दिनकर कुमार का काव्य संग्रह : कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात

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  काव्य संग्रह कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात -दिनकर कुमार और मैं सोचा करता था निहायत सरल शब्द होंगे पर्याप्त ।...

 

काव्य संग्रह

कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात

-दिनकर कुमार

और मैं सोचा करता था
निहायत सरल शब्द
होंगे पर्याप्त ।
जब मैं कहूं, क्या है
हरेक का दिल जरूर चिंथा-चिंथा होगा ।
कि तुम डूब जाओगे
अगर तुमने लोहा न लिया
यह तो तुम देख ही रहे हो ।
- बेर्टोल्ट ब्रेष्ट

स्वाद
तुम्हारे होंठ
पसीने की तरह नमकीन हैं
जैसे आवेग की घड़ियों में
आंसू
जैसे मजदूर की सूखी
रोटी पर
एक चुटकी नमक
इसी स्वाद ने आज भी
बचाए रखा है
जीवन का संतुलन
इसी स्वाद से अक्सर
बौराता हूं मैं
महुए की शराब पीने के बाद
जिस तरह बौराते हैं किसान
पहली बार प्रेम में डूबने के बाद
जिस तरह बौराती है नारी

पांच सौ के नोट पर गांधी
साढ़े सात सेंटीमीटर चौड़े और
सत्रह सेंटीमीटर लंबे कागज के टुकड़े पर
खिलखिलाते हुए गांधी
एक तरफ हैं
दूसरी तरफ दस अनुयायियों के साथ
लाठी थामे खड़े हैं
एक तरफ मुस्कान
दूसरी तरफ जाग्रत अवस्था
गलियों-सड़कों-पार्कों और
गंदी बस्तियों के नाम के साथ
जोड़ दिया गया है गांधी का नाम
और तेजाब की भूमिका निभाने वाले
कागज के टुकड़े को भी
गांधी के चित्र से वंचित नहीं रखा गया है
जब यह कागज का टुकड़ा
रौंद डालता है सत्य को
आदर्श को जीवन मूल्यों को
जब यह कागज का टुकड़ा
निगल जाता है भविष्य की संभावनाएं
तब भी खिलखिलाते रहते हैं गांधी


मेरी प्रियतमा के थे पूंजीवादी सपने
मेरी प्रियतमा के थे पूंजीवादी सपने
उन सपनों में कहीं नहीं था
विषाद
न ही संवेदना के तार
न ही पीड़ा का संसार
मेरी प्रियतमा की इच्छाएं आसमान को
छूती थीं
उन इच्छाओं में उपग्रह चैनल के
समस्त लुभावने विज्ञापन शामिल थे
शामिल थीं शोकेस की समस्त पोशाकें
मेरी प्रियतमा को प्रतीक्षा थी मेरी देह में
उन पंखों के उगने की
जिनके सहारे उड़ते हुए
मैं सितारे तोड़कर ला सकता था
उसके दामन में सजा सकता था
मेरी प्रियतमा को रफ्तार से प्यार था
वह चाहती थी
तेज और तेज और तेज
हवा के साथ बातें करना
विलासिता के बिस्तर पर
शुभरात्रि कहना
मैं बिलकुल ही अयोग्य था
अवांछित था
उन सपनों के लिहाज से
मेरी प्रियतमा ने जिन सपनों को संजोने में
एक उम्र गंवाई थी

ऋतिक रोशन से भी गर्म चीज क्या है ?
ऋतिक रोशन से भी गर्म चीज क्या है ?
सुधीजन अनुमान लगाएं और
दिल थामकर इंतजार करें
अमुक तारीख को वह
गर्म चीज आपके सामने होगी
अमुक तारीख तक अभाव के बिस्तर पर
आपलोग सपने देखें
कि वह गर्म चीज रोटी भी हो सकती है
पूस की रात की रजाई भी हो सकती है
हो सकती है आपके बच्चों की मुस्कान
अमुक तारीख तक आप कल्पना
करने के लिए स्वतंत्र हैं
क्योंकि अमुक तारीख को ही
विज्ञापन का पिटारा खुल सकता है
तब तक दिल बहलाने के लिए
आपके पास अनगिनत हसीन विषय हैं -
फूल, चांद, तितली, बारिश
इंद्रधनुष, चूल्हे का उत्सव
माटी की सोंधी महक, कोयल की कूक
मक्के की रोटी, सरसों का साग
बढ़ी हुई मजूरी सबके लिए न्याय
सबके लिए स्वास्थ्य सबके लिए शिक्षा
सबके लिए धरती सबके लिए आसमान


यह दिल मांगे मोर
यह दिल मांगे मोर
अनाप-शनाप पैसा
विदेशी गाड़ियां महंगी शराब
ज्यादा से ज्यादा फरेब
दिलफरेब लड़कियां
ड़िजाइनर पोशाक
यह दिल मांगे मोर
कोल्ड ड्रिंक्स विएग्रा
सटरड़े नाइट फीवर
फार्म हाउस की ऐयाशी
बीयर बार की साकी
सट्टे बाजार की कमाई
लकी कूपन का ईनाम
यह दिल मांगे मोर
ज्यादा से ज्यादा संवेदनशून्यता
ज्यादा से ज्यादा हिंसा
ज्यादा से ज्यादा सैक्स
ज्यादा से ज्यादा अमानवीयता
ज्यादा से ज्यादा संतुष्टि
ज्यादा से ज्यादा बर्बरता
यह दिल मांगे मोर


एक तरफ भूख है दूसरी तरफ कारतूस
एक तरफ भूख है दूसरी तरफ कारतूस
भूख के डर से दौड़ते-दौड़ते
दिशाओं को लांघकर कहां से कहां पहुंचे
कितनी सभ्यताएं पीछे छूट गईं
हड़प्पा-मोहनजोदड़ो से लेकर कई अज्ञात सभ्यताएं
एक तरफ भूख है दूसरी तरफ कारतूस
चारों तरफ फैला है बहेलिए का जाल
झोपड़ी में सड़क पर चाय की दुकान पर
नींद में भी बहेलिए गुर्राते हैं
अबोध बच्चों की मुस्कराहट खो जाती है
खो जाती है स्त्रियों की मुस्कान
एक तरफ भूख है दूसरी तरफ कारतूस
राजनीति का क्रूर कसाईबाड़ा है
हत्यारों की प्रेस विज्ञप्ति है
पहरेदारों का स्पष्टीकरण है
घृणा केवल घृणा की भट्ठी में
मनुष्य की पहचान सुलग रही है

