शेर सिंह का आलेख : डीएनए फिंगर प्रिटिंग प्रौद्योगिकी के भारतीय प्रणेता

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आलेख भारत में डीएनए फिंगर प्रिटिंग प्रौद्योगिकी के प्रणेता - डॉ. लालजी सिंह 0 शेर सिंह वह एक विशिष्ट दि...



आलेख
भारत में डीएनए फिंगर प्रिटिंग प्रौद्योगिकी के प्रणेता - डॉ. लालजी सिंह 0 शेर सिंह


वह एक विशिष्ट दिन था , गुरूवार 5 अक्तूबर - 2007 और समय था पूर्वाह्न 11.30 से 1.00 बजे का । स्थान था , भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईसीटी), तारानाका, हैदराबाद - 500 707 । अवसर था भारत सरकार के राजभाषा विभाग, दक्षिण और दक्षिण - पश्चिम क्षेत्र बेंगलुरु और तिरूवनंतपुरम के क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा संयुक्त राजभाषा सम्मेलन । आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस तरह के सम्मेलनों, संगोष्ठियों और कार्यक्रमों में हिन्दी और हिन्दी संबंधी विषयों पर रटे रटाए, अनेकों बार दोहराए गए विषयों की पुनरावृत्ति और पिष्टपेषण के अतिरिक्त और क्या हो सकता है । पर कई मायनों में यह एक अनूठा ही सम्मेलन था । लीक से हट कर और बिल्कुल अलग किस्म का ! जिज्ञासा और ज्ञान से परिपूर्ण ! तो जिन विषयों, जिज्ञासा, ज्ञान, जानकारी और गौरव के क्षणों को याद करने का है , उसी संबंध में आप को भी कुछ उन सुखद क्षणों ,अनुभवों को महसूस करने की अनुभूति से परिचित कराना चाहूंगा ।

भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान के वातानुकूलित सभागार में सुई पटक की खामोशी व्याप्त थी । सभागार जिस में लगभग सात सौ लोगों को एक साथ बौठने की क्षमता है, खचाखच भरी हुई थी । जिन्हें बैठने के लिए जगह नहीं मिली थी, वे खड़े- खड़े ही सुन रहे थे । पूरे हॉल में रोशनी बंद कर दी गई थी । केवल स्टेज पर एक दुबले- पतले , औसत कद -काठी के साधारण कपड़ों में एक विख्यात व्यक्ति पावर प्वांइट के द्वारा स्क्रीन पर अपने विषय को जिस सहज भाषा, सरलता लेकिन अधिकारपूर्ण बता और समझा रहे थे, उस से सभा में उपस्थित सभी लोग जैसे अपने- आप को भूल से गए थे, और उन महान व्यक्तित्व के साथ बहे जा रहे थे । विषय भी उतना ही जटिल लेकिन रोचक, रोमांचक, जिज्ञासा से परिपूर्ण और नवीन जानकारी से भरा था । सम्मेलन राजभाषा हिन्दी का था, परन्तु इस सत्र का विषय विज्ञान था । और, विज्ञान का एक ऐसा विषय जो आज पूरी दुनिया में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुका है । आप भी सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या विषय था जिसे सब के सब मंत्रमुग्ध हो कर सुन रहे थे । दरअसल आज विज्ञान के इस अति विकसित युग में विशेषकर मानव संबंधों या यूं कहें जीव संबंधों , जीव विज्ञान के बारे में जितनी चर्चा और उत्सुकता होती है , उतनी संभवत: अन्य विषयों की नहीं ।

तो , विषय था डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी और उसे समझा रहे थे भारत के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विलक्षण प्रतिश्रभा के धनी और विख्यात वौज्ञानिक पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह । पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह सेंटर फॉर सेलुलर एण्ड मॉलीक्यूलर बॉयोलॉजी (सीसीएमबी ) संस्थान, में 1998 से निदेशक के पद पर कार्यरत हैं । वे भारत के डीएनए फिंगर प्रिंटिंग क्षेत्र के सर्वाधिक योग्य और पारंगत वैज्ञानिक हैं । भारत में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हैदराबाद सर्वाधिक प्रतिष्ठित और उच्च मानकों वाला केन्द्र है । अत्यंत सरल स्वभाव, मृदुभाषी लेकिन प्रखर बुद्धि के धनी पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह डीएनए के संबंध में अपने अनुभवों, घटनाओं और जीवनवृत्त के बारे में बता रहे थे । डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वे भारत के अकेले ऐसे वैज्ञानिक हैं , जिन्हें अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है और अपार ख्याति प्राप्त हुई है । पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह मूलत: उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिला के हैं । 1971 मंे उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से साइटोजेनेटिक्स (Cytogenetics) के क्षेत्र में पी-एच. डी. किया है । उन्हें अब तक जगदीश चन्द्र बोस अवॉर्ड सहित लगभग 22 विभिन्न उच्च एवं प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तथा अवॉर्ड प्राप्त हो चुके हैं । वर्ष 1997 में भारत सरकार ने उन की विशिष्ट उपलब्धियों के लिए उन्हें पद्म विभूषण अलंकरण से सम्मानित किया है ।

