शरद तैलंग का व्यंग्य : साड़ी का ब्लाऊज

SHARE:

मे रे मित्र शर्मा जी आराम से घर के बाहर बैठ कर अखबार पढ रहे थे . मैनें उनसे पूछा कि क्या आज दफ्तर नहीं जाना है ? े बोले नहीं , आज छुटटी ली ह...

मेरे मित्र शर्मा जी आराम से घर के बाहर बैठ कर अखबार पढ रहे थे . मैनें उनसे पूछा कि क्या आज दफ्तर नहीं जाना है ? े बोले नहीं , आज छुटटी ली है.

ऐसा क्या काम आ गया, सब खैरियत तो है न ?

वो मेरी पत्नी ने साड़ी खरीदी है.

साड़ी खरीदी है या गाड़ी ? साड़ी खरदने में ऐसी कौन सी महत्वपूर्ण घटना घट गई जिसका जश्न मनाने के लिए छुटटी ली जाए . क्या पहली बार ही खरीदी है ?

नही नहीं छुटटी साड़ी खरीदने की खुशी में नही ली है वरन आज उसका मैचिंग ब्लाउज पीस खरीदने जाना है.

तो उसके लिए छुटटी ? मैंने फिर शंका जाहिर की .

हॉ ब्लाउज पीस खरीदने जाएंगे तो समय तो लगेगा ही . तुम्हारी भाभी भी रात के खाने के लिए कुछ पराठें बना रही है आते आते रात तो हो ही जाएगी.

ब्लाउज का कपड़ा खरीदने में इतना समय लगता है क्या ? मैंने फिर शंका प्रकट की. बच्चू जब तुम्हारी शादी हो जाएगी तब तुम्हें मालूम होगा कि कितना बडा आयोजन होता है. मैंने उनसे कहा भाई साब मैं भी आफ साथ चलूं आगे चलकर मेरे भी काम आएगा. उन्होंने आज्ञा दे दी चलो .

ऐसा माना जाता है कि भारतीय महिलाओं की पारम्परिक वेशभूषा साड़ी है . जो काम महज दो गज कपड़े में सम्पन्न हो सकता था इसके लिए साढे पॉच गज कपड़ा बरबाद करने की तुक में मुझे साड़ी के आबिष्कारक का पागलपन ही नजर आता है. लेकिन अब समय बदल गया है आज की नारी को उस दकियानूसी वेशभूषा का अनुसरण करने में हीन भावना पैदा होने लग गई है. वे वस्त्रभार के इस अतिरिक्त बोझ से छुटकारा पाना चाहतीं है नतीजा यह हुआ कि बहुत सी मल्लिकाओं तथा शिल्पाओं ने वस्त्र की इस बरबादी के खिलाफ मुहिम छेड़ दी और साड़ी का त्याग कर दिया. जब साड़ी ही न रही तो अकेला ब्लाउज कौन पहनना पसंद करेगा नतीजा यह हुआ कि ब्लाउज अपने आप ही लुप्त होने की दिशा में निरन्तर अग्रसर होने लग गया. इसका एक फायदा यह हुआ कि कई लोगों को जो संशय बना रहता था कि ‘नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है’ वह समाप्त हो जायगा और लोग समझ जाएंगे कि न तो नारी बीच सारी है और न ही सारी बीच नारी है बल्कि नारी अलग है और सारी अलग है.

यह भी सबकी धारणा है कि अविवाहित लड़कियॉ बैसे भले ही जीन्स, स्कर्ट, सलवार, कुर्ता, टी शर्ट कुछ भी पहन लें किन्तु उनकी शादी होते ही साड़ी पहनना आवश्यक हो जाएगा नहीं तो सब क्या सोचेंगे . जैसे उनकी शादी किसी लड़के से न होकर साड़ी से हो रही हो . अधिकांश युवतियॉ जो शादी करके साड़ी नहीं पहनतीं है उनके बारे में लोग पता नही क्या क्या सोचते होंगे., किसी भी लड़की की शादी का आयोजन हुआ नहीं कि सब लोग उसे भेंट में साड़ी देना शुरू कर देते है. उसी तरह लड़की की सास, ननद, बुआ, जेठानी, देवरानी और जितने भी महिला पात्र है सभी को साड़ी दी जाती है. इन साड़ियों की विशेषता यह होती है कि इनके रंग लाल पीले तथा इतने घटिया टाइप के होते है कि किसी को पसंद नहीं आते है इसलिए इन्हें कोई नहीं पहनता तथा उसी पैक्ड कंडीशन में अपने बक्सों में रख देते है जिससे कभी उनके घर में शादी हो तो ससुराल वालों को लेबल बदल कर भेंट में दे दी जाए. इसी तरह परम्परा चलती रहती है. बहुत सी मार्डन महिलाएं इन साड़ियों को अपनी कामवाली बाई को दे देतीं है सबका मानना है कि कामवाली बाईयाँ साड़ी के बहुत ही घटिया रंग पसंद कर लेतीं हैं. कितना मुश्किल काम है कि नव विवाहिता को साड़ी के साथ सम्पूर्ण जीवन गुजारना पड़ता है . तभी तो महिलाएं अपने मायके जाने के लिए बहुत उत्सुक रहतीं हैं कि वहॉ जाते ही उन्हें कुछ दिनों के लिए ही सही इस यातना से मुक्ति मिल जाती है. बहुत सी विवाहिता स्त्रियाँ तो ससुराल से मायके पहुंचते ही सबसे पहले घर में घुसते ही अपनी साड़ी खोलने लग जातीं हैं. कुछ तो सामान बाद में उतारतीं हैं साड़ी पहले .

