होना चाहिए। दूसरा बोला कि वैसे ही जैसे भारत में है। तीसरा विरोधी विचारधारा का था, उसने पलट वार किया कि भारत का प्रजातंत्र कोई प्रजातंत्र है, एक कमरे में जहां दो खिड़कियां होनी चाहिए वहां दस खिड़कियां है। ये प्रजातंत्र वहां सफल नहीं है। चौथे ने उसका विरोध करते हुए समर्थन किया कि अरे बिल्कुल ठीक फरमाया। स्वर्ग में यह व्यवस्था होनी चाहिए। भारत का संविधान एक पंक्ति का है ' जिसकी लाठी, उसकी भैंस' , क्या बुरा है। यहीं यहां पर लागू हो। मैंने देखा कि इस पर विवाद काफी गहरा रहा था। एक स्वर्गीय तो काफी जोश में थे, बांहे हवा में लहराने लगे, बोले कि इसका मतलब यह हुआ कि एक आदमी की ही लाठी होगी और उसी की भैंस होगी, भई यह कैसे हो सकता है, यह तो यहां नहीं चलेगा। स्वर्ग में रहते मुझे छप्पन साल हो गये है। वरिष्ठता का ध्यान रखिए। और अगर यह संविधान यहां पर लागू भी करना है तो समझ लें कि लाठी मेरी होगी और जब लाठी मेरी होगी तो स्वाभाविक ही है कि भैंस भी मेरी होगी। हल्ला गुल्ला मचने लगा। यमदूत आ गये । उनके हस्तक्षेप से भीड़ तितर बितर हो गई।

मेरी स्थिति विचित्र थी। वहां पर भी कई-कई समूह थे। सबके अपने अपने नेता थे। मेरी विवशता यह थी कि मुझे किसी न किसी समूह से जुड़ना ही था। वहां की व्यवस्था से स्वर्ग के अफसरान भी खासे चितिंत दिखे। यमदूतों की स्थिति यहां के पुलिसिया व्यवस्था से भिन्न न थी। धरती से इतने लोगों के वहां पर पहुंच जाने से दिक्कतें तो थी ही। पर करें तो क्या करें। तभी कोर ग्रुप की बैठक का बुलावा आ गया। वहां का दृश्य तो और विचित्र था। सभी थे। पर मौन थे। आंखों ही आंखों में इशारा चल रहा था। तभी प्रस्ताव जो इशारों में ही तैयार कर लिया गया था। पढ़ा गया। तय यह हुआ कि एक नया स्वर्ग बसाया जायेगा जहां पर प्रयोग के तौर पर भैसों को स्वर्ग में रहने का अधिकार दिया जायेगा। आदमियों का स्वर्ग अलग रहेगा। स्वर्ग प्रशासन आदमियों के स्वर्गीय होने पर खासा चितिंत था। इसलिए अब ये दर्जा भैसों को दिया जाए, यह तय कर लिया गया।

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आईडेंटटी क्राइसिस

आर. के. भँवर

सभी में पहचान की जबर्दस्त भूख होती है। जो जहां है वहीं इसे बरकरार रखना चाहता है। इसके लिए उसे कितनी जुगत करनी पडे, कितने पापड़ बेलने पड़े और किस तरह की विकट यात्रा करनी पड़े, यह सारी तकलीफें किसी पहचानदार शख्स से जाना जा सकता है। हम यहां है तो क्यों ? क्या है हमारी पहचान ? किस लिए हम यह काम कर रहे है ? इसके लिए हमें क्या मिलेगा ? पैसा तो मिल ही रहा है पैसे के अलावा क्या मिलेगा ? ये पैसे के अलावा जो है यही आईडेंटटी क्राइसिस है। प्रत्येक बड़ा आदमी इस बीमारी से त्रस्त है। मनोचिकित्सक के लिए यह एक शोध का बड़ा विषय है, बशर्ते इसे बीमारी की परिधि में ले आया जाए। ऐसा नहीं है कि यह बीमारी पढ़े लिखे समाज के हिस्से में आ रही हो। यह उनके भी भाग में है जो निपट निरक्षर है तथा किसी भी मुकाम पर जाने के लिए हाथ पैर धोकर तैयार रहते है। यह सभी जानते है कि इस रोग के लग जाने के बाद उच्च रक्तचाप की परेशानी पिछले दरवाजे से आ ही जाती है।

मैं भी कुछ हूं और मुझे भी लोग जाने का संकट अस्पताल के साइक्रेटिक विभाग में पंजीकरण कराने की अवश्य प्रेरणा देता है। ऐसा नहीं है कि यह बीमारी आज के भागदौड़ अथवा प्रतियोगी समाज के हिस्से में आई है ..... न .. न ... यह पहले से ही थी। रामायण और महाभारत काल में थी। रावण सीता का अपहरण न करता तो क्या उसे उत्तर भारत के लोग जानते ? हिरण्यकश्यपु, कंस और न जाने कितने अनाम राक्षस अथवा देवतागण इस पहचान बोध की ग्रंथि से त्रस्त थे। पहचान न पाने से पीड़ा पैदा होती है। पीड़ा का इलाज पहचान की रसधारा के प्रवाह से होता है और यह न मिला तो ? बीमारी। जवानी में बुढापे के लक्षण परिलक्षित होने में क्या देर लगती है ?

