वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : राष्ट्रीयता के राष्ट्र नायक : रामधारी सिंह दिनकर

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राष्ट्रीयता के राष्ट्र नायक : रामधारी सिंह दिनकर   - डॉ. वीरेन्‍द्र सिंह यादव   साहित्‍येतिहास की दृष्‍टि से रामधारी सिंह दिनकर को...

राष्ट्रीयता के राष्ट्र नायक : रामधारी सिंह दिनकर

 

- डॉ. वीरेन्‍द्र सिंह यादव

 

साहित्‍येतिहास की दृष्‍टि से रामधारी सिंह दिनकर को उत्‍तर छायावाद के अन्‍तर्गत रखा जाता है क्‍योंकि छायावादोत्‍तर काल में एक नयी चेतना ने जन्‍म ले लिया था - जो छायावाद एवं रहस्‍यवाद, जनित निराशा, घुटन, पीड़ा से पृथक अभिव्‍यक्‍ति में आस्‍था रखती थी। वैसे देखा जाये तो राष्‍ट्रीय-जागरण का उद्‌घोष छायावादी सृजन में भी परिलक्षित होता है किन्‍तु मूलतः इस युग की प्रवृत्ति-प्रकृति के विविध उपादानों के माध्‍यम से जिज्ञासा और कुतुहल में तन्‍मय रही अथवा वैयक्‍तिक पीड़ा में समष्‍टि को आत्‍मसात करती रही। विश्‍वजनीन मानवता के हित-सम्‍पादन के लिये चिन्‍तित छायावादी प्रवृत्‍ति उदात्‍त अवश्‍य थी किन्‍तु राष्‍ट्रीय विचारधारा को सशक्‍त रूप न दे सकी। राष्‍ट्रीय शब्‍द के सन्‍दर्भ में कहा गया है कि राष्‍ट्रीय शब्‍द अपने आधुनिक अर्थ में आधुनिक है जिसमें जाति, सम्‍प्रदाय, धर्म, सीमित भू भाग की संकीर्णता के स्‍थान पर क्रमशः एक समग्र देश और उसके भीतर निवास करने वाली समस्‍त जातियों, भिन्‍न-भिन्‍न भूखण्‍डों, सम्‍प्रदायों और रीति-रिवाजों के लोगों का संदिष्‍ट, सामूहिक रूप उभरता गया।

देश-प्रेम और राष्‍ट्रीय भावना भारत में सदैव से किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है। राष्‍ट्रीय या राष्‍ट्रवाद से केवल तात्‍पर्य मात्र हिन्‍दू राष्‍ट्र की कल्‍पना नहीं अपितु सम्‍पूर्ण भारत की सांस्‍कृतिक स्‍थिति से है। राष्‍ट्रीय भावना का यह स्‍वरूप हिन्‍दी साहित्‍येतिहास के विभिन्‍न कालों में भिन्‍न-भिन्‍न रूप में प्रस्‍फुटित होता रहा है। आधुनिक काल से पहले गाँधीवादी विचारधारा ने राष्‍ट्रवाद को अभिनव दृष्‍टि दी जिससे एक नयी चेतना को व्‍यापकता का रूप मिला। इसी विचारधारा से प्रभावित हो कवियों ने राष्‍ट्रीय स्‍वर प्रदान किये, जिनमें माखनलाल चतुर्वेदी, सोहन लाल द्विवेदी एवं रामधारी सिंह दिनकर के नाम महत्‍वपूर्ण हैं। इन कवियों ने सम्‍पूर्ण भारत के प्रति आस्‍था, संस्‍कृति के प्रति निष्‍ठा, मानवता के प्रति आग्रह, सामन्‍तवाद के प्रति आक्रोश, स्‍वतंत्रता के लिये संकल्‍प, निर्माण एवं सृजन के लिये प्रेरणा तथा शोषकों के प्रति क्रांति को जन्‍म देकर साहित्‍य को एक नयी दिशा दी - जो प्रगतिवाद के सहारे अधिक विकसित हो सकी, राष्‍ट्रीय भावना एवं विचारधारा के प्रमुख कवियों में दिनकर का विशिष्‍ट स्‍थान रहा है। ‘दिनकर' का आविर्भाव उस समय हुआ था जब देश पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और भारतवासी स्‍वतंत्रता के लिये संघर्ष कर रहे थे। इस संघर्ष में देश का मध्‍यमवर्गीय शक्‍ति प्राणपण से जुटा हुआ था क्‍योंकि मध्‍यम वर्ग पराधीनता को अभिशाप और कलंक की कालिका मान रहा था और माँ भारती को स्‍वाधीन करना अपना धर्म तथा परम उद्देश्‍य बनाये हुये था। दिनकर जी भी उसी मध्‍यम वर्ग के एक संवेदनशील नवयुवक थे। समकालीन नवयुवकों के उस वर्ग से उनका मन अधिक जुड़ा था जो गाँधी जी की अहिंसावादी नीति का पक्षधर न होकर क्रांति के पक्षधर थे और दिनकर ने अपने काव्‍य में इसी क्रांति भावना को व्‍यक्‍त और उजागर करने का प्रयत्‍न किया।

रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। प्रथम श्रेणी की रचनाओं का अधिकांश भाग राष्‍ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत है। इन रचनाओं में क्रांति का उद्‌घोष है, हृदय की ज्‍वाला है, दास्‍ता की पीड़ा और उसके विरूद्ध विद्रोह की भावना है। पीड़ित मानवता और दलित समाज के प्रति दिनकर की सहानुभूति सहज ही फूट पड़ी है। आपकी द्वितीय श्रेणी की रचना में विश्‍व कल्‍याण की महती भावना की अभिव्‍यक्‍ति हुई है। वास्‍तव में देखा जाये तो ऐसी ही रचनायें विश्‍व कल्‍याण की पोषक हैं। कवि विश्‍व क्रांति द्वारा शांति चाहते हैं। विश्‍व की विषम परिस्‍थितियाँ उनको उसी प्रकार उद्वेलित करती हैं जिस प्रकार देश की विषम परिस्‍थितियाँ उन्‍हें चैन नहीं लेने देती।

दिनकर जी की राष्‍ट्रीय चेतना वर्तमान की पुकार से सजग होती है और क्रांति का नारा लगाती है। उन्‍हें शक्‍ति के प्रति अगाध आस्‍था है।

बल के सम्‍मुख विनत भेड़-सा,

अम्‍बर शीश झुकाता है ?

इससे बढ़ सौन्‍दर्य दूसरा

तुमको कौन सुहाता है ?

है सौन्‍दर्य शक्‍ति का अनुचर

सुन्‍दरता निस्‍सार वस्‍तु है

हो न साथ में शक्‍ति अगर ?

दिनकर की राष्‍ट्रीय चेतना पर सत्‍य और अहिंसा के प्रभाव के दो स्रोत हैं - ;1द्ध प्रतीक परम्‍परा का प्रभाव ;2द्ध गाँधी का प्रभाव। दिनकर जी जहाँ एक ओर अहिंसावादी नीति का विरोध करते हैं तो दूसरी ओर शक्‍ति और क्रांति के महत्‍व का वर्णन करते हैं। ‘परशुराम की प्रतीक्षा' में अहिंसा की नीति का विरोध करते हुये प्रतिशोध शक्‍ति की प्रशंसा करते हुये कहते हैं -

