रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

रामनिवास मानव की कविताएं

कविता

रामनिवास मानव

लौट आओ अश्व

होकर जिसकी पीठ पर सवार
दौड़ाता लाया था जिसे मैं
बिन चाबुक, बिन मार,
वही अश्व
अचानक अड़ गया,
बीच राह में बिगड़ गया
और गिराकर मुझे
गोदते हुए मेरा जिस्म
अपने पैने खुरों से,
दौड़ता जा रहा है सरपट,
टपटप-टपटप !
उसकी मन्द होती टापों से
मैं लगाता हूं अनुमान,
बहुत दूर जा चुका है वह।
मैं कराहता हूं,
और दबी आवाज में
पुकारता हूं - लौट आओ अश्व,
मेरे यौवन, ओ प्यारे वक्त !

आस्था

आस्था झील की काई नहीं,
जो यहां से वहां
हवा के साथ तैर जाये।
आस्था वह पौध भी नहीं,
जिसे इच्छानुसार
बोया और बढ़ाया जाये।
आस्था वह दूब है,
जो बाहर नहीं,
आदमी के भीतर उगती है
और जिसकी ताजगी
पहली बरसात में फूटी
हरियाली की तरह
सबका मन मोह लेती है।
आस्था आदमी को
आदमी की पहचान देती है।

शहर के बीचों-बीच

क्या हो गया है इस शहर को !
हर दरवाजे और मुंडेर पर
उलटी लटकी हैं अबाबीलें
और घूम रहे हैं चमगादड़।
जो घना बाजार
कभी भीड़ से अंटा होता था
और जिसमें शोर-शराबा
चमक-दमक से सटा होता था,
अब वीरान है।
सड़कों पर घूमते हैं
आज भी कुछ धड़धड़ाते चेहरे,
जो आदमी-से दिखते तो हैं,
पर आदमी नहीं होते,
क्योंकि उन्हें देखकर
आंखें पथरा जाती हैं,
चेहरा जर्द हो जाता है
और शरीर में
कंपकंपी-सी छूटने लगती है।
आज शहर की सारी चिड़ियां
जा छुपी हैं घोंसलों में।
उनका गाना, पंख फड़फड़ाना,
सब बन्द है।
जब भी निकलती है बाहर
कोई चिड़िया घोंसले से
बाज के खूनी पंजे
दबोच लेते हैं उसे।
लेकिन इस पर भी
कोई पंख नहीं फड़कता,
कोई आहट नहीं होती,
कहीं सुगबुगाहट नहीं होती,
क्योंकि जब भी
कोई पंख फड़फड़ाता है,
बाज का अगला निशाना
उसी पर सध जाता है।
शहर के बीचों-बीच
गुजरते हुए लगता है,
हमने अपना धर्म-कर्म का बोध
उठाकर दूर धर दिया है
और पूरा शहर
एक बाज के नाम कर दिया है।


कितना मुश्किल है

धर्म की लादी ढोते हुए भी,
हिन्दू, मुस्लिम या कि सिक्ख,
जैन, बौद्ध या क्रिस्तान
होते हुए भी
कितना मुश्किल है धार्मिक होना !
जैसे कोई शिल्पी
गढ़ता रहे शब्द सुन्दर
या रचता रहे छन्द टकसाली,
पर शब्द या छन्द की
रचना के बाद भी
कितना मुश्किल है कवि होना !
धर्म या कविता
कहां है विधान में !
अभिधान या परिधान में !!
जैसे बहुत मुश्किल है
फूल का पराग में,
खुशबू में बदलना,
वैसे ही बहुत मुश्किल है
विचार की धर्म में गति
और भाव की कविता में परिणति।

चितेरे बोल
ओ चितेरे बोल तू !
चित्रा यह सुन्दर-मनोहर
विश्व का कैसे रचा ?
रंग ये इतने चुटीले-
नीले-पीले
पाये कहां से ?
भाव नव-नव सृजना के
तूलिका में
आये कहां से ?
मैं चकित हूं,
रहस्य अब तो खोल तू !
ओ चितेरे बोल तू !
और यह संगीत-सरिता
संवेदना की
बह रही कलकल ।
नृत्य करती लहरियों में
भाव उच्छल
कह रही छलछल।
मैं चकित हूं/कौन यह संगीत ?
ओ सुर-साधक बोल तू !
रहस्य सारा खोल तू !

2 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.