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आर के भंवर के दो व्यंग्य

व्यंग्य

संचालक

-आर.के.भंवर

r k bhanwar1 (WinCE) एंकर, संचालक, कम्प्येरर, उद्घोषक, एनाउंसर ये सारे शब्द एक उस बहु प्रयोजनीय व्यक्ति के निमित्त गढ़े गये हैं जो किसी संगोष्ठी, कार्यशाला, व्याख्यानमाला या सभा में 'मास्टर आफ सेरेमनी' होता है। किसी आयोजन के हिट और फ्लाप दोनों में ही उसकी भूमिका प्रबल होती है। रद्दी से रद्दी कार्यक्रम को वह बोलने की अपनी चमत्कारिक शैली में सुपरहिट करा सकता है। इसके विपरीत सुपरहिट आयोजन को अपनी नीरसता से बोगस भी। वह मंच पर ही एक दो किलोमीटर चल लेता है। वह सभापति की तरह एक आसन धर न होकर उठक बैठक लगाता ही रहता है। चुनाँचे एक स्थान पर बैठना उसके नसीब में नहीं। उसकी भूमिका उस टिकट चिपके लिफ़ाफ़ा की तरह है जिसे फाड़कर उसमें रखे पत्र को पढ़ना होता है और आप बेहतर ही जानते है कि फटे लिफाफे को कोई कलेजे नहीं लगाता है। इस प्रकार संचालक अपना काम करके डस्टबिन में चला जाता है। वह पूरे आयोजन का सूत्रधार होता है। वह मोतियों की माला का धागा होता है। माला, जिसमें मोतियां तो दिखती हैं पर धागा नहीं। और धागा यदि अपने को दिखाने की चाह रख ले तो मोतियों पर क्या गुजरेगी ?

वह किसी भी आयोजन का लास्ट मैन स्टैंडिंग होता है। आयोजन की समाप्ति तक अथवा सभी को स्वल्पाहार की मेज तक भेजने की घोषणा तक वह मंच पर रहता है। उसके हाथ का कागज परम गोपनीय होता है। बोलने के लिए किस किस महानुभाव को अवसर दिया गया है अथवा किसको नहीं दिया गया है, यह काम कम खतरे का नहीं होता है। जिसको बोलने का अवसर नहीं दिया गया और वह पूरी तैयारी के साथ आया है तो क्या समझते है वह महाशय अपनी बांह नहीं चढ़ायेंगे। घूर घूर कर यह तो बता ही देते है कि उतरो नीचे बच्चू , देखते है तुम्हारी औकात। ऐसे अवसर पर वह बहुत निरीह प्राणी होता है। उसके बचाव के लिए कोई नहीं आता है। मुख्य अतिथि अथवा माननीय अध्यक्ष जी को माला पहनवाने में कहीं चूक कर दी तो भी उसकी खैर नहीं .. । उसने जिस किसी से माला नहीं पहनवाई वह उसके दुश्मन, नीचे उतरे तो देख लेंगे की धमकी सो अलग। डर डर कर वह कैसे अपना काम चलाता है यह किसी धुरंधर संचालक के जेहन से पूछिये।

संचालक आयोजन की बुनियाद की ईंट होता है, जबकि कलश किसी और का चमकता है। उसका नाम भी नहीं छपता है। यदाकदा छप भी गया तो मात्र इतना गोष्ठी का संचालन फलां ने किया। उसमें यह भी नहीं बताया जाता है कि संचालन कला, किस कोटि की थी।

वर्तमान दौर में लोगबाग इस कला में अपना कैरियर खोजने लगे है। बेरोजगारी तो है ही। क्या करें, यह क्षेत्र कठिन तो है पर बहुत कठिन नहीं है। थोड़े बहुत शब्द और विशेषण पास में हो तो काम चल जाता है। पर मास्टर होने के लिए मंचीय तिकड़म को सीखना भी जरूरी है। जैसे आयोजक चाहता है कि फलां श्रीमान को कम महत्व मिले अथवा फलां जी को कुछ ज्यादा। वह तदनुसार काम कर लेता है। आयोजन का सफल होने का मतलब यह कि जितना कुछ लगाया है उससे तिगुना आयोजन से प्राप्ति नहीं हुई तो आयोजन की सफलता में कुछ कमी अखरेगी। सफल आयोजन हेतु समझदार आयोजक आयोजन से पहले संचालक से आधा दर्जन बैठक अवश्य करते हैं। इन बैठकों का मात्र उद्देश्य इतना ही रहता है कि कोई लय न टूटने पाये या जो फलसफा तय हो वह वैसे ही कार्यान्वित भी हो।