गीता में जो त्रिपिटिक पढ़ते हैं,

तलवार गलाकर जो तकली गढ़ते हैं।

शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,

शेरों को सिखलाते हैं कार्य अजा का

जब तक प्रसन्‍न वह अनल सुगुण हंसते हैं,

है जहाँ खड़ग अब पुण्‍य वही रखते हैं।

वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्‍य का रूप है

वास्‍तविक मर्म जीवन का जान गये हैं

हम भलीभांति तुमको पहचान गये हैं

हम समझ गये हैं खूब धर्म के छल को

दम की महिमा को और विनय्‌ के बल को।

दिनकर जी प्रारम्‍भ से ही भारतीय संस्‍कृति के गरिमामय राष्‍ट्रीय पात्रों की तलाश में व्‍यस्‍त रहे, भारत के राष्‍ट्रीय व्‍यक्‍तित्‍व के निर्माण के लिये महाभारत कालीन शौर्य सम्‍पन्‍न स्‍फूर्त व्‍यक्‍तित्‍वों को तराश कर प्रस्‍तुत किया। अतीत के जीवन्‍त पात्रों में कवि ने उनके जीवन में पराधीनता की घुटन के साथ जागरण का अदम्‍य संकल्‍प भर दिया। यही नहीं भारतीय आत्‍मा में क्रांतिबीज को जन्‍म देकर स्‍फूर्तिवान दिनकर ने नये सांस्‍कृतिक मूल्‍यों के साथ भारतीय समाज को एक राष्‍ट्र के रूप में स्‍थापित करने की कोशिश की। आपके व्‍यक्‍तित्‍व के बारे में डॉ. मैथिली शरण गुप्‍त ने लिखा है कि बिहार प्रान्‍त की पावन धरती में सोये हुये शक्‍तिकण से सम्‍भूत रामधारी सिंह दिनकर की काव्‍यात्‍मा ने इतिहास को अंगड़ाई लेने को विवश कर दिया। राष्‍ट्रीय ओज के इस अमर गायक की लेखिनी ने भारतीय पौरूष को ऐसे ललकारा कि कुरूक्षेत्र के युद्ध का धर्म धारणा करने की दिशा में भारतीय महारथी प्रवृत्‍त होने को विवश हो गये। युद्ध एवं शांति की दिशा में मौलिक चिन्‍तन को काव्‍यात्‍मक रूप में प्रस्‍तुत करने का उन्‍होंने सफल प्रयास किया।''

दिनकर की राष्‍ट्रीयता आपदा धर्म के रूप में परशुराम की प्रतीक्षा में व्‍यक्‍त हुई है। इनमें युद्धकाल की राष्‍ट्रीयता है। शांति और निर्माण काल में जिस राष्‍ट्रीयता की आवश्‍यकता होती है उससे युद्धकाल में काम नहीं चल सकता। युद्धकाल में राष्‍ट्रीयता के अन्‍तर्गत शक्‍ति, तलवार और क्रांति का महत्‍व सहज ही मान्‍य हो जाता है। दिनकर जी की विचारधारा में कायरता, समझौता, झुकना, पराजय, निराशा एवं पलायनवादिता का समावेश नहीं है अपितु ललकार के साथ जय का उद्‌घोष है। अहिंसा के विरोधी दिनकर ने वीरता का निनाद किया है। ‘परशुराम की प्रतीक्षा' के परशु भारतीय जनता के सामूहिक रोष-आक्रोश और शक्‍ति के प्रतीक हैं। इसके लिए दिनकर जी भारतीय राजतन्‍त्र, विचार दर्शन और नेताओं की निर्वीय शान्‍ति नींव को उत्‍तरदायी मानते हैं जिससे भारत के शक्‍तिबल का विकास नहीं हो सका और चीन को आक्रमण करने का दुस्‍साहस हुआ। इसलिये गाँधीवाद के नाम पर चलती हुई कृत्रिम आध्‍यात्‍मिकता और निर्बाध कल्‍पनाओं का आपने खण्‍डन एवं विरोध किया। भारत की शान्‍ति और तपस्‍या नीति की अव्‍यावहारिकता और भ्रान्‍त आध्‍यात्‍मिकता पर व्‍यंग्‍य किया, साथ ही राजनीतिज्ञ और सत्‍ताधारियों के भ्रष्‍टाचारों तथा आन्‍तरिक अवस्‍थाओं की ओर संकेत किया ऐसी अभिव्‍यक्‍ति कहीं-कहीं उग्र और चोट करने वाली बन गई है। जैसे -

घातक है जो देवता सदृश्‍य दिखता है,

लेकिन कमरे में गलत हुक्‍म लिखता है।

जिस पापी को गुण नहीं, गोत्र प्‍यारा है,

समझो उसने ही हमें यहाँ मारा है।

जो सत्‍य जानकर भी न सत्‍य कहता है,

या किसी लोभ से विवश मूक रहता है।

उस कुटिल राजतन्‍त्री कर्दम को धिक है,

यह मूक सत्‍य हन्‍ता कम नहीं अधिक है।

इसकी सार्थकता चीन के आक्रमण की घटना से और प्रबल हो गई कि लाल लपट से गाँधी की, भारत की और भारतीय संस्‍कृति की रक्षा करने के लिये हमें दृढ़ सैन्‍य बल का सहारा लेना पड़ेगा तथा शक्‍तिशाली बनकर ही हम उस लपट का मुँह तोड़ जबाव दे सकते हैं। अपने जीवन दर्शन में परमार्थ और मानवतावाद के प्रसार में तभी सक्षम होगा जब उसकी सैनिक शक्‍ति सुदृढ़ और बलवती होगी यह दिनकर की राष्‍ट्रीय भावना का एक नया स्‍वरूप है।