किन्तु हमारी परम्पराएं और है हम में से हरेक आधुनिकता की दौड़ में मल्लिकाएं या शिल्पाएं नही बन सकतीं . बहुतों को अपनी परम्परा की रक्षा करनी है और साड़ी पहननी है और जब साड़ी पहननी ही है तो ब्लाउज का मैचिंग कपड़ा भी खरीदना है उसे सिलवाना है और पहनना है. चलिए अब मैं आपको उस दिन की घटना का आंखों देखा हाल सुनाता हूं जब मैं शर्मा दम्पत्ति के साथ साड़ी के मैचिंग ब्लाउज का कपड़ा खरीदने बाजार गया. आगे मैं शर्मा जी की पत्नी को शर्मानी कह कर सम्बोधित करूंगा.

बाजार में ब्लाउज के कपड़े की दुकान में घुसते ही शर्मानी ने साड़ी दुकानदार के हवाले कर दी. दुकानदार अन्तर्यामी था साड़ी हाथ में लेते ही समझ गया कि किस प्रयोजन से दी गई है. उसने वह साड़ी अपने नौकर के हवाले कर दी . उस नौकर ने एक दूसरे नौकर को दे दी. किसी के भी चेहरे पर प्रसन्नता की कोई भी लकीर नहीं दिखाई दे रही थी. रेखा शब्द का उपयोग यहॉ जानबूझ कर नहीं किया गया अन्यथा सब का ध्यान कहीं और भटक जाता. उस नौकर ने साड़ी को मोडकर उसे इस तरह आकार दिया जैसे बगुले की चौंच बना रहा हो. अलमारियों में ब्लाउज के थान किसी सैनिक टुकडी की तरह पंक्तिबद्ध खड़े हुए थे. नौकर साड़ी को उन के सामने से यूं गुजार रहा था जैसे किसी परेड का निरीक्षण हो रहा हो. एक के बाद एक कई अलमारियों का निरीक्षण चल रहा था. एकाएक एक थान को परेड से अलग कर दिया गया और उसे नीचे पटक दिया गया. शर्मा जी की पत्नी को दुकान के नौकर की ऑखों में कुछ खराबी नजर आई क्योंकि वह जिस कपड़े को साड़ी के रंग जैसा बता रहा था शर्मानी उसमें जमीन आसमान का फर्क बता रहीं थीं. अन्त में जब मामला दुकानदार तक पहुंचा तो अन्तर का मापदण्ड उसने दो ऐसी संख्याओं का उदाहरण देकर अपना फैसला सुना दिया जो प्रत्येक व्यापारी अपने धन्धे में उपयोग में लाता है कि उन्नीस बीस तो चलता ही है किन्तु शर्माजी की पत्नी उन्नीस बीस तो क्या उन्नीस और उन्नीस दशमलव एक पर भी राजी नहीं थी. और फिर काफिला दूसरी दुकान की तरफ कूच कर गया . फिर दूसरी से तीसरी तीसरी से चौथी और न जाने कितनी दुकानों पर निरीक्षण टोली छापा मारती रही. एक दुकान पर जा कर फिर यही कि्रया दुहराई गई . फिर एक थान बाहर निकाला गया . एकाएक शर्मानी ने दुकानदार को आदेश दिया कि दुकान की लाइटें बन्द कर दे . मैं घबरा गया कि कहीं हवाई हमला तो नहीं हो रहा है जिससे ब्लैक आउट करवाया जा रहा हो किन्तु बाहर तो उजाला ही उजाला था और लडाकू विमानों की आवाजें भी नहीं आ रहीं थी. शर्मानी एकाएक लाइट ऑफ होते ही साड़ी और कपड़े के थान के बीच कुश्ती का मुकाबला करातीं रहीं. कभी साड़ी ऊपर तो कभी कपड़े का थान ऊपर. अचानक वो साड़ी और उस ब्लाउज के कपड़े के थान को ले कर दुकान से बाहर निकल गईं . मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि जब ये कपड़ा खरीदने आए हैं तो इस तरह उसे चुराकर ले जाने की क्या आवश्यकता थी मुझे लग रहा था कि दुकानवाला चोर चोर का शोर मचाने ही वाला है किन्तु वह शान्त मुद्रा म ही बैठा रहा. मेरा अनुमान भी गलत निकला . शर्मानी कपड़े का थान चोरी कर के नहीं बल्कि उसको धूप दिखाने के लिए बाहर ले गईं थी क्योंकि हो सकता था इतने दिन दुकान में पडे पडे उसमें कीडे पड गए हो किन्तु मेरा यह अनुमान भी गलत था क्योंकि वो कपड़े का रंग लगभग साड़ी जैसा ही है इसकी पुष्टी सूर्य भगवान से करवाने के लिए बाहर ले गई थीं. उनके अन्दर आते ही दुकानदार पर प्रश्नों की बौछार शुरू हो गई. इसका रंग तो नहीं जाएगा, ? यह सिकुड़ तो नहीं जायेगा, ? यह जल्दी फट तो नहीं जाएगा, ? यह छिन तो नहीं जाएगा ? . दुकानदार के पास इन सब प्रश्नों के उत्तर पहले से ही मौजूद थे. उसे पहले से ही पेपर आउट हो गया था. सभी उत्तरों का जवाब हॉ या न में ही देना था तथा उसने सभी का उत्तर ना में ही दिया .

