शोभना चौरे की कहानी : आनन्द

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आज आठ साल बाद, सरिता की सास उसके पास आई थी। सरिता यश की नई नई शादी हुई थी जब वे लोग ऊपर के फ्लैट में रहने आए थे। दोनों का लव मैरिज़ था सा...

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आज आठ साल बाद, सरिता की सास उसके पास आई थी। सरिता यश की नई नई शादी हुई थी जब वे लोग ऊपर के फ्लैट में रहने आए थे। दोनों का लव मैरिज़ था साथ ही अन्तर जातीय विवाह भी। सरिता के मम्मी पापा की तो सहर्ष स्वीकृति मिल गई थी ,उनके प्यार को शादी के रूप में परिवर्तित होने की क्यूंकि सरिता के परिवार में उसकी दोनों बड़ी बहनों ने भी अन्तर जातीय विवाह किया था। बिना दहेज़ दिये ही भार्गव जी ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह सादगी से कर दिया था ओर अब दोनों के परिवार वालो को भी कोई आपत्ति नहीं थी। उन दोनों के ससुराल वाले ,काफी सुलझे विचारों के थे। बेटों की पसंद को ही अपनी पसंद बना कर ,उन्होंने संतोष कर लिया था

किंतु सरिता का मामला टेढ़ा था।

यश की मम्मी के बहुत सपने थे यश की शादी को लेकर किंतु वो जानती थी ,यश ओर उसके पापा के आगे उसका विरोध ज़्यादा दिन तक नहीं रह पायेगा। फिर उन्होंने अनमने मन से स्वीकृति दे दी थी लेकिन उनका विरोध सरिता के साथ बर्ताव में हमेशा ही झलकता था।

दो चार दिन निकले ,तभी मैंने सोचा चलो आज यश की मम्मी से मिल कर आती हूँ इतने सालों बाद हैं , क्या वे पहचानती हैं या भूल गई। वैसे सरिता हर साल दीपावली पर आगरा जाती है वापसी में उसकी सास सबके लिए पेठे देना नहीं भूलती,इसका मतलब उन्हें हम सब याद तो रहते हैं। दरवाजा उन्होंने ही खोला ओर एक दम प्रफुल्ल्लित हो कर मेरा स्वागत किया। मैं आश्चर्य चकित थी हमेशा अनमनी सी रहने वाली यश की मम्मी तो एक दम बदल गई उन्हें देख कर अच्छा लगा। वरना में सोच रही थी पता नहीं ?उनसे क्या बात करुँगी? क्यूंकि सरिता मेरे जितने नज़दीक थी तो उन्हें मुझसे भी थोड़ा रोष था। पहले जब वे एक दो दिनों के लिए आती थी ,सरिता ने परिचय करवाया था,मैंने भी उन्हें चाय पर बुलाया था तो उनके व्यवहार से मुझे काफी असुविधा लगी थी। कुछ बातें उन्होंने सरिता के मायके के बारे में भी कही थी अगर सरिता वो जान जाती तो उसके मन को बहुत ठेस लगती और हमारे सम्बन्ध भी मधुर नहीं रह पाते।

थोड़ी देर इधर उधर के हाल जानने के बाद ,मैंने उनसे पूछा ओर आपकी प्रेक्टिस कैसी चल रही है। उन्होंने एल.एल.बी किया था। जिस उम्र में वकील अपने मुकाम पर होते हैं,उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत की थी

मैंने उनसे कहा , आपने यह काम बहुत ही अच्छा किया समय का सदुपयोग किया। }अपने दोनों बेटों की शादी कर ,जिम्मेवारी से मुक्त हो अर्निंग भी शुरू कर दी ओर समय के साथ कदम भी मिला लिए। आपके काम में भाई साहब मदद करते हैं या नहीं?मैंने उनकी चुटकी ली जबकि मुझे मालूम था,उनके आधे केस खन्ना साहब ही तैयार करते थे।

उन्हें तो बस काला कोट पहन कर कोर्ट। जाना होता था।

अरे कैसी बात कर रही है मिसेस खरे ?

