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आर के भंवर के चार व्यंग्य

व्यंग्य

-आर.के.भंवर

धब्बा

' कहीं जाने के लिए तैयार होते समय जब हम शीशे में चेहरे पर काला धब्बा देखते है तो शीशा साफ नहीं करते है, बल्कि चेहरे से धब्बा हटाते है। ' प्रबंधन के नये प्रकटे गुरू का यह प्रवचन होनहार मैनेजरों के वास्ते एक पंचतारा होटल के अप्सराई सुख में चल रहा था।

उधर संपूर्ण चेहरे पर धब्बों का एकक्षत्र साम्राज्य शोभायमान करने वाले मंचों के अलंकरण, उद्धाटन और शिलान्यास करने में सिध्दहस्त वंचित पार्टी के अध्यक्ष वंचित नारायण सिध्दोपाय का इन्हीं होनहारों की कार्यशाला में कहना था कि दरअसल अब ऐसे आईनों के उत्पाद पर पूरी तरह से पाबंदी लगा देनी चाहिए। आईनों को वही दिखाना चाहिए जैसा समय, माहौल और चुनौतियां बोले। यदि चेहरे पर धब्बे है और उन्हें आईना दिखा रहा है तो यह अप्रिय सत्य है और आप तो जानते ही है कि शास्त्रों में यह पहले से ही कहा गया है कि सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, अप्रिय सत्यं न ब्रूयात .... । चेहरे पर धब्बे अप्रिय सत्य है।

एक मैनेजर : सर, क्या इस तरह के आईनों का उत्पाद किया जायेगा ..

हां .... हां क्यों नहीं, अब मुझे ही इसकी जरूरत है।

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तू-तू : मैं-मैं

यह आलेख कुल साढ़े दस शब्दों का है। वैसे ही लोगों के पास समय की कमी है, ऊपर से पन्नों में गुदे हुए लेख, आलेख पढ़ने के लिए किसके पास वक्त ? तथापि जिनके पास कम समय है, वे लोग इसे पढ़ने का साहस कर सकते है।

प्रेम

परिणय

परिणाम

ढाई शब्द

चार शब्द

चार शब्द

(तू, तू-ही-तू, तू)

(मैं, मैं-ही-मैं, मैं)

( तू-तू : मैं-मैं )

कुल साढ़े दस शब्द

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पापी पेट

कई दिनों से पेट में भूख सुलग रही थी। भिखारी था, सो कई दिनों पेट में डालने के लिए नही मिला था । बड़ी देर से एक होटल के सामने वह कुछ पाने की मुराद में बैठा था। सामने मुर्गे की टांग को चूस रहे और शराब के पैग के साथ एक आदमी सामने बैठे इस मनुष्य से बिल्कुल बेखबर था।

भिखारी से रहा न गया, चिल्लाया - हे भगवान यदि पेट की भूख तू मिटा नही सकता तो ये पापी पेट किस वास्ते दिया है ?

शराबी की तन्द्रा टूटी - सुन स्साले, उसने पेट बेल्ट बांधने के वास्ते दिया है। बोल, बेल्ट है न तेरे पास ?

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ओफ्फ ! ये फ़ाइलें ...

निश्चित रूप से आजादी के बाद इस देश में फाइलों की फसल अथाह हुई। हर क्षेत्र में फाइलें दौड़ी। फ़ाइले बढ़ी। प्रगति के अनगिनत सोपानों को छूने में इन फ़ाइलों का योगदान किसी से छुपा नही है। कभी कभी फ़ाइले ढाल होती है जो साहब की तलवार रूपी नजर को अपने पर सह लेती है। मजाल भला कि ढाल टूटे, तलवार की धार भले ही मुड़ जाये।

सरकारी महकमे में यदि आप की फ़ाइल कम्पलीट है तो काम का पूरा होना मत समझिये। ये तो पहला चरण है। फ़ाइल कम्पलीट होती है, बड़े बाबू की मेज पर इठला के जाती है। और बड़े बाबू जब उस पर चिरैया बिठा दे तो ऊपर जाती है। अमूमन व्यवस्था में ये मान कर चला जाता है कि छोटा और बड़ा बाबू फ़ाइल पर लिख पढ़ कर दस्तखत बना दे तो फ़ाइल ऊपर से होकर आ ही जाती है, बशर्ते उस फ़ाइल पर भिन्न भिन्न मत न निरूपित किये गये हो।

