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विजय शर्मा का आलेख : युवा जिन्दगी फ़िल्मी परदे पर

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युवा काल जीवन का वह दौर है जिसे भूलना कठिन है. जवानी एक ऐसी शै है जिसे किसी दूसरे नशे की जरूरत नहीं है. जो अपने आप में एक नशा है, एक ऐसा...



युवा काल जीवन का वह दौर है जिसे भूलना कठिन है. जवानी एक ऐसी शै है जिसे किसी दूसरे नशे की जरूरत नहीं है. जो अपने आप में एक नशा है, एक ऐसा नशा जिसके सामने दूसरे सब नशे बेकार हैं. मगर हमारे देश में जवानी होती ही नही है कम से कम कुछ दशक पहले तक तो नहीं ही होती थी. हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना कुछ ऐसी रही है कि इसमें आदमी की जवानी के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी. आचार्य रजनीश इसका कारण बाल विवाह को बताते हैं. उनका कहना है कि हमारे यहाँ बचपन में शादी हो जाने के कारण आदमी शुरु से ही घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों में उलझ जाता था. जवानी की बेफिक्री के लिए उसके पास कोई गुंजाइश नहीं होती थी. शायद इसीलिए हमारे यहाँ जवानों के लिए कोई खेल विकसित न हो सका. या तो बच्चों के खेल, जैसे कंचे, लट्टू के खेल रहे या फिर बूढ़ों के खेल, जैसे चौपड़, शतरंज जैसे खेल विकसित हुए. एडवेंचरस गेम का चलन हमारे देश में कुछ समय पहले तक न था. आज भारत का युवा भी जिम्मेदारी के साथ जिन्दगी का सामना करने के लिए तैयार है. उसकी रूचि, उसकी पसन्द बदल रही है. वह मात्र ‘रन ऑफ द मिल’, सामान्य फिल्में ही उसकी पसन्द नहीं हैं. कुछ अनोखी फिल्में भी उसकी रूचि में शामिल हैं. आज उसे ये फिल्में विज्ञान, तकनीकी और संचार की सुविधाओं के कारण उपलब्ध भी हैं.

इस आलेख में कुछ ऐसी फिल्मों की चर्चा है जिसमें युवाओं को एक अलग जिन्दगी जीते दिखाया गया है. इन्होंने जिन्दगी जरा हट कर जीयी है. ये फिल्में मुझे मेरी बेटी ने दिखाई. मेरी बेटी अनघा इस बार जब बैंगलोर से आई वह अपने संग कई फिल्में लेकर आई. उसने जिद करके मुझे ये फिल्में दिखाई. कई दिन तक ‘समय नहीं है’ का बहाना बना कर मैंने टालने की कोशिश की. मुझे लग रहा था यह कुछ उछल-कूद, धूम-धड़ाके वाली फिल्में लेकर आई होगी. पर वह नहीं मानी. उसने मुझे ये फिल्में जिद करके दिखाई. पहली फिल्म शुरु होते ही मेरा उसकी पसन्द के प्रति विचार बदलने लगा. जवान ही ऐसी फिल्मों की जानकारी रख सकते हैं और हम जैसों को इसका चस्का लगा सकते हैं. बाद में जब फिल्में देख ली तो लगा कि यदि मैं ये फिल्में अपनी जिद में न देखती तो कितनी गलतफहमी पाले रखती और इतनी अच्छी फिल्मों के आनन्द से वंचित रहती. इन फिल्मों को देख कर मैं यह कहने और सोचने पर मजबूर हूँ कि आज का युवा कलात्मक दृष्टि से काफी सम्पन्न है और उसकी रुचि खासी युवा है. तो लीजिए आप भी इन फिल्मों का जायजा लीजिए और जब भी मौका और सुविधा हो इन फिल्मों को अवश्य देख डालिए. और आज के युवा के प्रति अपनी राय बनाइए. जीवन के प्रति युवा के नजरिए, उनकी पसन्द-नापसन्द, उनकी रूचि को जानने-समझने का प्रयास कीजिए.

