रचना श्रीवास्तव की कहानी : पश्चाताप के मोती

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   आज कजरी को गए करीब ५ दिन हो गए थे. कुछ ख़बर नहीं दी उसने. उस की आदत सी पड़ गई थी. रवि यही कोई ५ साल का था जब वो यहाँ आई थी और दीपा १साल की...

paschataap ke moti  
आज कजरी को गए करीब ५ दिन हो गए थे. कुछ ख़बर नहीं दी उसने. उस की आदत सी पड़ गई थी. रवि यही कोई ५ साल का था जब वो यहाँ आई थी और दीपा १साल की थी आज दीपा अपने पति के साथ बेंगलौर में खुशी खुशी रह रही है. और ये रवि उफ़ कितना बदमाश था अजय से हमेशा लड़ाई होती थी इस की ,हम तो सोचते थे की पढ़ेगा ही नहीं. पर देखो ऍम बी ऐ कर लिया और अमेरिका की एक कम्पनी से बुलावा आया चला गया. १साल हो गए डैलस में रहता है. पर मुझको ई मेल बराबर लिखता है. लेकिन अबकी जो कजरी के साथ गया तो आज इतने दिनों में कोई ई मेल नहीं किया. अपनी इंन्हीं उधेड़ बुन में मैं लाइट जलना ही भूल गई. अवि ने आ के जलाई और "बोला क्या बात है क्या सोच रही हो जो तुम को अन्धेरे की जरूरत पड़ गई "


".कजरी की याद आ रही थी. जबसे आई है साथ रहने कभी भी अलग नहीं हुई. हर बात में मुझसे ही पूछना ये कैसे होगा और वो कैसे होगा. आप तो हमेशा काम में लगे होते है वो ही थी एक मेरा
सहारा. "
"अच्छा जी मैने तो कुछ भी नहीं किया आप के लिए है न ये घर परिवार और........"
"आप भी न चलिए छोड़िये. अब खाना खाते हैं भूख लगी है"
खाना खा के ये बेडरूम चले गए. सुबह से ईमेल चेक नहीं किया था तो मैं उसे चेक करने बैठ गई. याहू मेल खोला तो देखा रवि का ईमेल आया था -


आदरणीया बड़ी माँ
हम यहाँ ठीक से आ गये है. पर थोड़ा व्यस्त था तो आप को मेल नहीं लिख पाया आप की ये जो सहेली हैं न इन को यहाँ अच्छा नहीं लग रहा था. कहती है की हम को दीदी के पास छोड़ आओ. अब आप ही बताएं यहाँ से इतनी जल्दी जल्दी आना जाना कहाँ सम्भव है. पर सच तो ये है बड़ी माँ की मुझको भी आप की बहुत याद आती है आज मैं जो कुछ भी हूँ आप की वजह से ही हूँ वरना मैं भी कहीं छोटा मोटा काम कर रहा होता बापू की तरह. आप तो हम सभी के लिए भगवान है. हम सभी आप के आगे नत मस्तक है.
अब देखिये आप रो रही हैं न सच में मेरे आँसू चश्मे से हो के गालों तक लुढ़क आए थे कुछ भी साफ़ दिख नहीं रहा था चश्मा पोंछ के मैने आगे पढ़ना शुरू किया बड़ी माँ रोइए मत मैं तो चाहता हूँ की आप भी एक बार यहाँ आइये मेरे और अजय भइया के साथ रहिये. इस दुनिया को भी देखिये. इस बारे में सोचियेगा. चलिए बड़ी माँ अभी बन्द करता हूँ. माँ आप को प्रणाम कह रही है. जल्दी ही फ़ोन करूँगा.
प्रणाम
आपका
रवि


