सुनीता शर्मा की पुस्तक समीक्षा : हिंदी कहानी कोश

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गवेषणात्‍मक एवं विश्‍लेषणात्‍मक प्रतिभा की पहचान : हिन्‍दी कहानी कोश डॉ. सुनीता शर्मा कृति - हिन्‍दी कहानी कोश लेखिका - डॉ. मधु सं...

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गवेषणात्‍मक एवं विश्‍लेषणात्‍मक प्रतिभा की पहचान :

हिन्‍दी कहानी कोश

डॉ. सुनीता शर्मा

कृति - हिन्‍दी कहानी कोश

लेखिका - डॉ. मधु संधु

प्रकाशक - नेशनल पब्‍लिशिंग हाऊस, दिल्‍ली

पृष्‍ठ - 226 मूल्‍य - 350 रु.

कोश - रचना एक ऐसी कला है जिसके द्वारा कोशकार के परिश्रम, धैर्य एव रुचि का दिग्‍दर्शन होता है । कलात्‍मक दृष्‍टि और वैज्ञानिक बुद्धि का समन्‍वित रूप कोश निर्माण का प्रथम चरण है जबकि किसी क्षेत्र विशेष की आवश्‍यकता पूर्ति इसके निर्माण का प्रेरक कारण बनता है । ‘निघण्‍टु' से आरम्‍भ हुई कोशकारिता की यात्रा संस्‍कृत तथा अपभ्रंश से विभिन्‍न पड़ाव तय करती हुई हिन्‍दी में पदार्पण करती है । ‘खालिकबारी' तथा ‘नाममाला' यद्यपि हिन्‍दी कोश - रचना के प्रारम्‍भिक कोश है तो ‘भारतीय संस्‍कृति कोश', ‘समांतर कोश' आदि इसके आधुनिकतम रूप हैं । कोश के स्‍वरूपगत महत्‍व को देखकर ‘शब्‍दकोश' तथा ‘विश्‍वकोश' को आधुनिक युग के सूचना - प्रौद्यौगिकी के ‘महाकम्‍प्‍यूटर' की संज्ञा दी गई है।

साहित्‍य के क्षेत्र में विविधमुखी प्रयास होने के कारण कोशकारों का ध्‍यान विधापरक कोश-निर्माण की ओर भी गया पर बड़ी अल्‍पमात्रा में विधापरक कोश अभी तक उपलब्‍ध हो पाये हैं जिनमें दशरथ ओझा का ‘नाटक - कोश' गोपालराय का ‘उपन्‍यास कोश' का नाम लिया जा सकता है । इसी कोशकारी की यात्रा में एक नया नाम दर्ज हुआ है - ‘डॉ. मधु संधु' का । कोश जगत्‌ में इनकी सद्यः प्रकाशित रचना ‘हिन्‍दी कहानी कोश' नेशनल पब्‍लिशिंग हाऊस दिल्‍ली के सौजन्‍य से हिन्‍दी साहित्‍य को प्राप्‍त हुई है । इससे पूर्व इनका एक कहानी - कोश सन्‌ 1992 में भारतीय ग्रंथम से भी प्रकाशित हो चुका है । एक कहानीकार, आलोचक और अध्‍यापक का अकस्‍मात्‌ एक कोशकार के रूप में उपस्‍थित हो जाना एक आश्‍चर्यजनक आह्लाद है। डॉ. मधु संधु एक कहानीकार के रूप में प्रख्‍यात हैं और कहानी जगत्‌ का विस्‍तृत फलक जो उनके भीतर समाहित था उसी ने उन्‍हें कहानीकार से कोशकार बना दिया और वह व्‍यक्‍ति से संस्‍था बन गईं ।

प्रस्‍तुत कहानी कोश दस वर्षों की (1991-2000) अवधि को समेटे हुए है । इन दस वर्षों में प्रकाशित होने वाली कहानियों, कहानी संग्रहों एवं कहानी संकलनों में से छः सौ कहानियों को इस कोश में स्‍थान मिला है । कोश के लिए कहानियों का चयन लेखिका के गम्‍भीरतापूर्ण चयन की बानगी प्रस्‍तुत करता है । लेखकों की ख्‍याति और कथ्‍य की उत्‍कृष्‍टता चयन कसौटी कहे जा सकते हैं । इस कोश की पूर्णता हेतु जहां लेखिका ने विभिन्‍न कहानी संग्रहों एवं कहानी संकलनों को आधार बनाया वहीं ‘हंस', ‘हरिगंधा', ‘कथन', ‘कहानीकार', ‘कथादेश', ‘वर्तमान साहित्‍य', ‘इन्‍द्रप्रस्‍थ भारती', ‘इंडिया टूडे', ‘साक्षात्‍कार', ‘संचेतना' जैसी पत्रिकाएं एवं ‘जनवाणी', ‘जनसत्ता' आदि पत्रा भी उनकी पारखी दृष्‍टि के केन्‍द्र में रहे हैं ।