सुष्मिता

देखा है तुम्हारे मांसल शरीर को और शरीर के अंगों को
तुम्हारी तराशी हुई हंसी को और दर्शकों की खुशी को
सुष्मिता तुम्हें मनीला में मुंह छिपाकर अभिनय करते देखा है
तुम्हारा सपना पूरा हुआ सुष्मिता और इस देश का भी
सपना पूरा हो गया जो भूखा सोता है सपनों में जीता है
अब तुम सपनों का वितरण कर सकोगी सुष्मिता
जो राधा बचपन में ब्याही गई किसी वृद्घ के साथ
जो सीता देख नहीं पाई कभी स्कूल पढ नहीं पाई ककहरा
जो गीता गांव से पहुंच गई किसी शहरी कोठे पर
उन सभी राधाओं सीताओं गीताओं से अलग होकर
एक गर्व का वितरण कर रही हो तुम सुष्मिता
तुम चाहती हो कि अपने सड़े हुए अंगों के साथ
तुम्हारा यह देश दर्द को भूलकर मुस्कराए और
अघाए हुए पश्चिम की तरह तुम्हारे अंगों को देखे
अब हम तुम्हें अलग-अलग रूपों में देखेंगे सुष्मिता
तुम्हारी देह एक ही होगी पोशाकें अलग-अलग होंगी
बाजार अलग-अलग होंगे व्यापारी अलग-अलग होंगे
हां सुष्मिता कुपोषण का शिकार है तुम्हारा देश
जहां बच्ची सीधे बूढ़ी बन जाती है आता नहीं है
उनके जीवन में वसंत आता नहीं उल्लास
तुम्हारे सौंदर्य से हम आतंकित हैं सुष्मिता
यह पश्चिमी उपकरण में गढा गया सौंदर्य है
पश्चिम का पैमाना है पश्चिम की आंखें हैं
खुश हुआ कोलंबस खुश हुआ आखिर वह
पहुंच ही गया भारतवर्ष

मेरे सतरंगे सपने
मैं खोई हुई चीजों की तलाश में निकला था
सरसों के फूलों से छिपे खेतों ने चुराए थे
बचपन के कुछ पीले सपने
मैंने पहली बार जाना कि पीलापन
सिर्फ बीमार चेहरों का रंग ही नहीं होता
पीलापन इंद्रधनुष का भी हो सकता है
और फूलों का भी
जलकुंभी से लदे पोखर ने चुराए थे
बचपन के कुछ हरे सपने
हमने बार-बार डुबकी लगाकर पानी के भीतर
जलपरी की तलाश की थी
उस सुरंग की तलाश की थी
जो जाती थी सोने-चांदी के देश में
मैंने नीले आकाश और धुंध की सफेदी के बीच
नीले और सफेद सपनों की तलाश की
मेरे सतरंगे सपने
गांव से लेकर शहर तक
बिखरे हुए थे और मुझसे आंखें मिलाकर
पूछ रहे थे -
टूटने का कोई दर्द भी होता है ?

साथ लेकर गया ही क्या था
साथ लेकर गया ही क्या था
जो पैर चूमता विषाद
पलकों पर उठा लेता
या भर लेता बांहों में
साथ लेकर गया ही क्या था
जो सोना उगलते खेत
धुंध को चीरती धूप
बांसुरी बजाता चरवाहा लड़का
साथ लेकर गया ही क्या था
जो शुरू होता चूल्हे का उत्सव
बंद हो जाता छप्पर से पानी का बहना
पथराई आंखों में तैरते सपने
साथ लेकर गया क्या था
इसीलिए
साथ ही लौटा विषाद
पगडंड़ियों से मुख्य सड़क तक

भूख मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी
भूख मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी
उसके होंठ सूख चुके होंगे
और अंतड़ियों में ऐंठन
शुरू हो गई होगी
खाली बरतन आपस में
उदासी बांट रहे होंगे
स्टोव के पास उपेक्षित पडा होगा
किरासन का खाली पीपा
अंधेरे में कोई आकृति
हिलती होगी
तो भूख की आंखों में
चमक आ जाती होगी
मैं जानता हूं वह
कितनी निढाल हो गई होगी
आशा और निराशा के बीच
मुझे सोच रही होगी
मेरे लौटने पर
मुझसे लिपट जाएगी
जन्म-जन्मान्तर की प्रेमिका की तरह
आरंभ होगा अन्न का उत्सव

अपहरण
कोमल भावनाओं का अनजाने में ही
हृदय के चौराहे से अपहरण किया गया
फिरौती के रूप में मांगा जा रहा है
सबसे हसीन सपना
चेतावनी दी गई है कि
सपने नहीं दिए गए तो
कोमल भावनाओं का वध किया जाएगा
कोई फायदा नहीं रपट लिखवाने से
कोई फायदा नहीं थाने में
सो रही है पुलिस
राजधानी में धुत्त पड़ी है सरकार
रिक्त हृदय को सांत्वना दे पाना
संभव नहीं
सांत्वना देने का रिवाज
प्रतिबंधित हो चुका है
अपहरणकर्ताओं का कोई नाम नहीं होता
कोई चेहरा नहीं होता
हृदय नहीं होता
हृदय में संजोकर रखी गई कोमल भावनाएं नहीं होतीं
सूखे कुएं की तरह अपने हृदय को लेकर
कहां जाऊंगा मैं कहां जाऊंगा

माजुली
ब्रह्मपुत्र का पानी बढ़ता है
द्वीप का बदन घायल होता है
किनारे से
घाव दिखाई नहीं देते
बहता हुआ लहू
दिखाई नहीं देता
पर्यटन के नक्शे पर
एक आकर्षक लकीर नजर आती है
रात होती है
द्वीप में झिलमिलाती रोशनी
किनारे के दर्शकों की आंखों में
प्रतिबिंबित होती है
नामघर में भक्तों का कीर्तन
जारी रहता है
बालूचर में बारूद
दफनाया जाता है
बंजर जमीन में लाशें
दफनाई जाती हैं
मांझी पत्थर बन जाते हैं
लाश का भारीपन
नाव सहन नहीं कर पाती
आधी रात में लोग नींद से
जाग जाते हैं
किसी की चीख सन्नाटे को चीरती हुई
इस किनारे से
उस किनारे तक पहुंच जाती है
सपने में दिखते हैं
शंकरदेव
जो अपने आंसू से धोते हैं
लहू में नहाए लोगों को

---
माजुली : असम में ब्रह्मपुत्र के बीच में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप

मुठभेड़ से पहले मुठभेड़ के बाद
हरियाली थी
आंखों में और खेतों में
तितलियों के पीछे
दौड़ता था बचपन
सोंधी महक थी
माटी की
कभी छुई नहीं थी
कुंवारी माटी ने
बारूद की देह
बारूद ने अपवित्र किया
माटी को
और हरियाली खो गई
तितलियों के पंख
बिखर गए
ठिठक कर रह गया बचपन
लाश और फसल
खून और कीचड़
अनाज और सपने
गोली और आदेश

पानी
चारों तरफ पानी है
मध्य में है
विषाद की पृथ्वी
असहाय की पुकार
शिशुओं का क्रंदन
ठंडे चूल्हों का विलाप
चारों तरफ पानी है
मध्य में है
योजना का शव
अधूरे ठेके
सड़ी-गली निविदाएं
मजदूरों का पसीना
चारों तरफ पानी है
और पानी के भीतर है
सपनों की फसल
रंगीन मछलियां
घोंघे और सीपियां
मध्य में है
घोषणाओं का शिविर
भूख और रोग का आतिथ्य

