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सोमेश शेखर चन्द्र का यात्रा संस्मरण : एवरेस्ट का शीर्ष - 5

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एवरेस्ट का शीर्ष - सोमेश शेखर चन्द्र ( पिछले अंक से जारी ....) भारत की तरह, अमरीका में भी प्रजातंत्र है लेकिन भारत की संसद म...



एवरेस्ट का शीर्ष
- सोमेश शेखर चन्द्र

(पिछले अंक से जारी....)

भारत की तरह, अमरीका में भी प्रजातंत्र है लेकिन भारत की संसद में जो कुछ होता है वह यहाँ के सीनेट में कभी सुनाई नहीं पड़ता। किसी नेता की यहाँ न तो सिनेट के भीतर और नहीं उसके बाहर, किसी दूसरी पार्टी या नेता के खिलाफ कुछ कहते, बोलते सुना जाता है। हमारे यहाँ हल्ला हंगामा करके लोग संसद का काम तक ठप कर देते हैं और वह भी दिन दो दिन के लिए नहीं बल्कि कभी कभी तो समूचा सत्र ही हल्ले हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। गाली गलौज, माइकों और कुर्सियों की तोड़ फोड़ और मारामारी यहाँ की असेंबलियों में अक्सर ही देखने को मिलता है। राजनीतिक पार्टियाँ, धरना प्रदर्शन, सड़क जाम, रेल रोको, चक्का जाम से लेकर प्रांत और भारत बंद तक करवा देती हैं। लेकिन अमरीका में वैसा कुछ भी नहीं होता, क्यों? यहाँ पर बड़े से बड़े मुद्दों पर सिनेट में बहस होती है और वहाँ सशक्त ढंग से लोग अपना पक्ष और विचार रखते हैं प्रस्ताव रखे जाते हैं उस पर वोट पड़ते हैं जो नतीजा निकलता है सब उसे स्वीकार करते हैं और वह मुद्दा वहीं खत्म हो जाता है। इसके बाद फिर उस मुद्दे पर कहीं से, किसी की, एक आवाज तक सुनाई नहीं पड़ती। राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव था। चुनाव का परिणाम आया। जूनियर बुश जीते और जॉन केरी हार गए। हारने के बाद, उनका एक बयान आया, हमने चुनाव की धुन में अमरीका को काफी बाँट दिया अब हमें, वह सब भूलकर, सिर्फ और सिर्फ अमरीका के बारे में सोचना चाहिए। जान केरी का यह बयान पढ़कर, उनके प्रति, मन में बड़ी श्रद्धा हुई थी। लेकिन वहाँ के प्रजातंत्र में, सिनेट का निर्विघ्न और बिना किसी हल्ला हंगामे के अनवरत चलते रहना तथा किसी मुद्दे पर पार्टियों के बीच गहरे मतभेद होने के बावजूद, सिनेट में बहस और मतदान से काम का निपट जाना, सिनेटरों में इतना आत्मानुशासन कि उसके बाद गंभीर से गंभीर मुद्दे पर, उनका चुप लगाए रखना, मेरे लिए एक बड़ी पहेली की तरह थी। लेकिन यहाँ सब कुछ देखने के बाद, मेरे भीतर की यह अनबूझ पहेली अपने आप सुलझ गई थी। किताबों में लिखा गया है कि, लोकतंत्र के तीन पाए हैं, और जहाँ पर तीनों पाए, मजबूत होंगे और अपने अपने काम स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर करेंगे वहाँ लोकतंत्र, सुचारु ढंग से चलेगा। किताबों में लिखी यह बात सत्य भी है और अमरीका में, तीनों संस्थाएँ अपने अपने काम, जैसा किताबों में लिखा हुआ है, ठीक उसी तरह से कर भी रही हैं, और किताबों में प्रजातंत्र के तीनों पायों से, जिन आदर्शों और मर्यादाओं की अपेक्षा, की गई है वे आदर्श और मर्यादाएँ भी तीनों ही संस्थाओं में यहाँ अपनी पूरी हैसियत के साथ न सिर्फ मौजूद है, बल्कि उसकी हनक, यहाँ की जिंदगी के जर्रे जर्रे और रेशे रेशे तक में देखने को मिलती है। ग्वांतोनामो जेल में मानव अधिकारों का हनन, और इसके लिए, उसके दोषियों को सजा, वाटरगेट स्कैंडल और राष्ट्रपति का इंपीचमेंट, मोनिका लेविंस्की केस तथा और भी दूसरे कई प्रकरण, जिनका संबंध न सिर्फ शीर्ष पर बैठे प्रभावशाली लोगों से था बल्कि वे काफी संवेदनशील खित्तों से भी ताल्लुक रखते थे, इसे सिद्ध करने के लिए काफी है। 9.11 जैसी घटना पर, अमरीका धूं धूं करके जल सकता था लेकिन छिटपुट घटनाओं को छोड़कर, वहाँ के किसी भी कोने से न तो, वहाँ के लोगों की तरफ से कोई बड़ी प्रतिक्रिया सुनने को मिली थी और न ही, वहाँ के नेताओं या पार्टियों का कोई बड़ा रिएक्शन देखने सुनने को मिला था। पृथ्वी के दूसरे किसी भूभाग में अगर इतनी बड़ी घटना घट गई होती तो वहाँ के लोग, कहर बरपा दिए होते। लेकिन, अमरीकी आवाम में, इतनी मारांतक घटना पर भी, जैसी सहिष्णुता और आत्मानुशासन देखने को मिला, उसे देखकर मैं चकित था।

