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शंकर पुणतांबेकर का व्यंग्य : साहित्य

मेरे दिमाग में खब्त सवार हुआ कि जानूं साहित्य क्या है? वैसे यह फिजूल की जिज्ञासा थी। साहित्य ही जहाँ फिजूल की बात है जिसके बिना भी हमारा काम चलता है, वहां उसके बारे में जिज्ञासा उत्पन्न होना तो और फिजूल की बात है। पर खब्त तो आखिर खब्त ही होता है न !

मैं साहित्य पढ़ता था चाव से पढ़ता था मैंने जहाँ प्रेमचन्द पढ़ा था वहाँ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी। मैं उन खुशनसीब लोगों में से नहीं था जो साहित्यकारों को साहित्य के इतिहास से जानते हैं उनके साहित्य से नहीं।

अब साहित्य के बारे में सवाल किसी ऐरे गैरे से तो किया नहीं जा सकता था। जो उससे जुड़ा होगा जो विद्वान् होगा वही उसके बारे में बता सकता था।

एक दिन मैं एक संपादक के पास गया।

ऊंची पत्रिका ऊंची केबिन सो ऊँची उपेक्षा से नजरी स्वागत ।

देखिए मैं आपके पास जरा अलग काम से आया हूं। मैं जानना चाहता हूँ कि साहित्य क्या है?

मेरा सवाल सुन पहले तो संपादक महोदय गंभीर हुए और फिर मंद मुस्काए क्षण दो क्षण। मैं उनके जवाब का इंतजार करता रहा ।

‘बताइए न साहित्य क्या है ?’ इंतजार जब पीड़ा बनने लगा तो मैंने अपना सवाल दोहराया।

‘आप क्या करते हैं ? ‘

मुझे यह सवाल अच्छा नहीं लगा। मैंने प्रतिसवाल किया साहित्य क्या एक कुछ करने वाले के लिए एक तो दूसरा कुछ करने वाले के लिए दूसरा है ?

‘देखिए’, संपादक ने कुछ चिढ़कर कहा कितने ही अहम सवाल हैं आज हमारे सामने - गरीबों के, अभाव के, बेरोजगारी के, भ्रष्टाचार के। आपको वे नहीं सता रहे हैं। सवाल सता रहा है तो साहित्य क्या है ? आप मुझे एक भले आदमी लगते हैं तब भी इस तरह का सवाल कर रहे हैं?

इस पर मैंने भी चिढ़कर कहा गरीबी और अभाव के सवाल आपके पास लेकर कैसे आता मैं? आता भी तो आप क्या कर लेते? क्या है आपके पास सिवा रचना लौटाने या स्वीकारने के? कौन सी बेरोजगारी या भ्रष्टाचारिता हटाई है या कम की आपकी स्वीकृतियों ने? आप भी मुझे भले आदमी लगते हैं तभी आपके पास मेरे सवाल का जवाब नहीं है। दुःख तो इस बात का है कि संपादक होकर भी नहीं है। इतना कह मैं वहाँ से उठ आया।

अब मैं एक जाने माने लेखक के पास गया। मैंने अपना सवाल उसे सुनाया तो वह बोला साहित्य जैसी बात नहीं जानते आप? आश्चर्य है! अरे भाई मैं जो लिखता हूं प्रेमचन्द ने जो लिखा है, वह साहित्य है।

यह तो मैं जानता हूं। मैंने कहा पर आप जो लिखते हैं या प्रेमचंद ने जो लिखा है उसे साहित्य क्यों कहते हैं?

‘ एक नया सृजन होता है न वह। इसलिए उसे साहित्य कहते हैं।‘

तब तो व्याख्यान संग्रह को भी साहित्य कहा जा सकता है!

‘तुममे अभी परिपक्वता नहीं है,’ लेखक ने कहा, ‘आगे आप समझ जाएंगे साहित्य क्या है’

मैंने साहित्य के एक आलोचक से सवाल किया। उसने कहा साहित्य जविन का प्रतिबिंब है।

मैंने कहा, ‘जीवन का प्रतिबिंब तो अखबार भी है।‘

‘जीवन का प्रतिबिंब अखबार भी है, पर अखबार और साहित्य में फर्क है। अखबार एक दिन में फिंक जाता है साहित्य नहीं फिंकता।‘

क्यों नहीं फिंकता के सवाल पर उसने कहा वह कहानी, नाटक, उपन्यास होता है सो नहीं फिंकता। अंततः मैं युनिवर्सिटी के एक विद्वान् के पास पहुँचा।

उन्होंने कहा, ‘आप वामन दंडी भामह आदि की व्याख्याएँ पढ़िए। मैथ्यू, आर्नाल्ड, डाँ0 जानसन, ले हंट की व्याख्याएँ पढ़िए, आपकी समझ में आ जाएगा साहित्य क्या है ?’

‘इन सबको आपने पढ़ा है तो आप ही बता दीजिए साहित्य क्या है?

‘हां हां रमणीयार्थं प्रतिपादकः शब्दः काव्यम् अथवा वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।‘

‘यह तो ठीक है,’ मैंने कहा – ‘पर इससे आपको साहित्य की जो प्रतीति हुई वह आप मुझे कराइए।‘

मुझे प्रतीति की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। मैं जब वहां से उठा तो विद्वान् महोदय बोले तुम व्यर्थ झंझट में क्यों पड़ते हो? हम बिना साहित्य की प्रतीति के भी जानते हैं साहित्य क्या है।‘

मैं समझता हूं उन्होंने ठीक ही कहा।

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साभार – व्यंग्य संग्रह – गुलेल3. व्यंग्यकार – शंकर पुणतांबेकर, प्रकाशक – पुस्तकायन, 2/4240-ए, अंसारी रोड नई दिल्ली 110002

2 टिप्पणियाँ

  1. बहुत बढिया......अब तो हम भी समझ गए कि साहित्य क्या है???:))
    जोरदार व्यंग्य!!

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  2. एक व्यर्थ का असाहित्यिक लेख है, भौंडा व झूठा व्यन्ग्य, साहित्य्कार या विद्वान कैसे नही बता पायेंगे, वस्तुतः आप जान ही न पाये -साहित्य्कार कौन है।

    जवाब देंहटाएं

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