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विजय शर्मा का आलेख : नथेनियल हॉथर्न : पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित

जन्म द्विशती लेख

नथेनियल हॉथर्नः पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित

 

विजय शर्मा

एक चीनी कहावत है, ‘कौन जाने क्या अच्छा, क्या बुरा.’ हुआ यूँ कि एक बार एक व्यक्ति का घोड़ा लगाम छुडा कर भाग निकला, देखने और सुनने वालों ने कहा ‘बहुत बुरा हुआ’. मगर घोड़े का मालिक बोला, ‘कौन जाने क्या अच्छा, क्या बुरा?’ लोगों ने सोचा अजीब सिरफिरा आदमी है, घोड़ा चला गया और दुःख मनाने की जगह कहता है कौन जाने क्या अच्छा क्या बुरा. और कुछ दिनों बाद घोड़ा लौट आया. घोड़ा अकेला न था, उसके संग थी एक घोड़ी. लोगों ने इस बार कहा, ‘ये तो बड़ा अच्छा हुआ.’ मालिक बोला, ‘कौन जाने क्या अच्छा, क्या बुरा?’ कुछ दिन बाद घोड़ा पुनः गायब हो गया. लोगों ने फिर कहा ‘बहुत बुरा हुआ’. इस बार वह घोड़ों का झुंड लेकर लौटा. लोगों ने इस बार फिर कहा, ‘ये तो बड़ा अच्छा हुआ.’ पर घोड़े का मालिक फिर बोला, ‘कौन जाने क्या अच्छा, क्या बुरा?’ सच जीवन में बड़ा मुश्किल है बताना कि क्या अच्छा होता है, क्या बुरा.

कुछ ऐसा ही हुआ आज से करीब डेढ सौ साल पहले नैथेनियल हॉथर्न के साथ. १८४९ के मध्य में राजनैतिक कारणों से उसे सेलम के कस्टम हाउस की नौकरी छोडनी पडी. सबने कहा बड़ा बुरा हुआ. खासकर तब जब उसका परिवार बढ़ रहा था. उसके दूसरे बच्चे जूलियस का जन्म हुआ था और उसकी माँ मृत्यु शैय्या पर पडी थी. अक्सर सौभाग्य दुर्भाग्य के वेश में भी आता है. यह नौकरी उसे एक स्थायी जीविका तो दे रही थी पर उसकी सृजनात्मकता पर भारी पड़ रही थी. वह दोपहर को लिखता था और उसके लेखन का सारा समय कस्टम हाउस के रोजमर्रा कामों में जाया हो रहा था. जब नौकरी जाती रही तो लेखन चल निकला और इतनी तेजी से चल निकला कि उसे लगा कि ‘पुस्तक स्वयं ही रच गई.’

डेढ वर्ष में पुस्तक रच और छप कर आ गई. पुस्तक भी ऐसी वैसी नहीं, एक कालजयी रचना, जिसने लेखक हॉथर्न को स्थापित कर दिया और स्वयं भी इतने वर्षों से विश्व साहित्य में जमी हुई है और अभी भी अमेरिकी साहित्य के शीर्ष पर है. इतना ही नहीं जिसने अन्य कई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया और जिस पर १९२६ से ले कर अब तक चार-पाँच बहुचर्चित फिल्में बन चुकी हैं और भविष्य में भी जिससे काफी सम्भावनाएँ हैं. साहित्य जगत में मील का पत्थर है ‘द स्कारलेट लैटर,’ जिसके बारे में एक विख्यात समीक्षक ने लिखा है, ‘साहित्यिक सृजनात्मकता की पराकाष्ठा - पूर्णता के उतना निकट, जितना मानवीय प्रयास पहुँच सकता है.’

