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विजय शर्मा की कहानी : क्या था यह?

मुझे आभास हुआ कोई मेरे सिरहाने खड़ा है. मैंने आँखें खोलीं वे मेरे सिरहाने खड़े थे लहीम-शहीम गोरा चिट्टा शरीर, वृषभ स्कंध, ऊँचा चौड़ा दमकता मुख माथा, वही अजानबाहु. एक सुदर्शन पुरुष की कल्पना की साकार प्रतिमा. मैं अचकचा कर उठ बैठी, कमरे में कोई नहीं था. घड़ी पर निगाह डाली २.३५ हो रहे थे. थोड़ी देर यूँ ही बैठी रही. घर में कोई आवाज न थी. उठ कर बगल के कमरे में गई. पति कोई किताब पढ रहे थे. उनसे पूछा, ‘‘क्या आप अभी मेरे कमरे में आए थे?’’ किताब में आँख गड़ाए हुए ही उन्होंने गर्दन हिला कर ऊँ हूँ कर दी. मैंने फिर पूछा ‘‘घर में कोई आया था?’’ बोले ‘‘नहीं.’’ मेरे मन में अभी भी शंका थी.

मेरी आवाज में जरूर कोई कम्पन रहा होगा, पति ने किताब से सिर उठा कर मेरी ओर देखा चेहरे पर जरूर कुछ अजीब रहा होगा, इसीलिए उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है? तबीयत तो ठीक है न?’’ मेरा मन अभी भी स्थिर न था. मैंने उनसे फिर पूछा, ‘‘आप सच कह रहे हैं. अभी आप मेरे कमरे में नहीं आए थे.’’ वे बोले ‘‘नहीं, पर बात क्या है?’’ मैंने बताया, ऐसा लगा मानो कोई मेरे सिरहाने खड़ा था.’’ जवाब मिला, ‘‘सपना देखा होगा.’’ और सिर फिर किताब में घुसा लिया.

आज काफी दिनों के बाद दोपहर को सोने का मौका मिला था. वरना दोपहर को झपकी लेने की लक्जरी हमारे जैसे प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाने वालों के भाग्य में कहाँ. खा-पीकर लेटी थी. आँख बस अभी लगी थी कि वे सिरहाने आ कर खड़े हो गए.

ठीक उसी रूप में जिस रूप में मैंने उन्हें करीब बीस साल पहले देखा था. फर्क यह था कि तब वे अपने बिस्तर पर औंधे लेटे थे और मैं दरवाजे पर खड़ी थी और आज मैं लेटी थी और वे मेरे सिरहाने खड़े थे. वे उम्र में मुझसे काफी बड़े थे. मैं बीस की और वे पचास के करीब. मैं उनकी निगाह में बच्ची थी पर मेरे लिए वे मेरे हीरो थे. उन दिनों आजकल की तरह लड़कियाँ अपने मनपसन्द फिल्मी हीरो की तस्वीरें अपनी अल्मारी पर पिन अप नहीं करती थीं. न दीवार पर उनके पोस्टर लगाती थीं. वैसे भी वे कोई क्रिकेट सितारे या फिल्मी अभिनेता न थे. वे जीते-जागते मेरी आँखों के सामने थे. जब वे हमारे घर आते मैं दौड़ कर उनके लिए पानी ले आती. वे माँ-पिता से बातें करते मैं किवाड़ की ओट से उनकी बातें सुनती, उन्हें निहारती रहती. माँ उनसे सीधे बात नहीं करती थीं जो कुछ कहना होता मेरे मार्फत कहलातीं. मैं उनके रंग रूप पर लट्टू थी उनकी याददाश्त की दीवानी थी गालिब, मीर, जौक उनकी जबान से झरते रहते थे. उन्हीं की सोहबत-क्या इसे सोहबत कहा जा सकता है?-से मुझे उर्दू शायरी का ज्ञान और उससे लगाव हो गया जो आज तक मुझ पर तारी है. उनसे सुन सुन कर न जाने कितने शेर मेरी जबान पर चढ़ा गए. पर यह सब मैं किवाड़ की ओट से करती थी जब वे और पिता मिल बैठते तो शायरी की बहार आ जाती थी. इस बड़ों की महफिल में हम बच्चों की बस एक भूमिका होती थी बीच-बीच में चाय-पानी रख आना.

