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सीमा गुप्ता की दर्जन भर प्रेम कविताएँ

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कविताएँ   - सीमा गुप्ता   "फर्जे-इश्क" बेजुबानी को मिले कुछ अल्फाज भी अगर होते पूछते कटती है क्यूँ आँखों ही आँखों ...

कविताएँ

 
- सीमा गुप्ता

 

"फर्जे-इश्क"

बेजुबानी को मिले कुछ अल्फाज भी अगर होते

पूछते कटती है क्यूँ आँखों ही आँखों मे सारी रात ..,

सनम-बावफा का क्या है अब तकाजा मुझसे ,

अपना ही साया है देखो लिए पत्थर दोनों हाथ ....

पेशे-नजर रहा महबूब-ऐ-ख्याल गोश-ऐ-तन्हाई मे,

आईना क्यूँ कर है लड़े फ़िर मुझसे ले के तेरी बात...

दिले-बेताब को बख्श दे अब तो सुकून-ऐ-सुबह,

दर्दे-फिराक ने अदा किया है फर्जे-इश्क सारी रात...

(सनम-बावफा - सच्चा-प्रेमी )

(पेशे-नजर - आँखों के सामने)

(गोश-ऐ-तन्हाई -एकांत)

(दर्दे-फिराक -विरह का दर्द)

(फर्जे-इश्क - प्रेम का कर्तव्य)

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'झूमती कविता'

बड़ी झूमती कविता मेरे आगोश में आयी है,

शायद तेरे साए से यह धूप चुरा लाई है..

हम तेरे तसव्वुर में दिन रात ही रहते हैं,

कातिल है अदाएं तेरी कातिल ये अंगडाई है..

सूरज जो उगा दिल का, दिन मुझमें उतर आया,

तुम साथ ही थे लेकिन देखा मेरी परछाईं है..

साथ मेरे रहने है कोई चला आया ,

तन्हा कहाँ अब हम पास दिलकश तन्हाई है..

खामोशी से सहना है तूफ़ान जो चला आया,

दिल टूटा अगर टूटा , कहने मे रुसवाई है..

अब रात का अंधियारा छाने को उभर आया,

एहसास हुआ पुरवा तुमेह वापस ले आयी है

-----

'तेरा आना और लौट जाना'

दो लफ्जों मे वो तेरा मुझे चाहना ,

गुजरते लम्हों मे मुझे ही दोहराना...

आँखों के कोरों मे दबा छुपा के जो रखे,

उन अश्कों मे अपनी पलकों को भिगो जाना...

रूह का एहसास था या सपने का भ्रम कोई ,

नीदों मे मुझे चुपके से अधरों से छु जाना...

सच के धरातल का मौन टुटा तो समझा...

शून्य था तेरा आना "और"

एक सवाल यूँ ही लौट जाना...

"दिल"

मुहब्बत से रहता है सरशार ये दिल,

सुबह शाम करता है बस प्यार ये दिल.

कहाँ खो गया ख़ुद को अब ढूँढता है,

कहीं भी नहीं उसके आसार-ऐ-दिल.

अजब कर दिया है मोहब्बत ने जादू,

सभी डाल बैठा है हथियार ये दिल.

यही कह रहा है हर बार ये दिल,

बस प्यार-ऐ-दिल बस प्यार-ये दिल.

युगों से तड़पता है उसके लिये ही,

मुहब्बत में जिसकी है बीमार ये दिल

उसकी है यादों में खोया हुआ वो,

ज़रा सोचो है कितना बेकरार ये दिल.

अब अपने खतों में यही लिख रहा है,

तुम्हारा बस तुम्हारा कर्जदार ये दिल

-----

"वीरानों में"

खामोश से वीरानो मे,

साया पनाह ढूंढा करे,

गुमसुम सी राह न जाने,

किन कदमो का निशां ढूंढा करे..........