२००४-०५ कई रचनाकारों के जन्म और मृत्यु तथा उनकी कृतियों को याद करने का वर्ष है. एंटन चेखव को गुजरे सौ साल हुए, रशीद जहाँ और पाब्लो नेरुदा को जन्मे सौ वर्ष हुए हैं. प्रेमचन्द को सवा सौ वर्ष. और नथेनियल हॉथर्न का जन्म दो सौ साल पूर्व हुआ था. ये सभी लेखक अपनी विशिष्ठ शैलियों के लिए सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे. हॉर्थन का जन्म सेलम, मेसाचुसेटस में अमेरिकी स्वतंत्रता दिवस चार जुलाई १८०४ को हुआ. चार साल की उम्र में ही उसके सिर से पिता का साया उठ गया. पिता पुत्र हमनाम थे. उसका पिता समुद्री कैप्टन था. मरते समय वह सूरीनाम, डच गयाना में था. अतः इन लोगों को कुछ दिनों तक सेलम से दूर रहना पड़ा. विधवा माँ ने उसका पालन पोषण किया. उसकी माँ, बहनों और उसका दायित्व उसके मामा रोबर्ट मैनिंग ने कुछ दिन सम्भाला. मामा के यहाँ सेवागो लेक पर उसके शुरुआती दिन पवन पक्षी की भाँति उन्मुक्त गुजरे. पर शीघ्र ही उसे पढ़ने का चस्का लग गया. उसने अट्ठारहवीं शताब्दी के लेखकों हेनरी फील्डिंग, टोबियास स्मोलेट तथा होरास वॉलपोल के साथ-साथ तत्कालीन लेखकों विलियम गोल्डविन, सर वाल्टर स्कॉट को भी घोट कए पी डाला. उस पर हेनरी वैड्सवर्थ लोंगफेलो जो आगे चल कर प्रसिद्ध कवि हुआ और फ्रेंकलिन पीयर्स जो आगे जा कर अमेरिका का राष्ट्रपति बना का भी प्रभाव पड़ा. पढ़ने के साथ उसने लिखने लेखक बनने की महत्वाकांक्षा भी पाल ली.

बाउडिन कॉलेज का यह शर्मीला युवक ‘डेमोक्रेटिक लिटरेरी सोसाइटी’ में खूब ताश खेलता, पीता और दोस्ती करता. खासकर उसकी दोस्ती होराशिओ ब्रिज और फ्रेंकलिन पीयर्स से हुई. वह उनका हमनिवाला-हमप्याला बना. यह दोस्ती ताजिन्दगी कायम रही. विरोधी ‘फेडरलिस्ट सोसाइटी’ के सदस्य लोंगफेलो से भी उसकी मित्रता थी. बाद में उसने वाम और दक्षिण दोनों साहित्य को उसने खूब पढा. १८२५ में कॉलेज की ग्रेजुएशन समारोह में लॉगफेलो ने उम्मीद जताई कि ‘आवर नेटिव राइटर्स’ खूब नाम कमाएँगे. कॉलेज के बाद हॉथर्न सेलम लौट आया उसने लिखना भी शुरु कर दिया पर नाम और प्रतिष्टा बड़ी देर से मिली. यह एक लम्बी और संघर्षपूर्ण दास्तान है.

बारह साल की अवधि छोटी नहीं होती और बारह साल में घूरे के भी दिन पलट जाते हैं. १८२५ से १८३७ तक का लम्बा समय हॉथर्न की तपस्या का काल था. इस काल में वह अपनी माँ-बहनों से भी बात नहीं करता था. अपने कमरे से दिनभर नहीं निकलता था. केवल रात को घूमने के लिए निकलता. कुछ लोगों का कहना है कि अपने बारे में एकांतवास की यह बात उसने चर्चित होने के लिए स्वयं फैलाई. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस दौरान उसने कई प्रेम सम्बंध भी कायम किए. वह गर्मियों में न्यु इंगलैंड, डिट्रोइट आदि स्थानों पर भी गया. जो भी हो ये बारह लम्बे वर्ष उसने अपनी कला को माँजने में लगाए. इस काल में ज्यादातर समय वह ऊपरी मंजिल पर बने अपने कमरे में ही रहता. हाँ इस बीच सेलम अंथेनियम से करीब बारह सौ पुस्तकें इस परिवार के लिए इश्यू हुई. सुबह दोपहर वह लिखता और शामें गुजरतीं पढ़ने में. इस साधना काल का परिणाम हुआ ‘फेनशॉ’ एक ऐतिहासिक उपन्यास पर इसे प्रकाशित करने के लिए उसे खुद ही पैस खर्च करने पड़े. पर शायद अच्छा नहीं बन पड़ा था वह अपनी इस कृति से खुश नहीं था. उसने इसे एक तरह से नष्ठ कर दिया.

