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एस के पाण्डेय का आलेख : हास्य रस के नए आयाम

हँसना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है । अनुभवी बताते हैं कि जब किसी दूसरे और खासकर पडोसी पर हँसने- हँसाने का सुनहरा अवसर हाथ लग जाता है तो वर्षों पुराने असाध्य रोगों में भी आश्चर्यजनक लाभ मिलता है । ज्ञानी कहते हैं कि शोध के माध्यम से ऐसा साबित भी ही चुका है । भले ही कुछ लोग ' अति सर्वत्र व्रजयेत '    के अनुसार अधिक हँसने -हँसाने को अशिष्ट मानें लेकिन इसके लाभ को देखते हुए आजकल शहरों में ' लाफिंग -क्लब ' भी बनने लगे हैं । राजा -महाराजा भी तो विदूषक रखा करते  थे । ' हँसी तो फँसी '  वाली उक्ति तो सबने सुना ही होगा । लेकिन आजकल फँसने वाला काम कम और फँसाने वाला काम ही जादा होता है । फँसे हुए पर सब कोई हँसता है । सामने न सही पीठ पीछे ही सही । हँसने-हँसाने वाली  बातें व इसके लाभ-हानि को यहीं छोड़ दिया जाय तो जादा अच्छा है । क्योकि यहाँ तो मुख्य मुद्दा हास्य रस का है ।

साधारणतया लोग अज्ञानतावश हास्य रस का मतलब भी सामान्य हँसी ही समझ लेते हैं । लेकिन अब ऐसा बिल्कुल नहीं रहा । पहले कभी रहा होगा । पहले वाली  हवा अब नहीं रही, पानी नहीं रहा । विज्ञानी कहते हैं 'प्रदूषण' है । 'खर-दूषण' भी दूसरों के जानसे खेलते थे और आज का प्रदूषण भी जीवन घाती है । हो न हो यह भी उन्ही का कलियुगी रूप हो । अब प्राचीन संतों वाली परम्परा भी तो नहीं रही कि केवल 'स्व -दूषण' दिखे । अब हर जगह 'पर-दूषण' ही दीखता है ।

कुछ भी हो आदमी, बात-व्यवहार, खान-पान, चाल-चलन सब कुछ पहले वाले नहीं रहे । सब आधुनिक हो गये । सबमें नये आयाम जुड़ चुके हैं । ऐसे में हास्य रस  में नया आयाम न जुड़े ऐसा कहीं संभव है । आज के समय में इसका दायरा बहुत विस्तृत हो गया है फिर भी इसका विछोह मन-मोद से नहीं हुआ है । इसके मूल में मन-मोद ही होता है । विज्ञानी कहते हैं कि आदमी के पूर्वजों के पूँछ  थी और आदमी के पूँछ होती है । दिखे या न दिखे विज्ञानी कहेगा तो मानना ही पड़ेगा । क्योकि उसके पास शोध का व्रह्मास्त्र  जो होता है । आजकल जिनको शोध का वोध भी नहीं है वे भी शोध से ऐसा साबित हो चुका है बात-बात में बताते रहते हैं । जैसे पूँछ आदमी से विलग नहीं हुई है वैसे ही हास्य रस मन-मोद से ।

कोई भी क्रिया-कलाप जिससे मन-मोद होता है हास्य रस के अर्न्तगत ही समझना चाहिए । जब कभी मन-मोद उत्पन्न करने वाली कोई  बात सोची, सुनी अथवा की जाती है तो हास्य रस होता है । इसी प्रकार कुछ चीजें देखने व दिखाने से भी हास्य रस होता है । हास्य रस के भी कुछ फायदे तथा कुछ नुकसान हैं । लेकिन नुकसान कि अपेक्षा फायदा कुछ जादा ही होता है । तभी तो दिन-दूनी रात  चौगुनी दर से इसमें लगातार वृद्धि हो रही है । यह कहना गलत नहीं होगा कि हास्य रस से कुछ लोगों  की पाँचों अँगुलियाँ घी में हो जाती हैं । इससे काम, दाम व नाम आसानी से मिल जाता है और मन-मोद ऊपर से होता रहता है । केवल मन-मोद के लिए भी हास्य रस किया जाता है और यही इसे नया आयाम देने के लिए उत्तरदायी भी है । आज के समय में हास्य रस एक ज्वलंत समस्या है ।