आपने ही तो हमे बातो बातो में उकसाया था ,हम जब आगरा गये छोटू की शादी बाद हमे खालीपन लगता था बस तब से हमने आपकी बातों का ध्यान रखा और काम शुरू कर दिया। हाँ आपके भाई साहब कभी कभी हमारी मदद कर देते है पर आज कल ये वहां ज्यादा टिकते ही कहाँ है !उनकी जान तो यहां बेटे बहु और पोती में अटकी रहती है।

अरे सरिता आंटी के लिए नाश्ता लाओ ॥

नहीं नहीं! मैंने कहा । सरिता रहने दो।

अभी मुझे बाहर जाना है ,फ़िर आउंगी तब फ़िर से बैठेंगे।

इतना कह नमस्ते कर मैं अपने घर आ गई।

मेरा शंकालु मन ये स्वीकार करने को तैयार नहीं था ?की यश की मम्मी में इतना बदलाव कैसे हुआ।

मै उन दिनों को याद करने की कोशिश करने लगी ,जब यश की मम्मी आती थी और सरिता रोते -रोते मेरे पास आती थी ,उन दिनों सरिता और यश संघर्ष ही कर रहे थे नौकरी के लिए।

ख़ुद का काम डालकर भी देखा थोड़े दिनों तक सब ठीक चलता: पर प्रतियोगिता के इस दौर में उनके लिए जमे रहना मुश्किल हो रहा था। । इस बीच दोनों को को एक अच्छे संस्थान में नौकरी मिल गई ,साथ ही नन्हीं दीप्ती भी आ गई। उन्होंने अपना फ्लेट भी खरीद लिया आज वो दोनों कैरियर के शिखर पर है। और ऐसे हालात में यश की मम्मी आती. उसके पापा का भी दूसरे शहर में तबादला हो गया था। बार बार वहां भी नहीं जा सकती थी, मैं उसे समझती धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा यश भी उसे समझाता मम्मी कि बातों का बुरा मत मानो। सरिता कहती -आंटी

हमारी शादी में भी पापाजी ने ही सारे उत्साह से काम किया था। मम्मीजी आज भी मुझ अपनी बहू नहीं स्वीकार कर पाई है। उनके मन के कोने में अभी भी कुछ कसक है। जबकि मैं जानती थी सरिता अपनी साँस को खुश करने के लिए हर संभव प्रयत्न करती है। सरिता के बनाये खाने में मीन मेख निकालना, मेरे बेटे को अपने वश में कर लिया है ये बातें उनके लिए आम होती। जब भी कभी मैं उनके घर गई तो हमेशा मुझे ड्राइंग रूम में बिठाकर खुद अन्दर चली जाती ,और जब तक मैं बैठती वो बाहर नहीं आती। उनके इस असहज व्यवहार के कारण खन्ना साहब भी उनके साथ नहीं आते। वे महीनों सरिता के पास रहते। नन्ही दीप्ती उनकी जान थी। सरिता और यश को भी उन्होंने अपनी छाया में रखा। उनके घर में रहने से सरिता को बड़ा संबल मिलता वर्ना घर और बाहर दोनों जगह संघर्ष करते करते कभी कभी वो रुआंसी हो जाती।

सर्व गुण सम्पन्न सरिता ने अपने व्यवहार से सभी बिल्डिंग वालो को अपना बना रखा। व्यस्त होने के बावजूद हमेशा सबकी मदद को तैयार रहती। ,छुट्टियों में बच्चो को पेंटिग सिखाना ,लड़कियों को मेहँदी सिखाना ओर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना इसमें सबसे आगे रहती। पर यश कि मम्मी के सामने अपने को असहाय पाती। यश कि मम्मी जब भी आती दो दिन तो सरिता के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करती फिर उनका ध्यान पूरी तरह से अपने बेटे पर केन्द्रित हो जाता और सरिता कि उपेक्षा उनके व्यवहार में निहित रहती। सरिता अपनी उपेक्षा देख व्यथित होती।