यहाँ पर सब कुछ इतने उच्च और आला दर्जे का कैसे है? और क्यों यहाँ के प्रजातंत्र की तीनों संस्थाएँ ठीक वैसी ही हैं जैसा किताबों में लिखा हुआ है? यहाँ पहुँचने पर जैसा वैभव और विनम्र संभ्रांतता मुझे यहाँ के जर्रे, जर्रे और रेशे रेशे में पसरी, बिखरी देखने को मिली, यहाँ के लोगों के गरिमामयी चेहरो से जैसी भद्रता टपकी पड़ रही होती है, उनके नजदीक से गुजरने पर परस्पर की उत्सर्जित तरंगों के बीच, संवाद का जो आदान प्रदान होता है, उससे मन के भीतर, डर या बैर के झटके लगने के बजाए, उनकी तरफ से निशा खातिर रहने की जैसी आश्वस्ति की अनुभूति होती है, वैसी अनुभूति, अपने किसी आत्मीय या विभूतियों का साथ होने पर ही मिलती है। जहाँ के लोग इतने ऊँचे पहुँच लिए हों और सभी आम और खास में, नकारात्मकता लेशमात्र की न हो, वे लोग महान ही होते हैं और ऐसे महान लोगों के बीच से, जो भी निकलकर समाज और देश के स्तर पर पहुंचता हैं वह उसी तरह की बात करेगा जैसा जॉन केरी ने, राष्ट्रपति पद का चुनाव हारने के बाद, अमरीका के लोगों से कहा था। इसी बात को अगर य कहा जाए तो ज्यादा ठीक होगा, कि यहाँ के लोगों में नैतिकता और मर्यादा का जो स्तर है, उसमें जॉन केरी को ठीक वही कहना था जैसा उन्होंने कहा था। यहाँ की जिंदगी के हर क्षेत्र के व्यवहार, में ऐसी उच्चता और उत्कृष्टता कैसे है? मेरे भीतर का यह प्रश्न, जो मेरे लिए एक बड़ी पहेली बनी हुई थी, वह यही था। ठीक है, प्रजातंत्र के तीनों पाए, जैसा किताबों में लिखा है कि, जब वे, पूरी तरह स्वतंत्र और निर्भीक होंगे तो, प्रजातंत्र सुचारु और प्रभावी ढंग से अपना काम करेगा और किताबों में लिखा सभी कुछ, इसके तीनों पायों में मौजूद हो तब पर भी, इस बात की गारंटी कौन दे सकता है कि प्रजातंत्र, अपने आवाम को वह सब दे ही देगा जिसकी उससे अपेक्षा की गई होती है। वह इसलिए कि इसके तीनों पाए सीमेंट, कंकरीट और छड़ से तो ढाले नहीं जाते कि उसे आला दर्जे के द्रव्यों से ढालकर ऐसा पुख्ता कर दिया जाए कि, भयानक से भयानक भूकंप और तूफान में भी वे अडिग खड़े रहें और उस पर किसी भी तरह के बम विस्फोट तक का कोई असर ही न हो। प्रजातंत्र के तीनों पायों के निर्माण में, इसकी बुनियाद से लेकर, समूचे स्ट्रक्चर तक में, सिर्फ एक ही द्रव्य और पदार्थ का उपयोग हुआ होता है और वह पदार्थ है आदमी। और जब बात आदमी की आती है तो उसमें स्वार्थ, लोभ, लालच, ऐंठ, अकड़, ईर्ष्या, द्वेष, शोध प्रतिशोध, माया मोह तथा तृष्णा जिस प्रबलता के साथ मौजूद होती है, झूठ बोलने और दूसरों को धोखा देने की जैसी उसकी सहजवृत्ति होती है वैसे में वह इतना सख्त जान होगा कि उस पर किसी भी जलजले, आँधी तूफान और बम धमाके का असर ही नहीं होगा यह बात गले के नीचे उतार सकना मुश्किल होता है। अगर इसी बातें को ठेठ भाषा में कहा जाए तो यह कि ऊँचे से ऊँचे सिंहासन पर बैठे लोगों की, जिनके हाथ में, उस देश की बागडोर होती है उन तक के बिक जाने की कई मिसालें इसी पृथ्वी पर मौजूद हैं और जब इतने ऊँचे और महत्व की जगह बैठे लोग, खरीदें और बेंचे जा सकते हैं तो पायों के ऐसे लोग जो कम औकात के है उनको खरीद लेना, डरवा धमका कर और जान की धमकी देकर, उनसे अपनी मनमानी करवा लेना तो, उस वर्ग के लोगों के लिए, जिनकी वृत्ति ही वही हैं, उनके बाएं हाथ का खेल है। इस सबके अलावे, अधम प्रकृति के लोग, हमारे ही बीच में होते हैं जिन्हें बेचने खरीदने की किसी को जरूरत ही नहीं पड़ती। वे खुद ही, खुद को, बेचने के लिए दुकान लगाए बैठे रहते हैं। लाखैरो, लंपट, लबार, धूर्त, ठग और धोखेबाज, चोर उचक्के और डकैत, सब इसी पृथ्वी पर पैदा होते हैं और पलते बढ़ते हैं। आदमी खुद में, जहाँ इतने अवगुण भरे हों और पृथ्वी, अवगुणियों से पटी पड़ी हो वैसे में, किसी देश के प्रजातंत्र के तीनों पायों में जिसका निर्माण बुनियाद से लेकर ऊपर तक सिर्फ आदमी के मसाले से किया गया हो, उसमें कोई अवगुण ही देखने को न मिलें हैं न यह एक अविश्वसनीय और आश्चर्य की बात? लेकिन अमरीका में ऐसा ही है। क्यों है ऐसा यहाँ? इस प्रश्न पर जब मैं, गहराई से सोचा था तो जो एक तथ्य खुद से उद्घाटित होकर, मेरे सामने प्रकट हुआ था वह यह कि प्रजातंत्र के तीन पाए नहीं बल्कि चार पाए होते हैं और इसका चौथा पाया है इस देश का अवाम। मैंने यहाँ, प्रजातंत्र को जिस तरह, किताबों में लिखे आदर्शों और मर्यादाओं में बद्ध रहकर, उसकी तमाम अपेक्षाओं से दो कदम आगे चलते देखा और सब कुछ वैसा ही होते रहने के पीछे की यहाँ के अवाम की प्रबल शक्ति को पहचाना जो उनमें से, किसी के जरा सा भी हिलडुल करते ही, उसकी मृत्यु बनकर, उस पर टूट पड़ता है, उसे जान कर मैं, यह बात बेहिचक कह सकता हूँ कि, प्रजातंत्र का यह चौथा पाया ही इसका असल पाया है। यही वह पाया है जो न सिर्फ बाकी के तीनों पायों के लिए आला दर्जे का कंक्रीट, छड़ और सीमेंट सप्लाई करता है बल्कि उसे इस कदर तमाम आदर्शों और मर्यादाओं में पाबंद रहने को मजबूर किए रखता है कि उसके पास थोड़ा सा भी हिलडुल कर लेने तक की जगह नहीं छोड़ता। किसी भी पाए या तंत्र को मर्यादित रखने के लिए उसकी नकेल पकड़े रखने या अंकुश दाबे रखने जैसा दुनियावी काम, यहाँ के लोगों की किताबों में है ही नहीं। यहाँ पर किसी के लिए भी जिंदा बचे रहने के लिए, सिर्फ एक ही शर्त है और वह है मर्यादा में रहो बस। इसीलिए, यहाँ पर प्रेसीडेंट से लेकर नेता और पार्टी, नौकरशाह और किसी भी स्तर का कारकून, व्यापारी और दुकानदार तथा तमाम आम और खास पूरी तरह शुद्ध और खांटी होते हैं और अपनी अपनी मर्यादाओं से आबद्ध अपना जीवन मजे में जीते हैं। लफ्फाज, झूठ को सच और सच को झूठ बना देने में माहिर नेता और कुर्सी पाने के लिए, कुछ भी कर गुजरने और किसी भी स्तर तक गिरने के लिए तैयार लोगों की कौन कहे कोई यहाँ पर, जैसा जान केरी ने, चुनाव हारने के बाद, अमरीकी जनता से कहा था उससे हटकर, कुछ बोल दे या अमर्यादित हरकत कर दे तो राजनीति के नक्शे से, उसका नामोनिशान मिट जाना तय है।