डॉ. सिंह विज्ञान जगत के संभवत: अत्यंत जटिल विषय डीएनए फिंगर प्रिंटिंग को बेहद सहजता से आम हिन्दी भाषा के माध्यम से समझा रहे थे । डॉ. सिंह ने शरीर रचना की सब से महत्वपूर्ण कड़ी डीएनए (Deoxyribo Nucleic Acid) यानी सरल भाषा में कहें तो , जीन , अनुवांशिकी के बारे बता रहे थे कि कैसे इस की सहायता से संसार में कहीं भी , किसी एक व्यक्ति की कितनी आसानी से पहचान की जा सकती है । भले ही इस का प्रयोग अपराध जगत में तथ्यों को प्रमाणित करने से संबंधित हो अथवा पशुओं की किसी विशेष प्रजाति के संरक्षण से हो या फिर अरबों वर्ष पहले लुप्तप्राय: हो चुके मानव तथा पशुओं के विषय में पता लगाने के बारे में हो ।

यदि गहराई से सोचा और देखा जाए तो पूरे विश्व में आज आर्थिक क्षेत्र से अधिक अन्य कोई दूसरा क्षेत्र महत्वपूर्ण नहीं रह गया है । आज विश्व में प्रत्येक व्यक्ति केवल और केवल अधिक से अधिक धन कमाना चाहता है । सब से अधिक धनवान बनना चाहता है । एक मात्र लक्ष्य जिस तरह से भी हो सके धन कमाना, जीवन को रंगीन बनाना और खुशहाल जीवन जीना मात्र लगता है । यही आज के समय का प्रमुख उद्देश्य रह गया लगता है । रीति -नीति ,मान -अपमान ,नैतिकता - बौद्धिकता आदि एक तरह से पीछे रह गए हैं । जो व्यक्ति नैतिकता को अपनाता है, रीति-नीति को मानता है, मान- सम्मान का ध्यान रखता है, वह व्यक्ति शायद ही आसानी से और ईमानदारी के बल पर धन कमा सके या धनवान बन सके ! ऐसा व्यक्ति संभवत: अपने स्वभाव , अपनी नैतिकता के कारण अच्छा और सफल जीवन जी तो सकता है । लेकिन, वह आर्थिक तौर पर उतना ऊपर नहीं उठ सकता है, जितना नैतिकता को ताक पर रख कर , छल -कपट और कर चोरी आदि के द्वारा धनवान बनते हैं । धन के प्रति अत्यधिक महत्वाकांक्षी ऐसे लोग अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं और कुछ भी कर और करवा सकते हैं । इस तरह की मानसिकता से अपराध का जन्म होता है, और अपराधी किसी भी प्रकार का काम कर सकता है । किसी को भी मौत के घाट उतार सकता है । किसी भी असहाय की भावनाओं से खिलवाड़ कर अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है ।


इस प्रकार के अपराधों को करने के पीछे , चाहे वे राजनीतिक हो, सामाजिक या आर्थिक हों, उन कारणों आदि के संबंध में तथ्य जुटाना या किये गए अपराध को सिद्ध करने के लिए डीएनए टेस्ट करना अब आम हो गए हैं । डॉ. सिंह इस जटिल विषय को जिस सहजता से समझा और बता रहे थे, लगता था सभागार में उपस्थित सभी जन जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए हों । वे बता रहे थे कि डीएनए फिंगर प्रिंटिंग पहली बार 1985 में ब्रिटेन के डॉ. अलेक जैफरी ने शुरू की थी । डीएनए फिंगर प्रिंटिंग की खोज वर्ष 1985 में ब्रिटेन में स्थित लिस्सिटर विश्वविद्यालय में डॉ. अलेक जौफरी ने ही की थी । उस के पश्चात 1988-89 में डॉ. लालजी सिंह द्वारा भारत में प्रारंभ किया गया । डॉ. सिंह अपनी इस विलक्षण खोज के बारे बता रहे थे कि उन्हें अपनी इस उपलब्धि के लिए किस प्रकार न्यायालय के कटघरे में खड़े किये गए थे । 1985 में केरल राज्य के त्रिची में किसी व्यक्ति ने अपनी प्रेमिका से बिना शादी के शारीरिक संबंध स्थापित कर लिए थे । युवती गर्ववती हुई और शादी के लिए आग्रह करने लगी । लेकिन युवक के परिजनों और संबंधियों ने युवक पर दबाव डाला और उस ने कह दिया कि युवती के पेट में पल रहा बच्चा उस का नहीं है । युवती अपनी बात, वास्तविकता को कैसे सिद्ध , यह बहुत कठिन था । उन्हीं दिनों पत्र-पत्रिकाओं में ब्रिटेन में डॉ. अलेक जैफरी द्वारा डीएनए टेस्ट और हैदराबाद में डॉ. लालजी सिंह द्वारा डीएनए फिंगर प्रिंटिंग में उपलब्धि के बारे समाचार पत्रों , पत्रिकाओं में पढ़ने के पश्चात उस युवती के वकील ने डॉ. लालजी सिंह द्वारा युवक , युवती और अजन्मे बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने के लिए कोर्ट से अनुरोध किया । और, इस प्रकार भारत में डीएनए टेस्ट कराने के लिए केरल राज्य के त्रिची के एक कोर्ट ने अनुमति दी और डॉ. लालजी सिंह यह सिद्ध करने में सफल रहे कि युवती के पेट में पलने वाला बच्चा विवादित युवक का ही है । कोर्ट ने इस तथ्य को माना और युवती के पक्ष में अपना फैसला सुनाया । भारत में किसी भी न्यायालय द्वारा डीएनए टेस्ट के तथ्यों के आधार पर सुनाए जाने वाले फैसले का यह पहला मामला था । भारतीय कानून व्यवस्था में ऐसा पहली बार हुआ जब कोई प्रावधान ऐवीडेंस एक्ट में न होते हुए भी एक वौज्ञानिक के शोध के आधार को मान कर सजा सुनाई हो ।