एक कुशल संचालक मंचस्थ वर्ण्य सद्जनों का इतिहास साथ में रखता है। उनके पैदा होने से लेकर उनके सुकृत्य (मंच पर श्रीमानों का कुकृत्य ब्यौरा निषेध होता है) तक का ब्यौरा। वह आयोजन का सूत्रधार तो जरूर होता है पर उसका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता है। उसे वही करना है जो आयोजक चाहेगा। इसे ऐसे कह ले कि रिमोट आयोजक के पास ही रहता है। वह दायें बायें जा ही नहीं सकता। उसकी नजरे आयोजक के संकेत की ओर लगी रहती है। मजाल क्या कि वह इधर उधर की कुछ जोड़ दे या छोड़ दे। यदि किया भी तो मानदेय में कटौती हुई। इस प्रकार वह अपने पेट पर जानबूझकर लात कभी नहीं मारता। यह अलग बात है कि मंच पर उससे छेड़छाड़ होता ही रहता है।

उसकी स्थिति उस समय अत्यंत दयनीय हो जाती है जब किसी वक्ता को बोलने के लिए पांच मिनट निर्धारित हो और वह बिना विराम के तीस मिनट बोल जाये। ऐसे में क्या करें, वह ? कितनी ही बार वह मन ही मन उसे गाली देता है, पर बाहर वह मुस्कराहट बिखेरने के अलावा कुछ नहीं कर पाता। बुध्दिधर लोगों का मानना है कि संचालन कर्म उन्हीं को साजता है जो अपनी विचार यात्रा का सफर मीलों तक नहीं ले जा सकते हैं। यह सोच ऐसे बुद्धिजीवियों की हो सकती है जो संचालन कर्म से जलन रखते हो। दरअसल एक कुशल संचालक एक कुषल रिर्पोटर भी होता है क्योंकि वह मंच की क्ष त्र ज्ञ से भिज्ञ होता है। मंच पर जब तक रहता है वह अतिविशिष्ट श्रेणी में रहता है। मंच से उतरते ही .... ?

संचालक आयोजन में सिर्फ संचालक ही होता है, उसका कोई नाम नहीं होता है। आयोजन सफल रहा हो तो आयोजक की जय जय। और संचालक, पर्दे के पीछे। सार यह है कि वह निष्काम कर्म की प्रतिमूर्ति होता है। कर्म में ही अधिकार रखने वाले संचालक को जो भी पत्र पुष्प सहज भाव से प्राप्त हो भी जाते है तो वह क्या उसकी गंभीर योग्यता के समतुल्य होते हैं ? उसके कार्य का आंकलन धन नहीं है और धन हो भी नहीं सकता है। वह आयोजन की नब्ज पर हाथ रखता है। क्या मजाल कि आयोजन के मिनट-टू-मिनट से वह भटक जाये, न ... न ... हो ही नहीं सकता।

संचालक का अपने कर्म के प्रति निष्ठा का भाव सभी क्षेत्रों में ग्राह्य होना चाहिये। हम जब कोई काम करते हैं तो उसकी पूर्णता पर प्राप्ति का भाव रखते हैं, प्राप्ति मतलब धन या यश, में कोई या दोनों ही, पर संचालक इन दोनों से दूर रहता है। धन मान ले मिल भी जाता है तो वह उसकी प्रतिभा कर्म का स्पष्ट मूल्यांकन कदापि नहीं है। इस विघा में लोग कैरियर की खोज करते हैं, उन्हें इससे काफी राहत मिलेगी।