एक दिन बिल्डिंग में मिसेस वर्मा के घर भजन थे वही यश कि मम्मी भी आई थी ,सरिता तो अपने काम पर गई थी यश कि मम्मी और मैं पास पास ही बैठे थे ,बस वहीं वो शुरू हो गई आजकल लोग अपनी लड़कियों को बहुत स्वतन्त्रता दे देते है ?लड़कियाँ भी जहाँ अच्छे पढ़े लिखे लड़के मिले बस पहुँच जाती है।

मैंने खा -

किसकी बात कर रही है ?

अरे ? आप नहीं जानती हमारा यश यहाँ पढ़ने आया था और फिर यही नौकरी लग गई अपने एक दोस्त के साथ रहता था। थोड़ी दूर पर ही तो सरिता का घर था बस ताड़ लिया ;कभी सब्जियां भेजी जाती, कभी केक कभी पकोडे ? लड़कों का क्या? घर से दूर अच्छा खाना मिला उन्ही के गुलाम हो गये मेरे बेटे को फांस लिया। वर्ना एक से एक रिश्ते आ रहे थे सुन्दर लड़कियों के पैसे वाले घरों के ?यहाँ तो हाथ जोड़कर माफ़ी मांग ली बरी हो गये।

न कोई लेन देन न ही कोई स्वागत सत्कार।

बातों में सरिता को ताने देती कि ,स्वजाति कि बहू आती तो इतना दहेज मिल जाता और आगे पढ़ने के लिए यश को अमेरिका भेज सकते थे। सरिता बेचारी चुपचाप सुनकर मेरे पास आती और हलकी हो लेती।

न कोई लेन- देन न स्वागत ही सत्कार?

मेरी यह हालत थी कि मेरा उनके पास बैठना मुश्किल हो गया मैंने उनसे माफ़ी मांगी और हाथ जोड़ केर उसी समय उठ कर आ गई। इतनी पढ़ी लिखी संस्कारित बहु पा कर कोई भी खुश हो, परन्तु यशः की मम्मी की बातों ने साबित केर दिया की वोह खुद भी पढ़ी लिखी है हैं उनके पति भी अच्छे ओहदे पर है। सभ्य लोगों में उनका उठाना बैठना था ;परन्तु उनकी यह सोच ? इस सोचा ने में लड़के की माँ हूँ, मेरा लेने पर कितना हक़ है उन्हें यह सब एक अजनबी के सामने कहने पे मजबूर कर दिया। हमारे समाज में लड़का होने पर जो खुशी मनाई जाती है;तो धीरे धीरे लड़के कि माँ के मान में जो अहम् भर देती है। हमारी कुरीतियाँ , उनकी परतें यश की मम्मी पर पड़ी हुई थी :उसके बाद में उनसे कभी नहीं मिली। वह एक आध बार आई थी सरिता ने कहा भी था । आंटी मम्मीजी आई हैं ?,

पर मेरा मान उनसे बात करने को नहीं हुआ; न ही कोई बिल्डिंग से उनके घर मिलने गया।

दबे दबे उनका स्वभावः सबको मालूम हो गया था वो तो सरिता का सब लोग लिहाज करते थे तो उपरी तौर पर उन्हे मान लेते थे। उसके बाद पता नहीं उनके और उनके पति के बीच क्या कह सुनी हुयी वे भोपाल नहीं आई हाँ सरिता हर साल दीपावली पर सबके लिये ढेर साड़ी गिफ्ट ले केर आती सुना उनके छोटे लड़के की भी धूम धाम से शादी हुई सरिता ने कार्ड भी दिया मिठाई भी दी दीप्ती ने भी अपनी चची के सारे गुण अपनी तोतली भाषा में बताये, क्योंकि दीप्ति स्कूल से आने के बाद मेरे पास ही रहती जब उसके दादू आगरा में रहते तब तक। वर्ना दादू के और उसकी इतनी पटती की कोई उनके बीच नहीं आता पा ता। दादू ने भी अपना पूरा कर्तव्य निभाया। जब तक दीप्ति समझदार हुई वे उसके पास ही रहते अब वे भी थोडे अशक्त हो गये थे फिर डायबिटीज़ के मरीज तो उनका आना जाना कम हो गया था।