फिर ‘सेवेन टेल्स ऑफ माई नेटिव लैंड’ लिखा पर प्रकाशक न मिला. हताशा इतनी बढ़ी कि सारी पांडुलिपि आग के हवाले कर दी. न मालूम उस संग्रह से ‘एलिस डोंस अपील’ और ‘द होलो ऑफ द थ्री हिल्स’ कैसे अग्नि को समर्पित होने से बच गए. १८२९ में वह फिर ‘प्रोविंशियल टेल्स’ जिसमें ‘द जेंटल बॉय’, ‘रोजर मल्विंस बरियल’, ‘माइ किंसमैन’, ‘मेजर मोलिनेक्स’ जैसी रचनाएँ थीं, के प्रकाशन के लिए प्रयास कर रहा था पर पुनः सफलता नहीं मिली. १८३२ में ‘जेंटल बॉय’ बिना नाम के ‘टोकन मैगजीन’ में भेजी जो स्वीकृत हो गई. यदा-कदा एकाध रचना छप जाती और कुछ डालर मिल जाते पर कोई चर्चा न होती. इनके दाम भले ही मिल गए पर नाम न मिला. काफी समय तक वह बेनामी रचनाएँ करता रहा. ‘द स्टोरी टेलर’ उसकी कल्पना के चरम को दर्शाती है पर यह रचना सम्पादक की कैंची का शिकार होने के कारण अपने पूर्ण रूप में प्रकाशित न हो सकी. १८३७ में जाकर उसके नाम के साथ ‘ट्वाइस टोल्ड टेल्स’ छपी.

१८३८ से १८४२ अब वह साहित्य के साथ अपने एकांतवास से बाहर आ गया पर कोई स्तरीय रचना न कर सका. असल में इस बीच उसका सारा ध्यान सेलम की प्रसिद्ध पीबॉडी बहनों में सबसे छोटी बहन अपाहिज सोफिया पीबॉडी पर लगा हुआ था. उसे सोफिया से प्रेम हो गया था. मगर प्रेम और शादी के लिए पैसे भी चाहिए. उसे लिखने से जो थोडे बहुत पैसे मिलते थे उससे परिवार पालना मुश्किल था. मित्र होते हैं आड़े समय में काम आने के लिए और हॉथर्न के कुछ मित्र डेमोक्रेटिक पार्टी में थे उन्होंने उसकी मदद की और उसे लोगों में काम मिल गया. नमक और कोयला तौलना उसका काम था. वे विश्वास करते हैं कि दैविक कृपा सब जगह होती है खासकर प्रकृति में. हरमन मेल्विल उसे ‘अमेरिका का शेक्सपीयर’ कहता है.

मगर १८४० में सरकार का तख्ता पलट गया और हॉथर्न की नौकरी खतरे में पड़ गई उसे इस्तीफा देना पड़ा. सोफिया ‘ट्रांसेंडेंटलिस्ट ग्रुप’ में रुचि रखती थी. हॉथर्न का इसमें कोई विश्वास न था पर रहने की सुविधा मिलन के कारण वे कुछ समय तक जॉर्ज रिटेल के प्रायोजित ब्रूकफॉर्म पर रहे. यह फॉर्म आर्थिक निर्भरता के लिए किया गया एक प्रयोग था. १८४१ में उसने कुछ महीनों के लिए प्रयोग के तौर पर सामूहिक रूप से रहते हुए विद्वानों तथा मजदूरों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया. वह स्थापित धर्म पर विश्वास नहीं करता था, वह मानता था कि धर्म एक निजि दैविक सम्बंध है. कुछ समय बाद बेटी यूना का जन्म भी हो गया पर आमदनी की कोई सूरत न थी. एक बार फिर दोस्त आगे आए और इस बार उसे सेलम कस्टम हाउस में काम मिला और एक बार फिर उसका लिखने का समय इन फालतू के कामों में जाया होने लगा.

इंगेजमेंट पीरियड में उसने एक ही चीज लिखी वो थी सोफिया को पत्र. इस बीच साहित्य नहीं शादी उसकी ख्वाहिश थी. जुलाई १८४२ में उनकी शादी हुई. उसने स्वयं कहा है, ‘जब आदमी बच्चे पैदा करने की जिम्मेदारी लेता है तो उसे अपनी जिन्दगी पर कोई हक नहीं रह जाता है.’

