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सीताराम गुप्ता का आलेख : आगे बढ़ना है तो परिवर्तन को स्वीकार कीजिए



हालात न बदलें तो इस बात पे रोना,

बदलें तो बदलते हुए हालात पे रोना।

आलेख

आगे बढ़ना है तो परिवर्तन को स्वीकार कीजिए

- सीताराम गुप्ता

शुजाअ ख़ावर साहब की ग़ज़ल का एक शेर है :

हालात न बदलें तो इस बात पे रोना,

बदलें तो बदलते हुए हालात पे रोना।

जी हाँ, यदि स्थितियाँ ख़राब हैं और उनमें अपेक्षित परिवर्तन नहीं हो रहा है तो शिकायत करना जायज है लेकिन परिवर्तन के लिए भी यदि हम शिकायत करें तो ये मुनासिब नहीं। कुछ लोगों की तो ये आदत है कि हर परिवर्तन का विरोध् करेंगे चाहे उससे उन्हें कितना ही लाभ क्यों न होना हो। किसी न किसी बहाने परिवर्तन से बचना चाहेंगे। उसमें कमियाँ निकालने की कोशिश करेंगे और तर्क-वितर्क द्वारा उसे ग़लत सिद्ध करके ही दम लेंगे ठीक भारतीय जनतंत्र में विपक्षी दलों की भूमिका की तरह। यहाँ केन्द्र में अथवा राज्यों में किसी भी दल की सरकार क्यों न हो विपक्ष का सबसे प्रमुख कार्य होता है सत्तापक्ष द्वारा किसी भी परिवर्तन का विरोध्।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन सृजन का नियम है। बिना परिवर्तन के सृजन असंभव है। दुनिया की सबसे स्थायी चीज यदि कोई है तो वह है मात्रा परिवर्तन। जीवन का हर क्षेत्र परिवर्तनशील है। व्यक्ति का निजी जीवन हो अथवा समाज या राष्ट्र या विश्व सभी में परिवर्तन की लहरें उठती रहती हैं। जब भी कोई परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है तो हम सोचते हैं कि ये परिवर्तन हमें परेशान करने के लिए, हमें नुकसान पहुँचाने के लिए किया गया है। इस परिवर्तन के पीछे मेरे ख़िलाफ़ कोई साजिश रची जा रही है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं होता है। परिवर्तन एक सामान्य प्रक्रिया है। एक परिवर्तन देखिए :

दिल्ली में विद्युत वितरण का कार्य निजी कंपनियों को दे दिया गया है। ये बहुत बड़ा परिवर्तन है लेकिन इसका कितना विरोध् हुआ। अब परिवर्तन के लाभ भी देख लें। बिजली की चोरी रुक जाने से या कम हो जाने से बिजली का दुरुपयोग कम हो गया है अत: आपूर्ति की स्थिति बहुत अच्छी है। बिल भरने में दो मिनट का समय नहीं लगता। पहले घंटों धूप में खड़े रहते थे बिल जमा कराने के लिए और अब वातानुकूलित भुगतान केन्द्र हैं। भुगतान के असंख्य विकल्प हैं। एक सबसे बड़ा लाभ जिसका मूल्य नहीं ऑंका जा सकता वो है बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के ईमानदारी का विकास। जो गड़बड़ी करते थे एक ही झटके में ईमानदार बन गये। अब बिजली का दुरुपयोग न करके अच्छे नागरिक भी बनेंगे।

स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रम में जहाँ भी परिवर्तन किया गया वहीं हाय-तौबा मची। नया पाठ्यक्रम पढ़ाएंगे तो क्या परेशानी है। जो नहीं आता उसे सीखने का अवसर मिलेगा। क्या नया ज्ञान अर्जित करना और बाँटना बुरा है? कदापि नहीं। ऐसे हर परिवर्तन का स्वागत किया जाना चाहिये।

आज ग्लोबलाइजेशन के दौर में तो परिवर्तन और भी त्वरित हो गया है। स्थितियाँ जिस गति से परिवर्तित हो रही हैं हम सोच भी नहीं सकते। ऐसे में परिवर्तन से ऑंखें मूँद लेना और भी ख़तरनाक है। आज जरूरी है कि हम निम्नलिखित बातों पर ग़ौर करें :-

1. परिवर्तन एकाएक नहीं होता अत: हालात पर शुरू से ही नजर रखें और बदलते हालात में हमें क्या करना है इसके लिए तैयार रहें। छोटे परिवर्तनों को पहले से ही भाँप लेने से आने वाले बड़े परिवर्तनों के हिसाब से ढलने में सुगमता होगी।

2. परिवर्तन किसी एक के साथ होने वाली घटना नहीं है अपितु सबको परिवर्तन का सामना करना ही पड़ता है चाहे उसे पसंद करें या नहीं, उससे डरें या नहीं।

