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विपिन चौधरी की कविताएँ










कविताएँ

-विपिन चौधरी

उनके स्वर



तनी हुई मुट्ठी लिये
वे बढ़ रहे है,
क्षितिज के उस पार,
बगावत की
तयशुदा परिभाषा के साथ।

अंधेरे और उजाले,
सच और झूठ,
भविष्य और वर्तमान,
सपने और हकीकत के बीच,
स्पष्ट भेद करते हुए।

जीवन और मृत्यु,
प्रेम और जुदाई,
के बीच का विकल्प तलाशते हुए।

जीने की उत्कट तलब लिये
खामोशी की बुनी हुई पैरहन ओढ़े
शब्दों के सुगबुगाते अंगारे लिये।

आखिरी इमारत के ध्वस्त होने से पहले,
लड़ाई के प्रबल दांव पेंच लिये,
वे तमाम अवरोधों से टक्कर लें
तनी मुट्ठी के साथ
उतर आएंगे वे
यकीनन
सड़क के बीचों बीच
सूर्यास्त से ठीक पहले।


विरोध

समय के घटते बढते क्रम में
मैं जहाँ हूँ,
वहीं से
एक लकीर खींचती हूँ
इस पार या उस पार।

जीवन की इस सटीक हिस्सेदारी में
मैं अभी से
अपना जायज हिस्सा ले,
जीना शुरू करती हूँ
कल, परसों, नरसों से नहीं
आज से
अभी से।

जहाँ मैं खड़ी हूँ
यात्रा आरम्भ करती हूँ,
वहीं से
जीवन के पक्ष में,
मृत्यु के विरोध में।

समय आ गया है,
इस शाश्वतता का
कुछ तो विरोध हो।


शोरगुल के बीच गुम होती आवाजें


जब दिन बोलता था
रात
चुपचाप सुना करती थी।
ठीक ठाक था
तब तक
बोलने सुनने का
यह सिलसिला।

फिर हुआ यह
दिन तो बोला ही बोला
रात, सुबह, शाम
सभी ने
बेलगाम
बोलना शुरू कर दिया।

अब ये
सारे के सारे पहर
चकचक करते हैं लगातार,
इनके शोरगुल तले
दब कर रह गया है,

एक सिरे से
दूसरे सिरे का संदेश
पक्षियों की कलरव ध्वनि,
हवाओं की सरसराहट,
बारिश की रिमझिम,
मंत्रों की ऊर्जा।

ध्वनियों की दुर्लभ प्रजातियाँ
अब खतम होने के कगार पर हैं।

प्रतीक्षारत


एक सपना
सच होने
की बाट जोह रहा है।

जीवन अनदेखी
सफलता की आस
लगाये बैठा है।

प्रेम अपनी
अन्तिम परिणिति
चाहता है।

जामुनी हाथों को
अपने श्रम की बाट है।

इस घनघोर प्रतीक्षा के आलम में
दिन अभी भी
बहुत दूर है।

अब शायद
शाम होगी
फिर रात होगी
तब प्रतीक्षा और गहराएगी।
अभी तो
प्रतीक्षा में लीन रहने का वक्त है।

सुबह ही
देहरी पर दस्तक के बाद
कुछ उम्मीद जगेगी।
मेरा है यह सवेरा


जीवन के आलोक में
जो
घुलता गुनगुना सवेरा
खामोश सांझ
रक्तिम अंधेरे का डेरा है
वह मेरा है।

जो बार बार बन कर
उखड़ रहा है,
फिर तन कर खड़ा होता है
उसमें विश्वास मेरा है।

शब्दों में सिमटी कहानियों
की परछाइयों में झाँकता चेहरा
मेरा है।

बेहतरीनता के दौड़ से जो
अचानक बाहर हो गये
उनसे एक सवाल मेरा है।

रंग हजारों बिखरे पड़े हों
जहाँ,
वहाँ किस तूलिका पर
अधिकार मेरा है।


मेरी उपस्थिति, मेरी अनुपस्थिति

उस एकमात्र, अछूते दृश्य में
मेरी उपस्थिति
कभी सम्पूर्णता से
दर्ज नहीं हो सकी ।

कभी आधी,
कभी पौनी,
कभी
केवल स्पर्श भर।

तब मैं
कैसे बता सकती हूँ
उस दृश्य का
भौगोलिक,
ऐतिहासिक,
समकालीन,
आधारभूत सत्य।

उस दृश्य के आवर्त में
सिमटी हवाओं के संत्रास से
कैसे परिचित हो सकती हूँ मैं।

जिस दृश्य में मैं कैद हूँ,
वहीं अपने आप को
यत्नपूर्वक समेटे हुए।
कई शाश्वत बेचैनियों से गुजरते हुए,
जीवन की बेहतर मीमांसा करते हुए,

इस बादलों से घिरी साँझ में,
देख रही हूं मैं
कई दृश्यों का घटना बढ़ना।
युग दास्तान


जगह छोड़ो,
परे हटो,
यह स्थान
खाली करो।

यहाँ आयेंगे,
सबसे मशहूर नायक,
धुरंधर खिलाडी,
सिने तारिकायें,
विश्व सुंदरियाँ,
सबसे धनी व्यक्ति,
सबसे सुगठित पहलवान,

यहाँ लगातार
कई दिनों,
कई सालों,
कई शताब्दियों तक
उत्सव चलेंगे,
तेज धुनें बजेंगी,
प्रतियोगितायें होंगी,
हमें इनमें
शामिल होना ही होगा
चाहे अनचाहे।

आने वाली पीढियों को
हम अपनी लाचारी की दास्तान सुनाएंगे।

1 टिप्पणियाँ

  1. वाह ! क्या खूब कविताएं हैं। इससे पहले भी विपिन चौधरी की अन्य कविताएं एक अन्य नेट पत्रिका में पढ़ी थीं। वो कविताएं पढ़कर भी लगा था कि इस कवयित्री में अपनी बात कहने की रचनात्मक ऊर्जा है। रचनाकार में छ्पी कविताएं न केवल ध्यान खींचती हैं वरन सोचने को विवश भी करती हैं।

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