हरी भटनागर की कहानी : चूहा

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कहानी   चूहा हरी भटनागर तीन लड़के हैं। उनके नाम क़द-कामद और आचरण के मुताबिक़ रखे गए थे। चवन्‍नी सिंह चवन्‍नी की तरह छोटे-से थे, इ...

कहानी

bhatnagar sir (WinCE)

 

चूहा

हरी भटनागर

तीन लड़के हैं। उनके नाम क़द-कामद और आचरण के मुताबिक़ रखे गए थे। चवन्‍नी सिंह चवन्‍नी की तरह छोटे-से थे, इसलिए उनके बाप ने नाम खोजने के लिए ज़रा भी सिरमग़ज़न नहीं किया। वैसे उनका घर का नाम चुन्‍नू था, किन्‍तु जब उनकी बाढ़ मारी गई, तो चवन्‍नी गिनते-गिनते उनका नाम चवन्‍नी सिंह रख दिया। घर का नाम खोटा निकल गया। यही चल पड़ा।

संग्राम बचपन से ही लड़ाकू किस्‍म के थे। जहाँ जाते संग्राम खड़ा कर देते। खेल-खेल में किसी बच्‍चे का सिर लट्‌टू से छेद देते या सींक से आँख। इस वजह बड़े-बड़ों में संग्राम छिड़ जाता। संग्राम नाम पड़ने के पीछे यही कारण था। वैसे उनका पहला नाम बजरंगी था। लेकिन आचरण के कारण दब गया।

मुलायम सिंह रूई के फाहे की तरह मुलायम और नाजुक थे। लोगों का कहना है कि मुलायम जब पैदा हुए, तब इतने नाजुक थे कि उन्‍हें रूई के फाहे में लिटाया जाता था। इस वजह उनकी दादी ने इसी नाम का ठप्‍पा लगा दिया। हालाँकि अब अत्‍यंत सख्‍़त होने के कारण लोग उन्‍हें बज्‍जर सिंह कहते।

तीनों की उमर लगभग बीस-एक बरस की है।

चवन्‍नी सिंह ने बीस बरस की उमर में कई बार उस्‍तरा फिरवाया फिर भी दाढ़ी-मूँछ नहीं आई, तो सिर घुटवा लिया। सिर्फ़ चुरखी भर रहने दी। घुटे सिर पर वे लाल अंगौछा पगड़ी की माफिक बाँधते हैं। कभी कुर्ता-पायजामा पहनते, कभी कुर्ता-लुंगी, कभी कुर्ता-पैण्‍ट। लेकिन वे जूता-चप्‍पल क़तई नहीं पहनते। उन्‍होंने शपथ ली थी काली माई के सामने। जब तक हाईस्‍कूल पास नहीं कर लेंगे, जूता-चप्‍पल नहीं पहनेंगे। चार सार लगातार फेल हुए। पढ़ाई से दिल टूट गया, किन्‍तु शपथ से नहीं। उनकी तमन्‍ना थी कि हाईस्‍कूल पास करके शहर के किसी कॉलेज में पढ़ेंगे, किन्‍तु असफलता ने उनकी तमन्‍ना को पंगु बना दिया। उन्‍होंने ठेकेदारी करने की सोची, किन्‍तु यह काम न करके उन्‍होंने शहर में एक बहुत बड़ी मोटर-पाट्‌र्स की दूकान खोल दी। उनमें यह सोच तब जाग्रत हुआ जब गाँव के ही एक ठाकुर ने शहर में स्‍कूटर-पाट्‌र्स की दूकान खोली। उन्‍होंने उसे चंद्रवंशी को नीचा दिखाने की खातिर दूकान में स्‍कूटर-पाट्‌र्स भी रखे, साथ ही अपने से सूर्यवंशी से सैकड़ों क़दम नीचे बरकरार रखने की मन में ठान ली। लेकिन दूकान में आने वाले फटे, गंदे कपड़ों में लिपटे, नींद से बोझिल ड्राइवरों और क्‍लीनरों के बात करने के भद्दे ढंग, बंदरों की तरह खसर-खसर खुजलाने और मुँह पर ही छींक देने के कारण वे इस काम से ऊब गए। ऐसा नहीं था कि वे गाँव में हरवाहों-चरवाहों का इसी तरह का आचरण बरदाश्‍त करते रहे हों। वहाँ वे उनकी छाया से कोशिश भर दूर रहते थे, किन्‍तु यहाँ ऐसा संभव न था। एक दिन एक सिख ने जो लम्‍बा सफर तय करके आया था, पसीने और धूल से लिपटा, ठीक मुँह पर खटाँध भरी डकार छोड़ी कि उनका जो मितला उठा। वे सिख की इस हरकत से कई दिन परेशान रहे। दुकान से जी उचट गया। एक दिन घर-गाँव चले आए। फिर वापस नहीं गए। बाप ने दूसरे धंध्‍ो के लिए कई बार ठेला, किन्‍तु वे टसके नहीं। अब वे गाँव में ही रहते हैं।