जगजीत सिंह को सुनने के बाद
वायलिन का स्वर बरसता रहता है
अवसाद की लंबी रातों में
मधुर दिनों की स्मृतियां
बचपन का सावन
यौवन का चांद
प्रियतमा का मुखडा
बिछोह की पीड़ा
वायलिन का स्वर बरसता रहता है
और मैं भीगता रहता हूं
पिघलता रहता हूं
पथराई हुई आंखें नम हो जाती हैं
संवेदना की सूखी हुई धरती
उर्वर बन जाती है

धरती की तबियत ठीक नहीं है
धरती की तबियत ठीक नहीं है
इसीलिए बात-बात पर
झुंझला उठती है
अकारण ही मुंह फुला लेती है
किसी बात का गुस्सा
किसी बात पर उतारती है
धरती की तबियत ठीक नहीं है
इसीलिए हवा आहिस्ता बहती है
गुमसुम परिंदे पंख नहीं फड़फड़ाते
नदियां उदासी के साथ
फुसफुसाती हैं
धरती की तबियत ठीक नहीं है
इसीलिए हमलोग
अकारण ही गुर्राने लगे हैं
घृणा के कांटे हमारी देहों में
उगने लगे हैं
संशय के अंधेरे ने
जीवन की गरिमा छीन ली है

वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं
वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं
इसीलिए इतनी असहिष्णुता
इतनी बर्बरता
इतना रक्तपात
धर्म की घृणा मिश्रित व्याख्याएं
वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं
उनकी उपासना
इहलोक के स्वार्थों को सिद्घ करना है
उनकी उपासना है
सिंहासन और पदाभिषेक की
गुप्त राह
वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं
शिकारी जानवर के वंशज
रक्तपान करना जिनका
आदिम स्वभाव है
विषवमन करना जिनका
दैनिन्दन कर्म है

आपके पास कार नहीं है ?
आपके पास कार नहीं है ?
सिटी बसों में धक्के खाते हुए
पैदल चलते हुए
सड़क पार करते हुए
बच्चों को स्कूल छोड़ते हुए
आपको बहुत तकलीफ होती होगी
आपके पास कार नहीं है ?
क्या झुंझलाती नहीं आपकी पत्नी
कीचड़ और धूलभरी सड़कों पर
आपके साथ पैरों को घसीटती हुई
हीन भावना से ग्रस्त नहीं होते
आपके बच्चे -
आपके पास कार नहीं है ?
क्या आपकी कोई दो नंबर की
कमाई नहीं है
क्या आपने अभी तक आत्मा की पुकार
की उपेक्षा करना नहीं सीखा है
क्या अभी तक आप ‘व्यावहारिक' नहीं
बन पाए हैं ?

देव प्रसाद चालिहा
देव प्रसाद चालिहा को आप नहीं जानते
और अगर जानते भी हैं
तो आप मानेंगे नहीं कि
देव प्रसाद चालिहा को आप जानते हैं
अपने बच्चे भी जान नहीं पाए
देव प्रसाद चालिहा को
पत्नी भी नहीं जान पाई
दोस्त और रिश्तेदार भी नहीं जान पाए
कार्यालय के सहकर्मी भी
अनजान ही रहे
प्रशासन को भी देव प्रसाद चालिहा की
जानकारी नहीं मिली
अखबारों में चुनाव और घोटाले के बीच
खून और खेल के बीच
एक सर्द खबर के रूप में
उपस्थित था वह शख्स -
देव प्रसाद चालिहा
कल ऐसा भी हो सकता है
कि आप बन जाएं
देव प्रसाद चालिहा या फिर
मैं बन जाऊं
देव प्रसाद चालिहा या
समूचा देश बन जाए
देव प्रसाद चालिहा

जिस तरह कार्यालय में विषपान
कर छटपटाता रहा वह शख्स
उसी तरह हम सभी
एक-एक कर छटपटाते रहें
एड़ियां रगड़कर मरते रहें
अपने आदर्शों और सिद्घांतों के साथ
अपनी भूख और अपनी शर्म के साथ
अपने दायित्व और अपनी विवशता के साथ
राजकोष पर कुंडली मारकर बैठे रहे सांप
तीन महीने तक वेतन न मिले और
आंखों के सामने अन्न के लिए मचलें बच्चे
जीवन हो मृत्यु से भी बदतर
एक गाली की तरह
जहां बिकना ही हो जीने का एकमात्र रास्ता
चूंकि पशु नहीं बना
इसीलिए कहलाया देव प्रसाद चालिहा
चूंकि बिका नहीं
इसीलिए कहलाया देव प्रसाद चालिहा
और जो भी इस रास्ते पर चलेगा
कहलाएगा देव प्रसाद चालिहा

प्रस्ताव
पारित करो घृणा का प्रस्ताव
सामूहिक रूप से बजाओ ताली
जो सपनों की याद में कब्रगाह बनते हैं
वहां कोई नहीं जाता अर्पित करने
भावभीनी श्रद्घांजलि या फूलों का गुच्छा
न ही जिक्र होता है सपनों का
आओ हम एक मिनट का मौन रखें
और भीतर एक प्रार्थना दुहराएं
कि मुक्त हो हृदय धीरे-धीरे
विकृतियों से कुंठाओं से
निराशा के खरोचों से प्रतिहिंसा की आग से
मुक्त हो हृदय काले अतीत से
और अब कृतज्ञता व्यक्त करनी है
एक-एक अपरिचित चेहरे को याद करना है
धन्यवाद कि आपने विरोध किया
धन्यवाद कि आपने अफवाहें फैलाई
धन्यवाद कि आपने रोड़े अटकाए
धन्यवाद कि आपने मुझसे घृणा की

कामुक स्त्रियों का कोरस
वसंत हमें अपने पंख दे दो
और आकाश हमें उड़ने दो
इस छोर से लेकर
उस छोर तक
हमारे अंगों को उज्ज्वल बनाओ वसंत
जैसे फूटते हैं कोंपल
खिलती हैं कलियां
रंग-बिरंगी
हम ऊब चुकी हैं अपनी अट्टालिकाओं से
सुविधाओं से भौतिकता से
पालतू कुत्तों से नौकरों से
बगीचे की कृत्रिम हरियाली से
हमारी उत्तेजना का कोई पड़ाव नहीं
कामसूत्र से लेकर ब्लू फिल्म तक
हमारे सिलीकोन से भरे वक्ष
शल्यक्रिया से कसी गई योनि
संसार का सर्वश्रेष्ठ पुरुष हमें मिला नहीं
रुपए पैदा करने वाला यंत्र
हमें दबोचता है हर रात और
खामोश हो जाता है
नितंब और वक्ष की रेखाएं
अश्लील नहीं हैं जितनी अश्लील हैं
बाजार की निगाहें
समाज की नैतिकता
वसंत हमें तृप्त कर दो
अपने आलिंगन में कसकर
नसों में तेज कर दो
रक्त प्रवाह ।