माता पिता चाहते हैं कि बच्चे उनकी अधूरी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करें. बच्चे की रूचि, पसन्द की चिंता न करते हुए उस पर अपनी पसन्द थोपते रहते हैं. जबरदस्ती उन्हें गलाकाट प्रतियोगिताओं की ओर धकेलते रहते हैं. फिर जब वे आत्महत्या कर लेते हैं तो सिर पकड़ कर रोते हैं. जब वे विद्रोह करते हैं तो उन्हें उदंड़ की उपाधि से नवाजते हैं. यही चाहते हैं क्रिस्टोफर मैक्कैंडलेस के माता-पिता. वह पढ़ने में अच्छा है उसमें ढ़ेर सारी सम्भावनाएँ हैं. मगर वह अपने माता-पिता को किस दृष्ठि से देखता है ? उसके लिए वे भौतिक सुख-साधन में डूबे रहने वाले, मतलबी, दूसरों का उपयोग करने वाले और दूसरों पर शासन करने वाले हैं व्यक्ति हैं. जिनसे उसे न तो कोई सहानुभूति है, न ही वह उनकी राह पर चलना चाहता है. नहीं चाहिए उसे ऐसे माता-पिता. न ही उसे उनकी सम्पत्ति चाहिए. वह सारे क्रेडिट कार्ड्स और सारे दस्तावेज नष्ट कर डालता है. अपनी समस्त जमा पूँजी दान कर देता है और सबसे नाता तोड़ कर निकल पड़ता है एक अंतहीन यात्रा पर. 2007 में बनी इन टू द वाइल्ड फिल्म की पूरी कहानी उससे सहानुभूति रखने वाली, उसकी अपनी बहन के शब्दों में कही गई है.

इन टू द वाइल्ड एक साहसिक यात्रा है. एक एडवेंचर है. क्रिस्टोफर अपनी गाड़ी में पहले देश पार करता है. उसे तरह-तरह के अनुभव होते हैं. फिर अपने लक्ष्य अलास्का के बर्फीले प्रदेश की ओर चल पड़ता है. नितांत अकेला. प्रकृति जितनी मोहक है, उतनी ही निर्दयी भी. जितनी आकर्षक है, उतनी दुर्गम और क्रूर भी. अचानक बाढ़ का सामना होने पर क्रिस्टोफर का उसकी गाड़ी से साथ छूट जाता है और वह पैदल ही आगे बढ़ता जाता है. कोलोराडो नदी से होते हुए वह मैक्सिको पहुँचता है और वहाँ से मालगाड़ी द्वारा लॉस एंजेल्स जा पहुँचता है. उसे हिप्पियों का एक दल मिलता है और एक एकाकी बूढ़ा (हाल होलब्रुक) मिलता है. बूढ़ा और क्रिस्टोफर एक दूसरे के प्रेम में पड़ जाते हैं. दोनों मिल कर खूब एडवेंचर करते हैं. मगर जब बूढ़ा उसे अपने पोते के रूप में गोद लेना चाहता है, क्रिस्टोफर उसके प्रस्ताव को ठुकरा कर आगे चल देता है. उसे एक किशोरी का प्रेम भी अपने लक्ष्य से नहीं डिगा पाता है. वह भी उसे प्रेम करने लगता है और बिछोह के दरद को सहता है, मगर आगे बढ़ता रहता है.

