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अशोक कुमार वशिष्ट की ग़ज़ल - सच्ची बातों का असर

ग़ज़ल

-अशोक कुमार वशिष्ठ

 

सच्ची बातों का असर, देर तलक रहता है,

ये दिल से होता हुआ, रूह तलक बहता है.

 

लोग ऐसे भी हैं जो, सदा दगा देते हैं,

कोई मरता है मरे, अच्छा उन्हें लगता है.

 

एकके मर जाने से कुछ, जिंदा भी मरते हैं,

रूह से तो रूह का इक, रिश्ता सा रहता है.

 

चांद रात को खुश होता , या रोता रहता है,

सुबह धरती पर पड़ी, शबनम से पता चलता है.

 

अब जीने मरने से, डर ही नहीं लगता मुझे,

दोनों अपने हैं मेरे, अब ये मुझे लगता है.

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