मधुबनी चित्रकला
बादल ने तुम्हारे चेहरे को चूमकर
दामन निचोड़ दिया
सूखी नदियां
जीवित हो उठीं
फ फल ने तुम्हारी गंध
को समेट लिया
अपने भीतर
वृक्ष ने धरती को उपहार दिया
अस्सी कोस की दूरी पर
किसी ने जलाया चिराग
सोहर और समदाओन की धुन
सुनकर देवता मुग्ध हो गए
किसान ने हल चलाया
बीज बोया
खेत को सींचा
माटी से तुम अंकुरित हुई वैदेही
कच्ची मिट्टी की दीवार पर
तुम्हारा विषाद
आंसू और मुस्कान
कहते हैं - मधुबनी चित्रकला ।

दिगेन वर्मा
क्या आप दिगेन वर्मा की
महबूबा को जानते हैं -
या उसका ई-मेल का ठिकाना -
या उसकी पसंद का शीतल पेयजल ?
दिगेन वर्मा आपके अवचेतन में
समा गया है
उसकी एक-एक पसंद
उसका एक-एक ब्यौरा
आपके अवचेतन की होर्डिंगों पर दर्ज है
बाजार का नया किरदार है दिगेन वर्मा
जो आपको बताएगा
सूचना प्रौद्योगिकी और फटाफट अमीर बनने का राज
महबूबा को चुनने से लेकर प्यास बुझाने के लिए खास ब्रांड को
अपनाने के लिए
आपको हर पल प्रेरित करता रहेगा
दिगेन वर्मा

यह जो प्रेम है
शाम भी घायल हुई थी
बांसुरीवादक के विषाद से
बादलों ने रोकर जाहिर किया
अपना मातम
किसी की राह देख रही थी
रात
जिसे बिछाकर सो गया था
भिखारी
धुएं से सराबोर आबादी
के बीच भी
बचा हुआ था जीवन
हर मोर्चे पर चोट खाने के
बावजूद भी
आदमी भूल नहीं पाया था
प्रेम ।

हथेली
विषाद से भीगे चेहरे पर
रखना चाहता हूं
हथेली
पराजय से झुके हुए कंधों पर
रखना चाहता हूं
हथेली
चाहता हूं चट्टान की तरह
मेरी हथेली
रोक ले
अंधेरे को
आंखों में समाने से पहले
चाहता हूं हथेली पकड़कर
डूबने वाला
किनारे तक पहुंच जाए
तितली की तरह सुख को
रखना चाहता हूं
हथेली में बंद करके
पंखुड़ियों की तरह टीस को
हथेली पर फैलाकर
महसूस करना चाहता हूं
अपनी धरती को रखकर
अपनी हथेली पर
मैं मग्न रह सकता हूं
छूकर देखो इसे
हथेली नहीं
मेरा हृदय है ।

डायनासोर
उन्हें नष्ट होना पड़ता है
परिवेश-समय-भूगोल से जो
संतुलन नहीं बना पाते
उनके जीवाश्म रखे जाते हैं
अजायबघरों में
उन पर शोध किया जाता है
वे लुप्त हो गए
धरती के तापमान के साथ
तालमेल नहीं रख पाने के कारण
वे अतीत के विस्मृत पृष्ठ बन गए
वे लुप्त हो जाएंगे
वे नष्ट हो जाएंगे
जो सत्य को लेकर
आदर्श को लेकर
जीवन मूल्यों को लेकर
पूरी मानवीय गरिमा के साथ
जीना चाहेंगे
एक दिन इस अमानवीय धरती पर
डायनासोर की तरह
उनके जीवाश्म ही बचे रहेंगे

जहानाबाद
जो चूल्हे कभी ठीक से सुलगे नहीं
उन चूल्हों ने चखा
बारूद का स्वाद
पंचायत की पथराई आंखें
पढ़ती नहीं
भारतीय दंड संहिता की
पहेलियां
लक्ष्मणपुर बाथे हो या
शंकरबीघा गांव
गिद्घों का झुंड
उमड़ता है
हरेक दिशा से
वे भूखे पेट ही लोरी सुनकर
सोने वाले बच्चे थे
अनपढ़ स्त्रियां थीं
आजादी की साजिश के शिकार
पुरुष थे
जिन्हें प्रभुओं की सेना ने
मार डाला
जहानाबाद आपके मानचित्र पर
एक काला धब्बा है
और भूखे नंगे लोगों की
आंखों में
आग का गोला


बारिश में भीगते हुए
बारिश में भीगते हुए
रोमानी होने की कोशिश करता हूं
चाहता हूं
यथार्थ के दंश को भूल जाऊं
भूल जाऊं
घर पहुंचने की आखिरी बस
कीचड़ से लथपथ पतलून
भूल जाऊं
दयनीय वर्तमान
बारिश में भीगते हुए
किशोर लड़के की तरह
सीटी बजाने की कोशिश करता हूं
गले में फंस जाती है सीटी
एक अजीब-सा स्वर निकलता है
जो मेरा नहीं होता
बारिश में भीगते हुए
मैं खुशी का स्पर्श करना चाहता हूं
बेताल की तरह दुःख
कंधे पर सवार रहता है
और पूरे वजूद को
दबाकर रखता है
मैं मौसम को कोसता हुआ
तेज कदमों से
घर लौटता हूं

टीन की छत
सुबह निश्छल बच्ची की तरह
हल्के से छूती है
जगाती है
पंछियों का पदचाप
टीन की छत से छनकर
कानों तक पहुंचता है
खिड़की से झांकता है
जाना-पहचाना आग का गोला
टीन की छत के नीचे ही
नवरस की अनुभूति करता हूं
कभी वेदना से हाहाकार कर उठता है
हृदय
कभी आनंद से उछलने लगता है
हृदय
टीन की छत पर बारिश का संगीत
सुनते हुए
विषादग्रस्त रातों में भी
रोमानी अनुभूतियों से सराबोर
हो जाता हूं
कि इस बुरे वक्त में भी
आसमान और धरती के बीच
एक स्नेहमय आंचल
सिर पर है

करुणा बचाकर रखो
करुणा बचाकर रखो
आपातकाल के लिए
अंग्रेजी पत्रिकाओं के चमकते
रंगीन पृष्ठों पर
लहूलुहान तस्वीरें
तुम्हें हिला नहीं सकतीं
रेंगते हुए
घिसटते हुए लोग और
उनकी चीख से
पिघलती नहीं
तुम्हारे भीतर संवेदना
इर्द-गिर्द की खामोशी
हताशा से झुलसे हुए चेहरे
तुम्हें सोचने के लिए
विवश नहीं कर सकते
बचाकर रखो करुणा
मुनाफे का सौदा करते वक्त
किसी को
गुलाम बनाते वक्त
काम आएगी करुणा