अब तो हर बात के लिए डीएनए टेस्ट किया जाता है जिस से सच्चाई सिद्ध हो सके । पूर्व प्रधान मंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या के पश्चात उन के अंग क्षत विक्षत हो कर इधर - उधर बिखर गए थे । डॉ. सिंह द्वारा उन बिखरे अंगों का डीएनए परीक्षण करने के पश्चात उन्हें एकत्रित कर उन का अंतिम संस्कार किया जा सका था । डॉ. सिंह अब तक लगभग तीन सौ मामलों में डीएनए से संबंधित साक्ष्य दे चुके हैं । जिन में राजीव गांधी हत्याकांड , नौना साहनी (तंदूर मामला ), पंजाब के पूर्व मुख्य मंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह हत्या, स्वामी प्रेमानंद मामला और मधुमिता शुक्ला हत्याकांड से संबंधित मामले शामिल हैं ।

पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह अपने विभिन्न अनुभवों, दृष्टांतों को जिस सहजता और बारीकी से बता रहे थे, उसी से समस्त हाल में सुई पटक की खामोशी व्याप्त थी ।

डॉ. लालजी सिंह और उन के सहयोगियों ने हाल ही में एक ऐसे डीएनए फिंगर प्रिंटिग टेक्नोलॉजी का विकास किया है जिस में लहू की एक बूंद या मांस के एक छोटे से टुकड़े से यह पता लगाया जा सकेगा कि यह मानव का है या पशु का । यदि पशु का है, तो कौन सी प्रजाति के पशु का ? यह जान लेना और स्पष्ट करना अब सहज हो गया है ।

पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह से मुझे दो बार उन से मिलने, उन के संपर्क में आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । पहली बार 5 अक्तूबर 2007 को दक्षिण क्षेत्र राजभाषा सम्मेलन में और दूसरी बार 28 अक्तूबर 2007 को हैदराबाद में ही रचनात्मक साहित्यिक एवं शैक्षणिक परिषद हैदराबाद द्वारा तेलुगु विश्वविद्यालय में राष्ट्र भारती पुरस्कार समारोह में उन के करकमलों द्वारा मुझे राष्ट्र भारती अवार्ड प्रदान किया गया । पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह जितने महान वैज्ञानिक हैं, उतना ही अधिक उन का सादगीपूर्ण जीवन लेकिन प्रभावशाली व्यक्तित्व है ।

मैंने 1985 में रांची में एचईसी यानी हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन के सौजन्य से आयोजित राजभाषा सम्मेलन में पहली बार भाग लिया था । तब से ले कर आज तक कितने ही सम्मेलनों, संगोष्ठियों , कार्यशालाओं, बैठकों आदि में देश के विभिन्न भागों में जा कर शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ है । लेकिन वे सम्मेलन, वे आयोजन केवल ढिंढोरा पीटने जैसे ही थे । विषयों का पिष्टपेषण और उबाऊ कार्यक्रम, उबाऊ विषय । लेकिन इस सम्मेलन में सचमुच कुछ हट कर था । अभिरूचि और भाषा, विज्ञान और जीवन के अंतरसंबंधों के बारे में भाषाविदों को
वौज्ञानिकों से रू-ब-रू हो कर वैज्ञानिकों को जानने का अवसर प्रदान किया गया था ।
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रचनाकार: शेर सिंह का आलेख : डीएनए फिंगर प्रिटिंग प्रौद्योगिकी के भारतीय प्रणेता
शेर सिंह का आलेख : डीएनए फिंगर प्रिटिंग प्रौद्योगिकी के भारतीय प्रणेता
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