दो साल की निरंतर यात्रा के पश्चात क्रिस्टोफर अलास्का के बर्फीले, जनशून्य इलाके में डेरा डालता है. और अपनी एडवेंचर यात्रा को लिपिबद्घ करना प्रारम्भ करता है. इस निर्जन, नीरव, वीराने क्षेत्र का अपना सौंदर्य है, अपना रव है, अपनी आबादी है. शुरु में क्रिस्टोफर को यह सब लुभाता है. पानी से डरने वाले क्रिस्टोफर का सामना एक बार फिर भयंकर जलप्लावन से होता है और वह बुरी तरह फँस जाता है. क्रिस्टोफर अपने माता-पिता की महत्वाकांक्षा से विद्रोह करके समाज से मुँह मोड़ लेता है. लेकिन मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. अंत में क्रिस्टोफर समाज के लिए तड़फता है. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी है. उसके समाज में वापस लौटने के सारे रास्ते बन्द हो चुके हैं. वह चाह कर भी समाज में वापिस नहीं लौट सकता है. वह जिस सीढ़ी से चढ़ा कर अपनी मंजिल तक पहुँचा था वह नष्ठ हो चुकी है. सारे रास्ते बन्द हो चुके हैं. आदमी सोचता है कि वह सब कुछ कर सकता है. परंतु क्या यह सम्भव है ? खाने के लिए शिकार मिलना बन्द हो जाता है. वह स्थानीय विरल वनस्पति पर निर्भर करने लगता है. सावधानी के लिए वह अपने संग लाई किताब से देख-पढ़ कर, चुन कर वनस्पति का सेवन करता है. मगर एक दिन गलत पौधे को खा लेता है जिससे उसका पाचनतंत्र रुक जाता है और वह भूखों मरता है. उसकी जादूई बस ही उसकी कब्रगाह बनती है. वह अंत-अंत तक अपना विवरण दर्ज करता जाता है. उसका अंत इतना त्रासद है कि दर्शक का मन दहल जाता है. दर्शक मन प्राण से चाहने लगता है कि कोई चमत्कार हो जाए वह बच जाए. पर ऐसा होता नहीं है. काश ऐसा हो जाता !

फिल्म इन टू द वाइल्ड कोरी कल्पना नहीं है. यह निर्देशक और स्क्रीन प्ले राइटर शॉन पेन के दिमाग की उपज भी नहीं है यह एक सच्ची कहानी है वास्तविक जीवनी. यह एमोरी यूनिवर्सिटी के एथलेट छात्र की जीवनी है जिसे अभिनेता-निर्देशक शॉन पेन (डेड मैन वाकिंग का नायक) ने पर्दे पर उतारा है. क्रिस्टोफर की जीवनी को उपन्यास में जोन क्राकौएर ने 1996 में लिपिबद्घ किया. और शूटिंग का अधिकाँश हिस्सा अलास्का के उस स्थान से करीब 60 मील दक्षिण में फिल्माया गया जहाँ असली क्रिस्टोफर की मौत हुई थी. फिल्म की युनिट अलग-अलग मौसम में चार बार अलास्का गई ताकि फिल्मांकन यथार्थ हो सके. क्रिस्टोफर की भूमिका को एमिल हिर्सच ने इस खूबी के साथ निभाया है कि समीक्षक इसे अभिनय से कहीं ज्यादा मानते हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि इस फिल्म ने गोल्डन ग्लोब तथा अन्य कई पुरस्कार जीते.

एक और फिल्म में एक और लड़का दौड़ रहा है. भाग रहा है. मगर वीराने में नहीं. और ना ही वह समाज से भाग रहा है. वह भाग रहा है जेरुशेलेम की गलियों में और वह एक ऐसे व्यक्ति का पीछा कर रहा है जिसे न उसने कभी देखा है और जिसे न वह जानता है. यहाँ तक कि वे एक दूसरे के अस्तित्व से भी बेखबर हैं. वह अपनी मर्जी से भी नहीं भाग रहा है. इस शर्मीले, थोड़े से बौढ़म किशोर असफ को भागने का यह काम गर्मियों के छुट्टियों में कुछ आ-मद-नी हो जाने के लिहाज से उसके पिता ने दिलवाया है. और क्या है यह काम ? उसे डिनका नाम की एक बेहतरीन कुतिया के पीछे-पीछे भागना है. सत्रह साल के किशोर असफ को इस लैबराडोर के पीछे जाकर उसे उसके मालिक का पता लगाना है. इस चक्करबाजी में असफ को कुतिया की मालकिन तमार का पता चलता है और यह भी पता चलता है कि तमार खतरे से जूझ रही है. समवन टू रन विथ की भागमभाग अलास्का के वीराने से दूर जेरुशेलेम के आदमियों की बस्ती में, उसकी गलियों में है.

