अशोक गौतम का व्यंग्य : हे जूते! रे जूते!

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हुर्रे! वे चुनाव हार गए। उनके घर गया था। उनके सामने उनके लिए भगवान से उनकी हारी हुई कुर्सी की आत्‍मा के लिए शांति मांगने। किसी मंदिर, गुरू...

हुर्रे! वे चुनाव हार गए। उनके घर गया था। उनके सामने उनके लिए भगवान से उनकी हारी हुई कुर्सी की आत्‍मा के लिए शांति मांगने। किसी मंदिर, गुरूद्वारे में जाकर उनकी हार के लिए अगर भगवान से शांति की कामना करता तो उन्‍हें विश्‍वास ही न होता। कारण, वे अपने वोटरों से ताजा ताजा धोखा खाए हुए थे। उनके अपने चुनाव क्षेत्र के वोटर तो उनको खा ही गए दूसरे चुनाव क्षेत्र के वोटरों ने भी उनको नहीं बख्‍शा। और वे ये सोचकर वोटरों को खिलाते रहे कि अबके अपनी जीत का रिकार्ड बुक आफ गिन्‍नीज में अपने नाम लिखवा कर रहेंगे कि इस चुनाव क्षेत्र में जितने कुल वोट थे ये उससे भी अधिक वोटों से जीते। दूसरे वे सबको दिल खोलकर ये सोच खिलाते पिलाते रहे कि बस एक बार चुनाव जीत जाएं फिर सारे हिसाब न बराबर कर लूं तो मुझे आदमजात की औलाद न कहें।

पर कुर्सी ने उनकी न सुनी। नेता तो बहरे थे ही कम्‍बख्‍त अब ये कुर्सियां भी ऊंचा सुनने लगी हैं।

उनके घर हिम्‍मत करके घुसा तो वे महाशोक की मुद्रा में। असल में क्‍या है कि न भूखे श्‍ोर की मांद में जाना आसान होता है पर हारे हुए नेता के घर शोक करने जाना मुश्‍किल। वे शोक में इतने डूबे थे कि साक्षात्‌ सामने बैठे होने के बाद भी कहीं नजर न आ रहे थे। हे भगवान ! तू किसी नेता को हराकर उसके साथ इतनी बड़ ज्‍यादती क्‍यों करता है? वोटर थे कि उनके घर शोक मनाने सिर झुकाए मुसकराते हुए आ रहे थे ,कुछ देर वहां बैठ कर जैसे ही चाय ठंडा आ जाते, सुड़क कर जा रहे थे। उनके घर उनकी हार के गम में शामिल होने वालों का तांता लगा हुआ था। इतने लोग उन्‍हें अगर वोट देते तो कम से कम जमानत तो बचती।

मैं जैसे कैसे बीसियों को पछाड़ अपना रोना थोबड़ा उन्‍हें बता उनका सच्‍चा हिमायती होने के लिए उनके पास पहुंचा ही कि उनके चमचे ने घोषणा कि,‘ हारे हुए नेता जी अब किसी से नहीं मिलेंगे। अब उनका आत्‍म मंथन करने का समय शुरू हो रहा है। शोक प्रकट करने आए से मेरा निवेदन है कि वे फिर कभी नेता जी से समय लेकर आएं। आपके यहां आने पर जो आपको तकलीफ हुई उसके लिए नेता जी की ओर से मैं आपसे क्षमा मांगता हूं। पर नेता जी का आदेश है कि वे चाय ठंडा लेकर जरूर जाएं। नेता जी की आत्‍मा को शांति तभी मिलेगी। नेता जी की आत्‍मा को आपसे मिले वोट तो शांत कर नहीं सके, शायद आपकी प्रार्थना इनकी कुर्सी के लिए तड़पती आत्‍मा को शांत कर दे।'

चमचे के इतना कहते ही शोक प्रकट करने वालों में खुशी की लहर दौड़ गई। चलो असली रूप में आ जाएं। नकली भाव चहरे पर रखे हुए आदमी बहुत जल्‍दी थक जाता है न! लोग ठहाके लगाते हुए चाय ठंडा पी रहे थे और प्‍लास्‍टिक के गिलासों की गरदनें मरोड़ रहे थे।