इस कहानी-कोश की कहानियों में पाठक को जहां अपने स्‍वानुभूत अतीत की झलक मिलती है वहीं उसका वर्तमान भी उसके सम्‍मुख कई प्रश्‍न लेकर उपस्‍थित मिलता है । इस कोश की कहानियों की धुरी में मध्‍यवर्गीय समाज है । इन कहानियों में मध्‍यवर्गीय परिवार की छोटी - छोटी आवश्‍यकताओं पर त्रासदियों का छाया इस प्रकार बढ़ते हुए दिखाया है कि चाहकर भी परिवारजन सामाजिक और पारिवारिक संबंधों का निर्वहन प्रसन्‍नतापूर्वक नहीं कर पाते । इन कहानियों में जहाँ श्रमिकों की साधना को दर्शाकर श्रम के महत्व पर प्रकाश डाला है तो दूसरी ओर दिनरात परिश्रम करने वाले खदानों के श्रमिक मल्‍लकटों और उनके परिवार के दर्दनाक जीवन के चित्र मिलते हैं । रोटी, कपड़ा और मकान हमारी मूलभूत आवश्‍यकताएं हैं। रोटी से जूझते हुए इस मध्‍यवर्गीय समाज में मकान एक स्‍वप्‍न बनकर रह गया है। मानव की इस इच्‍छापूर्ति के लिए कई बैंकों और कंपनियों ने सहायतार्थ आगे हाथ बढ़ाए हैं । इस कोश में ऐसी कहानियों को भी स्‍थान दिया गया है जिन्‍हें पढ़कर पाठक घर के लिए लोन देने वाली कंपनियों तथा एसोशिएसन्‍ज की धांधलियों से परिचित होता है । जैसे अलका सारावगी की ‘दूसरे किले में औरत' कहानी । न केवल कंपनियां अपितु आज अस्‍पताल भी मध्‍यवर्ग को लूट रहे हैं । धीरेन्‍द्र वर्मा की ‘दुक्‍खम्‌ शरणम्‌ गच्‍छामि' कहानी इन संस्‍थानों की व्‍यापारी वृत्ति की मुँह बोलती तस्‍वीर है ।

बेरोज़गारी से जूझता हमारा मध्‍यवर्ग इस ताक में रहता है कि किसी तरह सिफारिश या रिश्‍वत के बल पर एक बार रोजगार मिल जाए फिर आराम से इन्‍हीं लोगों का खून चूसेंगे । सुमन मेहरोत्रा की ‘बस हुकुम बजाते हैं' कहानी में जल्‍लाद के उपेक्षित और घृणित जीवन पर प्रकाश डाला है फिर भी इस काम के लिए इतनी होड़ है कि जल्‍लादी के लिए भी सिफारिश की ज़रूरत है । इन कहानियों में जहां एक ओर बेरोज़गारी का संताप है तो दूसरी ओर नौकरीपेशा के संताप भी पाठक को उद्वेलित करते हैं । कोश में नमिता सिंह की ‘नतीजा' कहानी नौकरी की हृदयहीनता को उघाड़ती है । साक्षात्‍कार की धांधलियों पर भी कुछ कहानियां इस कोश में सम्‍मिलित की गई हैं ।

भिखारी भारतीय समाज का वीभत्‍स चित्र प्रस्‍तुत करते हैं पर यह भिखारी समाज की सहानुभूति पाकर आराम और ऐश का जीवन गुजार रहे हैं । सैली बलजीत की कहानी ‘दौड़' कोश में स्‍थान पाने वाली ऐसी कहानी है जिसमें भिखारी लोगों की सहानुभूति पाने के लिए कभी अंधा, कभी लंगड़ा और कभी कोढ़ी बनकर भीख मांगता है और फिर उन्‍हीं पैसों से शराब, मीट तथा खाने का प्रबंध कर आराम का जीवन जीता है ।

इस मध्‍यवर्गीय समाज को जहां कई समस्‍याएं त्रस्‍त किए हुए हैं वहीं बार - बार होने वाले दंगों का आतंक समाज में इस प्रकार व्‍याप्‍त है कि साधारण व्‍यक्‍ति भी हर स्‍थान पर अपने आपको असुरक्षित अनुभव करता है । अग्‍निशेखर की ‘बोझ' कश्‍मीरी आतंकवाद के साये में सहमे कश्‍मीरियों की गाथा है तो विनोदशाही की ‘ब्‍लैक आउट' भारत-पाक युद्ध की भयावह स्‍थिति व्‍यक्‍त करती है । इन दंगों की आड़ में बदमाशों की स्‍वार्थपूर्ति पर भी प्रकाश डाला जाता है । नमिता सिंह की ‘मूषक' कहानी इन दंगों से त्रस्‍त व्‍यक्‍ति के मन की मलिनता तथा अपमान और भय को चित्रित करती है ।