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व्यंग्य

धनतंत्र + गनतंत्र = गणतंत्र

-आर.के.भंवर

जब बात आती है गणतंत्र की, तो मुझे अभी भी लगता है कि इस देश में धनतंत्र और गन(बंदूक) तंत्र के सामने जनतंत्र लाचार है। धनतंत्र और गनतंत्र दोनों मिलजुलकर काम कर रहे है। समन्वित विकास यात्रा में दोनों का जबरदस्त महत्व है। यह दोनों जब-जब साथ रहे है तो समाज, राज्य और देश का बेड़ागर्क किये है और कर रहे है, आगे भी करते रहेंगे। भारतीय राजनीति में इनका महत्व सर्वोपरि है। ये दोनों सत्ता की चूलें है। देश में गणतंत्र की वर्षगांठ मना ली गई है। सत्तावनवां गणतंत्र आया और आखिरकार मन ही गया। सबने खुशियां मनायी, झांकियां सजकर निकली, नेताओं ने भाषण दिये और हमारा गणतंत्र मजबूत हुआ। हो भी क्यों न ...... उम्र के सत्तावनवें दौर से गुजर रहे गणतंत्र का परिपक्व होना स्वाभाविक ही है। हमारे वैज्ञानिक व पूर्व राष्ट्रपति जी का भी यही कहना था कि संसदीय कार्य प्रणाली में परिपक्वता आ चुकी है। बहरहाल हमारा गणतंत्र उम्रदराज हो, ऐसी सभी की कामना होती है। अपने गणतंत्र के प्रतिवर्ष बढ़ते रहने से और इस बार उम्र के सत्तावन वर्ष की डयौढ़ी पर पहुंच जाने पर एक अनायास शंका मन में अलार्म बजाती है। क्षमा करिये शंकाएं कहीं तनाव में न बदलने पाये, इसलिए शंकाओं को शब्द देना परम आवश्यक है।

शंका यह, कि क्यों , क्या अपना गणतंत्र रिटायर नहीं होगा। और होगा, तो कब होगा। अट्ठावन में या साठ में या बहसठ में । फिर ढीले-ढाले, खर्चीलें गणतंत्र को क्यों न वी.आर.एस. दे दिया जाए कि भाई यह लो अपना पैसा या तो फुरसत से अपनी रिटायर्ड जिंदगी बिताओ या कोई प्राईवेट धंधा करो। हमें अब तुम्हारी जरूरत नहीं है। हमने एक कम्प्यूटर खरीद लिया है और नया साफ्टवेयर डलवा लिया है जो गणतंत्र की जगह काम कर सकता है। संविधान भी उसी कम्प्यूटर में फीड कर दिया है, वख्त जरूरत पर उसका इस्तेमाल करते रहेंगें। गणतंत्र मंहगा पड़ता है, उसे वी.आर.एस. देने पर देष का खर्च बचेगा। देश की विकास दर बढ़ जायेगी। जरूरत हुई तो किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी को ठेका दे देंगे। क्या जाता है एक टेंडर नोटिस सरकारी खर्चे पर निकालने में। चट्ट टेण्डर छपा और पट्ट आवेदनों के ढेर गिरे। बना डालेगे कम्परेटिव स्टेटमेंट। फर्स्ट लोएस्ट को दे देंगे, काम। बस। एक महीने पहले से तैयारी करने वाले, लंबी दूरी पर कदमताल करने, मंगनहीं का कपड़ा ले काम चलाने वाले स्कूली बच्चे को तो यही मालूम कि सज-धज कर परेड में जाना ही छब्बीस जनवरी कहलाती है। बहुत ज्यादा तो इतना कि इसी दिन संविधान जनता जनार्दन के हवाले कर दिया गया था कि लो रखो, पढ़ों और अपने पर लागू मानों। तो क्या जोखू और फुलमत्तो के पास भारतीय संविधान की किताब है या कोई ऐसा तंत्र है जहां से यह किताब बिना किसी आर्थिक दबाव के मिल जाए। इसीलिए वी.आर.एस. या रिटायर की बात आ रही है, कि क्यों, ऐसा हो सकेगा। इतनी मोटी, छोटे-छोटे अक्षरों वाली संविधान की किताब को कौन पढ़ेगा या जब मिलेगी तो तभी न पढ़ी जायेगी। इस देष का संविधान तो एक लाइन का लिखित होना चाहिए वह यह कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, हालांकि यह अलिखित संविधान सभी जगह पूरे उत्साह से लागू है। जब लाठी में झंडा लग जाता तो भैंस कुछ समय के लिए आराम फरमा लेती है, क्योंकि भैंस को मालूम है कि वह बिना लाठी के आगे नहीं बढ़ सकती है। कभी कभी मुझे लगता है कि यह भारत का ही नहीं अपितु विश्व के सभी दादा देशों का संविधान है। ये अलग बात है कि वहां लाठी और भैंस किसी अन्य रूप में है।