हे समझदार वोटरो! नेता जी की गरदन तो मरोड़ कर रख दी, अब तो गुस्‍सा छोड़ो।

मैंने प्रेस का कार्ड दिखाया तो एक चमचे ने चेहरे पर तीनों लोकों का शोक फैलाए मुझे अंदर आने दिया। असल में मेरा प्रेस से कोई वास्‍ता नहीं। वो तो मेरे एक मित्र जो जबरदस्‍ती एक साप्‍ताहिक निकालते हैं, कि इस बहाने उन्‍हें सरकारी विज्ञापन भी मिल जाते हैं और जब किसी को परेशान करना हो तो उसे परेशान भी कर लेते हैं। उन्‍होंने मेरा प्रेस कार्ड बना दिया है कि कई बार काम आ जाता है, और देखिए काम आ भी गया।

चमचे ने नेता जी के कान में कुछ फुसफुसाया तो उनकी गई चेतना लौट कर आई।

वे वैसे ही बेआत्‍मा हो कुर्सी पर पड़े पड़े मरी आवाज में बोले,‘ आओ बैठो! किस अखबार से हो?'

‘ साप्‍ताहिक भड़ास से।' बे आत्‍मा के नेता के सिवाय इस मृत्‍यु लोक में और कौन बातें कर सकता है? मैंने उनका मौना झूलता देखा तो सोचा कि शायद मौने को लकवा मार गया हो सो पूछ बैठा,‘ ये मौने को क्‍या हो गया?'

‘जलसों में जा जाकर तलवारें उठा उठा कर झूल गया।' पता नहीं लोकतंत्र में जीत के लिए मंचों पर तलवारें लहराने को रिवाज कब चूकेगा।

‘ हमारे साप्‍ताहिक भड़ास ने आपकी फेवर में हवा बनाने की कोशिश तो पूरी की थी पर वोटरों को शायद कुछ और ही मंजूर रहा होगा।' मैंने अपने मित्र के अखबार का सशक्‍त पक्ष उनके सामने रखा। हालांकि मुझे पता है कि उस अखबार को छापने के बाद मेरा मित्र भी नहीं पढ़ता।

‘ कम्‍बख्‍त अबके तो मैंने संपत्‍ति की घोषणा जितनी थी उससे चार गुणा अधिक कर डाली थी।' कह वे हारने के बाद भी संसद की ओर कूच करते लगे।

‘क्‍यों?'

‘इसलिए की जनता को बाद में कोई आबजेक्‍शन न हो कि चुनाव जीतने के बाद खाया है।'

‘ खिलाया पिलाया तो आपने बहुत, फिर आप हारे क्‍यों?'

‘साली जनता लगता है अब दिन पर दिन नमक हराम हो रही है। नमक का कर्ज चुकाना भी भूल रही है।'

‘अब क्‍या योजना है?'

‘पहले तो तीर्थ व्रत करूंगा फिर एक किताब लिखूंगा।'

‘किस पर?'

‘वोटरों पर।'

‘ आपकी हार का कोई खास कारण?'

‘जूते न पड़ना। अब देखिए न! इस चुनाव में जिन जिन को जूते पड़े वे सब जीते। अगली बार अगर पार्टी ने टिकट दिया तो कुछ और जनता को बांटने के बदले इन्‍हें जूते ही जूते बांटूंगा।' कह उन्‍होंने सिर झुका लिया। अचानक मुझे स्‍मरण हो आया कि जब मैं छोटा था और स्‍कूल में पढ़ता था, तो मेरे बापू मुझे पेपर शुरू होने से पहले पढ़ने के लिए जूते मारा करते थे। और जब जब मुझे पेपरों से पहले जूते पड़ते थे तब तब मैं जूतों की कृपा से पास भी हो जाता था।

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डा. अशोक गौतम

द्वारा संतोष गौतम,निर्माण शाखा

डा, वाय. एस. परमार विश्‍वविद्यालय नौणी, ,सोलन -173230 हि.प्र.

ईमेल - a_gautamindia@rediffmail.com

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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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