बच्चे, जवान और बूढ़ों में समान रूप से विराजमान है, यह। मैं शब्दों को सजा सजा कर सफेद कागज भरता हूं, ताकि लोग इसे पढ़े और वाह वाह करें, यह भी यही है। पढ़ने वाला यदि ये कहें कि धन्य हो जाओ कि मैं इस कूड़े करकट को पढ़ रहा हूं, यह मैं ही हूं, न पढ़ता तो खाक कौन पढ़ता ? यहां पढ़ने वाला भी भाव मार रहा है, इसमें भी यही ग्रंथि काम कर रही है। मैंने यह अनुभव किया है कि सारे जलसे, मेले, उत्सव सभी में यह फैल रही है। पहचान पर संकट है तो काठ की ढाल और तलवारें म्यान से बाहर निकल आती है फिर अपना गिरे या पराया, कोई भेद नहीं। गिरना तो है ही। यह संकट आदमी को अचानक अंतर्मुखी बनाता है। वह तब तक अंतर्मुखी रहता है जब तक इस संकट से निपटने का रास्ता नहीं खोज लेता है और जैसे उसे रास्ता मिला वह बहिर्मुखी हुआ। यह भी अनुभवसिद्ध है कि वह मौन रहकर भी अंदर वाचाल रहता है। दिमाग के चलने तक वाणी विराम ले लेती है और बंदा अन्तर्मुखी हो जाता है।

आईडेंटटी क्राइसिस ऐसे लोगों के लिए विशेष परेशानी का सबब बन जाया करती है जो अपने आप को सुपर ह्यूमन मान लेते है। यह बीमारी का चरमोत्कर्ष होता है। इसे महा भयानक मानसिक रोग भी कह सकते है। यह बीमारी प्राय: वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों अथवा समाजसेवियों में विशेषकर पायी जाती है। प्राय: इनकी सदिच्छा यही रहती है कि उनकी एक एक गतिविधि खबर बनें। असलियत में मीडिया उनकी जरूरत रहती है। यदि अपनी गल्ती से ये सीढी से नीचे गिर भी जाते तो भी यह स्थिति दूसरों के लिए कैसे और कब प्रेरणा बनें सदैव उसकी फिराक में रहते है। ऐसे लोग रोते नहीं है और हंसते भी नहीं है। और हां सोते समय जरूर मुंह ढक लेते है ताकि चादर के अंदर ही जी भर कर रो ले और हंस लें। यह भी देखा गया है कि ऐसे लोग सदैव चेहरे पर जबरदस्ती गंभीरता ठूंसे रहते है। ये कीड़े मकौड़ों की तरह आदमी धरती पर जब तक रेंगता रहेगा तब तक इनके पहचान की ग्रंथि को रस मिलता रहेगा। ये वर्ग बहुत चतुर सुजान है। ये जानते है कि ब्लैक बोर्ड पर ही सफेद खड़िया चलती है क्योंकि ये जानते है कि सफेद खड़िया के अस्तित्व की रक्षा यह ब्लैक बोर्ड ही करता है। बोर्ड सफेद तो सफेद खड़िया का क्या काम ? और बोर्ड काला तो काली खड़िया क्या झक मारेगी ?

आंकड़ों पर जाईये तो पायेंगे कि भारत में हृदयरोगियों और मनोरोगियों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ी है। सोचिए कि हजारों की भीड़ में सब उसे जानते है फिर भी उसे न जानने का स्वांग कर रहे थे या जैसा सोचा था वैसा रिस्पांस नहीं दे रहे थे, लीजिए एक मरीज का पंजीकरण और बढ़ा।