भारतीय सिस्टम में बच्चों को अच्छा शहरी बनाने के लिए, तीन पाठशालाएं हैं जहाँ उसके चरित्र निर्माण से लेकर, मानव मूल्य में और ज्ञान विज्ञान में संस्कारित और दीक्षित करने की व्यवस्था है। उसमें पहली पाठशाला, बच्चे के माँ बाप परिवार और कुलगोत्र होते हैं दूसरा उसका समाज तथा तीसरा गुरूकुल है। मैं समझता था, बच्चों के चरित्र निर्माण के लिए, इसी तरह का, या इसी से मिलता जुलता कोई सिस्टम अमरीका में भी होगा लेकिन यहाँ आकर जो कुछ मैंने देखा, वह यह कि, यहाँ के लोग बच्चों के चरित्र निर्माण जैसे पचड़े में पड़े ही नहीं। शायद वे यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि जो प्रोडक्ट आदमी के हाथों ढाल पकाकर बाहर आता है वह पूरी तरह बनावटी और दोगला होता है उसमें प्रकृति के निर्माण जैसी न तो चट्टानी मजबूती होती है और न ही उस जैसी खांटी शुद्धता ही होती है। वे यह भी जानते थे कि प्रकृति की तरह, जब परिवेष का अंतर और बाह्य दोनों शुद्ध होगा और अशुद्ध की जगह, सिर्फ रद्दी की टोकरी होगी, तो वहाँ सब कुछ शुद्ध और खांटी ही होगा। घर से लेकर बाहर तक यहाँ, प्रकृति का यही नियम लागू है इसलिए यहाँ के लोगों को अपने बच्चे के चरित्र निर्माण जैसा काम करने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई होगी।