लम्हा लम्हा परेशान,

दर्द की झनझनाहट से,

आसरा किसकी गर्म हथेली का,

रूह बेजां ढूंढा करे..........

सिमटी सकुचाई सी रात,

जख्म लिए दोनों हाथ,

दर्द-ऐ-जीगर सजाने को,

किसका मकां ढूंढा करें ...........

सहम के जर्द हुई जाती ,

गोया सिहरन की भी रगें ,

थरथराते जिस्म मे गुनगुनाहट,

सांसें बेजुबां ढूंढा करें................

----

"तुम्हारी बाट मे"

अंधियारे की चादर पे,

छिटकी कोरी चांदनी ..

सन्नाटे मे दिल की धडकन ,

मर्म मे डूबे सितारों का

न्रत्य और ग़ज़ल...

झुलसती ख्वाइशों की

मुंदती हुई पलक ..

मोहब्बत की सांसों की,

आखरी नाकाम हलचल..

पिघलते ह्रदय का

करुण खामोश रुदन..

ये सब तुम्हारी बाट मे,

इक हिचकी बन अटके हैं..

अगर एक पल को तुम आते

इन सब को सांसों के कर्ज से...

निज़ात दिला जाते...

----

"दर्द का वादा"

जिंदगी का ना जाने मुझसे और तकाजा क्या है ,

इसके दामन से मेरे दर्द का और वादा क्या है ?

एहसान तेरा है की दुःख दर्द का सैलाब दिया ,

मेरी आँखों को तुने आंसुओं से तार दिया..

एक बार भी न समझा मुझे भाता क्या है?

छीन कर बैठ गयी मेरी मोहब्बत को कभी,

जब भी मिली एक नयी चाल मेरे साथ चली,

मेरी तकदीर से अब तेरा इरादा क्या है?

जब भी मिलती है कहीं रूठ के चल देती है,

मेरे दिल को तू फिर एक बार मसल देती है

हैरान हूँ मुकदर को मेरे तराशा क्या है ?

कौन सी खताओं की मुझे रोज सजा देती है,

मुश्किलें डाल के बस मौत का पता देती है ...

तेरा अब मेरी वफाओं मे और इजाफा क्या है ?

जिंदगी का ना जाने मुझसे और तकाजा क्या है ,

इसके दामन से मेरे दर्द का और वादा क्या है?

----

"साथ"

बस एक तेरे "साथ" की प्यासी मेरे तन्हाई है,

मेरे इन निगाहों मे सिर्फ़ तेरे इंतजार की परछाई है.

चांदनी कहाँ मिलती है, वो भी अंधेरों मे समाई है,

रोशनी के लिए हमने ख़ुद अपनी ही ऑंखें जलाई हैं.

करवट- करवट रात ने हर तरफ उदासी फेलाई है,

ऐसे मे ना जिन्दगी करीब है, ना हमें मौत ही आयी है.

तेरे प्यार की तलब ही इस दिल के गहराई है,

मने आंसुओं के सैलाब मे अपनी हर आस बहाई है.

हवा की सरसराहट से भी लगे तेरी ही आहट आयी है,

इस एक उम्मीद मे हमने जाने कितनी सदीयाँ बिताई हैं.

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"याद किया तुमने या नही "

यूँ ही बेवजह किसी से, करते हुए बातें,

यूँ ही पगडंडियो पर सुबह-शाम आते जाते

कभी चलते चलते रुकते, संभलते डगमगाते.

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

सुलझाते हुए अपनी उलझी हुई लटों को

फैलाते हुए सुबह बिस्तर की सिलवटों को

सुनकर के स्थिर करतीं दरवाजी आहटों को

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

बाहों कर करके घेरा,चौखट से सर टिकाके

और भूल करके दुनियाँ सांसों को भी भुलाके

खोकर कहीं क्षितिज में जलधार दो बुलाके

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ.