मुझे एक परिजन का स्मरण है जो पचास पार करने के बाद प्राय: कहा करते थे कि अब मुझे समेटना है। बिखराव कम करना है। वे जानते थे कि यदि वे अपने फैलाव को नहीं समेटते है तो उनके आगे का समय गहरी पीड़ा में गुजरेगा। मेरे देखते देखते उन्होंने बड़ी सहजता के साथ समेट लिया। उनके बारे में कभी कभी मैं सोचता हूं कि उनकी तनावरहित और शान्तिपूर्ण मृत्यु से बड़े बड़े योगी भी ईर्षा करते होंगे। मुझे अब भी याद है कि मेरी मां पढ़ी लिखी नहीं थीं वह प्राय: कहा करती थी कि कम खाओ गम खाओ या संतोषी सदा सुखी परसंतापी सदा दुखी। ऐसा नहीं था कि यह भाषा की लफ्फाजी या नारों की नालायकी हो या जावेद अख्तर के संवाद का कोई हिस्सा। मैं आज उनके न रहने पर अनुभव करता हूं कि उन्होंने अपने जीवन का रस इन दो वाक्यों में घोल कर तपाया था। यही वजह है कि कभी अपने पास पड़ोस से उनका कोई विवाद नहीं हुआ। मुझे जहां तक याद है कि उन्होंने शायद ही किसी का दिल दुखाया हो। मन में कोई मैल नहीं रखती थी वे। इसलिए वह डरती नहीं थी। अगर कोई उनसे यह कहता कि आने वाले दिनों में संकट के बादल घिरेंगे तो तपाक से बोलती थी कि धन्य भाग मेरा कि उस संकट को देखने के लिए मैं जिंदा रहूंगी। बीमारी या बेहद परेशानी में भी उनके मुख से प्राय: यहीं निकलता था कि इस पीड़ा के लिए मेरा वरण भगवान ने बहुत सोच समझकर किया है। यह मेरे अच्छे के लिए ही है। यहीं वजह थी कि उनकी पीड़ा प्रसाद बन जाती थी। सो बगैर दवा लिये वह दुरूस्त हो जाती थी। उनकी पूजा मन से होती थी, तन से नहीं। घण्टी, अगरबत्ती, कपूर, लौंग, नारियल, श्रृंगारादि जैसे तामझाम से सदैव दूर रही। उनकी पूजा कब हो जाती थी, किसी को पता भी न चलता था। उनमें कोई झामा नहीं था। पढ़ी लिखी न होने के बावजूद भी जीवन के संजीदेपन की समझ उनमें बड़ी गहरी थी। उनका सरस्वती देवी से नाम माया देवी पिता जी ने इसलिए कर दिया था क्योंकि बैंक में माया नाम से हस्ताक्षर करना उन्हें सिखाया जा सकता था। माया में सिर्फ दो अक्षर थे, पेंसिल से लिखे पर कलम फिराना बड़ा आसान था। बाद में वे बड़ी तरकीब से माया लिखने लगी थी। जब तक जिंदा रहीं उन्होंने नहीं चाहा कि उनकी कहीं कोई पहचान बनें। सबके खुश होने में खुशी और सबके दु:ख में दु:खी। इस फलसफे में उनकी मस्ती बेजोड़ थी। आज जब वह नहीं है तो आसपास जो घट रहा है उसे देख देखकर उनकी बेहद याद सताती है।

पर अब के पहचानग्रंथि वाले लोगों में 'स्व' का भय पाल्थी मार कर स्थायी रूप से बैठा हुआ है। क्या जरूरी है पहचान ? इसके बगैर आदमी जिंदा नहीं रहेगा क्या ? दाल भात रोटी की तरह यह जीवन का हिस्सा क्यों बनती जा रही है ? हमारा कृतित्व हमारी पहचान हों, हों पर बने नहीं। होना निसर्गसिद्ध है और बनना प्रयासबद्ध। कार्य करते करते उम्र की गणित ने उन्हें कब झुर्रियों का उपहार प्रदान कर दिया, यह उन्हें पता ही नहीं चला या अमुक लोग उनके किये गये कार्य का उदाहरण देकर उनका अनुसरण करने लगे, ये बात जानने के लिए भी वे कभी लालायित ही नहीं हुए। लोगों को अच्छा लगा सो उनके बताये रास्ते पर चल पड़ें। ये भी जानने का समय भी उन्हें न मिला। क्या अब ऐसे लोग नहीं पैदा होते है ? या भगवान ने धरती को इन लोगों से विलग कर दिया है !

मुझे लगता है कि अभी ऐसा नहीं हुआ है। भगवान बड़ा कृपालु है। वह ऐसा नहीं कर सकता है। अब भी ऐसे लोग जो हमारे आसपास विचरण करते है। हमें यह प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवान हमें ऐसी आंख दे। हम उन्हें देख सकें और पहचान सकें। वे हमारे काम के लिए है। अंधेरे में हमें रास्ता सुझाने के लिए है। विवशता के क्षण में संबल देने के लिए है। ये फासले पाटने के लिए है तो हौसला देने के लिए भी है। उन्हें पहचानने के लिए भगवान हमारे अंदर विनम्रता की आंख दे। अहंशून्यता की आंख दे। समरसता की आंख दे। सौम्यता और सहजता की आंख दे। ऐसे लोगों के प्रति गहरे सम्मान से भर जाने की आंख दे। थोड़ी सी लिफ्ट कराने की हजार ख्वाहिशें वाली आंखों में मोतियाबिंद हो सकता है या ऐसी आंखों में माड़ा पड़ सकता है , पर हे भगवान उन लोगों की पहचान ' पहचानदारों ' से दूर रखना।

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रचनाकार संपर्क : ram_kishans@rediffmail.com

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,345,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,67,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,242,लघुकथा,1248,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2005,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,707,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,793,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,83,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,204,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: आर. के. भंवर के कुछ व्यंग्य
आर. के. भंवर के कुछ व्यंग्य
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