3. परिवर्तित स्थितियों के लिए दूसरों को दोष देने से भी कोई लाभ नहीं और यह परिवर्तन बदल कर पुरानी स्थिति आ जाएगी इसके इंतजार में बैठना मूर्खता है। उचित तो यह है कि बदली हुई परिस्थितियों के बाद विश्लेषण में ज्यादा वक्त बर्बाद न करके ख़ुद को हालात के अनुसार बदलने का फैसला शीघ्र कर लें। यदि यह चोट या मोच जैसी स्थिति है तो भी ''दर्द निवारक मलिए, काम पे चलिए''।

4. परिवर्तन को अस्वीकार कर देना समस्या का समाधान नहीं क्योंकि इससे समस्याएँ घटने की अपेक्षा बढ़ जाएँगी। आप हालात के बाद नहीं बदले तो निश्चित रूप से नष्ट हो जाएँगे। जीवन के हर क्षेत्र में यही सिद्धांत लागू होते हैं। सबसे पहले परिवर्तन को यथावत स्वीकार कर लीजिए।

5. जब आप परिवर्तन के परिणामस्वरूप नये रास्ते पर चलने के लिए डरे हुए होते हैं तो हालात तब बिगड़ने लगते हैं जब आप कुछ नहीं करते। अपने डर को प्रेरणा स्रोत बना लीजिए। डर हालात को और ख़राब कर देते हैं इसलिए वही करो जो बिना डर किसी आपात स्थिति में करते। निडर होकर नई दिशा की ओर अग्रसर हों। नई दिशा में चलने का अर्थ है आपने डर को जीत लिया है।

6. जब दूसरे लोग परिवर्तन को स्वीकार कर नई मंजिल की तरफ़ कदम बढ़ा सकते हैं और पहले से बेहतर स्थिति में पहुँच सकते हैं तो आप क्यों नहीं? नई मंजिल की स्पष्ट कल्पना मन में करो और उसे दृढ़तर करते चले जाओ।

7. परिवर्तन की स्थिति में पुरानी स्थिति को जितनी जल्दी अलविदा कहेंगे नई मंजिलें उतनी ही सरलता से खोज लेंगे। शीघ्रता से बदलने का सबसे अच्छा रास्ता है ख़ुद की मूर्खता पर हँसना। तभी आप अतीत को पीछे छोड़ सकते हैं और तेजी से आगे बढ़ सकते हैं।

8. जो लोग ये सोचते हैं कि परिवर्तन सही नहीं होता अगर वे नई मंजिल की तलाश में निकल पड़ते हैं तो इस दौरान छोटी-मोटी सफ़लताएँ न केवल उनको और आगे जाने के लिए प्रेरित करती हैं अपितु उनके नकारात्मक दृष्टिकोण को सकारात्मक दृष्टिकोण में परिवर्तित कर देती हैं। नई दिशाएँ नई ऊर्जा और नई ताकत देती हैं।

9. परिवर्तन के बाद पुराने विश्वास भी बदलने होते हैं क्योंकि सोच बदल लेने से कार्य स्वयं बदल जाते हैं।

10. परिवर्तन को बिल्कुल नहीं स्वीकार करने से कुछ देर बाद स्वीकार कर लेना बेहतर है लेकिन स्वीकृति के बाद तेजी से बदलाव लाना जरूरी है क्योंकि अगर आप समय रहते ख़ुद को नई परिस्थितियों के अनुसार नहीं ढालते तो संभव है बाद में ख़ुद को बदलने का कोई लाभ ही न हो। हालात को बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिये क्योंकि हालात कभी नहीं बदलते। बदलाव हमें स्वयं में लाना होता है।

11. नई मंजिल पा लेने के बाद भी आराम से बैठना उचित नहीं। नये विकल्पों की खोज जारी रखें। क्योंकि ये परिवर्तन भी अंतिम परिवर्तन नहीं अत: अगले परिवर्तन के लिए भी स्वयं को तैयार रखें। हर शुरुआत का अंत है और हर अंत एक नई शुरुआत।

12. और जो लोग परिवर्तन के चरम बिंदु पर पहुँचने से पहले ही नई मंजिल की तलाश में चल पड़ते हैं वही आज सर्वोच्च शिखर पर अपनी विजय पताका फ़हरा रहे हैं और साथ ही नये-नये दुर्गम शिखरों की तलाश भी जारी है।

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संपर्क:

सीताराम गुप्ता,

ए.डी. 106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110034

फोन नं. 011-27313954

1 टिप्पणियाँ

  1. परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन सृजन का नियम है। बिना परिवर्तन के सृजन असंभव है ।
    बहुत बढ़िया आलेख आभार

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