भूपेन हजारिका
बेचैन मांझी की पुकार सुनता हूं
नदियों-सागरों-महासागरों को
लांघकर
आती हुई दर्दभरी पुकार
वैशाख की रातों में पके से
पलते हैं कुछ मीठे सपने
कांसवन जैसा अशांत मन
वोल्गा से गंगा तक
मेघना से ब्रह्मपुत्र तक
दौड़ाता रहता है यायावर को
वह जो आदमी के भविष्य का
गीत है
वह जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षा
का वादा है
वह जो पूस की रात में ठिठुरते
किसी गरीब की चीख है
वह जो प्रेम में न पाने की टीस है
मेरे हृदय में प्राचीन लोकगीत की तरह
वह स्वर धड़कता है
जीवन की रेल में तीसरे दर्जे के
मुसाफिरों के आंसू शब्द में
परिवर्तित होते हैं
प्यार के दो मीठे बोल की तलाश में
एक पूरी उम्र बीत जाती है
बेचैन मांझी की पुकार सुनता हूं
समाज परिवर्तन के लिए
संगीत एक हथियार है
कहीं बुदबुदाते हैं पॉल रॉबसन -
‘वी आर इन द सेम बोट ब्रदर !
वी आर इन द सेम बोट ब्रदर !!
वी आर इन द सेम बोट ब्रदर !!!

पोवाल दिहिंगिया
(जाह्नू बरुवा की फिल्म ‘सागरलै बहुदूर' देखने के बाद)
मांझी के सपने खो जाते हैं
दिहिंग नदी की जलधारा में
जो ब्रह्मपुत्र में मिलती है
सागर तक पहुंचती है
वर्षा से पहले स्तब्ध प्रकृति
मांझी के चेहरे का रंग
नीला पड जाता है
सर्पदंश से पीड़ित मरणासन्न व्यक्ति की तरह
हेमिंग्वे का बूढ़ा आदमी
समुद्र किनारे से वेष बदलकर
कब आया दिहिंग किनारे हाट में
उसने नाम रख लिया
पोवाल दिहिंगिया
चप्पू चलाता है तो तनती हैं
चेहरे की शिराएं
बांसुरी की तान सुनकर
आहत होता है पहाड़ भी
नदी और पुल
पुल और सूनी नाव
मांझी और उसकी कुटिया
पराजय और विषाद
और
जूझते रहने की निरंतरता ...।

शीतल पेयजल पीता है सूरज
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नया प्रतिनिधि
सूरज
डूबने से पहले शीतल पेयजल पीता है
और चांद
एक बोतल की शक्ल में उभर आता है
बच्चे गाते हैं
विज्ञापन के गीत
उछलते हैं-नाचते हैं
अजीब-अजीब आवाज के साथ
एक खुशहाल देश को
प्रायोजित किया जाता है
किस कदर गद-गद होता है
अंग्रेजी में लिपटा हुआ देश
शेयर बाजार के दलालों के फूले हुए चेहरे
पाप और पुण्य की शिकन को
कभी महसूस नहीं कर सकते
जीने की जरूरी शर्त बन गई है
धूर्त होने की कला
गरीबी की रेखा की ग्लानि से
ऊपर उठकर उधार की समृद्घि
तिरंगे पर फैल जाती है
कूड़ेदानों में जूठन बटोरते हुए बच्चों
और अधनंगी औरतों के बारे में
कोई विधेयक पारित नहीं होता
ठंडे चूल्हों को सुलगाने के बारे में
न्यायपालिका के पास
कोई विशेषाधिकार नहीं है
बाजारू बनने की होड़ में बिकाऊ
बना दिया गया है सूरज को
चांद को धरती को
मनुष्य की गरिमा को

साहूकारों से संबोधित
जब भी मांगोगे
अपनी सांसें दे दूंगा
चक्रवृद्घि ब्याज के साथ
मेरे साहूकारों !
इन सांसों को संजोकर रखना
गुप्त तिजोरी में
घुटन बढ़ेगी
तो काम आएगी
अगर फरेब जानता तो
वह भी सौंप देता
अगर जानता काला जादू
तो वह भी सौंप देता
गणित की किताब में
भावनाओं का मूल्य देखना
और देखना संवेदनाओं का
मूल्य भी
जब भी मांगोगे
अपना हृदय दे दूंगा
सारे जख्मों के साथ
मेरे साहूकारों !

नृशंसता के जंगल में
नृशंसता के जंगल में
करुणा की नदी सूख जाती है
सड़कों पर सड़ती रहती है
मानव देह
लावारिस लाशों को
जमीन में गाड़ दिया जाता है
बिहू नर्तकी की चीख
वीरानी में गुम हो जाती है
वापस लौटती हैं
घोषणाएं
निरंकुश घोषणाएं
सुनते-सुनते आबादी
पत्थर की तरह जड़ हो गई है
राजपथ से गुजरती रहती हैं
अर्थियां
सेना की गाड़ियां
राजनेताओं का काफिला
नृशंसता के जंगल में
यंत्रणा के साथ जीवन
पशुओं की तरह गुर्राते हुए
नोचते हुए खसोटते हुए
बिना सोचे-विचारे
गुजरता रहता है


भय जब दस्तक देता है
भय जब दस्तक देता है
शयनकक्ष में
रातभर जागता है विवेक
चिड़ियों की तरह
लोग बुनते हैं घोंसले
बच्चों को सिखाते हैं
दाने चुगना
धूप और बारिश
की मार झेलते हुए
एक स्वतंत्र देश में
गुलाम बनकर जीते हुए
दैत्यों के चरणों में
शीश झुकाते हुए
मतपेटियों में अंगूठा काटकर
बंद करते हुए
लोग
ईश्वर और भाग्य को
दोष देते हैं
जन्मकुंडली के ऊपर
कुंडली मार कर बैठे
शनि और राहु को
कोसते हैं
नीलम-गोमेद-पन्ना-पुखराज
घोड़े के नाल की
अंगूठी पहनते हैं
भय जब दस्तक देता है
कायर दिमाग सोचता है
पलायन का रास्ता

युद्घ
तर्कों के बिना ही
हो सकता है आक्रमण
युद्घ की आचार संहिता
पढने के बावजूद
निहत्थे योद्घा की
हो सकती है हत्या
अदृश्य युद्घ में स्पष्ट नहीं होता
दोनों पक्षों का चेहरा
सिर्फ धुएं से ही
आग की खबर मिल जाती है
गिद्घ
मृतकों की सूचना दे देते हैं
अनाथ बच्चों के हृदय में
युद्घ समा जाता है
हृदय को पत्थर बनने में
अधिक समय नहीं लगता
असमय ही विधवा बनने वाली
स्त्रियों के चेहरे पर
राष्ट्रीय अलंकरण के बदले में
मुस्कान नहीं लौटाई जा सकती
गर्भ में पल रहा शिशु भी
अदृश्य युद्घ का एक
पक्ष होता है
युद्घ राशन कार्ड से लेकर
रोजगार केन्द्र-मतदाता सूची
खैराती अस्पताल-राहत शिविर तक
हर जगह हर रोजमर्रा की जरूरत की
चीजों में घुला-मिला रहता है
युद्घ का स्वाद
समुद्र के पानी की तरह
खारा होता है

