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एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : नेकी के बदले बदी ही मिलती है ।

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(व्यंग्य लेखन पुरस्कार : प्रविष्टि क्रमांक 1)

नेकी के बदले बदी  ही मिलती है । यह कहावत पुरानी जरूर है लेकिन प्रासंगिक । कहना तो यह चाहिए कि जितना ही यह पुरानी होती जाती है उतना ही प्रासंगिक भी और अब ऐसा जमाना आ गया है कि आप ने किसी के  साथ नेकी किया नहीं कि बदी  पहले ही मिल जाती है । यदि किसी को इसमे कोई शंका हो तो ' शुभस्य शीघ्रम '  को ध्यान में रखकर तुंरत इसका निवारण कर लेना चाहिए । लोग अक्सर यह कहते ही रहते हैं कि नेकी और पूछ -पूछ मतलब पूछने की भी कोई जरूरत नहीं जब कभी और किसी के भी साथ मन में नेकी करने का नेक बिचार  आये फौरन करना चाहिए । फिर भी यदि किसी को  यह असमंजस हो कि कहाँ और किसके साथ करें तो पड़ोसी से अच्छा दूसरा कौन होगा ?  उसी पड़ोसी का होना सार्थक है जो पड़ोसी के काम आये । पड़ोसी के साथ नेकी करने का एक फायदा यह होता है कि यदि वह कृतघ्न भी ठहरा तो भी उसे अपनी नेक हृदयता का अहसास बराबर कराते  रहने का प्रयास किया जा सकता है ।

वैसे साधु -महात्माओं का मत है कि नेकी निर्लिप्त भाव से करना चाहिए । अर्थात नेकी कर दरिया में डाल । इसलिए नेकी तो करें लेकिन उससे किसी प्रतिफल की अपेक्षा बिल्कुल न करें । जैसे गुरजनों  की बातें एक कान में पड़ते ही दूसरे कान से निकल जाती हैं ।  ठीक वैसे ही नेकी करके तुंरत भूल जाना चाहिए । ध्यान देने वाली बात यह है कि नेकी करके भूल जाना चाहिए न कि नेकी करना । जिसके प्रति नेकी किया जायेगा यदि वह कृतज्ञ होगा तो अपने आप जिंदिगी भर उपकार मानेगा ।

भले ही नेकी के बदले बदी  ही मिलती है परन्तु महान लोग इस बात कि परवाह किये बिना नेकी करते ही रहते हैं । आजकल नेकी करने वालों कि कमी नहीं है । यह खुशखबरी है । प्राचीन संतों ने भी नेकी करने को धर्म कार्य की संज्ञा दी है । एक दूसरे के प्रति नेकी करना मानव धर्म है । अतः नेकी करने से परलोक में भी लाभ मिलेगा ही । इसलिए ही लोग कष्ट सहकर भी इस महान कृत को अंजाम देकर पुण्य लाभ करते रहते हैं । यदि आपने भी किसी के साथ कोई नेकी किया है  लेकिन अब भूल गये हैं । जबकि ऐसा आमतौर पर मुमकिन नहीं है । क्योकि गुरजनों की बातों का असर ही ऐसा होता  है और निशेधोक्ति का इस्तेमाल न करने से ही आज के लोगों से उन्हें मात मिल रही है । कुछ भी हो जब कभी  किसी माध्यम से पता चले कि अमुक व्यक्ति आपको भला-बुरा कह रहा था, गाली दे रहा था तो तुरंत समझ लेना चाहिए कि जरूर आप उसके साथ कोई नेकी कर चुकें हैं । आगे कुछ घटनाओं कि चर्चा की जा रही है जिससे साबित हो जायेगा कि नेकी के बदले सच में बदी ही मिलती है ।