मेल बन्द कर के मैं भी बेड रूम मैं आगई अवि अभी भी पढ़ रहे थे मुझको देख के बोले क्या बात है स्नेह बहुत देर लगा दी.
"रवि की मेल आई थी वही पढने लगी ".
"अच्छा क्या लिखा था कजरी कैसी है ?"
जो भी रवि की मेल में लिखा था बता दिया
""अवि देखा ! न रवि कितनी बड़ी बड़ी बातें करने लगा है मुझको भगवान का दर्जा दे डाला. "
"कोई ग़लत नहीं कहा उस ने जो तुम ने उन लोगों के लिए किया है कौन करता है आज कल. अपना परिवार चलें वही बहुत है तुम ने दीपा ,रवि और अजय में कभी कोई अन्तर नहीं समझा. क्या नहीं किया पढ़ाई से लेके सभी कुछ तो तुम ने किया. मैं तो इस बात के खिलाफ था एक और परिवार की जिम्मेदारी आसन नहीं थी कहीं कुछ हो जाये तो यही सोच के मैं नहीं चाहता था की तुम ऐसा करो पर तुम ने किया और बहुत खूब किया. मुझे तो पता भी नहीं चला. तुम ने कजरी को हरिया की जगह नौकरी दिला दी. कुछ पैसे वहां से मिल जाते थे और कजरी घर का जो काम करती थी उस के पैसे भी देती थी. तुम ने उनके आत्मसम्मान का भी पूरा ख्याल रखा. मुझे तुम पर मान है . तुम सच में देवी हो. "
"नहीं ये आप क्या कह रहे हैं मैं कुछ नहीं हूँ मैं इस सम्मान के लायक नहीं हूँ रोकते रोकते भी नयन गागर छलक गई . "
'अरे क्या हो गया ?"
"नहीं कुछ नहीं बस ऐसे ही ". मैं अवि के गले लग के रोती रही. ये प्यार से मेरा सर सहलाते रहे. और मैं कब रोते रोते सो गई पता भी न चला.
सुबह अवि नाश्ता करते हुए बोले '.स्नेह क्या हुआ था कल तुम इतना रो क्यों रही थी ?"
".कुछ नहीं आप ऑफिस जाइये न ,देर हो रही है "


".ऑफिस अरे !अभी कल ही तो रिटायर हुआ हूँ भूल गईं आज से मैं आप का नौकर हूँ क्या हुक्म है मेमसाहब. "
"अरे हाँ मैं तो भूल गई थी एक आदत सी पड़ गई थी ९ :३० हुए नहीं के लगता है की आप को जाना है. आप को बुरा लग रहा होगा. है न"
"सच कहूँ तो हाँ इतनी व्यस्त ज़िन्दगी से अचानक ये खालीपन. ऐसा लगता है बहती नदी पे पुल बाँध दिया गया हो. सब कुछ स्थिर सा हो गया है. पर फ़िर भी मैं दुखी नहीं होऊंगा तुम हो न मेरे पास तुम को टाइम नहीं दे पाया इस काम के कारण अब मैं तुम्हारा ख्याल रखूँगा ,बताओ क्या करूँ"
और हम हँस दिए शाम को चाय पीते हुए ये बोले
" स्नेह एक बात कहूँ मैने कई बात एक बात महसूस की है की तुम कुछ कहते कहते रह जाती हो ,दिल की गहराइयों में बन्द एसी कौन सी बात है जो बार बार बाहर आना चाहती है और तुम जबरदस्ती उस को अन्दर धकेलती रहती हो. कह लो बोझ हल्का हो जाएगा"
'नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है आप को ऐसे ही लग रहा है. "
बात आई गई हो गई. हम दोनों फ़िर से अपने पुराने दिनों में चले गए थे अजय ,रवि , दीपा सभी अपनी दुनिया में मगन थे कजरी भी बेटे के पास खुश थी. हम ने एक घोसला बनाया था परिवार बढ़ा. घोसला भी बढ़ा. अंडे से बच्चे निकले बड़े हुए और उड़ गए. अब पुनः वही घोसला है और हम दो हैं. शाम को हम टहलते. पुरानी बातें करते ,,लाफ्टर क्लब में जाते और बिना बात के हँसते.
आज तो इतनी ज़ोर की बारिश हो रही है की लगता है सब कुछ बहा ले जायेगी तुम को याद है जब अजय होने वाला था हम मन्दिर गए थे. लौटे समय ऐसे ही बारिश हो रही थी हम कितनी देर मन्दिर में ही बैठे थे और तुम को दर्द शुरू हो गया था.
'हाँ जी कैसे भूल सकती हूँ मुझसे ज्यादा तो आप परेशान थे. फ़िर किसी तरह से आप कार चला के मुझको हॉस्पिटल तक लाये थे '
".हाँ आंधी पानी में हुआ था अपना अजय. कितना अजीब लग रहा था इस को छूते हुए कहीं गिर ही न जाए ऐसा लगता था नर्स तो कह रही थी की आप तो ऐसे पकड़ रहें हैं जैसे किसी और का बच्चा हो. "