खुशी प्रायोजित की जाएगी
खुशी प्रायोजित की जाएगी
ठंडे चूल्हे के पास बैठी हुई
एक बीमार औरत
मुस्कराएगी
विदेशी कार से उतरेगी
एक गदराई हुई औरत
और बनावटी फूल
बीमार औरत को सौंपकर
नववर्ष की शुभकामनाएं देगी
हताश चेहरे जादुई शीशे में
खिले हुए नजर आएंगे
सरकार जादुई शीशे
मुफ्त बंटवाएगी
असफलताओं की खाई में
एक उत्सव का दृश्य होगा
मरघट जगमगा उठेंगे
खोमचे वाले बेचेंगे सपने
जिन्हें नींद नहीं आती
जो देश के बारे में
इतिहास के बारे में
भूगोल के बारे में
अर्थनीति के बारे में
अधिक सोचते रहते हैं
उन्हें अफीम चाटने के लिए दी जाएगी
पदवियां दी जाएंगी
पुरस्कार दिए जाएंगे
दुनिया देखेगी
खुशी से दमकते चेहरे
दूरदर्शन के सीधे प्रसारण में
इंटरनेट पर
अंग्रेजी पत्रिकाओं के
रंगीन आवरण पृष्ठों पर

एकता कपूर का ककहरा
एकता कपूर को क से प्रेम है
क कमाल का अक्षर है
जो विज्ञापन का सोना बरसाता है
दर्शकों की तादाद बेहिसाब बढ़ता है
एकता कपूर का ककहरा
समूचा मध्यवर्ग रट रहा है
इस ककहरे में कोई
संवेदना नहीं है
कोई समस्या नहीं है
कोई वेदना नहीं है
इस ककहरे में जीवन एक
अंतहीन उत्सव है
इस उत्सव में छल-कपट की
सीढ़ियों पर चढ़कर कामयाबी हड़पने वाले
निर्मम किरदार शामिल हैं
इस उत्सव में डिजाइनर पोशाकों में
शौकिया सिंथेटिक आंसू बहाने वाली गदराई स्त्रियां शामिल हैं
एकता कपूर का ककहरा पढ़कर
मध्य वर्ग अपने लिए जीने की शैली
विकसित कर रहा है
इस नई शैली में परिवार का मतलब
एक कुरुक्षेत्र का मैदान है
इस नई शैली में जीवन का मतलब
केवल और केवल वैध-अवैध तरीके से
पैसों को अर्जित करना रह गया है
एकता कपूर के ककहरे में
इतनी संपन्नता है जो
हमें आतंकित करती है
हमारे इर्द-गिर्द की पीली उदास बीमार
अभाव की मार झेलती दुनिया
एकता कपूर के ककहरे में शामिल नहीं है

इन दिनों
मनुष्यता भी गिरवी रख दी
और समय पर चुकाते रहे
चक्रवृद्घि ब्याज
गणित के कलाकार ने
सफाई से बांधी है
जीवन की डोर
अर्थशास्त्र का पत्थर सीने पर
रखकर कहा जा रहा है
आजादी के गीत गाओ
सपनों की लाश हासिल करने के लिए
रिश्वत मांगेंगे देवता
या गिरवी रखनी पड़ेगी भावना
मुल्क के कानून को मानो या
दंड भुगतो या निर्वासित होकर
जियो - यही प्रावधान है
कब सिया था होठों को
तारीख याद नहीं
याद है
सुई की तीखी चुभन
और लहू का स्वाद

खत लिखना
कभी रोजी-रोटी के गणित से
फुरसत मिले
तो मौसम और फूलों के बारे में
लिखना
कभी महंगाई और राशन से ध्यान बंटे
तो तितलियों और पर्वतों
के बारे में लिखना
कभी बीमारी और अस्पतालों से
वक्त मिले तो अपने शहर की रंगीनी
और नदी के यौवन के बारे में लिखना
मेरे दोस्त
हादसों से गुजरते हुए
मुझे खत लिखना

गुवाहाटी की शाम
गुवाहाटी की शाम
मेरे भीतर समा जाती है
विषाद की तरह
भूरे रंग के बादल
मंडराते रहते हैं
और नारी की आकृति की
पहाड़ी मानो
अंगड़ाई लेती है
गुवाहाटी की शाम
सड़कों पर दौड़ते-भागते लोग
साइरन की आवाज
और दहशत से पथराए चेहरे
एक डरावना सपना
अवचेतन मन में
उतरने लगता है
नश्तर की तरह
गुवाहाटी की शाम
स्मृतियों में
बारिश की फुहारों सी
लगती है
जब भीगते हुए
गुनगुनाते हुए उम्र की पगडंडी पर
सरपट दौड़ना अच्छा लगता था

सोमालिया में जेन फोंडा
सोमालिया में दम तोड़ते हुए एक बच्चे का
हाथ थम लिया है जेन फोंडा ने
जेन फोंडा बच्चे की आंखों में
मौत की परछाई को पहचानने की कोशिश कर रही है
और मौत को तेजी से बढ़ते हुए देख रही है
जेन फोंडा के चेहरे पर दुःख है
यह दुःख हॉलीवुड की फिल्मों से
अलग किस्म का दुःख है
छायाकारों का झुंड इस क्षण को
कैमरे में कैद कर रहा है
प्रति मिनट मरने वाले पन्द्रह बच्चों में
वह बच्चा भी शामिल है
जिसका हाथ जेन फोंडा ने थाम रखा है
कुछ ही सेकेंड में सर्द होकर लुढ़क जाएगा
उस बच्चे का कोमल हाथ

सूनी हवेलियां
कस्बे की अधिकतर हवेलियां सूनी हैं
इनका सूनापन तंग गलियों में
विलाप करता है
कोई परदेशी इस तरफ क्यों नहीं आता
किसी हवेली में हैं सौ कमरे
और पांच सौ झरोखे
हवादार मुंड़ेर
जहां बैठता है कबूतरों का समूह
किसी हवेली में रहती है
एक अकेली स्त्री
जो या तो विधवा है
या जिसका पति वर्षों से नहीं लौटा
उस अकेली स्त्री के सामने
हवेली की भव्यता
धुंधली नजर आने लगती है
सूनी हवेली भी अकेली स्त्री बन जाती है