अमरीका में, गगनचुंबी इमारतें, दूकानें, माल और अपार्टमेंट तो दूसरी जगहों की तरह, ईंट बालू, सीमेंट और छड़ से ही बनाए जाते हैं लेकिन यहाँ के निजी रिहायशी मकान, पूरी तरह लकड़ी से बनाए जाते हैं। अपने यहाँ की तरह, यहाँ पर, ऐसा नहीं होता कि एक जगह पर, एक मकान काफी लंबी चौड़ी जगह में चार तल्ले का बना हैं। और ठीक उसी की बगल दूसरा, एकदम छोटा और बौना, बना हो। यहाँ पर जितने भी निर्माण है, माल दुकान, ऊँची इमारतों से लेकर अपार्टमेंट और निजी रिहायश के मकान तक, सब अगले दो सौ वर्षों की तमाम, संभावित जरूरियातों तथा पानी बिजली, गैस, सड़क, पार्क खेलों के मैदान, स्कूल जैसी सुविधाओं से लैस, बनाए जाते हैं। मकान के चारों तरफ, काफी खुली जगह, होती है जिसमें घास लगी होती है। सामने के भाग में अनिवार्य रूप से दो पेड़ लगे होते हैं तथा बैकयार्ड में, स्विमिंग पूल तथा बच्चों के खेलने भर की प्रचुर जगह होती है। यदि कहीं पर अपार्टमेंट बने है तो वहाँ पर, सिर्फ अपार्टमेंट ही होंगे और अगल बगल के सारे अपार्टमेंट, एक ही नक्शा डिजाइन तथा ऊँचाई के होंगे। इसी तरह यदि, किसी क्षेत्र में रिहायश के बड़े मकान बने है तो उस जगह के सभी मकान एक ही साइज और थोड़े हेर फेर के साथ, एक ही नक्शा और डिजाइन के बने होते हैं। उनमें अगर कहीं अंतर दिखाई देता है तो सिर्फ बाहर की तरफ लगी उसकी ईटों के रंग में। यहाँ पर, ईंटों के रंगों के चुनाव के अलावे, स्वीकृत डिजाइनों में हेर फेर कर सकने की किसी को छूट नहीं होती। अपने यहाँ की तरह यहाँ पर लोग अपनी जमीन खरीद कर, साइट पर खड़ा होकर, अपनी देख रेख में मकान नहीं बनवाते। यहाँ पर, यह काम पूरी तरह डेवलपर्स और बिल्डर्स के हाथों में होता है। जमीन खरीदने से लेकर, मकान बनाकर बेचने तक का सारा काम वही करता है। इसके लिए वे करते क्या है कि जिस एरिया में उन्हें मकान बनाना होता है उस एरिया में बड़ी लंबी चौड़ी जगह खरीदकर उसमें, सीवेज, जमीन के नीचे पानी और गैस की पाइपें तथा बिजली की लाइनें पहले से डाल देते हैं, रोड और फुटपाथ भी सीमेट से ढालकर बना लेते हैं जब सबकुछ मानक के हिसाब से बनाकर तैयार कर लेते हैं तब जाकर मकान का असल निर्माण शुरू करते हैं। वैसे यहाँ के बिल्डर्स, खुद से सबकुछ मानक के अनुरूप ही करते हैं और निर्माण में जितनी भी सामग्रियाँ लगाते हैं सब ऊँचे दर्जे की होती है बावजूद इसके, यहाँ पर हर स्टेज का निर्माण, जब तक सिटी की तरफ से तैनात इंजीनियर, खुद से चेक करके संतुष्ट नहीं हो लेता वह बिल्डर को आगे के निर्माण की इजाजत ही नहीं देता। यदि निर्माण में उसे किसी तरह की खोट, या खामी दिखी, तो वह उसे तोड़कर, फिर से बनाने के लिए कह देता है। इस तरह यहाँ पर, समूचे निर्माण में, किसी भी तरह की खोट या खामी रह जाने की गुजाइंश नहीं रहती। बावजूद इसके, कई खरीददार, प्राइवेट इंजीनियर बुलाकर, समूचे स्ट्रक्चर का निर्माण, और उसकी फिटिंग चेक करवाते हैं। चेक करने पर यदि इंजीनियर को कोई खोट या खामी दिखी तो वह बाकायदा उसे लिख कर देता है और बिल्डर्स को, बिना किसी नानुकुर के उस खामी को दूर करना जरूरी हो जाता है। मकान का कब्जा लेने के बाद भी यहाँ एक साल की वारंटी मिली होती है। इस दौरान किसी को, निर्माण में या किसी फिटिंग में खामी मिली तो बिल्डर उसे मुफ्त में ठीक करने के लिए बाध्य होता है।