एक बार उसने फिर नौकरी छोड़ी पर इस बार उसने मुड़ कर न देखा. घर में पैसों की दिक्कत, विरोधी पार्टी का बढ़ता राजनैतिक दबाव, बढ़ता परिवार, माँ की बीमारी, स्वयं उसके शब्दों में ‘यह विविध संवेदनाओं और भावनाओं की सघनताओं का काल था.’ और यही था उसकी सृजनात्मकता का चरम काल.

हाँ, कस्टम हाउस के अनुभव का परिणाम हुआ, ‘द स्कारलेट लैटर’ की भूमिका ‘द कस्टम हाउस’. १८४९ में उसकी माँ गुजर गई. ‘द स्कारलेट लैटर’ से प्रारम्भ में चाँदी के सिक्कों की वर्षा तो नहीं हुई पर पुस्तक की चर्चा खूब हुई. कुछ लोगों ने तभी इसके कालजयी होने की भविष्यवाणी कर दी. कुछ लोगों को ‘कस्टम हाउस’ वाली भूमिका पर आपत्ति भी थी पर ऐसे लोगों की संख्या नगण्य थी.

१८६४ में गुजरने से पहले हॉथर्न ने और बहुत कुछ लिखा. शायद न लिखता तब भी यह कृति उसे अमर कर जाती. न्यू इंग्लैंड के ‘प्योरिटंस’ पर पहले भी कई रचनाएँ हुई, बाद में भी कई रचनाएँ हुई पर ‘द स्कारलेट लैटर’ एक मात्र रचना है जो आने वाली पीढ़ियों को अपने-अपने ढंग से प्रभावित करती रहेगी.

असल में वह एक और संग्रह की योजना बना रहा था पर प्रकाशक के एक सहयोगी ने सलाह दी कि एक लम्बी रचना कहानी संग्रह से ज्यादा बिकेगी और पता नहीं किस रौ में आकर हॉथर्न ने उसकी बात मान ली. नतीजा था ‘द स्कारलेट लैटर’. आज नारी विमर्श के दौर में शायद इस कृति के लेखक के ट्रीटमेंट पर लोगों को आपत्ति हो पर आज से डेढे सौ साल पहले की गई यह रचना लेखक की सम्वेदनशील दृष्टि, उसकी उच्च शैली का उत्कृष्ट नमूना है. और रचना का उत्स तो उससे भी दो सदी पहले सत्रहवीं सदी में है. अक्सर इसे निरंकुश लेखन की संज्ञा दी जाती है, पर जब १८५० में यह प्रकाशित हुआ तो ग्रेट ब्रिटेन और अमेरिका में सनसनी मच गई. और समीक्षकों ने हॉथर्न को अमेरिका का सर्वोत्तम लेखक घोषित कर दिया गया. कारण है हॉथर्न ने नायिका के कार्यों को अपनी सहमति नहीं दी है फिर भी उसने कथा को इतनी सम्वेदना के साथ बुना है कि पाठकों की सहानुभूति बटोरने में वह कामयाब रही. नायिका हेस्टर प्रिन अपने दुश्चरित्र की सजा लैटर ‘ए’ अपने गले में लटकाती है. वह लोगों के सामने कभी स्वीकार नहीं करती है कि पादरी उसकी बच्ची का पिता है. यह बात उसके पति को पता चलती है और वह उसका लाभ उठाकर हेस्टर और पादरी को तंग करता है. जब वह मरती है तब उसकी कब्र पर मात्र इतना ही लिखा होता है, ‘ओन ए ब्लैक बैकग्राउंड, द लैटर ए, इन रेड’ और यहीं उपन्यास का अंत होता है. पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री केवल माँ और पत्नी हो सकती है उसकी स्वतंत्र सत्ता नहीं होती है. बागी को समाज कभी क्षमा नहीं करता है. लेखक ने इस उपन्यास में चरित्रों को आद्यप्ररूप (Archetypal) के रूप में प्रस्तुत किया है.