सीढ़ी से तुम उतरते , या चढ़ते हुए पलों में

देखुंगी छत से उसको,खोकर के अटकलों में

कभी दूर तक उड़ाकर नज़रों को जंगलों में

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

बारिश में भीगते तो, कभी धूप गुनगुनाते

कभी आंसुओं का सागर कभी हँसते-खिलखिलाते

कभी खुद से शर्म करते कभी आइने से बातें

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

तुमसे दूर मैने, ऐसे हैं पल गुजारे .

धारा बिना हों जैसे नदिया के बस किनारे..

बिन पत्तियों की साखा बिन चाँद के सितारे..

बेबसी के इन पलों में...

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ....

-----

"कभी आ कर रुला जाते"

दिल की उजड़ी हुई बस्ती,कभी आ कर बसा जाते

कुछ बेचैन मेरी हस्ती , कभी आ कर बहला जाते...

युगों का फासला झेला , ऐसे एक उम्मीद को लेकर ,

रात भर आँखें हैं जगती . कभी आ कर सुला जाते ....

दुनिया के सितम ऐसे , उस पर मंजिल नही कोई ,

ख़ुद की बेहाली पे तरसती , कभी आ कर सजा जाते ...

तेरी यादों की खामोशी , और ये बेजार मेरा दामन,

बेजुबानी है मुझको डसती , कभी आ कर बुला जाते...

वीराना, मीलों भर सुखा , मेरी पलकों मे बसता है ,

बनजर हो के राह तकती , कभी आ कर रुला जाते.........

----

"तलब"

ख़ुद को आजमाने की एक ललक है ,

एक ग़ज़ल तुझ पे बनाने की तलब है...

लफ्ज को फ़िर आसुओं मे भिगो कर,

तेरे दामन पे बिछाने की तलब है ...

आज फ़िर बन के लहू का एक कतरा,

तेरी रगों मे दौड़ जाने की तलब है ...

अपने दिल-ऐ-दीमाग से तुझ को भुलाकर,

दीवानावार तुझको याद आने की तलब है...

दम जो निकले तो वो मंजर तू भी देखे,

रुखसती मे तुझसे नजर मिलाने की तलब है...

-----

"खामोश सी रात"

सांवली कुछ खामोश सी रात,

सन्नाटे की चादर मे लिपटी,

उनींदी आँखों मे कुछ साये लिए,

ये कैसी शिरकत किए चली जाती है....

बिखरे पलों की सरगोशियाँ ,

तनहाई मे एक शोर की तरह,

करवट करवट दर्द दिए चली जाती है....

कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,

सूखे अधरों पे मचल कर,

लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...

सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...

----

"तेरी याद में"

तेरी ग़ज़लों को पढ़ रहा हूँ मैं ,

और तेरी याद में शिद्दत है बहुत

जैसे तुझसे ही मिल रहा हूँ मैं,

और तेरे प्यार में राहत है बहुत

वो तेरे वस्ल का दिन याद आया,

मुझ पे अल्लाह की रहमत है बहुत

तुझसे मिलने को तरसता हूँ मैं,

मेरी जान तुझ से मुहब्बत है बहुत

तेरे अंदाज़ में ख़ुद को देखा,

हाँ तुझे मेरी ही चाहत है बहुत

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" मैं ढूंढ लाता हूँ"

अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....

जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ"

किसी बस्ती की गलियों में किसी सहरा के आँगन में ...

तुम्हारी खुशबुएँ फैली जहाँ भी हों मैं जाता हूँ

तुम्हारे प्यार की परछाइयों में रुक के जो ठहरे ............

सफर मैं जिंदिगी का ऐसे ख्वाबों से सजाता हूँ

तुम्हारी आरजू ने दर बदर भटका दिया मुझको ............

तुम्हारी जुस्तुजू से अपनी दुनिया को बसाता हूँ

कभी दरया के साहिल पे कभी मोजों की मंजिल पे........