संग्राम सिंह जब हाईस्‍कूल थर्ड क्‍लास पास हुए, तो उनके बाप ठाकुर रणबहादुर सिंह ने पूरे गाँव को दावत दी। रणबहादुर के पिता बहुत बड़े ज़मींदार थे। उनके पास कारूँ का ख़जाना था। सैकड़ों बीघा ज़मीन थी, सैकड़ों पक्‍के मकान, वह भी शहर में। रणबहादुर खुद एक दर्जा भी नहीं पढ़े थे, किन्‍तु लड़के को पढ़ा-लिखाकर गवर्नर बनाना चाहते थे। इसीलिए संग्राम को शहर के अच्‍छे कॉलेज में दाखिला दिलाना तय किया और इसी ख़शी में सारे गाँव को दावत दी जिसमें उन्‍होंने हुक्‍का गुड़गुड़ाते, गिलहरी की पूँछ की तरह मूँछ में मुस्‍कुराते हुए कहा था कि ठाकुर चंदबली का लड़का इम्‍तहान में एक लकीर पाया है जबकि हमारा लड़का तीन लकीर पाया है! तीन!! हम उसे गौरनर-बरिस्‍टर बनाएँगे ताकि दुनिया देख ले कि ठाकुर के यहाँ खालिस लक्ष्‍मी ही नहीं, सरस्‍वती भी वास करती हैं।

तीन लकीर का आशय वे तब समझ पाए जब संग्राम ग्‍याहरवें में बुरी तरह फेल हो गए।

संग्राम को शहर की हवा लग गई थी। शुरू-शुरू में जब वे साधारण वेश में क्‍लास में आए, तो साथ पढ़तीं बड़े-बड़े घरों की लड़कियों ने उन्‍हें देहाती समझा। साथ ही देखना तो दूर, बात करना पसंद न किया। जबकि दूसरे सूटेड-बूटेड लड़कों से ख़ूब चोंच लड़ातीं। संग्राम को यह बात खल गई। उन्‍होंने गहन चिंतन-मनन किया और इस निष्‍कर्ष पर पहुँचे कि फैशनुबेल लड़कों पर ही लड़कियाँ मरती हैं। वे तुरंत ही नए फैशन में ढल गए। उन्‍होंने नई कॉट की दर्जनों पैण्‍ट-क़मीज़ और रंग-बिरंगी टाइयाँ खरीदीं। दसियों कोट सिलवाए। कुछ ही दिनों में उनकी क्‍लास की एक लड़की से मुहब्‍बत हो गई। लड़की गुलाब की पाँखुरी की तरह हल्‍की और नाजुक थी। संग्राम चौबीसों घण्‍टे उसी के ख्‍़वाब में डूबे रहते। दुर्भाग्‍य से सालाना इम्‍तहान के एक माह पूर्व उस लड़की ने संग्राम को धोखा दे दिया और दूसरे से मुहब्‍बत कर ली। संग्राम का दिल टूट गया। सालभर पढ़ाई से दूर रहे, इम्‍तहान के दरम्‍यान यह दुर्घटना घट गई, सो फेल हो गए।

यही नहीं, उन्‍होंने आगे पढ़ाई न करने का फैसला ले लिया और गाँव वापस आ गए। यहाँ आकर उन्‍होंने बाल बढ़ा लिए। दाढ़ी-मूँछों को बेतरतीब बढ़ने दिया। पैण्‍ट, क़मीज़, कोट, टाई और नुकीले ऊँचे जूतों से घृणा हो गई थी, लिहाजा वे धोती-कुर्ता पहनते और हवाई चप्‍पल। काली माई से भक्‍ति हो गई, इसलिए वे माथे पर सिन्‍दूर का अंगूठा टाँकते और गला तर करके उनकी आराधना करते।

मुलायम सिंह का पढ़ाई में शुरू से मन नहीं लगा। दसवीं कक्षा में उनका दिल पहलवानी में रमा, तो वे पढ़ाई छोड़कर सुबह-शाम रियाज़ मारने लगे।

पाँच किलो दूध, एक पाव बादाम, एक पाव मलाई और चार प्‍लेट भीगा चला यह उनका दोपहर के भोजन को छोड़कर सुबह का नाश्‍ता है जिसने वर्जि़श के साथ बदन को कच्‍चे कटहल की तरह सख्‍़त और कँटीला बना दिया है जिसे देखकर अन्‍य लोगों की बात दीगर, उनके बाप तक भयभीत हो जाते।

मुलायम सिंह के गले में काला गोल धागा पड़ा है। बाँह में तावीज़। चारखाने की तहमत के ऊपर रेशमी कुर्ते के सोने के बटन को खोलकर जब वे चलते, तो अपना बना हुआ शरीर निहारते और ख़ुश होते।

तीनों में गाढ़ी दोस्‍ती है। यह दोस्‍ती तब प्रारंभ हुई जब मुलायम सिंह ने एक बार गाँव के विशाल कुश्‍ती दंगल को जीतकर ‘केसरी' का खिताब अर्जित किया था। वैसे तीनों एक ही गाँव के थे और उनमें दूर का परिचय था गाढ़ी दोस्‍ती नहीं थी। इस दंगल के होने से चवन्‍नी सिंह और संग्राम ने मुलायम सिंह की ओर दोस्‍ती का हाथ बढ़ाया।