प्रेम, घृणा, ईर्ष्या और भावनात्मक ब्लैकमेल की सशक्त कथा है ‘स्कार्लेट लैटर’. समीक्षक इसमें बाइबिल, पिलग्रिम्स प्रोग्रेस, परी कथा देखते हैं. इसमें चरित्रों के नाम बड़ी सूझ-बूझ के साथ रखे गए हैं. नायिका का नाम प्रिन सिन (पाप) की लय पर है, जिसके पाप के लिए समाज द्वारा उसे अपने सीने पर ‘ए’ अक्षर पहनना पड़ता है यही उसके अपराध की सजा है. मरते दम तक और मरने के बाद भी यह उसका पीछा नहीं छोडता है. असल में हेस्टर प्रिन उसे नहीं त्यागती है. उसकी और उसके प्रेमी तथा उसकी बच्ची पर्ल के पिता आर्दर डिमसडेल दोनों की कब्र पर एक ही कब्र-पटिया है जिस पर अक्षर ‘ए’ खुदा है. ‘ए’ हालाँकि अडल्टरी (व्यभिचार) का प्रतीक है. पर समीक्षक इसके विभिन्न अर्थ देते हैं. यह एबल (समर्थ) का प्रतीक बन जाता है. जब यही अक्षर आकाश में दिखता है तो अलग-अलग लोगों के लिए उसका भिन्न-भिन्न अर्थ होता है. समुदाय के लोग इसे एंजल (देवदूत) तथा गवर्नर विनथ्रोप के स्वर्गारोहण के रूप में लेते हैं. कोई-कोई आलोचक इसे अमेरिका या एम्ब्युगिटी (सन्दिग्धता) का भी प्रतीक मानते हैं. डिम्सडेल डिमनेस, कमजोरी, समन्वय का अभाव, इच्छा शक्ति की कमी, दृढ़ता रहित चरित्र के रूप में लिया जा सकता है. चिलिंगवर्थ चिल, ठंडे, भावना रहित, निर्दयी व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है. और बालिका पर्ल बाइबिल के मुक्ति के लिए प्रयास पर्ल ऑफ ग्रेट प्राइज से लिया गया चरित्र है. जो हेस्टर के पाप का जीता जागता चिह्न है. जो बाद में अपने माता- पिता को जोड़ने का काम करती है. तभी कहानी पूर्ण होती है. इसके बाद पर्ल मुक्त हो जाती है. हॉथर्न ने उपन्यास में सभ्य समाज और वीराने, रात और दिन, बद्ध चिंतन एवं स्वतंत्र चिंतन आदि के विपरीत मोटिफ बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया गया है.

पर्ल का लालन-पालन प्रकृति की गोद में होता है. हमारे यहाँ के साहित्य में भी शकुंतला और मारीषा जैसी बालाओं का लालन-पालन प्रकृति करती है. पर्ल और इनमें एक फर्क है पर्ल के साथ उसकी माँ है, जबकि इनकी माताएँ मेनका और प्रमलोचा जन्म के बाद इन्हें छोड़ गई थीं. हाँ हमारे साहित्य में एक और बालक है जिसकी तुलना पर्ल से की जा सकती है और दोनों में बहुत समानता भी है. यह है शकुंतला पुत्र भरत. शकुंतला को उसके प्रेमी दुष्यंत ने पहचानने से इंकार कर दिया था, जबकि वह भरे दरबार में दुष्यंत को हवाला देती है कि वह उसके बच्चे की माँ बनने वाली है. वैसे पूरी कहानी को अलौकिक रंग देने के लिए दुष्यंत के भूलने को दुर्वासा के शाप का परिणाम बता दिया गया है. हेस्टर प्रिन कभी भी अपनी बच्ची के पिता का नाम नहीं बताती है. भरत का बचपन भी प्रकृति की गोद में व्यतीत होता है. बाद में पिता अपनी गलती स्वीकार करता है और माँ बेटे को अपनाता है. आर्थर डिम्सडेल भी अपने अंतिम क्षणों में समाज के समक्ष स्वीकार करता है कि पर्ल उसकी बच्ची है. पर वे साथ नहीं रह पाते हैं क्योंकि इसी स्वीकृति के साथ ही डिम्सडेल की मृत्यु हो जाती है.