हम दोनों मुस्कुरा दिए ,बेगम तो हो जाए इसी बात पर चाय मैं स्टेडी में जा रहा हूँ वहीं ले आना चाय ले के स्टेडी मैं आई तो देखा की इन के हाथ में मेरी डायरी है. कुछ पढ़ रहे है.
"अवि नहीं मत पढो ". कह के डायरी इनके हाथ से ले ली. देखा तो वही पेज खुला था . अब तो में सर से पाँव तक कांप गई. 'स्नेह मैं इसको पढ़ना नहीं चाहता था मैं सफाई कर रहा था तो ये हाथ लग गई मैने बस अभी खोला ही था. मै तुम्हारे मुहँ से सुनना चाहता हूँ आज कह ही डालो दिल के दरवाजे खोलो और मुझे अंदर आने दो. तुम ने ये दरवाजा मुझसे क्यों बंद कर रखे है मालूम नहीं . मेरे हाथ को पकड़ के बोले स्नेह तुम ने सुख बांटा है अपना दर्द नहीं बांटोगी?   "
"अवि ऐसा नहीं है मैने आज तक इस बात के अलावा तुम से कुछ भी नहीं छिपाया है. तुम को सब उसी समय बताना चाहती थी पर डरती थी के तुम नाराज हो जाओगे. "
'कोई बात नहीं आज तो बोलो मैं सुनना चाहता हूँ. "
"आप को याद है जब आप की पोस्टिंग गोरखपुर में हुई थी. उसी समय आप की तरक्की भी हुई थी. कमिशनर के पद पर . नई जगह नया पद सब कुछ बहुत अच्छा था. बहुत बड़ा बंगला मिला माली, ड्राइवर, रसोइया, सभी मिले थे. अजय ने १२ वीं पास कर के आई आई टी की प्रवेश परीक्षा दी थी. सभी कुछ बहुत अच्छा जा रहा था. याद है न"
'हाँ हाँ. भगवान की दया से अजय का आई आई टी कानपुर में चुनाव हो गया. हम सभी बहुत खुश थे"
"जी हाँ उसी समय बधाई देने वालों का ताँता लग गया था. साहब का बेटा था तो लोग इस अवसर को कैसे छोड़ते बस आते गए लोग. मिठाई पे मिठाई जो भी आता मिठाई लेके आता. सभी को साहब की नजर में ऊँचा उठना था. इसी बीच हम अजय के जाने की तैयारी में व्यस्त हो गए. उस की जरूरत की छोटी बड़ी सारी चीजों की लिस्ट बना ली थी हम माँ बेटे जा के ले आते थे. आप के पास पास टाइम कहाँ था. पहले बार बेटा घर से अलग जा रहा था दिल बहुत घबरा रहा था. पर जाना तो था ही न हम दोनों अजय को कानपुर छोड़ने गए थे है न '