यह फिल्म भी उपन्यास पर आधारित है, जो डेविड ग्रोसमैन की सर्वाधिक बिकने वाली किताब रही है. किशोरों के बड़े होने की प्रक्रिया और प्रेम, रहस्य-रोमांच की यह कहानी दर्शकों को अंत तक बाँधे रखती है. कथानक कभी आगे चलता है, कभी पीछे. कभी असफ को दिखाता है, कभी तमार को. तमार के रूप में बार बेल्फर का अभिनय और असफ के रूप में योनातन बार-ओर का अभिनय सराहनीय है. और तहार को नचाने वाले इजराइल की गलियों के अंडरवर्ल्ड के मालिक पेसाच (ज़ाही ग्राड) की दुनिया निराली है. गरीबी, ड्रग्स, दलाल, पॉकेटमार, मजमेबाज. क्या नहीं है इस दुनिया में. यहाँ अपराध है, यौन है, हिंसा है. और यह दुनिया आज किस देश की सच्चाई नहीं है ? अपराध की भयंकर दुनिया में भटकते दो किशोर. तहार सामान्य लड़की नहीं है. उसमें प्रतिभा है. वह एक बेहतरीन म्युजीशियन है और गिटार उसका अनन्य साथी. वह जेरुशेलेम की अंधेरी गलियों में डूब रही है और असफ के पास उसका पीछा करने के अलावा कोई चारा नहीं है. असफ को इस जोखिम भरी यात्रा में बहुत सारे कष्ट उठाने पड़ते हैं. वह मार खाता है, उसे तरह-तरह की धमकियाँ मिलती हैं. उसका पीछा किया जाता है. लेकिन वह अपने लक्ष्य से नहीं डिगता है. इसी तरह तहार कैद की जाती है. अपने प्रियजनों पर अत्याचार होते देखती है. उन्हें नशाखोर बनाए जाते देखती है. मगर पीछे नहीं हटती है. उसने जो ठान लिया है उसे पूरा करके ही दम लेती है. असफ और तहार दोनों के बीच में दूरी है. दोनों अकेले हैं. फिल्म समवन टू रन विथ साहस और निष्ठा का जीता जागता उदाहरण है.

2006 में मूल हीब्रू भाषा की यह फिल्म इंग्लिश सबटाइटिल्स के साथ उपलब्ध है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि फिल्म को कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए. यह 2006 के जेरुशेलेम फिल्म फेस्टीवल की उद्घाटन फिल्म थी और बार बेल्फर को उस वर्ष का सर्वोच्च अभिनेत्री का ग्रैंड जूरी स्पेशल मेंशन अवार्ड प्राप्त हुआ. इजरायली फिल्म अकादमी पुरस्कारों के लिए छः श्रेणियों में नामित इस फिल्म ने उस वर्ष का इजरायली फिल्म अकादमी पुरस्कार जीता. तमाम अन्य अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों के साथ-साथ 2007 में यह फिल्म इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल ऑफ इंडिया—गोआ में भी दिखाई गई थी.

युवा जो इतना बेफिक्र और लापरवाह नजर आता है, स्वयं तूफान से गुजरा रहा होता है उसके अन्दर बहुत कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है. इन टू द वाइल्ड एक युवा व्यक्ति की कहानी है और समवन टू रन विथ दो युवा लोगों के जीवन को प्रस्तुत करती है. तो फिल्म अक्रॉस द यूनिवर्स कई युवा लोगों की कहानी एक साथ दिखाती चलती है. इस म्यूजिकल फिल्म में जूली टेमोर ने साठ-सत्तर के बीटल्स दशक को पर्दे पर साकार कर दिया है. आज के युवा को बीटल्स के गीत-संगीत से जोड़ कर एक ऐसी खूबसूरत तिलस्मी कहानी गुंथी है जो बीटल्स के फैन को फिल्म के साथ-साथ गाने को मजबूर कर देती है. लड़के-लड़की के मिलन की शाश्वत सामान्य कहानी को इतने सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया गया है इस फिल्म में जिसे देख कर ही अनुभव किया जा सकता है. मात्र शब्दों में व्यक्त करने से बात नहीं बनेगी.