दीप्ति अपने छोटे भाई चाचा के बेटे की बातें करते नहीं थकती थी छोटा ऐसा छोटा वैसा। उसके लिए मानो वो एक खिलौना था । मैं खाना बनाते बनाते जाने क्या विचार करती रही खरे साहब भी अभी तक सैर करके नहीं आये थे वे रोज शाम को घूमने जाते थे अपनी हम उम्र के लोगो के साथ पार्क में। उनके साथ उनका समय अच्छा व्यतीत हो जाता। मैं सुनीता का इंतजार कर रही थी वो आवे तो उसकी पसंद कि सब्जी बना दूं। योगेश तीन महीने के लिए अमेरिका गया है तब से सुनीता को मैंने यही रहने को कह दिया है \सुनीता मेरी भांजी है मेरे पास ही उसकी पढ़ाई हुई है और इसी शहर में उसकी शादी हुई है हमारा अपना कोई बच्चा नहीं है। इतने में ही दरवाजे कि घंटी बजी \दरवाजे पर सुनीता थी।

अरे मामी इतनी देर लगा दी ?

दरवाजा खोलने में ?क्या सोच रही थी आज क्या बनाऊं?

सुनीता को क्या पसंद है ?

मामा को क्या पसंद है ?मामी कभी अपनी पसंद की तो कोई चीज बनाया करो।

अच्छा मामी छोड़ो सब आज मैं बहुत अच्छी खाने कि चीज ली हूँ आपके लिए ,कहकर उसने अपना बैग डायनिंग टेबल पर रखा और मेरे दोनों कंधे पकड़कर कुर्सी पर बैठा दिया। उसके आने से पूरे घर में जैसे भूचाल सा आ गया हो।

अच्छा मामी बताओ मैं क्या लाई हूँ ?

अरे ? भाई मैं क्या जानूं?

शायद समोसे शायद कचोरी ,?

नहीं ? मामी मैं आज मैं भरवां पराठे लाई हूँ उड़द की दल के जो कि आपको बहुत पसंद है। साथ में आलू का झोल भी है और उसने फटाफट प्लेटें भी लगा दी।

अरे ? तेरे मामाजी को तो आने दे?

वो अभी आये ही समझो

मैंने आते समय पार्क में ही उन्हें इशारा कर दिया था।

इतने में ही फिर कॉल बेल बज उठी। आप बैठो ऐसा कहकर वह दरवाजा खोलने गई।

देखा तो सरिता थी अरे सरिता भाभी आप ?

बहुत दिनों बाद ? कैसी हैं आप ?उसके अन्दर आने के पहले ही इतने सवाल ? वो बिचारी दरवाजे पर ही ठिठकी खड़ी रही?

मैंने उसे कहा -सरिता अन्दर आओ।

जी आंटी इतना कहकर उसने सरिता के सवालों का जवाब दिया, फ़िर कहने लगी -आंटी कल माताजी के भजन रखे है

अष्टमी है और फ़िर मम्मजी भी आई हुई है उनकी बहुत इच्छा थी आप जरुर आना। सुनीता तुम भी आना। अच्छा मैं चलती हूँ।

सुनीता ने तो माफ़ी मांग ली यह कहकर भाभी मेरी तो छुट्टी नहीं है पर प्रसाद लेने जरुर आउंगी।