यहाँ पर रिहायश के निजी मकान बनाने का ढंग भी बड़ा निराला है। इसे बनाने के लिए लोग, नींव नहीं खोदते। जितने क्षेत्र में मकान बनाना होता है उतनी जमीन पर पहले एक डेढ़ फीट की मोटाई का क्रंकीट का स्लैब ढाल लेते हैं। और उसमें से बिजली, गैस, पानी के लिए तथा पानी की निकासी के लिए अलग अलग पाइपें डाल देते हैं। जिस तरह अपने यहाँ दुर्गा पूजा का पंडाल बनाने वाले लोग, पहले अलग अलग साइज के बांस, रस्सियों से बांधकर, पंडाल का समूचा ढॉचा खड़ा करके उसके बाहर और भीतर, तरह तरह के रंगीन कपड़ों से सजाकर मनचाहा पंडाल तैयार करते हैं ठीक उसी तरह, यहाँ पर लोग पहले डिजाइन के मुताबिक लकड़ी से, समूचा घर बना लेते हैं इसके बाद ऊपर की छत रबड़ या फाइबर के चौकोर, गत्तों से छा देते हैं। देखने से यहाँ की छतें, अपने यहाँ के बड़े खपडों की छत की तरह छाई हुई लगती है। बाहरी तथा भीतरी, दोनों तरफ की दीवारों को, चारों तरफ रंगीन ईटों की एक बड़ी पतली सी दीवार खड़ी करके ढँप देते हैं। यहाँ की ईंटें, दो ढाई इंच मोटी, और छ या आठ इंच लंबी चौकोर लाढें की तरह की होती है। भीतरी छतों पर, फाइबर चढ़ाकर, उस पर सफेद रंग से स्प्रे करके उसके सभी जोड़ और सूराख भर देते हैं। रंग भी यहाँ के बड़े नायाब किस्म के होते हैं, उनके प्रयोग से घर का समूचा इंटीरियर बड़ा भव्य और संभ्रांत दिखने लगता है। उसी तरह ईंटें यहाँ की बहुत ही खूबसूरत होती हैं। यहाँ के ईटों के रंगों की इतनी वेराइटी होती हैं और उसके सभी रंग इतने नायाब किस्म के होते हैं कि उन्हें देखकर मन खुश हो जाता है और वे ईटें जब मकान की दीवारों में जोड़ दी जाती है, तो उस मकान से ऐसी मोहक छटा बिखरी रही होती है ऐसी संभ्रांतता और वैभव छलकी पड़ रही होती है कि खड़ा होकर उसे निहारते रहने का मन करता है। ऐसा नहीं है कि ऐसी भव्यता और संभ्रांतता यहाँ के नवनिर्मित मकानों में ही देखने को मिलती है। सैकडों साल पहले के बने मकानों, गगनचुंबी इमारतों, मालों, पुलों और फ्लाई ओवरों से लेकर छोटी छोटी गिमटियों तक में, जहाँ तक नजर जाती है सबमें वैसी ही भव्यता और संभ्रांतता छलकी पड़ रही होती है। यहाँ पर मकान बनाने वाले ज्यादातर कारीगर मैक्सिकन होते हैं। उन लोगों को काम करते देखकर लगता है कि वे काम नहीं, बल्कि किसी सुरीले संगीत की धुन पर थिरक रहे हों। जिस तेजी और फुर्ती तथा नजाकत और खास अदा में, उनके हाथ और पाँव सभी दिशाओं में कलाबाजियाँ कर रहे होते हैं, और उसी की लय में उनकी देह भी लचक रही होती है उसे देखने से किसी मोहक नृत्य का ही भान होता है। ढॉचा खड़ा करने के लिए लकड़ी की लंबाई नापने, नाप के हिसाब से उसे काटने, जगह पर रखने और कीला जड़कर उसे उसके वांछित जगह पर फिट कर देने में, भारत के किसी सबसे तेज मिस्त्री को जहाँ, घंटे भर का समय लगेगा, वही वे, उसे कुछ ही सेकंडों में पूरा करके, आगे का काम शुरू कर देते हैं। इसके लिए वे लकड़ी काटने की आरी, नापने का फीता, कील ठोंकने का हथौड़ा, गलत कीला ठक जाने पर उसे निकाल बाहर करने का प्लास तथा दूसरी जरूरत के औजारों की एक किट, अपनी देह में पहन कर रखते हैं। लकड़ी नापने, काटने, कीला ठोंकने, उखाड़ने तक का सभी काम वे मशीनों से ही करते हैं। बेहद हल्की और छोटे आकार की, उनके किट की सभी मशीनों में, बिजली के दौड़ते तार फिट होते हैं काम के दौरान, जिस भी मशीन की जरूरत होती है उनके हाथ, अपने आप उस मशीन तक पहुँच जाते हैं और काम सम्पन्न करके, मशीन वापस उसके खाँचे में डालकर दूसरी मशीन की तरफ लपक लेते हैं। उन लोगों की कीला ठोंकने की मशीन मैंने देखा, वह एकदम माउजर की तरह की होती है, जिस तरह माउजर के चैंबर में गोलियाँ भर दी जाती है और ट्रिगर पर अंगुली दबाते ही, उससे, ठॉय, ठॉय गोलियाँ दगने लग जाती है, उसी तरह, कीला ठोंकने की मशीन में अलग अलग साइज के कई चैम्बर बने होते हैं और इन चैंबरों में, अलग अलग साइज के कीले भर दिए जाते हैं। कीले यहाँ अकेले और अलग अलग नहीं होते बल्कि, अलग अलग साइजों के कीलों का मूठा बना होता है और वे एक साथ जमाए हुए होते हैं। कारीगर को जिस साइज का कीला ठोकना होता है बटन दबाने से, उस साइज के कीले का चैंबर, निशाने पर आ जाता है और ट्रिगर दबाते ही कीला, टक, टक लकड़ी के अंदर घुसता चला जाता है। समूचा मकान वे इतनी तेजगति से बनाते हैं कि डेढ़ से दो महीने के भीतर, उसे पूरी तरह फिनिश करके बिल्डर को सौंप देते हैं।

