श्रीनिवास कृष्णन का आलेख - प्रेम : जगत का विलक्षण तत्व

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भाँ ति-भाँति के पुष्पों से सुसज्जित किसी वाटिका के पुष्प जिस तरह से किसी मंदिर की छटा बिखेरते हैं, जिस तरह से किसी मंदिर के आगे जलता दीया अप...

भाँति-भाँति के पुष्पों से सुसज्जित किसी वाटिका के पुष्प जिस तरह से किसी मंदिर की छटा बिखेरते हैं, जिस तरह से किसी मंदिर के आगे जलता दीया अपनी रोशनाई को फैलाकर अपनी अर्थवत्ता को प्रगट करता है और जिस तरह शक्कर व्यक्ति के स्वाद में मिठास को घोलकर, उसे आनन्द विभूषित कर देती हैं, उसी तरह हमारा यह जगत प्रेम जैसे विलक्षण तत्व की सघनता में अपनी सार्थकता को प्राप्त करने के साथ ही सौंदर्यानुराग की अनबूझ अनुगूँज से महककर न केवल आल्हादित हो रहा है वरन् आज हमने इसके द्वारा परिपूर्ण रूप से तृप्त होने के रहस्य को जान लिया है । यही वजह है कि विद्वानों ने प्रेमहीन जगत को निरर्थक, निसार व मूल्यहीन करार दिया है ।

वास्तव में यह सम्पूर्ण जगत और इसकी सभी वस्तुएँ किसी अद्भुत रहस्यों के द्वारा एक दूसरे से गहनतौर पर जुड़ी हुई है । चूँकि मनुष्य इस जगत की एक श्रेष्ठतम कृति है तथा वह एक अति संवेदनशीन प्राणी है इसलिए हमने प्रकृति के इस अद्भुत रहस्य को न केवल जाना है वरन् हम इससे विचलित भी हुए हैं । यही वजह है कि आज प्रत्येक व्यक्ति अनुराग, वात्सल्य, भक्ति, लगाव आदि जैसे प्रेम के विविध रूपों के सहारे दूसरों के साथ जुड़ने के लिए अत्यंत व्याकुल नजर आता है ।

स्वयं दार्शनिकों के अपने मतानुसार यह सम्पूर्ण जगत और इसकी विभिन्न वस्तुएँ किसी पदार्थ के विखण्डन का ही परिणाम है और चूँकि यहाँ की सभी वस्तुएँ और प्राणी, पदार्थ के खंडित होने की वजह से निर्मित हुए है इसलिए वे स्वयं को अपूर्ण व अतृप्त महसूस करते हैं । मनुष्य इस जगत का अति संवेदनशील प्राणी है इसलिए उसने इस रहस्य को आत्यांतिक गहराई से अनुभव किया है और उसने अनुराग, लगाव, वात्सल्य आदि जैसे प्रेम के विविध रूपों के सहारे दूसरों के साथ जुड़कर स्वयं को तृप्त करने का रहस्य जान लिया है, यही वास्तव में प्रेम का भी अपना रहस्य है ।

इसी प्रकार प्रेम जीवन में संवेग को निर्मित करता है अर्थात् प्रेम से जीवन में गति आती है । यही वजह है कि बहुत से विद्वानों ने प्रेम को ही जीवन माना है । जब कभी किसी के जीवन में प्रेम का उदय होता है तो उसमें जीने की एक नई लालसा उमड़ पड़ती है क्योंकि प्रेम से व्यक्ति का मन प्रफुल्लित हो उठता है और उसमें उत्साह की एक नई तरंगें प्रवाहित होने लगती है । जो कि ऊर्जा का रूप धारण करके व्यक्ति में जीने का अदम्य साहस पैदा करती है । यह कुछ इस प्रकार से कि जिस प्रकार हमारे स्कूटर का "एक्सीलेटर" उसकी गति को बढ़ाने का कार्य करता है । ठीक उसी प्रकार प्रेम की ऊर्जा मिलने से जीवन में भी गति आ जाती है । यही कारण है कि बहुत से कवियों ने प्रेम के द्वारा आकाश में स्वच्छंद विचरण की कल्पना भी की ।

वास्तव में यह सम्पूर्ण जगत और इस पर आधारित जीवन एक अनजानी,  अनपहचानी यात्रा है क्योंकि हममें से बहुत से लोग तो यह भी नहीं जानते कि प्रकृति द्वारा उन्हें यह जीवन किस विशेष उद्देश्य के तहत प्रदान किया गया है और वे यह जीवन क्यों कर झेल रहे हैं ।

विद्वान दार्शनिकों के अपने मतानुसार यह सम्पूर्ण जीवन समष्टि के साथ एक हो जाने की यात्रा है और प्रेम इस यात्रा की पहली सीढ़ी है क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति किसी के साथ प्रेम में पड़ता है तो वह उसके साथ आत्यांतिक गहराईयों में एक हो जाता है । इससे उसे असीम आनन्द की अनुभूति होने लगती है । यही नहीं यह आनन्द व्यक्ति के दिल की गहराईयों में पहुँचकर उसे व्याकुल भी कर देती है तथा उसके प्यास को बढ़ा देती है । इन सब वजहों से व्यक्ति इस आनन्द के विस्तार हेतु अन्यों के साथ भी प्रेम के सहारे जुड़ने के लिए प्रेरित होता है और इस तरह उसकी प्रेम के सहारे समष्टि के साथ एक हो जाने की यात्रा शुरू हो जाती है ।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि मनुष्य बैचेन व अशांत चित्त के साथ ही जीता है और उसे यह बैचेनी जन्म के साथ स्वाभाविक रूप में प्राप्त होती है । वस्तुत: यह बैचेनी ही व्यक्ति को जीवन भर कुछ करने के लिए अभिप्रेरित करती है ।