इन टू द यूनिवर्स की मूल कहानी को टेमोर ने डिक क्लैमेन्ट तथा इआन ला फ्रेनाइस के संग मिल कर तैयार की है. फिल्म में बीटल्स समूह के सदस्यों द्वारा रचित 33 गानों का उपयोग किया गया है. फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं इवान रेचल वुड, जिम स्टुर्गेस, जोए एंडरसन तथा टी. वी. कार्पिओ. बोनो, एडी लज़्ज़र्ड, जोए कोकर, सेल्मा हाइक गेस्ट आर्टिस्ट्स के रूप में आते हैं, तो डना फुश, मार्टिन लूथर मैकोय को पहली बार अभिनेताओं के रूप में काम करने का अवसर मिला है. 2007 में बनी इस फिल्म की कहानी 1965 से 1069 तक के, चार-पाँच साल के

समय को अपने में समेटे हुए है.

इंग्लैंड के बन्दरगह में काम करने वाला युवा जूड फीनी अपनी माँ और गर्लफ्रैंड मोली की बात न मानकर मर्चेंट नेवी में भरती होता है और जहाज से यात्रा करते हुए अमेरिका जा पहुँचता है. यहाँ वह बिना इजाजत और बिना वैध कागज- पत्तर के अपने जहाज से उतर पड़ता है. और वहाँ अपने अमेरिकी पिता वेस हर्बर्ट (रोबर्ट क्लोहेसी) को खोज निकालता है. उनसे वह पहले कभी नहीं मिला है. उसे पता चलता है कि उसका पिता एक जेनीटर के रूप में प्रिंसटन कॉलेज

में काम करता है. अब जव वह अपने पिता से मिल चुका है, वह क्या करे कहाँ जाए ? उसके पास जाने के लिए कोई स्थान नहीं है. क्योंकि वह कानूनी रूप से अमेरिका नहीं आया है. जूड प्रिंसटन के एक छात्र मैक्स से दोस्ती करता है. मैक्स कैरीगान एक रईस परिवार से ताल्लुक रखता है परंतु स्वभाव से सनकी और विद्रोही है. मैक्स और उसके साथी समृद्घ परिवार का होने के कारण अपनी फीस देते हैं. खाते-पीते तथा ड्रग्स का सेवन करते हैं. मैक्स जब थैंक्सगिविंग के लिए अपने घर जाता है तो अपने संग जूड को भी ले जाता है. और इस तरह जूड (जीम स्टुर्गेस) और लूसी (इवान रेचल वुड) मिलते हैं. लूसी मैक्स की छोटी बहन है. इस थैंक्सगिविंग के अवसर पर मैक्स (जोए एनरसन) और उसके माता-पिता के बीच खूब गर्मागरम बहस चलती है और मैक्स ताव में स्कूल छोड़ कर जूड के साथ न्यूयॉर्क सिटी में रहने लगता है. मैक्स टैक्सी ड्राइवर बन जाता है जबकि जूड फ्रीलांस अर्टिस्ट के रूप में जिन्दगी शुरु करता है. वे जिस घर में रहते हैं वहाँ और भी कई कलाकार रह रहे हैं. जोजो के छोटे भाई की मौत एक सड़क दंगे में हुई है. प्रुडेन्स का किसी के पीछे-पीछे ओहिओ से न्यूयॉर्क आना हुआ है. लूसी का बॉयफ्रेंड डैनियल (स्पेंसर लिफ) वियतनाम युद्घ में मारा जा चुका है. वह मातापिता की आज्ञा के विरुद्घ जाकर कॉलेज जाने से पहले न्यूयॉर्क में मैक्स से मिलने आती है. मतलब यह कि हरेक की एक अलग कहानी है, पर वे संग रह रहे हैं.