यहाँ के घरों की फर्श, पर कार्पेट बिछे होते हैं। जमीन से दो या तीन फीट के बाद घर की बाहरी दीवारों में, आठ से दस फुट की ऊँचाई तक की खिड़कियाँ लगी होती है। अल्यूमिनियम या स्टील के बड़े फ्रेम के अंदर उतना ही लंबा चौड़ा काँच बैठाकर उसे बनाया जाता है। घर को एयर टाइट रखने के लिए फ्रेम के चारों तरफ रबड़ के गास्केट लगे होते हैं। जाड़े के दिनों में खिड़कियाँ बंदकर देने पर पूरा घर एयर टाइट हो जाता है जिससे बाहर की ठंडी हवा भीतर नहीं घुसपाती, साथ ही, बाहर से सूरज की रोशनी और धूप घर के भीतर पहुँचती रहती है। खिड़कियों के बाहर, महीन तारों की एक जाली लगी होती है जिसके चलते बाहर से कीड़े मकोड़े घर के भीतर नहीं घुस पाते। अपने यहाँ हवाएँ पुरवा और पछुआ चलती हैं जबकि यहाँ पर उत्तरी और दक्षिणी हवाएँ चलती है और करीब करीब हर समय, पच्चीस से तीस किलोमीटर की रफ्तार से बहती ही रहती है। उत्तर की हवा आर्कटिक से आती है इसलिए जाड़े के दिनों में जब, उत्तरी हवा चलती है तो, यहाँ बर्फबारी होने लगती है और तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है। बर्फबारी यदि न भी हुई, तो भी ठंडी हवा इतनी कटखनी और सर्द होती है कि कितने भी कपड़े पहनकर रखो, घर से बाहर निकलते ही, पूरी देह सुन्न होने लग जाती है। एक दफा हुआ यूँ कि दो तीन दिनों की लगातार बर्फबारी के चलते घर में बैठे बैठे मेरा मन उकता गया था। एक दिन दोपहर को आकाश साफ हो गया और चटख धूप खिल आई। मन में आया बाहर निकलकर एक चक्कर मार आऊँ, घर के भीतर लगा बैरोमीटर देखा तो वह, बाहर का तापमान माइनस सात डिग्री बता रहा था। पाँवों में ऊनी मोजा पहना, हाथों में खास ठंड के लिए बना मोटा ग्लब्स डाला, देह में नीचे गंजी, उसके ऊपर इनर, फिर कमीज फिर ऊनी स्वेटर, ऊपर से ऊनी सदरी और सबसे ऊपर मोटा गर्म जैकेट पहना, कान को ऊनी मफलर से पूरी तरह लपेटा, ऊपर से कश्मीरी फर की टोप डाल लिया। इस तरह ठंड से बचने का पूरा उपाय करके घर का दरवाजा खोलकर बाहर निकला तो ऐसा लगा जैसे बर्फ के पानी में उतर गया होऊँ। सोचा कुछ दूर, तेज कदमों से चलूँगा तो देह में गर्मी आ जाएगी लेकिन पन्द्रह बीस कदम आगे बढ़ते बढ़ते, ऐसा लगा था कि जितने कपड़े मैंने पहन रखा है वे गर्म कपड़े नहीं बल्कि बर्फ के बने लबादे हों जो मेरी देह की सारी गर्मी बड़ी तेजी से सोखने में जुट गए हैं। इसके बाद मेरी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं पड़ी थी और मैं भागकर वापस अपने घर में घुस गया था। ऐसी होती है यहाँ की ठंड। बाहर की ठंड भीतर न घुसे और भीतर की गर्मी भीतर ही रूकी रहे, इसके लिए यहाँ पर बाहर की सभी खिड़कियां और दरवाजे एयर टाइट होते हैं अलावे इसके मकान की बाहरी दीवार भी एयरटाइट बनाई जाती है। दीवारों को एयर टाइट बनाने के लिए लकड़ी की बाहरी दीवारों के बीच में जो खाली जगह होती है उसमें चारों तरफ फाइबर का मोटा गत्ता डालकर समूचा घर ही एयरटाइट कर दिया जाता है। इसके चलते, लोगों को यहाँ, घरों के भीतर किसी भी तरह के धुआँ, धक्कड़ करने की इजाजत नहीं होती। जिस तरह, हम लोग अपने घरों में, हवन कर लेते हैं धूप अगरबत्तियाँ और दिए जला लेते हैं वैसा यहाँ के लोग नहीं कर सकते। यहाँ के सभी घरों में एक फायर अलार्म सिस्टम लगा होता है और वह सिस्टम, सीधा उस क्षेत्र के फायर स्टेशन से जुड़ा होता है। घर के भीतर, निश्चित मात्रा से ज्यादा धुवां होते ही, अलार्म सिस्टम, अपने आप हॉऊँ हाऊँ करके चिल्लाने लग जाता है और हाट लाइन से जुड़ा होने के चलते इसकी सूचना फायर स्टेशन को भी हो जाती है। फायर स्टेशन में इसकी सूचना होते ही, एक साथ तीन गाड़ियों का एक काफिला उस घर की तरफ, हाँऊ, हाँऊ करता दौड़ लेता है। उस काफिले में, एक गाड़ी फायर ब्रिगेड वालों की, दूसरी पुलिस की तथा तीसरी इमर्जेंसी वालों की होती है। वह इसलिए कि आग से यदि कोई जल, झुलस गया हो तो इमर्जेसी वाले उसे तुरंत हास्पिटल पहुँचा दें। आग लगाने का काम किसी अराजक तत्व ने किया हो या आग के चलते किसी तरह की अव्यवस्था उठ खड़ी हो, उसे काबू करने के लिए, पुलिस साथ हो लेती है।