हालाँकि तीनों धनकुबेरों के बेटे थे, तीनों की दोस्‍ती में एक-दूसरे का बड़प्‍पन आड़े आ रहा था, इसके बावजूद तीनों अनन्‍य मित्र हो गए।

चवन्‍नी सिंह चूँकि हाईस्‍कूल कई बार कोशिश के बाद भी पास नहीं हो पाए थे, इसलिए वे उन लोगों से नफरत करने लगे जो दसवीं कक्षा पास होते या उनसे अधिक पढ़े होते। उनकी इससे कम पढ़े-लिखों के प्रति पूरी सहानुभूति थी, किन्‍तु इससे ऊपर के लोगों को देखते ही, वे अपना नंगा भारी पैर ज़मीन पर पटकने लगते और अंगौछा सिर पर पुनः कसकर कहते पहले के लोग आठवीं पास करके तहसीलदार हो जाया करते थे, आज कितना भी पढ़ो बेकार, क्‍योंकि लोगों को अप्‍लीकेशन लिखने तक की तमीज़ नहीं है।

यह बात अलग थी कि स्‍वयं चवन्‍नी सिंह ने अप्‍लीकेशन कभी न लिखा और न लिखना जानते हैं।

चवन्‍नी सिंह की घृणा केवल दसवीं कक्षा से कम या अधिक पढ़े लिखों तक ही महदूद न थी, उन्‍हें उन हरवाहों-चरवाहों से सख्‍त नफरत थी जो उठने-बैठने और बात करने का सलीका तक नहीं जानते थे। उन्‍हें वे दूर से देखते ही आग बबूला हो जाते। मुट्‌ठी भींचकर हवा में चला देते गोया उनके जबड़ों पर वार कर रहे हों।

संग्राम सिंह ही एक ऐसे अपवाद थे जो उनकी घृणा से बरी थे। हालाँकि वे उनसे एक दर्जा अधिक पढ़े थे, लेकिन चवन्‍नी सिंह उनसे इसलिए घृणा नहीं करते थे, क्‍योंकि वे ग्‍यारहवीं में बुरी तरह फेल हो गए थे और असफल होकर उन्‍हीं की तरह गाँव वापस आ गए थे। यदि वे आगे बढ़ते, तो अवश्‍य चवन्‍नी सिंह की घृणा की हद में आते।

यद्यपि वे चवन्‍नी सिंह से एक दर्जा अधिक पढ़े थे, फिर भी चवन्‍नी सिंह उन्‍हें अपने समकक्ष ही महसूस करते।

संग्राम का चूँकि लड़की ने दिल तोड़ा था, इसलिए वे समूची लड़की जाति के विरुद्ध हो गए थे। वे अपना गुस्‍सा किसी भी जाति की लड़की के साथ अवैध संबंध कर ठण्‍डा करते। वे कहते कि पुराने ज़माने में भारत में जब-जब युद्ध भड़का और खूून-ख्‍़ाराबा हुआ, उनके कारणों के बीच लड़की थी।

मुलायम सिंह को अगर किसी से नफरत थी तो उस पहलवान से जो उनसे देह और जाँगर में बीस होता। वे उसे देखते ही ताल ठोंकने लगते और कुश्‍ती लड़ने के लिए उकसाते और जब तक चित्त न कर देते, चैन न लेते।

तीनों के पास कोई काम नहीं था, इसलिए तीनों एक ही मोटर-साइकिल पर बैठकर गाँव भर में घूमते नज़र आते। अगर ये कहीं बैठते तो जुम्‍मन मियाँ के आम के दरख्‍़त के नीचे, खाट पर या रमेसर साहू के ट्‌यूबवेल पर जहाँ तेज़ आवाज़ में टेपरिकार्ड से फ़िल्‍मी गाने सुनते और बदमस्‍त होकर तरह-तरह के अभिनय करते हुए नाचते। जब ये थककर चूर हो जाते तो गाँव, प्रदेश, देश और विदेश की राजनीति पर बहस करते। ये अक्‍सर इस बात पर खेद प्रकट करते कि इस गाँव के छोटे तबके के लोग सीध्‍ो मुँह बात नहीं करते। अकडूँ हैं। सब ठीक हो गए हैं। किसी में पुराने ज़मींदारों व ताल्‍लुकेदारों के प्रति ज़रा भी आदर भाव नहीं रह गया है।

ये कहते कि गाँव से इस तरह की रब-ढब का विच्‍छेद होना ज़रूरी है।

ये कहते हालाँकि लोगों पर इस ‘अकड़' के बावजूद उनके बाप-दादों का दबदबा है, लेकिन यह दबदबा अब उनके हाथों में आना चाहिए, क्‍योंकि वे नई पीढ़ी के हैं और नई पीढ़ी को अपना अधिकार मिलना चाहिए।

ये हमेशा इस बात पर चिंतित रहते कि कौन-सी नीति अख्‍तियार की जाए जिससे समूचा गाँव उनकी मुट्‌ठी में आ जाए। लोग उनके खाँसते-भर से थरथरा उठें। सब उन्‍हें अपना मालिक समझें।