फ़ाइल का बनना, सजना, संवरना और निकलना ये ऐसे विषय है जो पढ़ाई के दौरान बिहारी की नायिका के श्रृंगार वर्णन की याद दिला देती है। स्थानान्तरण के मसले में फ़ाइलें काला जादू का तेवर लिये होती है। काला जादू में गायब लड़की की तरह ये कब गायब हो जाये और शो खतम होने से पहले कब मिल जाये, इसे समझना मुश्किल है। कहीं कहीं तो फ़ाइलें गंडा-ताबीज बंधवा कर बढ़ती है। सगुन कराकर बढ़ती है। 786 और ओम लिखा कर चलती है। जैसी जिसकी श्रध्दा। शार्टकट में कहें तो ये फ़ाइले एनर्जी पाकर चलती है। फ़ाइलों का गायब होना अपशकुन माना जाता है। इससे बड़े धत्कर्म हो जाते है। मसलन गायब फ़ाइल के धारक बाबू की शामत। बड़े बाबू और अफसर द्वारा उसे ब्लैकमेल करने के नायाब रास्तों का अचानक खुल जाना। ये ऐसे लिख लाये, वरना वो गायब वाली फ़ाइल ....।

दरअसल फ़ाइले नित्य और शाश्वत होती है और फ़ाइल धारक नश्वर। फ़ाइल धारक तो कोई हो सकता है पर फ़ाइलें वहीं रहेगी। फ़ाइलों के चलते रहने से देश चलता है और ये रूक गई तो देश का क्या होगा, उसके विकास का क्या होगा, इसलिये कोई सरकार आये वह फ़ाइलों को अपने नजरिये या एजेंडा के मुताबिक तेजी, मध्दिम या धीमी गति से चलवाने में भरोसा रखती है। संविधान संशोधन हो या पानी विवाद, पोटा कानून का हटना हो या दागियों का मसला, अनुपम खेर को हटाना हो या शर्मिला बी की तैनाती, राज्यपालों की विदाई हो या रेलवे पर कुल्हणों का चलन .... इन सबके वास्ते फ़ाइले ही तो दौड़ी होंगी। फ़ाइलें गंभीर मुद्दों पर जब भी तेजी से दौड़ती है तो आर-पार का परिणाम लेकर लौटती है। ये सत्ताा पलटने में भूमिका रखती है। देश के वृहत्तर विकास में फ़ाइलों का योगदान शोध का विषय हो सकता है। विश्वविद्यालयी छात्र इस ओर ध्यान दे तो सरकार के अनेक विभाग व उनके बाबुओं का सहयोग मिल सकता है।

फ़ाइलें अपने संवाहकों में भेद नही करती है, वह बाबू हो सकता है, अफसर भी हो सकता है। पर फ़ाइलों का अनुराग बाबुओं से और बाबुओं का अनुराग फ़ाइलों से सर्वविदित है। और हो क्यों न ... उनका पोषण व पल्लवन तो वहीं करता है। फ़ाइलें लिखें हुए कागजों के आधार पर बनती है और निर्णय के लिए चलती है। जैसे कोई अर्जी आई आला अफसर ने आख्या मांगी। आख्या बनकर जब उसके सान्निध्य में आती है तो अर्जी वाला नही रहता है और अर्जी वाला अपने काम के विषय में उससे पूछने जाता है तो वह आख्या नही रहती है। अफसर देख लेंगे के सिवाय क्या कहेगा ? अनायास ऊपर से फ़ाइलों का मांगना, फ़ाइलों का दबाना या उनको छिपाना - ये सभी रहस्य है। हर कड़क अफसर अपने मातहत से जब ये कहता है - ये देखों तुम्हारी फ़ाइल मंगवा ली है, तुमने क्या क्या काले सफेद किये है ? सब कुछ है इसमें, बस इतने में ही अगले के प्राण हलक में अटक गये। कभी कभी कचहरी की तारीख की तरह फ़ाइलों पर परिणाम आने का सिलसिला अंतहीन है। जिन फ़ाइलों में 'कुछ' होता है तो वह दौड़ जाती है जिनमें 'कुछ' नही तो वे सुस्ता सुस्ता कर चलती है। अब तो सरकारी महकमे का एक सच उभर कर आया है - ऐसे थोड़े ही फ़ाइले बढ़ती है, वह बढ़वाई जाती है इसके लिए उसके धारक को 'बढ़वाई' दी जाती है। वह अपना मीटर आन करके सीट पर बैठता है।

आंकड़ों का संजाल समेटे फ़ाइलों का सहोदर सफेदा होता है। ये तीन को पोत कर चार बनाने का एक जरूरी घोल है। छाया की तरह अनुसरण करता है ये। तरक्कीपसंद समाज के लोग फ़ाइलों के बारे में ज्ञान बढ़ाकर महिमामंडित होते है। पर उनकी महिमा स्वयं के लिए तो मंडित और अन्य के लिए तनाव परोसने के लिए होती है। बचने का रास्ता यही है कि व्यक्ति अपने अंदर की फ़ाइल खोल ले और उस पर अपने जीवन के उतार चढ़ाव को मन की आंखों से लिखता रहे तो बाहर की फ़ाइल बाहर ही रह जाती है। पर करे कौन ? किसे बाहर से फुरसत ? इसीलिये ये फ़ाइलें .....ऊफ् और ओफ्फो है। इनका चलना और रूकना कभी खुशी और कभी गम जैसा ही है।

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संपर्क:

सूर्य सदन, सी-501/सी, इंदिरा नगर, लखनऊ,

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