ठंड़ी में गर्म तथा गर्मी में ठंडा रखने के लिए, सभी घरों में ए0सी0 लगा होता है। यहाँ की सभी कारें ए0सी0 होती है। माल, दुकानें, दफ्तर, स्टोर सब कुछ ए0सी0 होते हैं। घरों के भीतर की गंदी हवा, बाहर करने के लिए, इसकी छतों पर चिमनियों के साथ एक्जास्ट लगे होते हैं। यहाँ का सब कुछ बड़ा हाईटेक है। घरों में, खाना बनाने के लिए गृहणियों या किसी को भी, ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। उबालने से लेकर, भूंजने पकाने तक के सभी छोटे बड़े कामों के लिए घरों में मशीनें लगी होती है। वैसे भी यहाँ के लोगों, का भोजन, हम लोगों से एकदम अलग तरह का होता है। अपने यहाँ जिस तरह, एक शाम के भोजन में दाल, चावल, सब्जी, रोटी, पापड़, चटनी, घी, अचार, मांस मछली, शामिल होता है और लोग उसे स्वाद और चटखारे ले लेकर छकते हैं वैसा यहाँ के लोग नहीं करते। यहाँ पर लोग, माँस बाजार से लाकर, कुकर में, उबाल लेते हैं और उस पर थोड़ा नमक और गोलमिर्च बुरक कर खा लेते हैं ऊपर से थोड़ा चाकलेट, फल का जूस कोक पी लिए बस हो गया उनका भोजन या सैंडविच खा लिए। जूठा बर्तन डिशवाशर में डालकर बटन दबा दिए, मशीन, सारा बर्तन माँज धोकर सुखवा देती है सुबह लोग उठते हैं तो सारा बर्तन उन्हें धुला पुंछा तैयार मिलता है।

भारत के घरों में लोग चपातियाँ खाते हैं उसे बनाने के लिए भी यहाँ, आटा गूँधने तथा रोटी बेलने की मशीन होती है उन्हें सिर्फ चपातियाँ, तवे पर सेंक कर, उतार लेने की जरूरत होती है। वाशिंग मशीन में साबुन डालकर बटन दबा देने से मशीन कपड़ों को धो सुखवा देती है। घर के बाहर के लान की घास में, पानी देने के लिए किसी को पाइप लेकर घास पर फौव्वारा नहीं छोड़ना होता। मकान बनाते समय ही बिल्डर, जमीन के नीचे चारों तरफ, पाइपें बिछाकर उसमें स्प्रेयर लगा देते हैं। घर के भीतर उसका कम्प्यूटर नुमा एक सिस्टम लगा होता है, लान में किस समय और कितनी देर पानी देना है लोग सिस्टम में फीड करके छोड़ देते हैं। निश्चित समय पर सिस्टम अपने आप सक्रिय हो उठता है और पाइप में लगे स्प्रेयर, जमीन के नीचे से उठकर ऊपर आ जाते हैं और लॉन में दूर दूर तक पानी छिड़कना शुरू कर देते हैं। जितने समय के लिए, सिस्टम में कमांड दिया होता है उतने समय तक स्प्रेयर, चारों तरफ पानी की बौछारें छोड़ते रहते हैं समय समाप्त होते ही पानी के फौव्वारे अपने आप बंद हो जाते हैं और जमीन से ऊपर निकले, स्प्रेयर, वापस जमीन के नीचे, अपनी जगह जा बैठते हैं। यहाँ के सभी घरों में सिक्यूरिटी सिस्टम लगा होता है घर की कोई खिड़की, दरवाजा खुलते ही घंटी घनघना उठती है। घर का दरवाजा और खिड़की बंद करते समय, यदि कोई खिड़की बंद करना भूल गई हो या ठीक से बंद न हुई हो, तो भी घंटी घनघनाती रहती है। कार रखने की गैरेज खोलना और बंद करना होता है तो बटन दबाने मात्र से ही वह खुल और बंद हो जाता है। इसके खोलने और बंद करने का सिस्टम, गृहस्वामी की कारों में भी लगा होता है। लोगों को कार बाहर निकालना होता है तो सिर्फ कार में लगी बटन ही दबाना होता है शटर की तरह कार गैरेज में लगा गेट, अपने आप उठकर, ऊपर चला जाता है। बाहर से कार लेकर घर पहुँचने के समय, लोग दूर से ही बटन दबा देते हैं तो उनकी कार, गैरेज पहुँचने तक, शटर अपने आप ऊपर हुआ रहता है। इसी तरह घर के दरवाजों, खिड़कियों को लॉक करने और खोलने के लिए भी घर के बाहर एक कम्प्यूटरनुमा सिस्टम लगा होता है जिसमें लोग अपना पासवर्ड और नंबर फीड करके रखते हैं घर से निकलने के पहले वे अपने घर के दरवाजे खिड़कियाँ बंद करके, अपने कोड या पासवर्ड से उसे डबल लॉक कर देते हैं इससे उनकी अनुपस्थिति में अगर उनका घर कोई खोलना चाहे तो वह नहीं खोल सकता।
यहाँ की कालोनियों की सारी व्यवस्थाएँ पानी, बिजली, सड़क, सीवेज से लेकर साफ सफाई तक, सिटी के जिम्मे रहता है। हर सिटी में सेंकडरी तक का एक स्कूल और लाइ्रब्रेरी जरूर होती है जिससे उस एरिया के बच्चों को पढ़ने के लिए, कही दूर नहीं जाना पड़ता। सिटी की लाइब्रेरियों में विज्ञान, साहित्य, इतिहास तथा दुनिया के जितने भी तरह के विषय हैं सबकी पुस्तकें, ड़ी0बी0ड़ी0, फ्लापी रखी हुई मिलती हैं। हर विषय पर पुस्तकों तथा ड़ी0बी0ड़ी0 का जैसा संग्रह मैंने यहाँ की सिटी लाइब्रेरी में देखा, वैसा संग्रह, अपने यहाँ के, बड़े शहरों की लाइब्रेरियों में ही होती होगी। लाइब्रेरी का मेंबर बनते ही, वहाँ से पन्द्रह दिनों के लिए, जितनी पुस्तकें कोई पढ़ सकें, उतनी इशू करवा सकता है। यहाँ पर हर सिटी एक स्वतंत्र इकाई होती हैं। अपना खर्च वह मकानों और उस क्षेत्र की दुकानों से बिकने वाले सामानों पर टैक्स लगाकर उगाहती है।