उनमें यह बात तब पनपी जब चवन्‍नी सिंह और संग्राम सिंह के हरवाहों-चरवाहों ने बेगार न करने और दहेड़ी बढ़ाने की हिमाकत की। इस पर बड़ा बावेला मचा। चवन्‍नी सिंह के बाप ने एक हरवाहे को इतना पीटा कि उसके मुँह से तीन दिन तब लहू गिरता रहा। उन्‍हें विश्‍वास था कि कुटम्‍मस से बात बन जाएगी लेकिन बात न बनी। जुताई-बुआई का समय था ऐसे में हरवाहों-चरवाहों का अकड़ जाना फसल के लिए ज़हर हो रहा था। वे बौखला उठे। उन्‍होंने हरवाहों-चरवाहों को अपनी आराजी से लात मार भगा देने और दूसरे हरवाहों-चरवाहों को रखने की योजना बनाई कि उनके मुंशी ने फ़िलहाल एक रुपया दहेड़ी बढ़ा देने और बेगार न करने की शर्त कर मामला सुलझवा दिया।

चवन्‍नी सिंह के यहाँ हरवाहों-चरवाहों की दहेड़ी बढ़ते ही संग्राम सिंह के हरवाहों-चरवाहों ने भी अपने हल रख दिए। उनके यहाँ भी काफ़ी मारधाड़ हुई। कई हरवाहों के सिर फूटे, उनके झोपड़े जला दिए गए। जुताई-बुआई सिर पर थी, इसलिए निष्‍कर्ष निकला-उनकी कुछ दहेड़ी बढ़ा दी गई, किन्‍तु बेगार पूर्ववत्‌ थी।

हरवाहों-चरवाहों की इस अकड़फूँ ने तीनों के दिमाग़ में एक तूफान-सा मचा दिया। साले, दो कौड़ी के हैं! और इस तरह सिर उठा रहे हैं। ये बौखला उठे। इसी का नतीजा था कि ये न केवल हरवाहों-चरवाहों, बल्‍कि समूचे गाँव के छोटे-मोटे दूकानदारों और किसान-मज़दूर तबके के लोगों को कुचल देने और उन्‍हें अपनी मुट्‌ठी में लेने की योजना में व्‍यग्र हो उठे।

संग्राम सिंह को एक युक्‍ति सूझी। उसे अमल में लाया गया। तीनों ने शहर से आ रहे एक मज़दूर को पकड़ा और उससे पूछा कि तुम किस देश में रहते हो?

मज़दूर पकड़े जाने और यकायक सवाल किए जाने पर भौंचक-सा रह गया, फिर खिसियाया-सा बोला हजूर, हम अपने मुलुक में रहते हैं।

चवन्‍नी सिंह उसके सामने तन कर खड़े हो गए। हालाँकि लम्‍बाई में वे उसके आध्‍ो थे, लेकिन इस विचार को उन्‍होंने दिमाग़ में नहीं आने दिया। नंगा पैर ज़मीन पर पटक कर अंगौछा कसते ज़ोरों से बोले अबे, यह तो मैं भी जानता हूँ कि तू अपने मुलुक में रहता है, पर मुलुक का नाम-गाँव कुछ है?

मज़दूर गहरी सोच में पड़ गया। काले चुचके चेहरे पर घुच्‍ची आँखें मुलमुलाने लगीं। बचपन से वह ठाकुर गुरुचरन के यहाँ हरवाही करता रहा। ठाकुर की दी ज़मीन को वह अपना मुलुक समझता था। ठाकुर के सिधारते ही वह मज़दूर हो गया और नीम के नीचे डाले छप्‍पर को अपना मुलुक समझने लगा।

गरदन झटक कर बोला हजूर, नीम के पेड़ के नीचे ही हमारा मुलुक है।

मुलायम सिंह कुर्ते के गिरेबान से झाँकती सीने की मछली को देखकर ख्‍़ाुश हो रहे थे और सोच रहे थे कि इस दौरान मछली और बन गई है कि मज़दूर के जवाब से क्रोध में उछल पड़े।

संग्राम सिंह ने अफ़सोस के स्‍वर में कहा गद्दारी की भी हद है! साले अपने देश का नाम तक भूल गए!

चवन्‍नी सिंह ने उसे गगनभेदी गाली दी कि मुलायम सिंह ने उसका टेंटुआ पकड़ा और उसे चूहे की तरह टाँग कर नीचे छोड़ दिया।

मज़दूर चीखता हुआ नीचे आ गिरा कि चवन्‍नी सिंह ने एक करारी लात उसकी पीठ पर दे मारी। वह मुँह के बल गिरने को हुआ कि मुलायम ने उसके मुँह पर एक ऐसी ठोकर मारी कि वह ज़ोरों से चीखा।

उसके मुँह से ख़ून की धार बह निकली। सिर चक्‍कर खाने लगा। अगल-बगल साँय-साँय होने लगी वह बेहोश हो गया।

इस घटना से इन्‍हें ज़रा भी आतंक नहीं दिखा, सिर्फ़ इतना दिखा कि कुछ लोग खाट की डोली बनाकर ग़मगीन से आए और चुपचाप मज़दूर को लिटाकर ले गए।

इन्‍हें भयंकर गुस्‍सा आया। इतनी ग़ज़ब की योजना बनाई और उसका कोई असर नहीं। इन्‍होंने पैंतरे बदले और एक नई युक्‍ति ईज़ाद की।