जब इतने युवा संग-संग रह रहे हों तो उनमें दोस्ती का प्रेम में परिवर्तित होना कोई आश्चर्य नहीं है. यही होता है अक्रॉस द यूनिवर्स में. लूसी और जूड के बीच प्रेम पनपता है. सैडी (डाना फचस) और जोजो (मार्टिन लूथर मैकोय)

एक दूसरे की ओर आकृष्ट होते हैं. प्रेम त्रिकोण बनते हैं, क्योंकि प्रुडेन्स (टी. वी. कार्पिओ) भी सैडी की ओर आकृष्ट है. वह हताश हो जाती है और डिप्रेशन में आकर खुद को एक अलमारी में बन्द कर लेती है. सारी कहानी बताना मेरा इरादा नहीं है. इसे तो देख कर ही मजा लेना होगा. इस म्युजिकल ग्रुप को एक मैनेजर मिलता है जो उन्हें डॉक्टर रोबर्ट के पास ले जाता है. जहाँ उन्हें नशे का स्वाद और लेक्चर मिलता है. उन्हें अपनी इस यात्रा में साइकेडेलिक अनुभव होते हैं. जब वे जगते हैं, उन्हें ज्ञात नहीं है कि वे कहाँ हैं. बाद में कल्ट कम्पाउंड में वे सब प्रुडेन्स से मिलते हैं. प्रुडेन्स का काम अब मिस्टर काइट के सर्कस में लोगों का मनोरंजन करना है.

मैक्स को वियतनाम युद्घ में भेज दिए जाने पर लूसी युद्घ विरोधी आन्दोलन में जुट जाती है. जूड अब भी गैर कानूनी तरीके से रह रहा है और राजनीति में हिस्सा नहीं ले पाता है. लेकिन वह यह भी सहन नहीं कर पाता है कि लूसी राजनैतिक सरगर्मियों में इतनी व्यस्त है. लूसी स्टूडेंट्स फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म से जुड़ी है. जूड का जीवन बिखरने लगता है. वह अपना आपा खोकर लूसी के ऑफिस पहुँच जाता है, लेकिन वहाँ से मार-पीट कर बाहर कर दिया जाता है. और दोनों में विच्छेद हो जाता है. बाद में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में युद्घ विरोधी प्रदर्शन के दौरान लूसी को पुलिस से बचाने की कोशिश में जूड मार खाता है. बहुत सारे प्रदर्शनकारियों के साथ वे दोनों भी गिरफ्तार हो जाते हैं.

जूड का पिता भी उसे बचाने में नाकामयाब रहता है और जूड को वापस इंग्लैंड भेज दिया जाता है. वहाँ वह अपनी पुरानी गर्लफ्रैंड से मिलता है, जो अब उसके एक दोस्त के बच्चे की माँ बनने वाली है. अब इस बात से जूड को कोई फर्क नहीं पड़ता है. उधर मैक्स वियतनाम में घायल हो जाता है और दरद सहन करने के लिए मॉर्फीन लेता है. लूसी का समूह विद्रोह के विध्वंसात्मक तरीके अपनाने लगा है. बम बनाते हुए एक विस्फोट में ग्रुप लीडर पासो मर जाता है. पूरी इमारत नष्ठ हो जाती है. यह भी 1970 की एक सत्य घटना पर आधारित है. जूड लीवरपूल में जब यह खबर पढ़ता है तो सोचता है कि लूसी भी नहीं रही. मगर मैक्स उसके लिए ‘हे जूड’ गाता है और उसके कानूनी तौर पर अमेरिका लाने का इंतजाम करता है.