पर उससे ज्यादा उनके प्रति मेरे मन में दया सहानुभूति और प्यार था. मैं उनकी देख-रेख करना चाहती थी. उनका घर मेरे कॉलेज के रास्ते में पड़ता था. बहुत बड़ी कोठी थी उनकी पर रहते वे अकेले थे. उन्होंने शादी न की थी और शायद इसीलिए वे मुझे बड़े बेचारे, बड़े निरीह लगते थे. मैं सोचा करती काश मैं उन्हें अच्छा-अच्छा खाना बना कर खिला पाती. जब कमीज के बटन टूट जाते तो बटन टाँक पाती. असल में सारी खुरापात की जड़ यह कमीज का मरा बटन ही था. एक दिन वे हमारे घर आए, संग में एक शर्ट लाए थे. उन्होंने शर्ट मुझे देते हुए कहा बटन टूट गया है टाँक दूँ. ऐसे काम मैं सदा माँ को धरा देती थी पर होनी को कौन टाल सकता है. माँ भीतर किसी काम में व्यस्त थीं अतः मैं सूई डोरा ले खुद हे बटन टाँकने बैठ गई. और तब पहली बार मेरे मन में उनके लिए प्यार उमड़ा. बेचारे अब तक क्वाँरे हैं. कैसे रहते होंगे अकेले? जिन्दगी के कितने सारे काम हैं जो केवल औरतें ही कर सकती हैं. उनकी शर्ट पर बटन टाँकते हुए मेरा दिल भी उसमें टँक गया और जब शर्ट वापस की तो मेरा मन मैंने उन्हें सौंप दिया वे इन सब से बेखबर थे.

उन्होंने मुझे कभी कोई तवज्जो नहीं दी. कभी मुझे घास नहीं डाली वे किसी को भी घास नहीं डालते थे. परिचितों के बीच बड़े मस्त मौला माने जाते थे. उनकी चाल-ढाल में एक बेफिक्री झलकती थी. जब अपने पर आ जाते तो सामने वाले की ऐसी-की-तैसी कर डालते. एक और अफवाह मैं उनके विषय में अपने बड़ों से सुनी थी. वे अपनी कोठी में निपट अकेले रहते थे वह भी बिल्कुल नंग धड़ंग. मगर वे जब भी हमारे घर आए सदा पूरे कपड़ों में एकदम शरीफों की तरह.

एक बार वे कई दिनों तक न आए इंतजार करते-करते मेरा बुरा हाल. ध्यान दरवाजे पर लगा रहता. कान उनके ठहाके सुनने को बेताब, मन सूरत देखने को तरसा हुआ. माँ उनके ठहाकों को छत फाड़ ठहाके कहतीं. बात बात पर खूब खुल कर हँसते थे. माँ उन्हें पागल कहती थीं. एक दिन मुझे माँ पर बड़ा गुस्सा आया. वे पिता से कह रहीं थीं यदि वे हमारे बेटे (मेरे भाई) को गोद ले लें तो उनकी सम्पत्ति यूँ बर्बाद न होगी. मुझे लगा कह दूँ उनकी सम्पत्ति है जो चाहें करें जिसे चाहें दे दें. पर बड़ों के बीच बोलना नियम के खिलाफ था. माँ का स्वार्थीपना बुरा लगा.

उस दिन न जाने कैसे मैं कॉलेज न जाकर उनकी कोठी पहुँच गई. यह पहली मर्तबा था जब मैं उनके घर जा पहुँची थी. वे हर दूसरे-तीसरे दिन हमारे घर आते थे. पिता कभी-कदा उनके घर हो आते. चूँकि कोई औरत उनके घर में न थी अतः माँ का उनके घर जाने का सवाल नहीं उठता था. मैं जब उनके घर पहुँची दोपहर का वक्त था. मेन गेट खुला पड़ा था. कोठी के चारों ओर फलों के ढेरों पेड़ थे. जामुन, कटहल, नींबू और न जाने क्या-क्या. अपने साथ अक्सर हमारे घर फल लाते थे. यह विख्यात था कि यदि वे किसी को अपनी कोठी के बागीचे में बिना इजाजत फल तोड़ते देख लेते तो उसकी खैर न होती. यदि बच्चे फलों के लालच में बाग में चले आते तो वे नंगे ही अपने छज्जे पर खड़े होकर दहाड़ते और बच्चे भय से भागते. आसपास के लोगों की निगाह में वे अच्छे आदमी न थे. उसी आदमी के घर दोपहर को बिना सूचना के मैं जा पहुँची थी. तब क्या था मेरे मन में मालूम नहीं पर आज मनोविज्ञान पढ कर खूब अच्छी तरह जानती हूँ क्या रहा होगा मेरे अचेतन में. क्यों जा पहुँची थी मैं उनके घर.