अन्त में फैसले की घड़ी आ गई जिसका मुझे पिछले चार पॉच घण्टों से इन्तजार था . मैं सोचने लगा कि जव एक कपड़े के लिए इतना समय लगा तो महिलाओं का आधा जीवन तो इसी कार्य में गुजर जाता होगा किन्तु संतोष हुआ कि अब वह थान खरीदा ही जाना था जिसके लिए इतना समय तथा परिश्रम व्यय किया गया. अगले ही पल शर्मानी ने दुकानदार को जो आदेश दिया उसको सुनकर ही मुझे चक्कर सा आ गया . ‘इसमें से अस्सी सेन्टीमीटर दे दो’. मेरी ऑखों के सामने गणित का सवाल घूमने लगा कि यदि एक महिला छः घण्टे में एक साड़ी के लिए अस्सी सेन्टीमीटर कपड़ा खरीदती है तो एक साल में उसके पति को कितनी छुट्टियाँ लेनी पडेंगी ? रात के लगभग नौ बजे हम लोग उस अनुष्ठान के पूर्ण करके अपने घर पहचे. शर्मा जी ने मुझसे पूछा क्या तुम्हारे पास सिलाई मशीन है ?

क्यों क्या ब्लाउज घर पर ही सिला जाएगा ?

नहीं वो तो बाजार में सिलवाएंगे किन्तु हर ब्लाउज की एक विशेषता होती है कि उसे चाहे कितने भी बडे से बडे दर्जी से सिलवाया जाए उसकी फिटिंग कभी सही नहीं बैठती और प्रत्येक महिला सिलकर आने के पश्चात उसका पोस्टमार्टम जरूर करती है. कभी उसमें सिलाई डाल कर या उसे उधेड़ कर .

दूसरे दिन सुबह सुबह मैंने फिर देखा कि शर्मा जी घर के बाहर अखबार पढ रहे हैं. क्या हुआ ? क्या आज भी छुट्टी पर हो ? कल ज्यादा थक गए थे क्या ? मैंने उनसे पूछा .

नहीं, आज भी बाजार जाना है .

क्यों अब क्या रह गया ? मैंने पूछा

आज पेटीकोट का कपड़ा लाना है .

पाठक इस लेख में ऊपर के पैराग्राफ में जहॉ यह लिखा है कि ‘ बाजार में ब्लाऊज के कपड़े की दुकान में घुसते ही’ से अन्त तक पुनः आगे का हाल पढते जाए और जहां जहां ब्लाउज लिखा है उसे पेटीकोट कर लें. उसमें भी वही क्रिया अपनाई जाती है.

०००

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: शरद तैलंग का व्यंग्य : साड़ी का ब्लाऊज
शरद तैलंग का व्यंग्य : साड़ी का ब्लाऊज
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2009/04/blog-post_14.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2009/04/blog-post_14.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content