वे दोनों जोजो, सैडी तथा प्रुडेन्स के रूफटॉप कंसर्ट में पहुँचते हैं. मगर लूसी दुःखी हो कर बाहर चली जाती है. ग्रुप बीटल्स का प्रसिद्घ गीत ‘डोंट लेट मी डाउन’ गाता है. पुलिस उन्हें तितर-बितर करती है. ठीक ऐसा ही बीटल्स के साथ 30 जनवरी 1969 को हुआ था. जूड किसी तरह पुलिस से बच कर छत पर रह जाती है और ‘‘ऑल यू नीड इज लव’ गाती है जिसे सुन कर पुलिस उसके साथियों को वाद्ययंत्रों के साथ छत पर जाने देती है. फिल्म का अंत भी बीटल्स के स्टाइल में होता है. लूसी हीरों का हार पहने एक दूसरी छत पर खड़ी है और बैकग्राउंड में बज रहा है, ‘लूसी इन द स्काई विथ डायमंड’. लूसी और जूड एक दूसरे को देख कर मुस्कुराते हैं उनकी आँखों में आँसू हैं यहीं फिल्म का अंत होता है. केवल सफेद बादल और नीला आकाश परदे पर रह जाता है.

इस फिल्म की कहानी इंग्लैंड के लीवरपूल से प्रारम्भ होती है जो कि बीटल्स का भी उद्गम था. बीटल्स जिन्होंने इंग्लैंड में युवाओं को अपने संगीत से पागल बनाया था. वे बाद में अमेरिका पहुँचे और उन्होंने अमेरिकी युवाओं के दिल पर भी भरपूर शासन किया. अपने इसी प्रभाव के चलते वे अमेरिकी युवाओं को युद्घ के विरुद्घ खड़ा करने में सक्षम हुए. और उनकी इसी ताकत से अमेरिकी शासन घबरा उठा. खासकर वे निक्सन की आँख में खटकने लगे. युद्घ की ताकत के बल पर, भय के बल पर दुनिया पर शासन करने वाले अमेरिका को शांति का सन्देश कैसे भा सकता है. उसके युवाओं को एक दूसरे देश के गाने-बजाने वाले कैसे उसके विरोध में खड़ा करने की हिम्मत कर सकते हैं. कहने को बीटल्स का गीत-संगीत समूह टूट चुका था. लेकिन उसके प्रमुख जॉन लेनन को गोली लगने का रहस्य अब तक नहीं सुलझा है. वैसे कहने को कहा जाता है कि उसे उसके एक सिरफिरे चहेते ने गोली मारी थी.

इन टू द वाइल्ड, समवन टू रन विथ तथा अक्रॉस द यूनिवर्स मुझे जिद करके मेरी बेटी ने दिखाई परंतु कुछ

और फिल्मों का जिक्र करने से मैं स्वयं को नहीं रोक पा रही हूँ. ईरानी निर्देशक मजीद मजीदी ने युवाओं की जिन्दगी पर कुछ बेहतरीन फिल्में बनाई हैं. जिनमें कलर ऑफ पैरेडाइज, फादर, बरन प्रमुख हैं और इसी पत्रिका में उन पर कुछ अंक पहले आलेख प्रकाशित हो चुका है. लेकिन जिस फिल्म फेटलेस का मैं जिक्र करना चाह रही हूँ वह इन सबसे बिलकुल अलग तरह की फिल्म है. यह फिल्म भी सत्य पर और 2002 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार इमरे कर्टीज के अपने अनुभवों पर आधारित है. उन्होंने यातना शिविर में एक किशोर के रूप में जीवन बिताया था और उन्हीं अनुभवों के आधार पर आगे चलकर उन्होंने आत्मकथात्मक उपन्यास फेटलेस की रचना की. जब इसी उपन्यास पर इसी नाम से फिल्म बनने लगी तो उन्होंने स्वयं इस फिल्म का स्क्रीनप्ले तैयार किया. 2005 में रिलीज हुई यह फिल्म एक चौदह साल के किशोर की जबानी बताई गई है. इस किशोर को जब यह खेल रहा था हिटलर के सैनिक उठा कर ले जाते हैं और यातना शिविर में डाल देते हैं. निर्देशक लजोस कोल्टाई ने कहानी से जरा भी छेड़छाड़ नहीं की है. हंगरी में बनी यह फिल्म वहाँ बनी अब तक की सर्वाधिक खर्चीली फिल्म है.

