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गौतम राजऋषि की प्रेम कविता


किस तरह से और कैसे-कैसे

कितना प्यार करता हूं तुझसे

काश कि कह पाता मैं ये तुझको

या काश कि जानती तू बिना कहे


कहने को तो सारी पीड़ाएं

यूं तुझसे हम कह जाते

इस पागलपन का हाल सारा

और दीवानगी की सारी बातें


कहते-कहते लेकिन रुक जाऊं

मन ये जाने क्या-क्या सोचे

स्वीकार नहीं है इस दिल को

कि मैं कहूं और तु परेशान रहे


तू तो पूरी जिन्दगी है मेरी

नहीं महज एक हिस्सा है

जान पाये तू कभी जो

वो मेरे रोने का किस्सा है


सुनते वो हांजो तेरी तो

शायद अभी हम कुछ और होते

फ़र्क तुझे क्या पड़ता है लेकिन

आंसू ये बहते हैं तो बहे


रुला-रुला जाये उदासीनता तेरी

बेरुखी तेरी कर दे विकल

इतनी मुहब्बत किसी पर्वत से करुँ

वो भी अब तक जाता पिघल


इस अथाह पीड़ा से ऊब कर

जी चाहे अब जीना छोड़ दे

कब तक करें यूँ ही प्रतीक्षा

दर्द ये कब तक और सहें

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