हास्य रस का बहुत गहरा अर्थ है । कभी किसी कवि ने कहा था -

"नयन बयन कुछ करत जब, मन को मोद उदोत ।

चतुर चित्त पहिचानिए, तहाँ हास्य रस होत ।।"

कहने का मतलब पहले हास्य रस के लिए नयन एवं बयन को ही मुख्यतः उत्तरदायी माना जाता था । लेकिन आज के समय में भी यह यहीं तक सीमित रहेगा ऐसी अपेक्षा बिल्कुल निरर्थक है तथा 'कूप-मंडूक' वाली उक्ति को चरितार्थ करती है । आज-कल बात नयन, बयन से शुरू होकर आगे बढ़ जाती है । मन-मोद तो दोनों स्थितियों में होगा ही । मन-मोद और हास्य रस एक दूसरे के पूरक हैं । आज का हास्यरसिक  भी तो पहले वाला नहीं रहा जो केवल नयन-बयन तक ही सीमित रहकर अपना  काम चला ले । पाँव रखने कि जगह मिलते ही पाँव फैलाने की कारिस्तानी शुरू कर देता है ।

हास्य रस से जहाँ एक ओर उन्नति व प्रोन्नति के मार्ग खुल जाते हैं वहीं दूसरी ओर पति-पत्नी तक के  रिश्ते में भी दरार पड़ जाती है तथा घर के घर बर्बाद हो जाते हैं । आजकल हास्य रस बहुत  ही व्यापक हो गया है । सभी क्षेत्रों में इसकी जड़ें जमीं हैं । कॉलेज हो या कार्यालय, घर हो या बाहर इसकी पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं । फिल्मों को ही ले लीजिये हास्य रस से परिपूर्ण होने पर हिट व सुपरहिट होने में देर नहीं लगती तथा जो हीरोइनें जितना ही जादा हास्य रस  में माहिर होती हैं, उतना ही जल्दी स्टार बन जाती हैं ।

पहले भी साहित्य में हास्य रस रहता था लेकिन पहले वाला । आजकल साहित्य जगत भी इसके नये आयाम से अछूता नहीं है । 'कोरे-बोरे' साहित्यों की बाढ़ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । 'स्त्री-विमर्श' के नाम पर भी हास्य रस की  पैठ साहित्य में काफी मजबूत हुई है । औरतों के लाभ तथा उन्हें अगले पन्ने पर कितनी जगह मिलती है  यह तो पता नहीं लेकिन ऐसी किसी भी पुस्तक के अगले पन्ने पर जगह मिलने में कोई संदेह नहीं रहता ।

आजकल की  शिक्षा से लोगों की  आर्थिक तथा मानसिक उन्नति तो हो ही रही है । भले ही 'विद्या विनयम ददाति ' वाली बात नहीं है तथा हत्या,  चोरी, डकैती और अन्य कुकृत्यों में दिन-प्रतिदिन बाढ़ आती जा रही है । लेकिन यह अधिकारों के प्रति जागरूकता लाने में काफी सहायक सिद्ध हुई है । कुछ न कुछ अच्छाई-बुराई तो हर चीज में होती है । आज अधिकार के लिए लोग नंगे अथवा अधनंगे होकर परेड कर सकते हैं । शिक्षा से मानसिक उन्नयन हो ही रहा है तो अधिकारों के प्रति जागरूकता लाजिमी ही है । नंगापन भी  लोगों का प्राकृतिक अधिकार है । ईश्वर सभी को नंगे ही तो भेजता है । इसीसे  तरह-तरह के पोशाक चलन में आ रहे हैं ।   'खुला -ढका'  मोड़ फैसनेबल माना जाता है । इससे भी हास्य रस होता रहता है । क्योकि देखने तथा दिखाने वाले दोनों के मन में मोद तो होगा ही तथा  मन-मोद और हास्य रस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।