" हुम "अवि धीरे से बोले  . वापस. घर आए तो आप अपने काम में लग गए पर मुझे तो ये बड़ा घर काटने को दौड़ता था. पूरा दिन खाली खाली. पर दिल तो लगाना ही था. मैं घर के कामों में अपने आप को लगाये रखती अजय के. जाने की धुन में देखा नहीं था पूरा फ्रिज़ मिठाइयों से भरा था. जो अच्छी जगह की मिठाइयां थी और जो ठीक बची वो किसी किसी के घर भिजवा दी और जो बची वो नौकरों में बाँट दी. तब जा के थोड़ी सफाई हुई. इसी तरह से घर जो नौकरों के भरोसे था वो अब मेरी निगरानी में रहता. घर का कोना कोना मैने साफ करवा दिया. आप भी तो बहुत खुश रहते थे कहते थे ये घर कम होटल ज्यादा लगता है , हम बहुत हँसते इसी बात पर . मुझे तो बस बताना होता था काम तो नौकर ही करते थे उस दिन सन्डे था. हम शाम को साथ साथ बगीचे में टहलते थे.
"हाँ याद है"
.तो फ़िर ये भी याद होगा की फूल मुरझा रहे थे क्यारी सूखी हुई थी  ,मैने आपने ड्राईवर से कहा की जरा हरिया को बुला दे मेरे माली का नाम था. तो वो बोला की मेमसाहब वो तो एक हफ्ते से नहीं आ रहा है. क्या एक हफ्ते से किसी ने मुझको बताया क्यों नहीं. मैं हुत गुस्सा हुई थी तो तुम ने कहा था कोई बात नहीं आ जायेगा. चलो छोटे तुम ही पानी दे दो.
पर इसी तरह १० दिन बीत गए मुरारी नहीं आया. ११ वें दिन देखा की उसकी बीवी काम कर रही है अरे तू हरिया कहाँ है? कहीं शराब पीके पड़ा होगा घर में. तुम इस को छोड़ क्यों नहीं देती. कितना परेशान करता है ये तुम को.
वो बहुत धीरे से बोली मेमसाहिब हरिया हम का छोड़ के चला गै.
क्या कहा किसके साथ तुझ जैसी को छोड़ के वो कैसे जा सकता है.
नाही नाही मेमसाहिब केहू के साथै नाही तब दुनिया ही छोड़ देहलें . .मुइ गईलें. और वो जोर जोर से रोने लगी
कब क्या होगया था
कछु नाही बड़का बिटुआ सकूल गइल रहलें  . दुपहरिया के इ आइलें खाना खाई के कान कहाँ से जिलेबी लाइल रहिलें.उहे खाई के सुत गइलें. बस थोडी देर मा उलटी सुरु हो गइल जबतक अस्पताल लेके पहुँचली तब तक ता......................और वो फ़िर से बहुत ज़ोर ज़ोर से रोने लगी.

 

जलेबी मैं सोचने लगी अरे वो तो. ................आप ने कितनी बार कहा था की न बसी खाया करो न किसी को दिया करो.
हाँ क्यों की कितनी बार तो लाइट जाती है चीजें ख़राब हो जाती है.
पर मैने आप की बात पर ध्यान नहीं दिया और जानते है जब मैं मिठाई बाँट रही थी तो ये जलेबी मैने ही उसको दी थी
क्या. ......क्या कहा तुम ने !!!!!!!!!!!!!!!
हाँ मैने ही दी थी वो जिलेबी उस को मेरा दर्द पिघल के आंसू बन बह रहा था
फ़िर उस के बाद तो मेरा दिमाग शून्य हो गया मैं गिर पड़ी सभी दौडे मुझे पानी का छीटा मारा . सभी कहरहे थे की कितनी नरम दिल है हरिया के जाने का दुःख सह नाही पा रहीं हैं पर मैं ही जानती थी की क्या हुआ है. जब थोड़ा संभली तो घर के अंदर आ गई. हरिया की बीवी को भी अंदर बुला लिया.