तीनों बीच बाज़ार में जाकर रास्‍ता रोक कर खड़े हो गए। जब दोनों तरफ़ भीड़ हो गई तो इन्‍होंने मज़बूत हाथों से आसमान की ओर बन्‍दूक तानी और कई हवाई फायर किए।

इस घटना से भगदड़ मच गई। तीनों इत्‍मीनान से चलते हुए सड़क के किनारे आ खड़े हुए और भीड़ मे आतंक की लहर की मुआयना करने लगे।

थोड़ी देर में सब कुछ पूर्ववत्‌ शांत हो गया। केवल कुछ लोग जो किसान मज़दूर और किराना दुकानदार थे इस फायर के बाबत बेखौफ से बातचीत कर रहे थे मानो किसी चिड़ीमार के बारे में बात कर रहे हों।

इनकी आँखें जल उठीं। सोचा कि इन्‍हें गोली से भून डालें, क्‍योंकि ये ज़रा भी आतंकित नहीं हुए और न उन्‍हें देखकर काँपे और न ही उनके सोच का अनुसरण किया।

इन्‍होंने गोली नहीं चलाई। तीनों मोटर साइकिल पर जा बैठे और जलती आँखों गाँव-भर का चक्‍कर लगाने लगे।

चवन्‍नी सिंह ने कहा पढ़े-लिखों और किसान-मज़दूरों को गोली से उड़ा देने से ही लोगों में हमारे प्रति दहशत पैदा होगी।

संग्राम सिंह ने कहा गाँव भर की जवान लड़कियों को घर से निकलवाकर नंगा करने से ही हमारा काम फतह होगा!

मुलायम सिंह कुछ नहीं बोले। वे कुछ नया कर दिखाना चाहते थे। उन्‍होंने फुलस्‍पीड में बहती गाड़ी रोकी और शहर से आ रहे चार मज़दूर-किसानों को दौड़कर कई फैट, लातें और सिर मारे कि चारों बिखर गए।

मुलायम सिंह ने चवन्‍नी सिंह और संग्राम की ओर गौरवान्‍वित आँखों से देखा जैसे कह रहे हों कि इस तरह कमाल दिखाया जाता है कि जहाँ हाथा भाँज दिया, मैदान साफ! अब देखो, आतंक ही आतंक!!

उन्‍होंने मूँछ ऐंठी और गरदन टेढ़ी करके चलते हुए मोटर साइकिल के पास आए। एक किक में गाड़ी स्‍टार्ट की और दोनों को बैठाकर बस्‍ती की ओर बढ़ गए।

बस्‍ती में पहुँचकर मुलायम सिंह गंभीर मुद्रा में खड़े होकर आसमान की ओर देखने लगे। यकायक उनके दिमाग़ में एक क्रांतिकारी विचार कौंधा और वे उठाकर हँस पड़े। सहसा वे एकदम गंभीर हो गए। उन्‍होंने चवन्‍नी सिंह और संग्राम की ओर कनखियों से देखकर चुटकी बजाई जिसका आशय था अब बस्‍ती में कमाल दिखाना चाहिए।

तीनों मिर्ज़ा खलील की छान की ओर बढ़े। मिर्ज़ा भैंसों को दाना-भूसा दे रहा था। जब ये उसके सामने आ खड़े हुए और मुलायम सिंह ने उसे एक करारा थप्‍पड़ मारा कि वह भौंचक-सा रह गया, किन्‍तु तुरंत भाँप गया कि क़यामत आने वाली है। वह जान बचाकर भागा।

जैसे ही उसने बाहर निकलकर गुहार लगाई कि तीनों की भुजाएँ फकड़ उठीं। साले कटुए की इतनी हिम्‍मत कि हमारे ख़िलाफ़ भीड़ खड़ी करे। ये क्रोध में उछल पड़े और इन्‍होंने भैंसों को घुटने मारने शुरू किए। अंत में उनके एन (थन) काट लिए। भीड़ इकट्‌ठी हुई कि तीनों ने उसे धमकाने के लिए अगल-बगल फायर किए भीड़ जान बचाकर भागी।

इस घटना का इन्‍हें आतंक दिखा, किन्‍तु पूरा आतंक तब दिखा जब इन्‍होंने खुल्‍लमखुल्‍ला कई किसानों की खड़ी फसलें एक लाइन में फूँक डालीं। कइयों को बंद अंध्‍ोरी कोठरी में बिना अन्‍न-जल के बाँधकर रखा तथा भयंकर यातनाएँ दीं।

छोटा-सा गाँव था। ऐसी हरकत पर हल्‍ला मच जाना स्‍वाभाविक था। सो मचा। और उनके दिलों में एक भय-सा डोल गया। लोग इन्‍हें देखते काँप जाते और जान बचाकर भाग खड़े होते।

ऐसा नहीं था कि लोग इनकी यातनाएँ कड़वे घूँट की तरह आँखें बंद करके पी गए। लोगों ने चोरी-छिपे आपस में काफ़ी शोर मचाया, पंचायतें कीं, मज़बूरी यही थी कि तादाद में होने के बाद भी वे निहत्‍थे थे। उनके साथ न पुलिस थी और न इतना पैसा कि आगे थाना-कचहरी कर सकें जिससे न्‍याय की उम्‍मीद भी न थी। और इन तीनों के पास वह सब कुछ था जिसके आगे झुक-दब जाना लाजिमी था। लोग झुके-दबे और चुपचाप रो-धोकर जुल्‍म सह लेते। यह बात अलग थी कि इनके दिलों में इन तीनों के प्रांत भयंकर आग धधक रही थी।