भारतीय शिक्षातंत्र की न्‍यूनताओं को सम्‍मुख रखते हुए इस पर आधारित कुछ कहानियां इस कोश में स्‍थान पा सकी हैं । उर्मिला शिरीष की ‘दाखिला' कहानी शिक्षातंत्र में समाई विकृतियों पर प्रकाश डालती हैं । इन विकारों को दूर करने के लिए सरकार समय-समय पर योजनाएं बनाती है पर वे कागज़ों में जितनी प्रभावी दिखाई देती हैं व्‍यावहारिक रूप में उतनी प्रभावशाली नहीं हैं । प्रौढ़ शिक्षा के प्रति सरकार की योजनाएं और लोगों की अरुचि के माध्‍यम से सरकार की दम तोड़ती नीतियों को दर्शाया गया है । हमारे समाज में नवयुवक जब शिक्षा प्राप्‍ति के पश्‍चात्‌ भी जब रोजगार नहीं पाते तो आजीविका की तलाश में भारत का प्रतिभाशाली वर्ग विदेशों में प्रवासी बनता जा रहा है । ऐसी कहानियों का उद्देश्‍य सरकार को इसके दायित्‍व का एहसास करवाना है ।

नारी इस समाज का अभिन्‍न अंग है । वर्तमान में जहां हमारा समाज स्‍वयं को आधुनिक और स्‍त्री समर्थक के रूप में ‘एक्‍सपोज' कर रहा है वहीं इसी समाज में ऐसी स्‍थितियां उभर कर सामने आती हैं जिनमें इस माडर्न कहलाने वाले समाज में स्‍त्री किसी गुलाम से कम नहीं लगती । कोश की इन कहानियों में कहीं पति और सास का शोषण सहती बहु है तो कहीं संबंधों की मार झेलती विवश नारी । इस आधुनिक कहलाने वाले माडर्न समाज में अमानुषिक व्‍यवहार को सहती विधवा है तो कहीं बाप की हवस का शिकार हुई मज़बूर बेटी । कहीं ब्राह्मणों के शोषण का शिकार हुई चमारिनें हैं तो कहीं सभ्रांत पुरुषों के शौक पूरा करने वाली कालगर्ल । कोश में संकलित कहानियों को पढ़ कर पता चलता है जहां आदर्श पतिव्रता अपने घर - परिवार पर मर मिटती हैं तो वही आधुनिक कहलाने वाली यह नारी संबंधों में आने वाली उदासीनता के कारण कालगर्ल बन जाती है। ‘टूटी हुई डार' (गुरबचन सिंह) कहानी में जहां पारिवारिक विवशता के कारण उसे मज़दूरिन से वेश्‍यावृत्ति के धंधे में लगा दिया जाता है तो जया जादवानी की ‘बाज़ार' में नारी को हुस्‍न के बाज़ार की ऐसी वस्‍तु के रूप में सजा दिया जाता है जिसकी खरीदफरोख्‍़त करने के लिए संभ्रांत पुरुष भी लालायित रहते हैं । प्रस्‍तुत कोश में कोशकारा ने ऐसी कहानियों को भी स्‍थान दिया है जिनमें आधुनिक नारी इस समाज में उसके साथ होने वाले शोषण के प्रति परचम लहराती हुई नारी चेतना की उद्‌घोषण करती है । इन कहानियों की नायिकाएं उन्‍मुक्‍त जीवन को महत्‍व देती हैं, कामकाजी होने के कारण संबंधों की अपनी परिभाषा गढ़ती हुई नये धरातल कायम करती हैं । विधवा भी अपने बदले हुए रूप में सधवा के समान सम्‍मान प्राप्‍त करती है । प्राचीन रूढ़ियों को तोड़कर नारी अपने अधिकारों का हनन नहीं होने देती ।

इस कोश में लेखिका ने ऐसी कहानियों को भी स्‍थान दिया है जिनमें महानगरीय जीवन - बिडंबना तथा शुष्‍क और संवेदनाशून्‍य मानवीय संबंधों का यथार्थाकंन है । महानगरों का छद्म, वाहनों की भरमार तथा एक दूसरे को सीढ़ी बनाकर आगे निकलने की इस दौड़ में भागता व्‍यक्‍ति छटपटाता सा प्रतीत होता है ।