तलाश
मैं बहुत दिनों से तलाश कर रहा हूं
कोई मुझसे सवाल करता
कि मेरा असली ठिकाना कहां है
कैसा मौसम है वहां
कैसे हैं सूरज-चांद-सितारे
कैसी औरतें हैं वहां
कैसे हैं रीति-रिवाज
कैसी है लोकगीत की धुन
- कि कबसे मैं दुःख और सुख की
पहचान करने लगा था
कि कबसे अकेलापन और अंधेरा
मुझे भाने लगा था
- कि मेरी पसंद का रंग कौन-सा है
मेरी पसंद का फूल कौन-सा है
वह कौन-सी कहानी है
जिसे मैं पसंद करता हूं
- कि मेरा पहला प्यार कैसा था
कैसा था पहला चुंबन
कब से मैं लड़कियों के उभरे सीने का
मतलब समझने लगा
कब मैं पहली बार किसी के साथ
बारिश में भीगा था
कब मैंने वसंत का स्पर्श किया था
- मेरी आदतें कैसी हैं
कब मैं खुश होता हूं
कब मैं दुःख से घायल होता हूं
मेरी मुस्कराहट कैसी है
मेरी लंबाई क्या है
मेरा वजन कितना है
कैसी पोशाक मुझे पसंद है
क्या-क्या खाना मुझे अच्छा लगता है
फुरसत के पलों में मैं क्या करता हूं
- मैं बहुत दिनों से तलाश कर रहा हूं
कोई मुझसे सवाल करता ।

जीवित रहने का प्रस्ताव
नहीं समझा पाऊंगा विषाद की वजह क्या है
सुविधाओं के बिल में दुबके रहो
बंकर में छिपे रहो युद्घ में जुटे राष्ट्र की तरह
सुनते रहो देववाणी
गमलों के फूलों की खुशबू से बौराते रहो
फूल मुरझा रहे हैं जल खाद और रोशनी के अभाव में
बच्चे मर रहे हैं अनाज दवा देखभाल के अभाव में
विकलांगता फैलती जा रही है शरीर में दिमाग में
धमनियों में समाता जा रहा है विषैला धुआं
सुरक्षित रहो किले के भीतर
जारी करते रहो बयान आलीशान शयनकक्ष में लेटकर
कैसे समझ सकते हो
खुले आसमान के नीचे बारूद और बरसात
महंगाई और राजनीति की मार झेलने वाली आबादी
किस विषाद नामक बीमारी को झेल रही है
दबोचकर रखो हमारे हिस्से की धूप
भरे रहें तुम्हारे भंडार नियंत्रित रहे मौसम
चलती-फिरती लाशों को मत समझाओ
प्रेम की परिभाषा
डार्विन का सिद्घांत
हमें लड़ने दो अपने छोटे-बड़े मोर्चों पर
हमें मरने दो खड़े-खड़े
हमारी लाशों की सीढ़ी पर चढ़कर
आएगा एक पवित्र भविष्य

मूर्तियों के शहर में
मूर्तियों के शहर में सन्नाटा है
शायद इन मूर्तियों को गढ़ने वाले शिल्पी की आह
शहर को लग गई है
कैसी विचित्र मूर्तियां हैं इस शहर में
भ्रष्ट दलालों की मूर्तियां
भ्रष्ट राजनेताओं की मूर्तियां
कुछ मूर्तियां वेश्याओं की हैं
कुछ मूर्तियां धार्मिक ठेकेदारों की
कुछ मूर्तियां चमचों की
संगमरमर से बनी मूर्तियों की
गरदनें दंभ से अकड़ी हुई हैं
आंखों में हैं वहशीपन
मूर्तियों के शहर में
सत्य की समाधि है
अहिंसा की समाधि है
मूर्तियों के शहर में
गणतंत्र की लाश है
जिसे चील-कौवे नोच रहे हैं

नाचघर
नाचघर में घुटन का माहौल है
बासी संगीत की धुन पर नाचती
नर्तकी थकी-थकी-सी है
पीली रोशनी मध्यम है
नर्तकी बीमार सी लग रही है
नाचघर में तंबाकू का धुआं फैला हुआ है
वे जो दर्शक हैं उनके चेहरे
एक जैसे सपाट हैं
वे रिक्शा खींचने वाले मजदूर हैं
या दफ्तर के बाबू हैं
नाचघर में जिस्म की गंध है
वे जो रुपए फेंक रहे हैं
वे गोश्त को चबा रहे हैं
नर्तकी के शरीर के गोश्त की
निगाहों से माप-तौल कर रहे हैं
नाचघर में विषाद का माहौल है
जिन्दगी की शाम काटने वाले
दर्शकों का मन नाच में नहीं
घर में सुलग रहे चूल्हे
और भूखे बच्चों पर टिका हुआ है

जंगल में अकेले
जो लोग जंगल की ओर चले गए
वे न तो वैरागी थे
न ही थी उनकी उम्र इतनी
कि वे अध्यात्म की प्यास
बुझाने के लिए कहीं निकल सकें
वे अभी ठीक से
जवान भी नहीं हुए थे
ठीक से देखा भी नहीं था
जीवन को
अभी तो उनकी उम्र फूलों से
नदियों से खेतों से फसलों से
प्यार करने की थी
अभी तो उन्हें करना था
अपनी पसंद की लड़की से
प्रेम निवेदन
जो लोग जंगल की ओर चले गए
उनके गुस्से को नहीं समझा गया
उनकी कठोरता के पीछे
छिपे कोमल हृदय की कोई
परवाह नहीं की गई
उनके पवित्र सपनों को कुचला गया
नियमों के नाम पर
लालफीताशाही में लिपटी व्यवस्था के नाम पर
उनकी बातों को बकवास कहकर
हवा में उड़ा दिया गया
वे जंगल में आज भी सोचते हैं
अपने सपने के समाज के बारे में


कोलाहल के बीच अकेला था
कोलाहल के बीच अकेला था
सहलाते हुए जख्म
मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था
दयनीय हो गया था
आईने में मेरा चेहरा
किसने सुनी किसने समझी
हृदय की बात
जो दुर्लभ निधि की तरह
गोपनीय थी
किसने पढ़ी आंखों की भाषा
किसने आंसू का इतिहास पूछा
किसने कंधे पर हाथ रखा
किसने कभी सोचा मेरे बारे में
कोलाहल के बीच अकेला था
और बड़ी मुश्किल से
स्वयं को बचाकर लाया था
भीड़ से भीड़ के उन्माद से
कोलाहल के साथ ही
शुरू हुआ था जीवन
अन्न के लिए छीना-झपटी
वस्त्र के लिए हाथापाई
सिर पर छत के लिए
हाहाकार-हाहाकार

दुःख के प्रति आभारी हूं मैं
दुःख ने स्नेह के साथ
मेरे माथे पर अंकित किया चुंबन
मेरी आंखों में अमावस्या
समा गई
जन्म-जन्मान्तर से करता रहा हूं
दुःख के साथ सहवास
इसीलिए उससे कोई
शिकायत नहीं है
दुःख ने मुझे धोया
आंसुओं की नदी में
मेरे हृदय में करुणा भरकर
दुःख ने कहा -
मुस्कुराओ
दुःख ने मुझे जगत को देखने की
नई दृष्टि दी
और मेरे वजूद में
भर दी चट्टानी शक्ति
दुःख से अलग होकर
मैं किसी युग में जिया नहीं
इसीलिए दुःख के प्रति
आभारी हूं मैं

