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साधना दुग्गड़ की कविताएँ


कविताएँ

-साधना दुग्गड़


टूटता परिवार बिखरता रिश्ता

शादी के चंद दिनों बाद ही

टूटने लगता है परिवार

आज सुनाई देते है ऐसे ही

किस्से हजार

सुनकर विश्वास नहीं होता था

दिल कहता था यही बार बार

नारी के लिये तो सब कुछ

होता है उसका घर परिवार

इतनी छोटी छोटी बातों पर भी

क्या हो सकती है तकरार

नहीं हुये दिल के अरमान पूरे

नहीं मिले विचार

नारी ने दहेज को ही

बना लिया अपना हथियार

जहां कुछ दिन पहले तक

खुशियां छाई थी घर में हजार

दावतों का लगा रहता था अंबार

उस घर पर ऐसी बिजली गिरी

ऐसा हुआ प्रहार

लगा दिया ससुराल वालों पर

दहेज प्रताड़ना का झूठा इल्जाम

नारी को जो आज मिला है

मान सम्मान और अधिकार

बेवजह मत करो उसे

इस तरह तार तार

यह शस्त्र है

उस अबला नारी का

जो दहेज के नाम

जला दी जाती है

यह कवच है

उस अबला नारी का

जो गुनाहगार को

गुनाह करने से

रोकती है

उस ताकत को यूँ न

इस्तेमाल करो

नारी जाती को कलंकित

यूँ न बदनाम करो

अपनी मान मर्यादा को

यूँ न सरे आम नीलाम करो

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घर की आन बान और शान होती है बेटियाँ

हर दर्द की हमराज़ होती है बेटियाँ

सहेली से भी बढ़कर होती है बेटियाँ

दो दो कुलों की लाज निभाती है बेटियाँ

बेटा है सूरज तो चांद होती है बेटियाँ

दिल के इतने करीब होती है बेटियाँ

दर्द यदि आपको हो तो रोती है बेटियाँ

इसलिये तो विदाई के वक्त

जार जार रुलाती है बेटियाँ

ओस के बूंद सी होती है बेटियाँ

चांदनी सी शीतलता देती है बेटियाँ

आज बेटों से बढ़कर होती है बेटियाँ

वक्त पड़ने पर कांधा भी देती है बेटियाँ

दुर्गा और काली का रूप धरती है बेटियाँ

घर का भरण पोषण भी करती है बेटियाँ

फिर भी गर्भ में दफ़ना दी जाती है बेटियाँ

पराया धन आज भी कहलाती है बेटियाँ

सदियों से सतायी जाती है बेटियाँ

दहेज के नाम जलाई जाती है बेटियाँ

घर की आन बान और शान होती है बेटियाँ

फिर भी बेटे के लिये कत्ले आम होती है बेटियाँ

फिर भी गर्भ में दफ़ना दी जाती है बेटियाँ

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कर्तव्यों से विमुख हो रहा है आदमी

आज कितना अकेला

हो गया है आदमी

कहने को घर बार

रिश्तेदार है सभी

अपने में ही सिमट कर

रह गया है आदमी

दर्द किसी और का देख

खुश हो रहा है आदमी

रिश्तों की अहमियत नहीं कोई

अपनों को भी पराया

बना रहा है आदमी

चोर डाकू लुटेरे नहीं

घर में खुद ही डाका

डाल रहा है आदमी

दुख में आज कितना अकेला

हो गया है आदमी

अच्छे बुरों की पहचान

खो रहा है आदमी

पीज्जा बरगर फास्टफूड खा

पेट को कबाड़ी की दुकान

बना रहा है आदमी

शारीरिक श्रम को छोड़

शान शौकत को

अपना रहा है आदमी

निरंतर चिंताओं में घिरे

ब्लड प्रेशर शुगर का

शिकार हो रहा है आदमी

प्रकृति के साथ खिलवाड़

कर रहा है आदमी

खुद को ही खुदा

समझ रहा है आदमी

आज कितना अकेला

पड़ गया है आदमी

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आओ सोचें जरा

मानवता की उड़ रही है धज्जियां ।

क्योंकि आंखों से चली गई है लज्जा ।।

घर घर में फेल रही है अशांति ।

क्योंकि मन से चली गई है शांति ।।

देश में फल रही है अराजकता ।

क्योंकि वतन से चली गई है नैतिकता ।।

मानव मन में बढ़ रही है कायरता ।

क्योंकि जुबां से चली गई है सत्यता ।।

युवाओं में बढ़ रही है अश्लीलता ।

क्योंकि फिल्मों से चली गई है शालीनता ।।

जिओ और जीने दो कि लुप्त हो रही है मानसिकता ।

क्योंकि मैं और मेरे की हो रही जीवन में है प्रधानता ।।

आओ सोचे जरा

क्या मानव जीवन की यही है सार्थकता ।।

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संपर्क:

श्रीमती साधना दुग्गड़

२१ रवि नगर रायपुर (छ.ग.)

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(चित्र - कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति)

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