अतः समाज में बढ़ते नंगेपन का कारण भी हास्य रस ही है । फैसन से हास्य रस का सीधा सम्बन्ध है । पहले पुरूषों के कपडे कम होते थे । प्रायः एक लंगोटी और एक अंगवस्त्र । लेकिन स्त्रियाँ पूर्णरूपेण वस्त्र में रहती थीं । अब बिल्कुल बिपरीति होने लगा है । उत्थान-पतन हर चीज का होता ही है । पत्र-पत्रिकाओं में हीरोइनों के वक्तव्य प्रायः मिलही जाते हैं कि सुन्दरता भगवान की  दी हुई चीज है जिसे दिखाने में बुरा क्या है ? रोल के माँग के अनुसार कपडे कम करने में मुझे कोई परहेज नहीं है । आज का सिनेमा समाज का दर्पण नहीं है,   समाज ही सिनेमा का दर्पण बन गया है । समाज में सिनेमा दिखता है ।

एक बार एक पति-पत्नी में पोशाक को लेकर विवाद हो गया । पति महोदय कह रहे थे कि दुपट्टा को बोझ नहीं समझना चाहिए । श्रीमतीजी नाराज हो गयीं । हाल ही में नारी उत्थान के लिए स्त्री- विमर्श पर एक पुस्तक भी पढ़ रखा था । बोलीं- " जी रहे हो इक्कीसवीं सदी में और विचार हैं पहली सदी के । इतना नैरो माईन्डनेस मुझे पसंद नहीं है । एक सुरंग बनवाकर उसी में  डाल दो । जब काम लगे घुस जाया करो । बाहर रहने पर कोई न कोई तो देख ही लेगा । किसके पास क्या है कौन नहीं जनता ?

बात पते की है । जब सभी लोग जानते हैं कि किसके पास क्या है तो कपड़े पहनने की ही क्या जरुरत है ? पशु-पक्षी तक को भी आजादी है इस मामले में । कोई कुछ नहीं कहता । किसीको कोई आपत्ति नहीं होती । तब यह दुर्लभ मानव शरीर जो चौरासी लाख जन्मों के बाद मिलता है,  इसे अर्ध-नग्न तो रख ही सकते हैं । क्योकि अर्ध-नग्न रहने से सुन्दरता में चार चाँद लग जाते हैं । किसी ने कहा है-

                     "सर्व ढके सोहत नहीं,  उघरे होत कुवेश ।

अर्ध  ढके छवि देत हैं,  कवि-अच्छर, कुच, केश ।।"

उपरोक्त विवाद के मूल मे हास्य रस ही मूल कारण है । इसके लिए संघर्ष भी करना पड़ता है । क्योकि हास्य रस में असीमित आनंद होता है । हास्य रस करने के लिए ही लोग गर्ल और बॉय फ्रेंड बना लेते हैं । शादी करने के लिए बहुत कम लोग ही ऐसा करते हैं । शादी-विवाह में ताम-झाम बहुत  होता है । जब बिना कूप खने  जल मिल रहा हो तो कूप खनने की मूर्खता कौन करेगा ?  मंजिल मिले तो रास्ता कोई भी हो क्या फर्क पड़ता है ?  हास्य रस के लिए नये-नये तरीके भी इस्तेमाल किये जाते हैं । जो लोग इसमे लगे हैं वे ही इसके सभी पहलुओं से भली-भाँति परिचित हैं । इसके लिए माता-पिता व पति तथा पत्नी को गुमराह भी किया जाता है । आजकल युवा भिखारी व पागल को भी हास्य रस की दृष्ट से शक के दायरे में देखा जाना चाहिए । भिखारी या पागल के रूप में आने से बहुत सहुलियत रहती है और आसानी से कार्यक्रम निश्चित हो जाता है । आज के हास्यरसिक बहुत ही आधुनिक और नायाब नुस्खा आजमाते रहते हैं । बच्चों के जरिये या फिर घर वालों से कोई मनगढ़ंत सम्बन्ध जोड़कर घर में आने जाने का रास्ता भी साफ कर लेते हैं । सम्बन्ध कुछ ऐसा जोडेंगे कि किसी को कोई आपत्ति या शक-सुबहा की कोई गुंजाइस न रहे । इसके बाद नजरें बचाकर नजर लड़ाते हैं । आज जब बाहर ही पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं तो घर तक पहुँच बनाने की कोई विशेष जरूरत नहीं रहती । आधुनिक आई टी सुविधाएँ भी तो प्राप्त हैं । सिर्फ मौका चाहिए ।  'नयन-बयन' की सीमा कभी भी पार की जा सकती है ।