जब जीवन भर कुछ करने और कुछ न करने के बाद भी व्यक्ति अपने जीवन में एक खालीपन व बैचेनी का अनुभव करता है तो वह अत्यधिक व्याकुल हो उठता है । वास्वत में भिन्न-भिन्न प्रकार के धर्मों व संप्रदायों की उत्पति व्यक्ति की इसी अशांति का परिणाम है किन्तु आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के अपने मतानुसार मनुष्य जीवन की यह अशांति और कुछ नहीं, उसके द्वारा प्रेम को ठीक ढंग से न समझने व उसे अपने जीवन में न अपनाने का ही परिणाम है ।

इसे तार्किक ढंग से समझाते हुए मनोवैज्ञानिकों ने बताया कि जब भी कोई बच्चा माँ के गर्भ में होता है तो वह माँ के आहारों के साथ स्वयं भी पोषण प्राप्त करता है और वह माँ के साँसों के साथ स्वयं साँस लेता है । इससे उसे एक अपूर्व तरह की शांति व सुख का अहसास होता है क्योंकि उस वक्त उसका अपना व्यक्तित्व उसकी माँ के साथ जुड़ा होता है और जब वह इस धरती पर आता है तो चिकित्सक माँ के साथ जुड़े बच्चे की नली को बड़ी बेरहमी से काटकर, उसे एक अलग व्यक्तित्व प्रदान करता है किन्तु इससे व्यक्ति के अपने अचेतन मन में, जीवन भर एक व्यक्तित्व के साथ कटकर अलग हो जाने का घाव बना रहता है तथा उसके अपने मन में माँ के गर्भावस्था में रहने के दौरान अचेतन की दशा में प्राप्त उस अपूर्व शांति की तलाश में जीवन भर बैचेन रहता है । यहीं वजह है कि व्यक्ति का मन प्रेम को पाने के लिए सदैव व्याकुल रहता है क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति प्रेम की गहराई में पड़ता है तो उसका हृदय उस दूसरे व्यक्ति के साथ मिलकर धड़कना शुरू हो जाता है और इस तरह प्रेम में दो व्यक्ति आपस में मिलकर एक हो जाते हैं जिससे व्यक्ति अचेतन की स्थिति में प्राप्त अपने उस सुख को पुन: अनुभव करने लगता है ।

संक्षेप में देखा जाए तो 'प्रेम' इस जगत की अद्भुत व चमत्कारी खोज है क्योंकि एक तरफ प्रेम जहाँ व्यक्ति में जीवन के प्रति अनुराग पैदा कर, उसके जीवन को गति प्रदान करती है वहीं दूसरी तरफ यह मनुष्य को समष्टि के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित भी करती है । इतना ही नहीं प्रेम-पूर्ण सम्बन्धों की साकी में डूबकर ही मनुष्य, जहाँ अपूर्व आनन्द व शांति का अनुभव करता है वहीं प्रेम ही मनुष्य के स्वयं को और दूसरों को जानने का मापदंड रूपी यंत्र है । अत: यह सम्पूर्ण जगत प्रेम जैसे विलक्षण तत्व की उपस्थिति मात्र से ही महिमामंडित होकर धन्य हो गई है ।

- श्रीनिवास कृष्णन

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परिचय

तमिलनाडु में तिरूनेल्लवेली जिले के छोटे से गाँव तिरूचेन्दुर में दिनांक 25-08-1964 को जन्में श्री श्रीनिवास कृष्णन मूलत: दक्षिण भारतीय तमिळ भाषी हैं और वे हिन्दी साहित्य-जगत के उदीयमान लेखक होने के साथ ही राष्ट्रभाषा हिन्दी के कट्टर समर्थक भी है । उनकी अपनी रचनाएँ दैनिक 'देशबन्धु' जबलपुर, दैनिक 'राजस्थान पत्रिका' जयपुर, अहमदाबाद तथा सूरत संस्करण, दैनिक 'चमकता सितारा' चेन्नई, दैनिक 'गुजरात वैभव', अहमदाबाद, दैनिक 'यंगलीडर', अहमदाबाद, पाक्षिक पत्रिका 'राजभाषा मिलाप' हैदराबाद आदि में प्रकाशित होने के साथ ही, गृह मंत्रालय, भारत सरकार राजभाषा विभाग की उत्कृष्ट पत्रिका 'राजभाषा भारती' तथा भारतीय रिजर्व बैंक की बैंकिंग विषयक श्रेष्ठ त्रैमासिक पत्रिका 'बैंकिंग चिन्तन-अनुचिंतन' में भी प्रकाशित हो चुकी हैं । इसके साथ ही उन्होंने विभिन्न नगर-स्तरीय, राज्य-स्तरीय और राष्ट्र स्तर की प्रतियोगिताओं में भी बड़ी संख्या में पुरस्कार अर्जित किए हैं ।

श्रीनिवास कृष्णन वर्तमान में विजया बैंक की वराछा शाखा, सूरत में सहायक प्रबन्धक के पद पर कार्यरत हैं ।

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: श्रीनिवास कृष्णन का आलेख - प्रेम : जगत का विलक्षण तत्व
श्रीनिवास कृष्णन का आलेख - प्रेम : जगत का विलक्षण तत्व
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