तीनों को पक्‍का विश्‍वास हो गया कि लोग पूरी तरह उनकी मुट्‌ठी में आ चुके हैं। कारण कि उन्‍हें देखते ही काँप जाते, रोनी शक्‍ल बना देते, गिड़गिड़ाने-से लगते। इन्‍होंने चैन की साँस छोड़ी और आगामी योजना बनाने के पूर्व यह तय किया कि आतंक की आग जगाए रखने के लिए कुछ न कुछ सज़ा जारी रखना लाजिमी है। इसलिए ये कभी किसी किसान या मज़दूर को पकड़ लेते और उससे अपने दण्‍ड-विधान के अनुसार सैकड़ों बाल्‍टी पानी कुएँ से खिंचवाते या उसे मुर्गा बनवा देते या पेड़ से उल्‍टा लटकवा देते। यह क्रिया ये तब तक करवाते जब तक वह चीं न बोल दे।

अपनी इसी आतंक की आग जगाए रखने की नीति के तहत इन्‍होंने एक दिन एक ऐसी मिसाल पेश की कि उसका कुछ उल्‍टा ही असर हुआ।

हुआ यह कि चवन्‍नी सिंह के यहाँ चूहे भारी तादाद में बढ़ गए थे। उन्‍होंने बहुतों का सफाया दवा देकर कर डाला था। इसके बाद भी कुछ शेष थे, जो वस्‍तुओं का सर्वनाश किए दे रहे थे। उन्‍हें एक युक्‍ति सूझी। उन्‍होंने संग्राम सिंह और मुलायम को इसकी जानकारी दी। फिर सहमति पर पूरे गाँव में ढोल पिटवा दिया। ढोल का पिटना था कि आशंकित हादसे के भय में डूबे लोग मैदान के एक कोने में आ खड़े हुए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह ढोल क्‍यों पिटवाया गया? कोई हादसा होने वाला है क्‍या? सभी एक-दूसरे से खुसुर-फुसुर कर रहे थे। बात तब स्‍पष्‍ट हुई तब चूहादानी के ऊपर से पीला कपड़ा हटाया गया और उस पर चवन्‍नी सिंह का अल्‍सेशियन कुत्ता पंजा मारने लगा।

चूहादानी में चूहों को देखकर एक हरवाहा जिसे चवन्‍नी सिंह के बाप ने इस कदर पीटा था कि उसके मुँह से तीन दिन तक लहू गिरता रहा और एक किसान जिसे संग्राम सिंह ने कोठरी में बंदकर नख खिंचवा लिए थे यकायक घबरा-से गए। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और दोनों एकदम पसीने से नहा-से गए। हरवाहे ने भनभनाहट के स्‍वर में गरदन झटककर ‘चूहा' कहा गोया वह ख़ुद चूहा हो जिसे एक पल में कुत्ता अपने दाँतों के बीच किच्‍च कर देगा। उसने अगल-बगल खड़े अपने साथियों को देखा जिन्‍हें इन तीनों ने भयंकर यातनाएँ दी थीं और कुएँ से इतना पानी भरवाया था कि खाट पकड़ ली थी और जो इस वक्‍त होने वाले दृश्‍य से आतंकित हो उठे थे। वह विद्युत-गति से पीछे की ओर मुड़ा और ‘हाय राम' कह कर गहरी साँस छोड़ता भीड़ में घुसता हुआ एकदम पीछे आ खड़ा हुआ। किसान ने भी इसी तरह हरवाहे का अनुसरण किया। उसने गरदन उठा-उठाकर पहले पीछे की ओर देखा, फिर चूहादानी देखी और एक चरवाहे के कान में कुछ कहा। बात सुनते ही चरवाहे ने संग्राम सिंह को देखकर तुरंत उसके कान में भुनभुनाया कि किसान काँप-सा गया। लड़खड़ाता हुआ वह एक-दो क़दम आगे बढ़ा, फिर पुनः पीछे मुड़कर भीड़ चीरता हुआ भयभीत-सा पीछे आ खड़ा हुआ। उसने सामने देखा, संग्राम सिंह लपके आ रहे थे। उसे पक्‍का विश्‍वास हो गया कि संग्राम सिंह उसे मारने आ रहे हैं जिसकी संभावित जानकारी चरवाहे ने दी थी।

किन्‍तु संग्राम सिंह उसे मारने नहीं आए। वे फुर्ती से चलकर चूहादानी के पास आ खड़े हुए और कुत्ते को परे खींचा ताकि चूहों को बाहर निकलने में दिक्‍क़त न आए।

किसान ने राहत की साँस छोड़ी और पंजे से आँखों पर छाया करके चूहादानी की ओर देखा भयभीत निगाहों से।