फिल्म का नायक कोव्स जब यातना शिविर ले जाया जाता है उसके पास प्रश्न हैं मगर वयस्कों की भाँति तैयार उत्तर नहीं हैं. एक साल के बाद जब कोव्स को यातना शिविर से बचाया जाता है तब वह बुचनवॉल्ड बैरेक के अस्पताल में मरने के कगार पर पड़ा हुआ है. उसके सब साथी मर चुके हैं. वह बालक था अतः उसके अनुभव और उन अनुभवों का उसका वर्णन दूसरे कैदियों से भिन्न है. उसका नजरिया आश्चर्य का है उसे यातना शिविर के अधिकारी होशियार नजर आते हैं और जो काम में चाल चौबन्द हैं. मगर जब वह शिविर के बाहर आता है तब उसे असल झटका लगता है. उसका कोई परिचित जीवित नहीं है और जो जीवित हैं वे उसे पहचानने से इंकार कर देते हैं. होलोकास्ट पर बनने वाली फिल्मों से यह हट कर है. इस विषय पर शिंडलर लिस्ट, लाइफ इज ब्यूटिफुल, साउंड ऑफ म्युजिक, टिन ड्रम जैसी कई फिल्में बनी हैं परंतु कोई भी होलोकास्ट को किशोर की दृष्टि से प्रस्तुत नहीं करती है. हालाँकि यह निर्देशक लाजोस कोल्टाई की पहली फिल्म है, परंतु इसमें उनकी प्रौढ़ता छलकती है. फिल्म बिना भावुकता का सहारा लिए हुए. फिल्म की ऑथेन्टिसिटी का श्रेय नायक कोव्स का अभिनय कर रहे अभिनेता मार्सेल नागी को जाता है उसकी बड़ी-बड़ी सूनी आँखें बिना मुँह से कुछ बोले बहुत कुछ कह जाती हैं. टाइम आउट मैगजीन में समीक्षक ने इसे एक बहुत शक्तिशाली और चिंतन को प्रेरित करने वाली फिल्म माना है. स्वयं लेखक इमरे कर्टीज का इस फिल्म को देख कर कहना है कि वे इस फिल्म से बहुत अभिभूत हैं.

इन टू द वाइल्ड, समवन टू रन विथ, अक्रॉस द यूनिवर्स तथा फेटलेस आदि हाल में बनी कुछ फिल्में हैं जो युवाओं के आंतरिक और बाह्य संसार का आधिकारिक लेखा-जोखा देती हैं. जो युवाओं पर बनने वाली फिल्मों की लीक से हट कर बनी फिल्में हैं. जो दिखाती हैं कि युवा ऐसी जिन्दगी भी जीता है, वह जिम्मेदार है. उसमें जोखिम उठाने का साहस है. वह मुसीबतों से टकराने की हिम्मत रखता है. चुनौतियाँ स्वीकार करना और उनसे जूझना जानता है. हमारे देश के युवाओं की फिल्मी पसन्द की सूची में ये फिल्में शामिल हैं. वह न केवल लीक से हट कर बनी इन फिल्मों को देख रह है वरन इन्हें एप्रिशियेट भी कर रहा है. खुद देख रहा है, दूसरों को दिखा रहा है.

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संपर्क:

विजय शर्मा, 151 बाराद्वारी, जमशेद्पुर 831001. फोनः 0657-2436251, ई-मेलः vijshain@yahoo.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 4
  1. चित्र और विषय का सामंजस्य नहीं लगा

    जवाब देंहटाएं
  2. महेश जी,
    चलिए, चित्र बदल कर इनटू द वाइल्ड का पोस्टर लगा दिया है :)

    जवाब देंहटाएं
  3. रोचक एवं ज्ञानवर्द्धक लेख को रचनाकार पर प्रकाशित करने के लिए बधाई ।

    जवाब देंहटाएं
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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,242,लघुकथा,1248,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2005,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,707,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,793,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,83,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,204,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: विजय शर्मा का आलेख : युवा जिन्दगी फ़िल्मी परदे पर
विजय शर्मा का आलेख : युवा जिन्दगी फ़िल्मी परदे पर
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