प्रिय भूख, तुम नहीं जीतोगी
प्रिय भूख, तुम नहीं जीतोगी
तुम्हारी क्रूरता का
तुम्हारी संवेदनशून्यता का
एक-एक वार व्यर्थ जाएगा
तुम्हारा घिनौना स्पर्श
छीन सकता है मेरे बच्चों के
होठों की पवित्र हंसी
विषाद के विषैले धुएं से
धुंधली बना सकती हो
तुम हमें भींच सकती हो
कुपोषण के जबड़े में
घोल सकती हो
हमारी मीठी नींद में
तेजाब
प्रिय भूख तुम नहीं जीतोगी
हमेशा की तरह
तुम पराजित होगी
और शुरू होगा
अन्न का उत्सव

घृणा के साथ सहवास संभव नहीं
घृणा के साथ सहवास संभव नहीं
संभव नहीं है
अपनी इच्छाओं के खिलाफ
कीट-सा जीवन जीना
आदेशों-अध्यादेशों में गुम
हो चुका है भविष्य और
बीमा के किस्तों में बंट चुके हैं
सपने
अपनी आवाज भी लगती है
अजनबी की आवाज
अपनी परछाई भी लगती है
शत्रु की परछाई
इसी तरह बुनते हैं जाल
इसी तरह अपने वजूद को
बंदी बनाते हैं हम
जीवन को उज्ज्वल बनाने के लिए
घृणा के साथ सहवास संभव नहीं
और वनवास के सारे
रास्ते बंद हैं
घृणा के आलिंगन में
कोमल भावनाओं का जीवित रहना
संभव नहीं है

इतना अपना सा लगता है
(अकीरा कुरोसोवा की फिल्में देखने के बाद)
इतना अपना सा लगता है
विषाद
जैसे मेरे हृदय को
फ्रेम में बांधा गया हो
धुंध में हिलती हुई परछाई
तेज बारिश के बीच
एक शिशु का क्रंदन
लहलहाती हुई फसल के बीच
हिलता हुआ
नाजुक प्रेम का पौधा
अरण्य की गहराई में
पत्तों के बीच से झांकता हुआ सूरज
संशय और अविश्वास
की पृष्ठभूमि में
मानवीय उष्मा का आभास
इतना अपना-सा लगता है
क्षोभ-गुस्सा
और युद्घ
और अन्न के लिए हाहाकार

आइए हम जनहित याचिका दायर करें
आइए हम जनहित याचिका दायर करें
करुणा के बारे में
जो पहले रहती थी सबके हृदय में
जो बहती थी धमनियों में
जो हमारे जीवन का हिस्सा थी
जो आज गुम होती जा रही है
आइए हम जनहित याचिका दायर करें
भावना के बारे में
जो पहले छलछलाती थी आंखों में
धड़कती थी अनुभूतियों के संग-संग
जो मानवीय गुणों को बचाती थी
जो आज गुम होती जा रही है
आइए हम जनहित याचिका दायर करें
प्रेम के बारे में
जो पहले एक पवित्र अनुभूति का नाम था
जो अपरिचित हृदयों को जोड़ता था
जो जीवन को उज्ज्वल बनाता था
जो आज नीलाम होता जा रहा है
आइए हम जनहित याचिका दायर करें

दुनिया की सबसे हसीन औरत
दुनिया की सबसे हसीन औरत
गरीबी की रेखा पर चढ़कर
मुस्कराती है
ठंड़े चूल्हे की तरह सर्द हैं
उसके होंठ
असमय ही वृद्घा बन जाने वाली
बच्ची से मिलती हैं
उसकी आंखें
दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमें बताएगी
भूख लगने पर रोटी नहीं मिले
तो केक खा लेना
प्यास लगने पर
शुद्घ पेयजल नहीं मिले
तो कोल्ड ड्रिंक्स पी लेना
दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमारी नींद की गुफा में
समा जाती है
हमारे सबसे हसीन सपनों को
बटोरती है
और गायब हो जाती है

प्रिय ऑक्टोपस
प्रिय ऑक्टोपस
तुम निचोड़ते हो मेरी धमनियों से
बूंद-बूंद लहू
और उगलते हो
जूठन ऑक्सीजन
जिनको मैं ग्रहण करता हूं
और मरते-मरते
बच जाता हूं
मेरी छटपटाहट
मेरी बेचैनी
आंखों की तरलता
आहत संवेदना
तुम्हें हृदय परिवर्तन के लिए
प्रस्तुत नहीं कर सकती
तुम्हारी पकड़ के विरुद्घ
मेरी समस्त शक्ति
भीतर ही भीतर
घुमड़कर रह जाती है
मेरे सुन्न हो रहे अंगों में
तुम्हारे ठंडे स्पर्श
की अनुभूति बची रहती है

कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात
कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात
मोमबत्ती की तरह
हृदय में धीरे-धीरे पिघलती है याद
आंसू से धुल जाती है
कलुषता-घात-प्रतिघात
कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात
अभाव की लोरी सुनकर
चांद के सपने देखते हैं अबोध बच्चे
परियों के देश में उत्सव का शोर
आंगनबाड़ी में सड़ा हुआ भात
पड़ोसी का जूठन
प्रभु का अनुदान
अवसाद के बिस्तर पर
‘बैरन निंदिया' का इंतजार
कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात
बीज के सपने देखते हैं खेत
सावन का सपना देखता है चातक
आग का सपना देखता है चूल्हा
सपनों की शोभायात्रा निकलती है
रात चाहे कैसी भी हो -
जरूर ढलती है

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दिनकर कुमार
जन्म : 5 अक्तूबर 1967, ग्राम ब्रह्मपुरा, जिला दरभंगा (बिहार)
एक कविता संग्रह ‘आत्म निर्वासन' (1993), एक उपन्यास ‘निहारिका' (1995) प्रकाशित ।
असमिया से चालीस कृतियों का हिन्दी अनुवाद ।
अनुवाद के लिए 1998 का सोमदत्त सम्मान ।
कविताओं का असमिया, अंग्रेजी, नेपाली आदि भाषाओं में अनुवाद ।
100 से अधिक टीवी धारावाहिकों की पटकथाओं का लेखन ।
पत्रकारिता, रंगमंच एवं टीवी के क्षेत्र में योगदान ।
संप्रति : गुवाहाटी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘सेंटिनल' का संपादन ।
संपर्क : रोहिणी भवन, श्रीनगर, बाईलेन नं. - 2, दिसपुर, गुवाहाटी-781005 (असम)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: दिनकर कुमार का काव्य संग्रह : कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात
दिनकर कुमार का काव्य संग्रह : कौन कहता है ढलती नहीं गम की रात
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