चूहादानी में चूहों की भाग-दौड़ मची थी। एक-दूसरे पर चढ़ते-उतरते वे बेचैनी से चक्‍कर लगा रहे थे गोया जान गए कि मृत्‍युदंड दिए जाने के लिए उन्‍हें कुत्ते के बीच छोड़ा जाएगा। बार-बार हाथ मारने पर भी वे बाहर नहीं निकल रहे थे, किन्‍तु चवन्‍नी सिंह थे कि उन्‍हें निकालने में लगे थे।

एक भी चूहा जब बाहर नहीं निकला, तो वे कुछ सोचने लगे, आँखें मूँदकर। सहसा सिर झटक कर उन्‍होंने अगल-बग़ल देखा सामने एक लम्‍बी लकड़ी पड़ी थी। उंगली बढ़ाकर उन्‍होंने लकड़ी उठा ली और उससे चूहों को कोंचने लगे।

एक मोटा चूहा बाहर आ गिरा कि कुत्ता उस पर झपटा। कुत्ते ने मुँह में भरकर उसे एक जबरदस्‍त झिंझोड़ा दिया कि चूहा दूर जा गिरा। चूहा जीवित-सा था। उसमें कंपन हो रहा था। कुत्ता फिर उसके पास पहुँचा। अबकी उसने एक ऐसा झिंझोड़ा दिया कि चूहा दूर जा गिरा और निर्जीव हो गया।

भीड़ का चेहरा सफेद क़ाग़ज-सा हो गया। लगता है कि इस दृश्‍य ने उसे रुला दिया।

मुलायम सिंह का ठहाका गूँजा मानो उन्‍होंने अपने से बीस किसी पहलवान को पलक झपकते चित्त कर दिया हो।

संग्राम सिंह भी ठठाकर हँसे गोया उन्‍होंने शहर में धोखा देने वाली लड़की का चिथड़ा बना दिया हो।

चूहादानी से दूसरा चूहा गिरा जिसे कुत्ते ने पूर्ववत्‌ झिंझोड़ा दे-देकर मार डाला।

इसी तरह चूहादानी से चार और चूहे निकाले गए जिन्‍हें कुत्ते ने दाँतों के बीच कूँच डाला। यह अंतिम चूहा था जो बार-बार हाथ मारने और लकड़ी से कोंचने पर भी नहीं निकल रहा था।

मुलायम सिंह ने कहा बहुत हरामी है साला, निकलना ही नहीं चाहता!

चवन्‍नी सिंह ने लकड़ी से कोंचते हुए कहा निकलेगा इसका बाप! यह किस खेत की मूली है।

देखो साला कैसा भाग रहा है, जैसे बच ही जाएगा मुलायम सिंह ने कुर्ते की बाँह ऊपर चढ़ाते हुए कहा ला, मैं निकालूँ!

नहीं उस्‍ताद, यह हमारा शिकार है कहकर चवन्‍नी सिंह ने पलभर के लिए आँखें बंद कीं मानो भवानी का स्‍मरण कर रहे हों। फिर वे झटके से उठ खड़े हुए। उन्‍होंने फुर्ती से फेंटा कसा, नंगा पैर ज़मीन पर ज़ोरों से पटका और ‘जयकाली माँ' कहकर धम्‍म से ज़मीन पर बैठे और चूहे को लकड़ी से कोंचने लगे।

बार-बार लकड़ी से कोंचने पर भी चूहा नहीं निकला, तो उन्‍होंने सिर से अंगौछा उतार कर पंजे में लपेट लिया और चूहादानी में हाथ डाला।

चूहा बेतहाशा चूहादानी में चक्‍कर लगा रहा था। चवन्‍नी सिंह ने जैसे ही उसे मुट्‌ठी में भींच लेना चाहा कि वे ज़ोरों से चीखे।

उन्‍होंने झटके से हाथ बाहर खींच लिया और एक लम्‍बी कराह के साथ पंजे पर से अंगौछा हटाया कि ख़ून की धार बह निकली। चूहे ने बीच की उंगली में दाँत जमा दिए थे।

भीड़ में हल्‍ला-सा मच गया मानो वह चूहे के इस कृत्‍य पर हँसी-ठिलठिलाई, लेकिन उस पर मुर्दनी उस वक्‍त छा गई जब मुलायम सिंह ने कुर्ते की बाँह चढ़ाई और भुजाओं पर हाथ फेरते हुए उसे घूर कर देखा।

पीछे खड़ा किसान धीरे-धीरे सरकता हुआ भीड़ के बीच में आ खड़ा हुआ था, मुलायम सिंह का रौद्र रूप देखकर बगटुट पीछे की ओर भागा।

चवन्‍नी सिंह उंगली से बहते ख़ून को देखकर आपे से बाहर हो गए। उन्‍हें बेतरह गुस्‍सा आया, चूहे पर। साले ने कैसा काटा कि उंगली फटी जा रही है। उन्‍होंने दाँत पीस डाले, आव देखा न ताव, सामने पड़ी चूहादानी पर एक करारी लात मारी चूहादानी खड़खड़ाती संग्राम सिंह के सामने आ गिरी। संग्राम सिंह चूहे की हरकत से अपनी जगह पर खड़े हुए रह-रहकर उबल रहे थे। उन्‍होंने खूूनी आँखों से चूहे को देखा मानो भस्‍म कर देंगे। गहरी साँस खींचते हुए उन्‍होंने हाथ का कड़ा चढ़ाया, चेहरे पर लटक आए बालों को पीछे की ओर झटका और उझक कर चूहादानी हाथ में ले ली और मुसलमान ज़मीन पर पटकने लगे।