तुम्हें मैं ढूँडने हर हर जगह अपने को पाता हूँ

हवा के दोष पर हो कि पानी की रवानी पे .............

तुम्हारी याद में मैं अपनी हस्ती को भुलाता हूँ

मुझे अब यूँ ने तड़पाओ चली आओ चली आओ ......

चली आओ चली आओ चली आओ चली आओ

अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....

जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ"...........

----

'तुम्हारा है "

जो भी है वो तुम्हारा ...

यह दर्द कसक दीवानापन ...

यह रोज़ की बेचैनी उलझन ,

यह दुनिया से उकताया हुआ मन...

यह जागती आँखें रातों में,

तनहाई में मचलना और तड़पन ..........

ये आंसू और बेचैन सा तन ,

सीने की दुखन आँखों की जलन ,

विरह के गीत ग़ज़ल यह भजन,

सब कुछ तो मेरे जीने का सहारा है ........

जो भी है वो तुम्हारा है

---------

प्यार 'बेपनाह "

ज़िंदगी भर गुनाह करते रहे

हम जो उनसे निबाह करते रहे

बेवफाई की चोट खाई थी

जिन्दिगी को तबाह करते रहे

कौन था रास्ता जो दिखलाता

हम अंधेरों में राह करते रहे

तुमको दुल्हन बना के ख्वाबों में

रोज़ तुमसे निकाह करते रहे

जानी मालूम है की हम प्यार थे

तुमसे बेपनाह करते रहे.........

--

सीमा गुप्ता की अन्य रचनाएँ यहाँ पढ़ें:

http://kyakhun.blogspot.com/

http://mairebhavnayen.blogspot.com/

http://bikhreyseafsaney.blogspot.com/

http://loveneverloves.blogspot.com/

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 7
  1. स्वागत है ! कितना पूरसकूं है रचनाकार का यह पहला दीवान ! सीमा गुप्ता का सृजन कर्म दरअसल श्रृंगार के वियोग पक्ष की अगुयायी करता हुआ एक कालजयी दस्तावेज बन कर मन में गहरे पैठ जाता है .इसमें अहसासों की गहराई है और एक ऐसा अंदाजे बयाँ कि कोई भी इन्हे पढ़कर अकस्मात आह और वाह कहने से ख़ुद को रोक नही पाता ! यह पोएट्री ब्लॉग जगत की अमूल्य निधि है और रचनाकार ने इन्हे स्थान देकर श्रेष्ठ रचनाओं के प्रति समर्पण की अपनी प्रतिबद्धता पर ही मुहर लगाई है !

    जवाब देंहटाएं
  2. Respected Ravi jee, it is my pleasure to be part of Rachnakar blog. I am honourd to get precious place on this prestigeous blog. I hav no words to express my feelings. Once again thanks a lot and lot. With Regards

    जवाब देंहटाएं
  3. @ Arvind jee your words are always a motivating factor for me. They are like gems for me which boost my moral always. I am obliged to read your above coments and wish ur blessings will always show me the right path. With regards

    जवाब देंहटाएं
  4. बेनामी10:55 pm

    kuch anubhav bhi likhe.

    जवाब देंहटाएं
  5. Seemaajee ke vishay men arvind jee ekdam baja farma gaye hain jee. Bahut oonchee baat ko kah rahi hain Seemajee. Aur unka koyee sani nahin hai. Seemajee ek dharohar ban chukee hain blogjagat kee. Inkee taareef men alfaaz kam padne lage hain jee. Bahut khoob peshkash. kya kahna !

    जवाब देंहटाएं
  6. इन छंदों को नौका मानकर हिन्दी साहित्य के कवि छंदों की कसौटी को पार करेंगे; ऐसी मेरी अभिलाषा है!!

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: सीमा गुप्ता की दर्जन भर प्रेम कविताएँ
सीमा गुप्ता की दर्जन भर प्रेम कविताएँ
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