इस कोश की कुछ कहानियां चरमराती हुई राजनैतिक व्‍यवस्‍था पर भी प्रकाश डालती हैं । भ्रष्‍ट राजनीति, पथभ्रष्‍ट राजनेता, सत्ता की लालसा, नेतागणों का शोषण, राजनीति की आड़ में षडयंत्र और षडयंत्र की आड़ में राजनीति भ्रष्‍ट सरकार का पर्दाफाश करती है यही नहीं राजनैतिक हथकंडों को अपनाने के लिए रैली का आयोजन और रैली में भाड़े के लोगों पर होने वाले अत्‍याचारों का वर्णन भी मिलता है जिन्‍हें पढ़कर पाठक इन राजनीतिज्ञों से सचेत रहने की प्रेरणा लेता है । कोश की प्रविष्‍टि में उदय प्रकाश की ‘वारेन हेिस्‍ंटग्‍ज़ का सांड' के द्वारा पाठक को यह प्रेरणा दी है कि यदि विदेशी हमारी राजनीति या संस्‍कृति में छाने का प्रयास करते हैं तो हमें सांड के समान विरोध कर परिस्‍थितियाँ अपने अनुकूल बनानी हैं ।

लेखिका ने कोश में ऐसी महत्त्वपूर्ण कहानियों को भी संकलित किया है जिनमें मन की विभिन्‍न अवस्‍थाओं का मनोविश्‍लेषण हुआ है । इस कोश में बचपन से युवा होने वाले युवकों की यात्रा के विभिन्‍न पड़ाव हैं, वृद्धों के अकेलेपन की पीड़ा है, तलाकशुदा तथा अविवाहित प्रौढ़ का अकेलापन है, विकलांग का दर्द और अपराध बोध की कुंठा से जूझते व्‍यक्‍ति का चित्रण है जो पाठक को बरबस सोचने के लिए विवश करती हैं । नामिता सिंह की ‘बदली तुम हो, साहिया' में मानसिक तनाव को झेलती आलोका की छटपटाहट की धड़कन के पाठक स्‍पष्‍टता से अनुभव कर सकता है ।

जीवन और यथार्थ के हर पक्ष को उद्‌घाटित करने वाली कोश की यह कहानियां यह बताने का प्रयास करती हैं कि हर चमकती हुई चीज़ सोना नहीं होती। इसमें फिल्‍मी दुनिया का सच भी है और चोरों की झूठ भी । मैडिकल सांइस की प्रगति और मानवीय सोच का पिछड़ापन, अंधविश्‍वासों और काले जादू के जाल में फंसा मानव कसमसाता हुआ प्रतीत होता है । दलित चेतना, विदेशियों के साथ भारतीयों का दुर्व्‍यवहार, अमेरिका में जन्‍मे भारतीय बच्‍चों की समस्‍याएं, पुरुष का पुरुष पर शोषण आदि कहानियां भी इस कोश की अहम्‌ प्रविष्‍टियां हैं । पाठक के मानसिक तनाव को कम करने के लिए व्‍यंग्‍यप्रधान कहानियां भी इस कोश में स्‍थान पा सकी हैं। व्‍यंग्‍य के माध्‍यम से - संस्‍कारों, कर्मकाण्‍डों, प्रशासन तंत्र का खोखलापन, संकुचित जातीयता का खोखलापन, छद्म फ्रीडम फाइटर के सामाजिक छल को सार्वजनिक कर समाज को सचेत करने का प्रयास है ।

इस प्रकार इस कहानी-कोश में भारतीय एवं भारतीय मूल के प्रवासी लेखकों, स्‍वतंत्र लेखक, नौकरीपेशा, ग्रामीण-शहरी लेखक, पुरुष एवं नारी लेखकों की वे कहानियां संकलित हैं जो जीवन के सभी पक्षों पर प्रकाश डालती हैं । अतः कहानियों का यह विस्‍तृत फलक कोश लेखिका का विषय संबंधी ज्ञान तथा कहानियों के प्रति उनकी जागरूकता को स्‍पष्‍ट करता है । कोशकारा के विचारों की प्रौढ़ता, भाषा-शैली की गम्‍भीरता और विषयों की स्‍वीकार्यता पाठकों में नवीन आशाओं का सृजन करती है । लेखिका द्वारा प्रत्‍येक प्रविष्‍टि के बाद दिया गया कहानी का कथ्‍य पाठकों की जिज्ञासा को बढ़ाकर उन्‍हें पढ़ने के लिए प्रेरित करता है । अतः यह कहा जा सकता है कि प्रस्‍तुत ‘हिन्‍दी कहानी कोश' कोश लेखिका की गवेषणात्‍मक एवं विश्‍लेषणात्‍मक प्रतिभा की महत्‍वपूर्ण परिणति बनकर उभरा है।

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डॉ. सुनीता शर्मा, प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग, गुरु नानक देव विश्‍वविद्यालय, अमृतसर 143005,पंजाब, भारत।

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: सुनीता शर्मा की पुस्तक समीक्षा : हिंदी कहानी कोश
सुनीता शर्मा की पुस्तक समीक्षा : हिंदी कहानी कोश
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