स्कारलेट लैटर जैसी रचना देने के पीछे एक कारण यह भी था हॉथर्न के पूर्वजों में से एक जॉन हॉथर्न १६९२ में सेलम के प्रसिद्ध विचक्राफ्ट मुकदमे में जज की भूमिका में था. उसका परिवार प्योरिटन था. वे १६३० में न्यू इंग्लैंड आए थे. कहानी से उसका परिवार और वह स्वयं बहुत गहरे जुड़ा था. उपन्यास में सेलम और उसके जीवन का बड़ा सूक्ष्म एवं विस्तृत विवरण है. हम अपने पूर्वजों द्वारा किए गए कुकर्मों को मिटा नहीं सकते पर किसी न किसी ढंग से उसका प्रायश्चित करके उन्हें हल्का अवश्य कर सकते हैं और नेथनियल ने उपन्यास के रूप में यही करने का प्रयास किया है.

इसी स्कारलेट लैटर पर १९२६ में विक्टर सीस्टोर्म ने लिलियन गिश को लेकर मूक फिल्म बनाई. १९३४ में कोलीन मूर को निर्देशक रोबर्ट बिगनोला ने नायिका के रूप में प्रस्तुत किया. महान फिल्मकार ग्रिफिथ ने भी इस विषय को अपनी फिल्म में लिया. ये सभी फिल्में श्वेत श्याम थीं. विम वेंडर्स ने १९७३ में इसे जर्मन भाषा में इंग्लिश सबटाइटिल्स के साथ फिल्माया. उसने इसके मनोवैज्ञानिक पहलु को उभारा. सत्रहवीं सदी की इस घटना को उसने एक नया रंग दे दिया. १९९६ में इसी को आधार मान कर डेमी मूर के इर्द-गिर्द एक और फिल्म बनी और नायिका को १२ मिलियन डॉलर मिले.

अमर साहित्य के रचयिता मानवता के आदिम कवियों ने कहा हैं - कविः क्रांतदृष्ठिः. साहित्यकार की महानता मानव जीवन की और मनुष्य की अंतस की उसकी अचूक, गहन पहचान और इनकी सशक्त अभिव्यक्ति में है. मानव के सुख-दुःख, आशा-निराशा, उसकी आकांक्षा, प्रेम-घृणा यही सब है महान साहित्य को ऊर्जा देने वाला, प्राण देने वाला स्रोत. साहित्य का विषय होता है मानव जीवन और उसका परिवेश. यह परिवेश बाह्य तथा आंतरिक दोनों होता है. आदिकाल से मानव के सुख-दुःख, आशा-निराशा-हताशा, उसकी आकांक्षा, प्रेम-घृणा, स्वार्थ-परमार्थ, घमंड-विनम्रता का विश्लेषण साहित्य का कथ्य बनता आया है. उसे यह भी लगता था कि दूसरों के निजी जीवन में झाँकना अच्छी बात नहीं है. वह जिनसे मिलता है उनके चरित्र का विश्लेषण उसके लेखन का आवश्यक अंग है. हॉथर्न अपनी कहानियों में वह इनका उपयोग करता. उसे मालूम था कि जब हम किसी की बहुत गहराई में उतरते हैं तब उसके, लोगों के प्रति हमारा मन कठोर हो जाता है. उसे यह भी ज्ञात था कि किसी भी लेखक की सफलता इस पर निर्भर करती है. उसके पास मनोवैज्ञानिक सूझ थी, यह सूझ उसके साहित्य का प्राण है. सबसे बढ़ कर उसकी उत्सुकता थी मानव हृदय के अंतस में पैठ कर उसे जानने-समझने की. हॉथर्न भी एक लेखक के रूप में अन्य स्त्री-पुरुषों के जीवन में झाँकना चाहता था. इस थीम के विषय में वह दुविधा में था क्योंकि वह जानता था कि एक लेखक के रूप में उसकी सफलता उसके द्वारा अपने मिलने वालों के गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में है, लेकिन वह कभी नहीं भूल सकता था कि दूसरों के व्यक्तित्व के निजी अलंघ्य क्षेत्र में प्रवेश भले ही मस्तिष्क को समृद्ध करता हो हृदय को कठोर करता है. हॉथर्न के लिये भी मानव जीवन और मनुष्य की गहराइयाँ सदैव उसके पठन का विषय रही. साहित्यकार होने के नाते, साहित्यकार की क्रांतदृष्ठि होने के कारण वह सहज ही बाह्य से ज्यादा आंतरिक यथार्थ को महत्व देता था. मजबूरन वह स्त्री-पुरुषों के अंतर में झाँकता था. अपनी रुचि के कारण वह स्त्री-पुरुषों के अंतर में झाँकता था सदैव मानवीय कथ्य को टटोलता रहा - छिपे अपराध बोध का जीवन में फल, जीवन के प्रति हल्के-फुल्के नजरिए और गम्भीर दृष्टिकोण में संघर्ष, एकाकी जीवन से उत्पन्न हृदयहीनता, अतीत (खासकर प्योरिटन अतीत) की वर्तमान जीवन पर छाया, दोनों में टकराहट. सम्पूर्ण समाज सुधार की आकांक्षा की व्यर्थता, मनुष्य के हृदय से पाप की भावना को मिटाना असम्भव है, आदि विषयों को लेकर वह लिखता रहा..... लेकिन उसकी प्योरिटन पृष्ठभूमि उसें इसके लिये कभी माफ नहीं करती थी .... साथ ही वह अपनी इस विशेषता को लेकर द्वंद्व में भी था. वह जानता था कि उसके पास दूसरों को जानने-भेदने की तीक्ष्ण गिद्ध दृष्टि है पर वह वह कितनी ओत्सुकतापूर्ण ललक है और कितनी अपने चरित्र की कलात्मक वैध खोज, इसको लेकर वह शंकित था. यही मानव मन को गहराई से जानने-समझने-परखने की ललक डी. एच. लॉरेंस, मोराविया, और दॉस्तावस्की में भी मिलती है. असल में कोई भी महान लेखक इस गुण के बगैर महान बन ही नहीं सकता है.

