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अशोक गौतम का व्यंग्य : नई सुबह : नए संकल्प

हर पल नया जोश, नई उमंग! भौतिकवादी समाज में जीने का एक यही ढंग! सुबह ठेला,शाम को रेला, बंधु, यही है संसार रूपहला! समय से भी तेज दौड़ रहा है यहां हर किरदार! लंगड़ाता हुआ,गच्चा खाता हुआ!!

नई सुबह का नया सूरज, आदर्श टाउन के जागरूक नागरिकों ने शाम को ही नए दिन के स्वागत के लिए नये संकल्प लिए। बेचारे संकल्पों की छटपटाहट से रात भर सो नहीं पाए। शर्मा जी ने संकल्प लिया कि नई सुबह से बिजली के मीटर की सांसें वे सदा के लिए चलना बंद कर देंगे। गुप्ता जी ने संकल्प लिया कि नई सुबह से तराजू के गले का फंदा कुछ और टाइट कर देंगे। वकील साहब ने संकल्प लिया कि आने वाले कल से वे अपने ही बनाए झूठ के रोज रिकार्ड तोड़ेंगे। जिस दिन न टूटा उस दिन शाम को खाना नहीं खाएंगे। पत्रकार बंधु ने संकल्प लिया कि नई सुबह से वे खबरों पर कम, खबरों से होने वाली आय पर ज्यादा ध्यान देंगे। वर्मा जी ने संकल्प लिया कि कल से वे अपने पटवारखाने में बैठने के भी जनता से पैसे वसूलेंगे। ठाकुर साहब जिनके पिता मुफ्त की ज्यादा पीने से अपना अंत कर गए थे ने संकल्प लिया कि नए दिन के सूरज के साथ ही वे हफ्ता वसूली की जगह हर दिन वसूली करेंगे। जो न करें तो नरक को जाएं। मास्टर जी ने फिर और जोश से आने वाले कल से न पढ़ाने का संकल्प दोहराया। अब आदर्श टाउन का एक जागरूक नागरिक शेष मैं बचा था। आदर्श नागरिक टाउन का नव निर्वाचित सचिव! दोस्तो! मौके की नजाकत देख मैं मजे से रंग बदलने के फन में माहिर हूं, सो बिना किसी संकोच के मैंने भी नई सुबह के नए सूरज के साथ नए संकल्प लेने की ठानी । न लेता तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली बात होती। समाज से अलग होकर कोई जी सका है क्या?

तो दोस्तों, नई सुबह के आगमन के लिए मैंने भी कुछ हल्के-फुल्के संकल्प लिए हैं। अगर उन्हें अपने प्राण देकर भी पूरा करना पड़े तो भी पीछे नहीं हटूंगा। कारण? मैं उस देश का वोटर हूं जहां पर सदियों से संकल्पों की फसलें सूखा पड़ने के बाद भी संसद से लेकर सड़क तक लहलहाती रही हैं, ताबड़तोड़!

आपको मेरे संकल्पों में जो दम लगे तो आप भी ले सकते हैं। मैंने अभी इनका पेटेंट नहीं करवाया है। और पेटेंट न हुई चीजों पर नगों से नंगों तक का हक होता है।

मेरा पहला संकल्प :- नई सुबह के नए सूरज की पहली किरण ज्यों ही मेरे आदर्श टाउन का स्पर्श करेगी मैं पूरा झूठ बोलना शुरू कर दूंगा। इससे पहले बीच-बीच में सच बोल लिया करता था। अब नई सुबह से सच बोलना बिल्कुल बंद! झूठ भी सफेद बोलूंगा। क्योंकि मैं अपने मित्रों से सीख गया हूं कि दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए झूठ नहीं सफेद झूठ बोलना जरूरी होता है। जो आज के दौर में झूठ नहीं बोलता वह जिंदगी भर दिमागी तौर पर बीमार ही रहता है। और बीमार व्यक्तित्व देश का उत्थान नहीं कर सकता। मैं भी देश के विकास में बढ़-चढ़ कर हिस्सा देना चाहता हूं। इसलिए देशहित में बिल्कुल स्वस्थ रहूंगा आने वाले कल से। अतः आप भी आने वाले कल से देश हित में झूठ बोलिए, आपसे मेरी करबद्ध प्रार्थना है। मेरा झूठ वराइटीदार होगा। झूठ दिमाग के लिए प्रोटीन, हाइडरेट, मिनरल्स, विटामिंस, फाइबर सभी कुछ की पूर्ति एक साथ करता है। इसलिए आप भी नियमित झूठ कहिए, मैं तो कहूंगा ही।