भारत में जिस तरह लोग, टी0वी0, फ्रिज तथा दूसरे सभी तरह के उपकरण और सामान, खराब हो जाने पर, उसे रिपेयर करवाकर, वर्षों तक, व्यवहार करते रहते हैं वैसा यहाँ नहीं होता। यहाँ पर, अपने यहाँ की तरह, रिपेयर करने की व्यवस्था ही नहीं है और यदि कोई सामान रिपेयर करवा भी लिया जाए तो उसमें आने वाला खर्च, नए के दाम से ज्यादा आएगा। इसलिए यहाँ पर सब कुछ, व्यवहार करों और खराब होने पर फेंक दो के सिद्धांत पर चलता है। इसीलिए दामी से दामी चीजें भी, यहाँ जब खराब हो जाती है, तो लोग उसे अपने घर के पिछवाड़े ले जाकर रख देते हैं। कचरा ढोने वाली गाड़ी आती है तो वह दूसरे कचरों के साथ, उसे भी उठाकर ले जाती है। कारें जब पुरानी हो जाती है या उसमें टूटफूट बढ़ जाती है तो, यहाँ के लोग, उसे भी, कबाड़ी के यहाँ ले जाकर छोड़ आते हैं। कबाड़ी, कार की उस कबाड़ के लिए, लोगों को कुछ देता नहीं उल्टे वह उसे लेने के एवज में, उनसे हजार दो हजार डालर की राशि अलग से वसूल करता है। शहर के बाहर मुझे, ऐसी कारों के कई कबाड़खाने दिखे, जहाँ पर, काफी लंबी चौड़ी जगह में हजारों पुरानी कारें खड़ी की हुई थी।

डलास, अमरीका के दक्षिणी प्रांत, टेक्सास में पड़ता है। टेक्सास की जमीन पूरी तरह रीकड़ है, यहाँ पर बड़े पेड़ कहीं नहीं दिखाई पड़ते। यहाँ के जो भी पेड़ दिखते हैं, वे अपने यहाँ के बबूल के पेड़ की तरह छोटे और झाड़ीदार होते हैं। मैं समझता था कि जिस तरह अपने यहाँ के गाँव, शहरों से हटकर, एकदम अलग तरह के होते हैं, उसी तरह के गाँव, यहाँ पर भी होते होंगे लेकिन यहाँ के गाँवों के मकान भी शहरों के मकानों की तरह ही संभ्रांत, और सभी सुख सुविधाओं से लैस होते हैं। घरों के दरवाजों पर ट्रैक्टर तथा खेती और पशुपालन से संबंधित तमाम उपकरणों के साथ बड़ी छोटी कई कारें भी लोगों के दरवाजों पर खड़ी दिखाई पड़ती हैं। यहाँ के लोग, गाय, भेड़ और घोड़े पालते हैं। उनके चरने और घूमने के लिए वे मीलों लंबी चौड़ी जगह को तार की बाड़ से घेर कर उसी में अपने जानवर, चरने के लिए छोड़ देते हैं। बकरियाँ यहाँ देखने को नहीं मिलती। यहाँ के गाँव के लोग कारों की सवारी के साथ साथ घोड़ों की भी सवारी करते हैं।

अमरीका का क्षेत्रफल, भारत के कुल क्षेत्रफल से छ गुना बड़ा है और यहाँ की आबादी, भारत की आबादी के, दसवें हिस्से से भी कम की है। इसलिए, यहाँ पर जमीन की कोई कमी नहीं है। यहाँ के एकएक किसान के पास दस दस हजार एकड़ तक जमीन होती है। कोई कोई किसान शहर में नौकरी धंधा और रोजगार भी करते हैं और शनीचर इतवार की छुट्टी के दिन वे अपने फार्म पर जाते हैं और अपने खेत जोत बोकर, वापस लौट आते हैं। किसानों को यहाँ पर, खेती करने के लिए पानी, बिजली, खाद, बीज कीटनाशक तथा वैज्ञानिक सलाह, बहुत कम मूल्य पर, सरकार की तरफ से दी हुई होती है और उनकी उपज की, बाजार में अच्छी कीमत भी मिलती है, इसलिए, यहाँ के किसान, यहाँ के दूसरे तमाम बाशिंदों की तरह ही सम्पन्न और धनाढ्य होते हैं और पशुपालन से लेकर खेती तक सभी काम बड़ी पसंद से करते हैं।
(शेष अगले अंकों में जारी...)

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रचनाकार: सोमेश शेखर चन्द्र का यात्रा संस्मरण : एवरेस्ट का शीर्ष - 5
सोमेश शेखर चन्द्र का यात्रा संस्मरण : एवरेस्ट का शीर्ष - 5
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