देखा जाये तो इस देश में गणतंत्र की जरूरत सचमुच कम होती जा रही है, ठीक वैसे ही जैसे किसी पुराने कर्मचारी की जरूरत आधुनिक कम्पनी में न हो। उसके पास एम.बी.ए. की डिग्री नहीं है और न वह आई.एस.ओ. है, साथ ही वह सिक्स सिग्मा भी नहीं है। नए भारत उद्योग निगम में जो नये प्रोजेक्ट चल रहे हैं, उनमें गणतंत्र बहुत काम नहीं आता। एक प्रोजेक्ट हिन्दुत्व का है, एक जातिवाद का है, एक देश के कारपोरेटाईजेशन का है, ये आधुनिक जमाने के आधुनिक धंधे है जिनमें विकास की संभावनाएं हैं, इनमें आधुनिक तेज तर्रार मैनेजरों की जरूरत है। देश बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है। 21 वीं सदी में जाने से पहले राजीव गांधी जी के साथ सैम पित्रोदा जी आये थे, पर अब उनकी भी जरूरत नहीं है। देश में मरे हुए महान पुरूषों की मूर्तियों की जरूरत है और जरूरत है उनकी जाति के आधार पर संगठन की। जिंदा कौमें इंतजार नहीं करती है, वे आज के जमाने की है, इसलिए मरे हुए महान पुरूषों को अपने झंडे, डंडें, पोस्टर, बैनर के वास्ते जिंदा रखती है। वे पार्टियों या खेमों के सुप्रीमो बन जाते है। पार्टियों में बंटे महापुरूषों के लिए पार्टी का संविधान या पार्टी का एजेंडा। वह भी देश के संविधान से बहुत ऊपर। देश के संविधान कानूनविदों के लिए है या सेमिनार के लिए है। संविधान गण के लिए और तंत्र गण के लिए नहीं, वह मीडिया के लिए है।

ऐसे में हमारा पुराना ढीलाढाला गणतंत्र क्या करेगा। गणतंत्र बनाने वालों की ब्रान्डिंग हमने जो कर दी है। महात्मा गांधी सिर्फ अन्तर्राष्ट्रीय मंचों के लिए ठीक है। उनकी भी अब इस देश में विशेष जरूरत नहीं है। रिचर्ड एटनबेरो के लिए गांधी ठीक है, वह भी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में, ताकि आस्कर में पहुंच सके। यहां तो शेखर कपूर ही पर्याप्त है, बैंडैट क्वीन या एलिजाबेथ पर काम करने के लिए। इस देश में गांधी की उपयोगिता राजघाट तक सीमित है या शपथ समारोहों या दो अक्तूबर या सौ से हजार रूपयों पर मुद्रण तक। ऐसे में बुढ़ाता गणतंत्र काल सेंटर में नौकरी तो नहीं कर सकता है। हमारे गणतंत्र का पेंटेंट हो जाए तो कुछ महत्ता भले ही बढ़ जाए, पर इसके लिए जरूरी है कि सारे महापुरूषों को ब्राण्ड में परिवर्तित कर दिया जाए। सभी का एक नम्बर आवंटित कर दिया जाए जिससे जिसका काम चले, सो चलाए।

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संपर्क:

सूर्य सदन' सी-501/सी,

इंदिरा नगर, लखनऊ,

0522-2345752, मो0 9450003746

e-mail id : ram_kishans@rediffmail.com

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