मेरा दूसरा संकल्प :- अगली सुबह से मैं दफ्तर में हल्का लेना छोड़ दूंगा। जो भी मेरे से काम करवाने आएगा उससे पहले कटोरे में डालने के लिए कहूंगा। अगली सुबह से मांगने के मामले में बची शर्म भी छोड़ दूंगा। जो कुछ जनता देगी प्रेम से लूंगा। कल से चूजी होना बंद। साहब के चरणों की सौगंध लेकर कहता हूं कि अगर अपना बाप भी मेरी सीट से काम करवाने आए तो उसका काम भी बिना कुछ लिए नहीं करूंगा। बाप हो तो बाप की जगह! कुर्सी की मर्यादा रिश्तों के आगे कमजोर नहीं पड़ने दूंगा।

मेरा तीसरा संकल्प :ष् नई सुबह से मैं पत्नी से ज्यादा तरजीह प्रेमिका को दूंगा। अपने बच्चों के बाप से ज्यादा बाप प्रेमिका के बच्चों का बनूंगा। पत्नी में पहले से ज्यादा दोष देखूंगा। प्रेमिका के दोषों को सदा नजर अंदाज करूंगा। अपने जज्बातों पर अब मैं कतई काबू नहीं रखूंगा। समाज जो कहता हो कहता रहे। वह कौन सा दूध का धुला है?

मेरा चौथा संकल्प :ष् नई सुबह से मैं अपना सामाजिक बढ़ाऊंगा। जीने के लिए शारीरिक वजन नहीं ,सामाजिक वजन जरूरी होता है। अपने हाथ लंबे करूंगा। हाथ लंबे करने के लिए चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े। ईमान मारना पड़े, चाहे ईमानदारी। वर्तमान युग लंबे हाथ वालों का युग है। वजनी महापुरूषों से सब डरते हैं, भले ही वे जेल के भीतर हों। कम वजनी व्यक्ति की न घर में पूछ होती है,न घर के बाहर। सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक बीमारियां उसे तिल-तिल मरने के लिए विवश कर देती हैं। और वह बेचारा मर भी जाता है। पर कल से मैं जीने के लिए उठूंगा।

मेरा पांचवां संकल्प :ष् नई सुबह से मैं एक नए ढंग का हरामी होने का संकल्प लेता हूं। शातिर समाज में जीने के लिए शातिर होना बहुत जरूरी है। आदर्श, नैतिक हो कछुए की चाल नहीं चला जा सकता। इसके कारण तनाव हो जाता है, आपकी तरह मुझे भी कभी-कभी। हरामी व्यक्ति ही दूसरों को तनाव में रख खुद तनावमुक्त रह सकता है। परमानंद की स्थिति यही होती है। हरामी व्यक्ति कहीं भी हो,चैन की बंसी बजाते हैं। मैं भी अब बंसी प्रिय होना चाहता हूं। दुनिया मरती है, तो मरती रहे।

मेरा अंतिम संकल्प :- नई सुबह से मैं संकल्प लेता हूं कि मैं उत्तम नहीं सर्वोत्तम ढंग से साहब की चापलूसी करूंगा। साहब की चापलूसी के अपने ही बनाए अपने पिछले सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दूंगा। और दाव लगा तो साहब को भी! पीठ के पीछे उसे डट कर गालियां दूंगा और सामने पड़ते ही सदियों पहले गुम हो चुकी दुम सगर्व निकाल उसके आगे हिलानी शुरू कर दूंगा। साहब के मूत को गंगाजल समझ नित्य उसका आचमन करूंगा। घर में भगवान की जगह साहब के जूते रख दूंगा और भगवान को घर से निकाल दूंगा, मन से तो बहुत पहले निकाल चुका हूं। दोस्तों के लिए बगल में रखी छुरी अब हफ्ते में एक बार नहीं, हर रोज पैनी करूंगा। दिमाग में अब रिश्तों के बदले उल्लुओं, सियारों, गीदड़ों को पनाह दूंगा।

तो मित्रों! ये हैं मेरे नई सुबह के मेरे कुछ नए संकल्प! तो मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं अपने संकल्पों को हर हाल में पूरा कर रात को चैन से सो सकूं। सही मायने में सामाजिक होने की ओर यह मेरा पहला कदम है, मिल के सब दुआ करो।

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अशोक गौतम

गौतम निवास,अपर सेरी रोड

नजदीक वाटर टैंक,सोलन -१७३२१२ हि.प्र.

E mail a_gautamindia@rediffmail.com

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