हा हा क्यो नहीं ?पर वादा मत भूलना।

सरिता तो चली गई पर सुनीता के प्रश्नों की बौछार शुरू हो गई।

आंटी कब आई ?सरिता भाभी पर इतना प्यार क्यो?आदि आदि ......मैंने उसे टालने को कहा -चलो अब मुझे बहुत भूख लगी है फ़िर परांठे भी ठंडे हो रहे है ,इतने में ही सुनीता के मामाजी भी आ गये आज तो उनके मजे हो गये सुनीता आती है

तो उनके मन की कली -कली खिल जाती है हम सबने मिलकर परांठे खाए सुनीता ने मुझे उठने ही नहीं दिया सारा कम कर रसोई साफ कर हम दोनों को दवाई दी फ़िर अपने लेप टॉप पर काम करे बैठ गई।

दूसरे दिन मैं भजन शुरू होने के थोड़ी देर पहले ही सरिता के घर पहुंच गई थी। सरिता लगी थी तयारी में। मुझे मालूम था सरिता के घर भजन यानि की अच्छी खासी दावत। तभी तो आरती के समय तक पुरा कमरा भर जाता है भजन के पहले घंटे में तो चार पांच भजन गाने वाली महिलायें ही होती है।

मैंने उससे कई बार कहा सरिता बहनों के कार्यक्रम में ये खाने पीने का झंझट क्यो ?

वो कहती आंटी कभी कभी तो कोई घर आता है इस बहान भी थोड़ा कुछ बना लेती हुँ। मैं भी हमेशा उसे मदद करवाती परन्तु आज तो सरिता की मम्मीजी उसके साथ जोर शोर से कम करवा रही थी , मैं तो भजन वाले कमरे में ही बैठ गई रसोई तक गई ही नहीं \

कमरा धूप बत्ती कि सुगंध से महक रहा था दुर्गा माँ कि तस्वीर और झांकी सरिता ने बहुत अच्छे से सजा राखी थी दीप्ती भी माँ का पूरा सहयोग कर रही थी \

मुझे देखते ही मिसेस खन्ना रसोई से बाहर आई और कहने लगी -देखिये तो मिसेस खरे !कही कोई कमी तो नहीं है हमे तो ये सब काम आते नहीं ?आप तो हमेशा करती रहती है। हम तो बस ग्रहस्थी में उलझे रहे और अब कोर्ट कचहरी में ये तो सरिता के संस्कार अच्छे है और आप जैसे लोगो का साथ मिला है तो वो सत् ईश्वरीय कार्यो में लगी रहती है \

नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ,मुझे अपने आप पर थोड़ी सी शर्म महसूस हो रही थी मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया था जिससे मिसेस खन्ना को मेरी इतनी तारीफ करना पड़ रही थी \या फिर मुझे लगा शायद वो अपनी झेंप मिटाने के लिए ये कह रही हो।

लेकिन उस बात को भी अब तो कई साल हो गये। और वो भी हमारे साथ ही आकर बैठ गई।

इसके बाद और कई महिलायें आ गई और फिर विधिवत गणेश वंदना के साथ भजनों का कार्यक्रम शुरू हुआ माताजी के जयकारे के साथ आरती सम्पन्न हुई। सबने प्रसाद पाया और नाश्ता कर जाने लगे। सरिता ने कहा - आंटी अंकल के लिए भी नाश्ता और परसाद लेते जाना।

थोड़ा रुकिए न ? पड़ोस की मिसेस शर्मा भी बैठी थी मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी।

इतने में वादे के मुताबिक सुनीता भी आ गई उसने प्रसाद लिया और खन्ना आंटी के समाचार पूछने लगी \

मिसेस खन्ना भी उसे देखकर खुश हो गई सुनीता कि शादी के बाद पहली बार ही उसे देख रही थी \

आंटी वकालत कैसी चल रही है ?

अरे तुम्हें भी मालूम है मैं प्रेक्टिस करती हूँ।

क्यों नहीं आंटी ?आप इतना अच्छा काम करती है। वैसे आपके पास कैसे केस आते ह?