कमरे का दरवाजा उंढ़का हुआ था. मैंने झिर्री से झाँक कर देखा. और जो देखा उससे मेरा सर्वांग काँप उठा. जड़वत हो गई न पैर पीछे हटें न आगे बढें. वे बिस्तर पर औंधे पड़े थे. नंग धड़ंग. एक सूत न था उनकी देह पर. चिकनी उजली सिल की तरह चौड़ी चमकती पीठ. और जानते हैं मेरे मन में क्या इच्छा हुई? खैर छोड़िए उस बात को. इसके पहले मैंने बच्चों को नंगा देखा था. किसी पुरुष को नंगा देखने का यह मेरा पहला अवसर था. एक मन हुआ लौट जाऊँ. पर मुझ पर पागलपन सवार था मैं लौटने के लिए नहीं गई थी. मैंने पीछे हट कर दरवाजे पर दस्तक दी. वे अन्दर से दहाड़े ‘‘कौन है?’’ मेरा हलक सूख गया बड़ी मुश्किल से अपना नाम बताया. उन्होंने भीतर से कहा अभी अन्दर मत आना और अन्दर की हलचल से लगा वे कपड़े पहन रहे हैं.

कपड़े पहनने के बाद मुझे भीतर बुलाया. पूछा, ‘‘क्यों आई हूँ? घर में सब ठीक तो है? घर में बता कर आई हूँ या नहीं?’’ जब पता चला बिना बताए आई हूँ तो बोले इस तरह बिना घर में बताए बिना घर वालों से पूछे मुझे कहीं नहीं जाना चाहिए. अब मेरी हालत पस्त होने को तो आ गई. अगर उन्होंने मेरे घर में बता दिया तो मेरे टुकड़े कर दिए जाएँगे. पर अब क्या हो सकता था. मैंने उनसे अनुरोध किया वे मेरे घर पर यह बात न बताएँ अब कभी ऐसी गलती नहीं करूँगी. इस पर वे कुछ नहीं बोले. थोड़ी देर बाद बोले चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आता हूँ मेरे काटो तो खून नहीं. किसी तरह कहा मैं खुद चली जाऊँगी. वे काफी देर मुझे देखते रहे मैं निगाह नीची किए अपने पैर के नाखून से जमीन कुरेदती रही. उन्होंने फिर कहा, ‘‘सीधे घर जाना. इधर उधर कहीं मत जाना और आइन्दा इस तरह बिना घर में बताए कहीं न जाना.’’ उस दिन मैं सिर झुकाए चुपचाप घर लौट आई. कई दिन तक डरी रही पता नहीं कब आकर वे सारी बात मेरे घर में बता दें, पर वे कई दिन तक न आए. और जब आए तो ऐसा व्यवहार किया मानो कुछ हुआ ही न हो.

मेरी शादी हो गई. मैं नए शहर में आ गई. घर-गिरहस्ती, पति, नौकरी में व्यस्त हो गई. अपनी दुनियाँ में ऐसा खो गई कि मायके जाने का समय न मिलता. इस बीच शायद ही मैंने उन्हें कभी याद किया हो.

पर आज वे क्यों आए? अगले दिन माँ का फोन आया हाल चाल पूछने के बाद उन्होंने बताया कि कल दोपहर में करीब ढाई बजे वे चल बसे. मैं भूत प्रेत आत्मा पर विश्वास नहीं करती. पूजा पाठ नहीं करती मन्दिर भी शायद ही कभी जाती हूँ. फिर इसे क्या कहूँ यह क्या था? मृत्यु के आसपास हजारों मील की दूरी लाँघ कर वे मेरे पास क्यों पहुँचे? क्या कहने, क्या देखने आए थे वे? क्या उन्होंने भी कभी मुझे चाहा था?

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विजय शर्मा, १५१, न्यू बाराद्वारी, जमशेद्पुर ८३१००१. ई-मेलः vijshain@yahoo.com

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