हॉथर्न अपने और अपने परिवार का रोजनामचा बड़ी बारीकी से विस्तारपूर्वक लिखता था. इसमें यात्रा विवरण, कलाकारों, मूर्तिकारों, लेखकों आदि से मुलाकात का ब्योरा भी शामिल होता था. यही सब विभिन्न नोटबुक्स के रूप में उपलब्ध है. और इसी से लेकर उसने एक रोमांस कथा ‘द मार्बल फॉन’ लिखी. यूनानी मूर्तिकार प्रेक्सीटिलीज द्वारा निर्मित लैटिन ग्रामीण देवता चरवाहों के रक्षक फॉन के सम्बंध में है यह कहानी. यह १८६० में इंग्लैंड में ‘ट्रांसफोर्मेशन’ के नाम से तथा अमेरिका में लेखक के मनपसन्द शीर्षक ‘द मार्बल फॉन’ के नाम से प्रकाशित हुई. उसकी अन्य रचनाएँ हैं ‘मोसेस फ्राम अन ओल्ड मैंस’, ‘द हाउस ऑफ द सेवेन गैबल्स’, ‘द ब्लिथडेल रोमांस’, ‘टैंगल्वुड टेल्स फोर गर्ल्स एंड बॉय्स’, ‘आवर ओल्ड होम’ आदि. ‘सेप्टीमियस फल्टन’, ‘द डोलीवर रोमांस’, ‘डा. ग्रिमशॉस सीक्रेट’, और ‘द एनसेस्ट्रल फुटस्टेप’ मृत्योपरांत प्रकाशित हुए.

वैसे हॉथर्न व्यापारियों और राजनीतिज्ञों के बीच ज्यादा सहुलियत महसूस करता था बनिस्बत रचनाकारों के. पर १८५०-५१ में मेसाचुसेट्स लेनोक्स में रहते हुए उसकी दोस्ती रचनाकार हर्मन मैल्विल से भी हुई. कई अधूरी रचना छोड कर जब १९ मई १८६४ में वह गुजरा तो एल्कोट, एमर्सन, फील्ड्स, होम्स, लॉगफेलो और लोवेल ने उसको कंधा दिया.

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( विजय शर्मा, सी २/४ गंगोत्री काम्प्लेक्स, बाराद्वारी एंक्लेव, जमशेद्पुर ८३१००१. फोनः ०६५७-२४३६२५१, ०९४३०३८१७१८

ई-मेलः vijshain@yahoo.com वर्तमान साहित्य, सित. 2005 में पूर्वप्रकाशित

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