 

क्या नाम है तुम्हारा?
कजरी
कौन कौन है तुम्हारे घर में ?
"" एक गो बिटवा है ५ साल के और एक बिटिया है १ साल के. अब हमार का होई मेमसाहिब हमका काम पे राखी लो"
"हाँ हाँ तुम ऐसा करो यहीं पीछे जो कमरा बना है उसी में आ के रहो तुम को हरिया की जगह रख लेंगे. "
कजरी मेरे पैर छूने लगी "आप भगवान बानी बहुत दया वाली बानी जिन्नगी भर उपकार मानिब "वो बोलती जा रही थी और रोती जा रही थी. पर में तो न किसी से कुछ कह सकती थी न ही रो सकती थी. वो उस के वचन कानों में चुभ रहे थे "आप भगवान बानी..................."मैं तो हत्यारिन थी उस के हरिया की यदि उस को पता चल जाए तो शायद मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी आप ने मेरे कहने से उस को हरिया की जगह पे रखवा दिया था. हमारा तबादला हो गया यहाँ तो वो नहीं मानी और हमारे साथ यहाँ आ गई. आज तक जो भी मैने किया उसी पाप को धोने की छोटी सी कोशिश थी .
"स्नेह इतनी बड़ी बात तुम ने मुझसे छिपाई. तुम ने मेरी बात नहीं मानी तुम्हारी एक छोटी सी भूल ने एक जीवन ले लिया और साथ में मरा एक पूरा परिवार"
"मैं क्या करती मैं डर गई थी. आज तक मैं इसी बोझ के साथ जी रही हूँ इन लोगों के लिए जो भी करती हूँ बेमानी लगता है"


"अवि ने मेरे आंसू पोंछते हुए कहा स्नेह तुम ने जो किया है वो अपराध तो है पर उस की जो सजा तुम ने अपने को दी है जो प्रायश्चित किया है वो प्रशंसा के काबिल है. तुम ने अपने बल पर उस परिवार का भविष्य बना दिया है. हरिया होता तो इतना कुछ न कर पाता"
तभी दरवाजे की खट से हम दोनों का ध्यान उस ओर गया. देखा तो कजरी ओर रवि खड़े थे. मैं तो हड़बड़ा गई. कजरी रो रही थी और रवि पथराई आंखों से मुझको देख रहा था. घर में हम चार थे पर अजीब सी खामोशी थी. बात जो सालों से छुपी थी आज हवाओं में थी.
"कजरी प्लीस मुझको माफ़ कर दो मैंने जान के कुछ नहीं किया  "
" दीदी मैने उनको तड़पते देखा है. अपनी दुनिया को अपने सामने उजड़ते देखा है. उस समय यदि आप ये कहती तो शायद मैं आप को कभी माफ़ न कर पाती. पर दीदी आप यदि चाहती तो हम को जीवन की धूप में जलने को छोड़ सकती थी. लेकिन आप ने मुझे और मेरे बच्चों को अपने आँचल के साये तले समेत लिया. हमारे आंसुओं को प्रेम के गंगा जल से धो दिया आप दर्द की जिस अग्नि में पूरे जीवन भर जलती रहीं हैं उसको मैने महसूस किया है पर तब में कुछ जानती नहीं थी आज समझ पा रही हूँ. इतने पश्चाताप पर तो भगवान भी माफ़ कर देगा फ़िर मैं तो इन्सान हूँ. ".


मैं कजरी के गले लग गई . पीड़ा की जो नदी मेरे अंदर थी बहती रही और उसका अंचल भिगोती रही. प्यार जो डर के धागे में बंधा था उन्मुक्त हो हमारे बीच बह रहा था.

नाम

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रचनाकार: रचना श्रीवास्तव की कहानी : पश्चाताप के मोती
रचना श्रीवास्तव की कहानी : पश्चाताप के मोती
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