एक बार एक लड़के ने एक लडकी से कहा कि चलो घर में हास्य रस किया जाय । लडकी के परिजनों से पता चला कि लड़का रिश्ते में लडकी का भाई लगता है । शायद इसीलिए उसके घर वालों ने कुछ ध्यान नहीं दिया या हास्य रस के बढ़ते आयाम से वे लोग बिल्कुल ही अनभिज्ञ थे । मैंने ही उन्हें आगाह किया कि आज के समय में हास्य रस के नये आयाम से बेखबर होना या इसे गंभीरता से न लेकर नजरंदाज कर देना बहुत  ही घातक है । आजकल तो पावन  समझे जाने वाले पारिवारिक व सामाजिक संबंधों में भी कुछ नजरबाज होते हैं तथा कई मुंह बोले भाई तो कसाई से भी बदतर निकले हैं । बाद में लडकी मेरे ऊपर ही बिफर उठी । कहने लगी आप उस पागल के बात का बतंगड़ बना रहे हो,  क्या आप नहीं हँसते ? भला ऐसी दो अर्थी बातें करने का भी कोई औचित्य है । जैसे  कोई शराबी पूछ बैठे कि क्या आप नहीं पीते ?  जीने के लिए सबको कुछ न कुछ पीना ही पड़ता है । दीगर है कुछ लोग मरने के लिए भी पीते हैं । लेकिन दूध, पानी व चाय पीना भी क्या व्हिस्की व रम पीने के बराबर ही होता है । कहीं थोडा- बहुत हँस देता हूँ तो इसका मतलब यह तो नहीं  कि मैं भी हास्य रस करता हूँ । मैं अपने सफाई में सच कहता हूँ कि बहुत पढाई-लिखाई किया, भारत-भ्रमण किया लेकिन हास्यरस की बारीकियाँ नहीं सीख सका । जिंदिगी में इस बात का बड़ा अफसोस है । जब हास्यरसिकों के आमोद-प्रमोद व मन-मोद को देखता हूँ तो मन खिन्न हो जाता है । आज के समय में हास्य रस, मसखरी आदि पर पकड़ न होने से बहुत उपेक्षा होती है । इसी वजह से कोई बात करना भी पसंद नहीं करता तथा गर्ल फ्रेंड तो दूर कोई मजे का फ्रेंड तक नहीं मिल पाता ।

आशा है कि नये हास्यरसिक इस लेख से काफी लाभ उठायेंगे तथा जो पहले से ही लगे हैं वे हास्य रस के गोपनीयता के प्रति और अधिक सजग रहेंगे । माता-पिता भी हास्य रस के नये आयाम को देखते हुए चौकस रहेंगे । युवती वर्ग अपने प्रेमी अथवा पति के तथा युवक वर्ग  अपनी प्रेमिका अथवा पत्नी के हास्य रस संबन्धी गति-विधियों पर नजर रखेंगे । पति अथवा पत्नी के अनावश्यक रूप से घर से गायब रहने,  देर से घर लौटने अथवा दूर रहने पर पत्र न लिखने व फोन न करने की स्थितियों में हास्य रस की प्रबल सम्भावना को नजर अंदाज नहीं करेंगे ।

                                                                       - एस. के. पाण्डेय,

समशापुर , गोंडा (यू. पी. ) ।

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