दिनकर की राष्‍ट्रीयता वास्‍तव में भाववादी राष्‍ट्रीयता है जिसमें चिंतन की संगति की अपेक्षा आवेग और आक्रोश ही प्रधान है। गुलामी के वातावरण में अंग्रेजों के शोषण और अत्‍याचारों की प्रतिक्रिया का शक्‍तिशाली रूप दिनकर के काव्‍य में दिखाई देता है। उसमें उत्‍साह, उमंग, प्रेरणा और आस्‍था है। आपने हिंसा को प्रशस्‍ति के साथ-साथ अहिंसा और विश्‍व-प्रेम का भी वर्णन किया है। जो उनकी राष्‍ट्रीयता, अन्‍तर्राष्‍ट्रीयता या मानवतावाद में परिणत होने का प्रयास करती है। भीष्‍म, युधिष्‍ठिर, कर्ण और परशुराम सभी मानवतावादी और आदर्शवादी हैं। दिनकर उस पुनरूत्‍थानवादी धारा के राष्‍ट्रीय कवि हैं जो भारतेन्‍दु से आरम्‍भ होकर छायावादी काव्‍य में व्‍यक्‍त हुई है। जिस प्रकार जयशंकर प्रसाद जी ने चन्‍द्रगुप्‍त के माध्‍यम से प्राचीन पात्रों में कर्म और शक्‍ति का सौन्‍दर्य दिखाया है। उसी प्रकार दिनकर ने भीष्‍म, परशुराम आदि के माध्‍यम से कर्म और क्रांति का प्रेरक वर्णन किया है किन्‍तु शक्‍ति और क्रांति का जो वेग खुलकर दिनकर के काव्‍य में व्‍यक्‍त हुआ है। वह अन्‍य में नहीं मिलता है।

बाह्‍य आक्रमणों के संकट काल में दिनकर जी ने अनेक ओजस्‍वी कवितायें लिखकर देश को एक नया जोश, नई चेतना दी। राष्‍ट्र की रक्षा बलिपंथिओं के कन्‍धों पर है, इन्‍हीं के कारण राष्‍ट्र एवं संस्‍कृति की रक्षा सम्‍भव है। आपने राष्‍ट्रीय विचारधारा द्वारा समाज को नयी दिशा देकर युग चेतना को व्‍यक्‍त किया। आपके अनुसार राष्‍ट्र की रक्षा एवं प्रगति अहिंसावादी विचारधारा से सम्‍भव नहीं हैं, अहिंसा पुरूषार्थ को दुर्बलता प्रदान करती है, धर्म के हित की गई हिंसा पाप नहीं है। दिनकर जी ने कर्मवाद की पृष्‍ठभूमि में समग्र सृजन किया है जो उनकी राष्‍ट्र निष्‍ठा को व्‍यक्‍त करता है।

रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी सृजनशीलता में राष्‍ट्रीय भावना के सम्‍बन्‍ध में स्‍वयं लिखा है - ‘‘संस्‍कारों से मैं कला के सामाजिक पक्ष का प्रेमी अवश्‍य बन गया था, किन्‍तु मेरा मन भी चाहता था कि गर्जन तर्जन से दूर रहूँ और केवल ऐसी ही कवितायें लिखूँ जिनमें कोमलता और कल्‍पना का उभार हो। ...... और सुयश तो मुझे हुंकार से ही मिला, किन्‍तु आत्‍मा अब भी ‘रसवन्‍ती' में बसती है। ....... राष्‍ट्रीयता मेरे व्‍यक्‍तित्‍व के भीतर से नहीं जाती। उसने बाहर से आकर मुझे आक्रांत किया है।'' चक्रवात की भूमिका दिनकर के काव्‍य में प्रणय और राष्‍ट्रीयता की दो समान धारायें प्रवाहित हुयी हैं। यद्यपि उपर्युक्‍त कथन से यह स्‍पष्‍ट होता है कि राष्‍ट्रीयता ने उन्‍हें बाहर से आकर आक्रांत किया है तथापि राष्‍ट्रीयता उनके व्‍यक्‍तित्‍व का अभिन्‍न अंग बन गई है।

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clip_image001युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्र्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानो से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं

सम्‍पर्क ः वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता हिन्‍दी विभाग, दयानन्‍द वैदिक स्‍नातकोत्तर महाविद्यालय उरई-जालौन (उ0प्र0)-285001 भारत

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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रचनाकार: वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : राष्ट्रीयता के राष्ट्र नायक : रामधारी सिंह दिनकर
वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : राष्ट्रीयता के राष्ट्र नायक : रामधारी सिंह दिनकर
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