चूहा निर्जीव दिखा इसलिए उन्‍होंने चूहादानी सामने फेंक दी जिस पर कुत्ता भौंकता हुआ पंजे मारने लगा।

सहसा उतान पड़े चूहे में हरकत हुई। उसके अगले-पिछले पंजे थरथराए और वह पलभर में पंजों के बल बैठ गया। उसने थुथनी घुमाकर बाहर की ओर निकली पड़ती आँखों से चारों ओर देखा और पिछले पंजों के बल खड़ा हुआ गोया कुत्ते, मुलायम, संग्राम और चवन्‍नी सिंह से कह रहा हो कि इतनी जल्‍द हम मरने वाले नहीं हैं! और न ही हार मानने वाले!

मुलायम सिंह की आँखें माथे से सट गईं जैसे वे उसका आशय ताड़ गए। नथुने फुलाते उसकी ओर बढ़े मानो किसी पहलवान को चित्त करने जा रहे हों। उन्‍होंने चूहादानी अपने अपने दोनों हाथों के बीच ले ली ताक़त लगाई कि चूर कर दें चूहा बाहर आ गिरा।

जैसे ही चूहा बाहर आ गिरा और कुत्ता उस पर झपटा एक अजीब दृश्‍य उपस्‍थित हो गया। लोगों ने देखा कुत्ता बुरी तरह चिचिया रहा है और चूहा उसकी नाक में दाँत जमाकर चिपट गया है।

भीड़ उल्‍लास में उछल पड़ी। कुत्ता पगलाया-सा भीड़ में से राह बनाता भाग निकला।

संग्राम सिंह यह दृश्‍य देखकर तमतमा उठे। उन्‍होंने दौड़कर एक किसान से लाठी छीनी और कुत्ते की तरफ़ लपके। उन्‍होंने लाठी तानी और साधकर नाक में चिपके चूहे पर मारी कि निशाना चूक गया। लाठी हवा में भँजकर रह गई। चूहा कूदा और भागा। संग्राम सिंह फुर्ती से उसके पीछे दौड़े। उचकते-भागते चूहे पर वे दौड़ते हुए हन-हन कर लाठियाँ बरसाते जाते लेकिन हर वार ख़ाली जाता। लाठी ज़मीन पर पड़ती और धूल उड़ती। यकायक चूहा पास की झाड़ी में जा घुसा। संग्राम सिंह क्रोध में इस क़दर पागल-से हो गए कि उन्‍होंने समूची झाड़ी लाठियों के वार से उजाड़ डाली। उन्‍होंने जलती आँखों से देखा आस-पास झाड़ी की पत्तियाँ, काँटे और डगालें थीं। न था तो सिर्फ़ चूहा जिसकी उन्‍हें तलाश थी। वह कहीं फरार हो गया था। संग्राम गहरी साँस छोड़ते हुए पीछे पलटे।

सामने कुत्ता था जो चें-चें कर रहा था। उसकी नाक से ख़ून की धार बह रही थी और नाक का बड़ा-सा माँस का टुकड़ा नुच गया था। वह बौखलाया-सा पंजे से नाक खुजलाता, कूँ-कूँ करता, दुम हिलाता चवन्‍नी सिंह के पास जा खड़ा हुआ मानो पनाह माँग रहा हो लेकिन उन्‍होंने उसे पनाह नहीं दी। दाँत पीसते हुए उन्‍होंने उसे माँ की गाली दी और उछल कर एक जबरदस्‍त लात मारी।

एक लम्‍बी चें की आवाज़ करता कुत्ता भागा कि मुलायम सिंह ने लपक कर उसकी दुम पकड़ ली कहाँ जाता है, नाक कटवाने का परसाद तो लेता जा... कह कर उन्‍होंने उसे बलिष्‍ठ हाथों से उठाकर अपने से काफी ऊपर उछाल दिया।

कुत्ता चिचियाता हुआ नीचे आ गिरा, किन्‍तु तुरंत ही जान बचा कर भाग निकला।

भीड़ पूरी तरह शांत खड़ी थी, किन्‍तु सभी के चेहरों से लगता था मानो पलभर में हर्षोल्‍लास का सोता फूट पड़ेगा। किसान और हरवाहे जो पीछे दुबके खड़े थे, क्षण भर को भय भूल कर सरसराते हुए भीड़ के एकदम आगे आ खड़े हुए।

मुलायम, संग्राम और चवन्‍नी सिंह पसीने में तर-ब-तर खड़े एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे। वे एक-दूसरे से कुछ कहना चाह रहे थे, किन्‍तु एक शब्‍द नहीं फूट रहा था। लगता था जैसे किसी ने जीभ निकला ली हो।

तीनों को पहली बार महसूस हुआ कि किसी ने उनकी पीठ में धूल लगा दी है।

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रचनाकार: हरी भटनागर की कहानी : चूहा
हरी भटनागर की कहानी : चूहा
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