सुनीता तो बस बाल कि खाल ही निकलने लगी है। मुझे डर था कही बातों बातों में उन्हें कुछ सुना ना दे। इतने में मिसेस खन्ना ने कहा वैसे तो सब तरह के केस लेती हुँ पर बहु को ससुराल में अपना हक़ दिलाने में ,न्याय दिलवाने की कोशिश करती हुँ ,

दहेज पीड़ित बहू , औरतों पर हुए शारीरिक या मानसिक अत्याचार के मामलो में न्याय दिलवाना ऐसे कैसों पर ज्यादा काम करती हुँ और कोई महिलायें जो फीस नहीं दे सकती उनके लिए निशुल्क भी कर रखा है ,आज मिसेस खन्ना को पूरा अवसर दिया था सुनीता ने ताकि वो अपने बारे में कुछ कह सके। आंटी आपने तो बहुत ही अच्छा काम हाथ में ले लिया है एक तरह से तो समाज सेवा ही है।

और छोटे भइया भाभी कैसे है वो लोग साथ नहीं आए ?उन्हें कभी देखा भी नहीं ?

मै जो बात पूछ नहीं पाई थी या जो बात मेरी पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी सुनीता ने बेहिचक साफ शब्दों में पूछ लिया।

हा वे लोग अच्छे हैं उनका चेहरा थोड़ा सपाट हो गया था वे एकदम से इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थी उस पर सुनीता ने एक और प्रश्न कर डाला

आपकी छोटी बहु तो सजातीय है ?आपके साथ ही रहती है ?क्या वो भी सर्विस करती है ?

नाश्ते की प्लेट रख कर सुनीता भी वहीँ बैठ गई थी मैंने उसके चेहरे को देखा सुनीता काम ये प्रश्न उसे विचलित कर गया था मुझ लगने लगा सुनीता को कुछ समझता ही नहीं कुछ भी ऊटपटांग पूछने लगती है ये उनके घर का मामला है।

परन्तु मिसेस खन्ना ने तपाक से उत्तर दिया -नहीं हमारी छोटी बहु हमारे साथ नहीं रहती शादी के दो सालबाद ही वो दूसरे घर में रहने चले गये जो की उसके मायके से उसे मिला था। जब बच्चा ६ महीने का था तभी चले गये थे और वो सर्विस भी नहीं करती, हा हमारा बेटा जरुर उनकी सर्विस करता है। कभी कभी त्योहारों पर मिलने आ जाते है इतना कहते कहते वो रुँआसी हो गई लेकिन अच्छा है.. रोज रोज की तकरार से निजात मिल गई वो भी वंहा खुश हम भी अपने काम में खुश।

अरे आप लोग नाश्ता नहीं ले रहे कहा की बातों में उलझ गये। इतने सुंदर भजनों का आनन्द लिया ये सब बातें व्यर्थ है।

सरिता बेटी -शर्मा आंटी और सबके लिए चाय तो बनाओ ?

हम लोग चाय पीकर नमस्ते कर घर आ गये। धर आते ही मैंने सुनीता को कहा तुमने खन्ना आंटी को परेशान कर दिया ?

नहीं मामी ...

मुझे अच्छा लगा और उन्हें भी अच्छा लगा जाने अनजाने उन्हें सरिता भाभी के साथ किए गये व्यवहार पर स्पष्ट रूप से पश्चाताप था जो की आज उन्होंने हम सबके साथ स्वीकार किया था यह बहुत बड़ी बात है।

तुम और तम्हारी ये बातें तुम ही जानो मैंने सुनीता से कहा -पर मेरा मन भी कही हल्का हो रहा था और आज के भजनों का आनन्द और दुगुना हो गया था ..............................

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चित्र – रेखा की कलाकृति – कागज पर स्याही से रेखांकन

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: शोभना चौरे की कहानी : आनन्द
शोभना चौरे की कहानी : आनन्द
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