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सी. आर. राजश्री की कहानी : समझदारी

कहानी

 

समझदारी

-सी. आर. राजश्री

रामपुर नामक एक गाँव में लगभग पाँच सौ लोग रहते थे। दो पहाड़ों के बीच कहती हुई एक नदी के तट पर बसा यह गाँव खूबसूरती का मस्त नजारा था। यहाँ की हरी-भरी भूमि काफी सुहावनी लगती थी। स्वच्छ वायु और साफ-सुथरा, व्यवस्थित

वातावरण मनमोहक लगता था।

गाँव के लोग पारंपरिक रीति रिवाज़ों को प्राथमिकता देने वाल,े व्रत त्योहार में गहरी आस्था रखने वाले, धार्मिक प्रवृत्ति के लोग थे। अज्ञानता के अंधकार में डूबे हुए गाँव के वासी अंधविश्वास के शिकंजे में फंसे हुए थे। वे बहुत ही खुश थे और अपनी तरह से जीवन गुजार रहे थे।

ज्ञान के दीप को फैलाने के कार्यक्रम में लगा हुआ एक पढ़ा-लिखा, आधुनिक विचारधारा वाला, सामाजसेवी नौजवान उस गाँव में शिक्षा फैलाने के लिए आया।

पहले वह गाँव के मुखिया के पास गया। वहाँ गाँव वालों की भीड़ को देखकर वह चकित हो गया। गाँववाले और मुखिया बहुत परेशान लग रहे थे। उनकी परेशानी को दूर करने के उद्देश्य से समीर ने अपना परिचय दिया। ग्रामवासी आश्वासित होकर बड़े भोलेपन से बोले- “बबुआ दूर खेत में राक्षस है”। समीर को बहुत हँसी आ गई, समीर को यह दृढ़ निश्चय था कि गाँववालों को किसी चीज पर अवश्य गलत फहमी हुई है। हँसी को दबाते हुए समीर ने राक्षस को देखने की इच्छा प्रकट की। गाँववाले समीर को खेत में ले गए। उसके अनुमान के अनुकूल खेत में एक बड़ तरबूज उगा हुआ था। उसने एक बड़ा चाकू मँगाया, आव देखा न ताव, झट से उस तरबूज को तोड़ा और वहीं काट कर खाने लग गया। गाँववाले समीर को घृणा और भय की दृष्टि से देखने लगे। फिर समीर को बाँधाने केलिए, एक लंबी रस्सी लेकर गाँववाले उसके पीछे दौड़ने लगे। गाँव वालों के इस प्रकार के आश्चर्यजनक व्यवहार से समीर भी तेजी से भागने लगा, बेचारा आखिर कब तक दौड़ता। गाँव वाले उसे पकड़ कर गाँव के छोर में स्थित एक झोपडे़ में बंद कर दिए। समीर को समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है? सख्त पहरे लगाकर बिना खाना-पानी दिए जब उसे मारने का ऐलान जब मुखिया ने किया तो समीर से रहा नहीं गया। उसने हिम्मत बटोर कर पूछा-“ मेरा कसूर क्या है।“ गाँव के मुखिया ने जवाब दिया “ जो आदमी राक्षस को खाने वाला है वह कितना भयानक होगा।“ समीर बिल्कुल ठंड़ा पड़ गया। उसने सपने में भी नहीं सोचा कि उसकी प्रवृत्ति का ऐसा प्रतिकूल असर पड़ेगा। उसने तब कहा कि “ खेत में कोई राक्षस नहीं है, वह तो एक मीठा फल है। श् उसने तो यह समझा कि यदि वह तरबूज को खाने लगेगा तो लोगों के मन से ड़र हट जाएगा और वे शायद यह समझने लगेंगे कि वह एक स्वादिष्ट और सेहत के लिए हितकारी फल है, जिसे कोई भी कभी भी खा सकता है। पर उसकी बात को कोई कान तक वहाँ देने वाला नहीं था।

समीर ने तब अपने दोस्त विवेक को मोबाइल से अपनी अवस्था से अवगत कराया और शीघ्र ही उसे भी रामपुर आने के लिए कहा। अगले दिन विवेक रामपुर पहुँच गया।

अपने दोस्त की हालत वह पहले ही फोन पर जान चुका था, उसने भी पहले गाँव के मुखिया से मिलने की इच्छा प्रकट की। तब वे गाँव वालों के साथ मिलकर दो-तीन राक्षस के बारे में बातें कर रहे थे। विवेक को अंदाजा हो गया कि मामला क्या है? विवेक ने अपना परिचय दिया। गाँववाले उसे राक्षस के बारे में बताने लगे। उन की बातों को ध्यान से सुनते हुए वह उनसे कहा “ यदि आप उस राक्षस से छुटकारा पाना चाहते हैं तो मेरे पास एक तरकीब है”। गाँववाले उसे आश्चर्य की दृष्टि से देखने लगे। उसने कहा “ ज्यादा कुछ नहीं बस थोडी सी मेहनत करनी होगी। सोच लीजिए अन्यथा वह राक्षस शायद आप सबको हानि पहुँचाए। फिर वे एक दूसरे को देखने लगे। वह शिक्षा का महत्व बताते हुए उन्हें पढ़ने लगा। फिर उन्हें दुनिया की तरक्की और अन्य वैज्ञानिक उपलब्धि के संबंध में बताता गया। ज्ञान की ज्योति धीरे-धीरे उनके भीतर प्रज्ज्वलित होने लगी। अब उनको यह समझने में देर न लगी कि खेत में कोई राक्षस नहीं है, बल्कि वह तो एक स्वादिष्ट मीठा फल है जो गर्मियों में काफी लाभप्रद है। उनके मन से भ्रम एवं डर दूर हो गया। अब वे खुद निड़र होकर खेत में जाकर उस तरबूज को तोड़ तोड़ कर खाने लगे। कमरे में बंद समीर से भी उन्होंने माफी माँगकर उसे भी छोड़ दिया। अपने किए पर उन्हें पछतावा होने लगा। समीर और विवेक फिर रामपुर से लौट पड़े।

सी.आर.राजश्री

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