मेंरे एक परिचित हैं जो  ' हास्य रस के नये आयाम'  पढ़कर मुझे हास्य रस विरोधी बताते हैं । आखिर जब कोई दोस्त न बनना चाहे तो किसी चीज का विरोध करके लोगों को अपना विरोधी बनाना कोई बुद्धिमानी तो है नहीं । मूरख भी  अपने को बुद्धिमान समझता है और  इसी से ज्ञानियों की भरमार है । तब मैं भी ऐसा क्यों न सोचूँ फिर भी मैं ज्ञानी नहीं हूँ । अतः  मैं हास्य रस  का बिरोध क्यों करूंगा ? दरअसल बात यह है कि एम एस सी गणित और पीएचडी मैथमैटिकल-फिजिक्स में पूरा करनें तक शिक्षक तो बहुत मिले लेकिन बचपन से ही गोस्वामी तुलसीदासजी  को अपना गुरु बना लिया । इसी से हास्य रस की ओर रुझान नहीं हो  सका । अब जिस चीज में किसी का इंट्रस्ट न हो या अनभिज्ञता हो तो उसे उसके बिरोध करने का अधिकार थोड़े ही मिल जाता है । मैंने जन-जागरण के लिए ही हास्य रस के नये आयाम को लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया । कोई मिथ्यावाद तो फैलाया नहीं केवल तथ्य उजागर किया है । यही सब तो शोध में भी सिखाया व किया जाता है । वैसे मिथ्यावाद फैलाने वालों की भी आजकल कोई कमी नहीं हैं । हर कोई किसी न किसी वाद के चक्कर में फँसा हैं । आबाद कोई नहीं हैं । सभी वादग्रस्त हैं । बात-बात में वाद-प्रतिवाद होता  रहता है और विवाद की स्थिति बनी ही रहती है । अतः विवाद ही विवाद हैं । लेकिन मैंने अपने  समझ से तो नेकी ही किया लेकिन बदी ही हाथ लगी ।

एक महाशय दहेज के कारण पिछले पॉँच बर्षों से बेटी की शादी नहीं कर पा रहे थे  । वे दहेज विरोधी भी हैं । लेकिन कुछ वर्षों पूर्व ऐसे नहीं थे । जब बेटे की शादी हुई थी । परिस्थिति बश ऐसे हो गये हैं । पेंसन  से घर का खर्च चलना ही मुश्किल था तो दहेज कहाँ से जुटाते । एक दिन उनके घर के सामने भीड़ जमा थी और जितने लोग उतनी ही बातें हो रही थी । कोई कहता लड़की भाग गई, कोई कहता बाजू में रहने वाला लड़का भगा  ले गया । कोई कहता लड़का तो शरीफ था लड़की ही भगा ले गई । कुछ भी रहा हो सब सड़कें चौराहे पर मिलती हैं । एक ज्ञानी ने बताया कि दोनों ने मंदिर में शादी भी कर लिया है । लेकिन ये महाशय कहते कि अगर एक बार वह मिल जाये तो मैं उसका खून पी जाऊँगा । कम से कम इतना तो सोचना चाहिए था  कि अब ऐसा करने से बेटी बिधवा हो जायेगी ।

एक दूसरे महाशय जो बड़े ही धार्मिक प्रवृत के हैं । जब ये सुबह अगरबत्ती सुलगा रहे होते हैं तो इनका बेटा सिगरेट । रोज समझाते थे कि बेटा  !  कुछ पूजा-पाठ भी किया करो । मेंरे खानदान में आजतक कोई नास्तिक नहीं हुआ । लेकिन इनका समझाना भैंस के आगे बेन बजाने के समान ही था । सौभाग्यबश एक परिवार इनके यहाँ किराये पर रहने के लिए आ गया । किरायेदार की बेटी  पूजा को जबसे इनके बेटे ने देखा रात-दिन पूजा-पूजा ही करता रहता है । अब ये सज्जन कहते हैं कि जबसे ये लोग आये मेरा  बेटा बर्बाद होता जा रहा है  । किरायेदार को अब तक बाहर कर दिए होते लेकिन सोचते हैं कि इस महँगाई  में कम से कम सब्जी का खर्चा ही निकल आता है । अब  आप ही बताएं की नेकी के बदले बदी मिलती है कि नहीं ।

कबीर दास जी ने कहा है- "ढाई  अच्छर प्रेम का पढै  सो पंडित होय" । आजकल कई लड़के-लड़कियाँ ढाई पृष्ठों से भी बड़े-बड़े प्रेम-पत्र लिखते-पढ़ते हैं । ये पांडित्व की सीमा से भी बहुत आगे निकल चुके होते हैं तथा अपने माता-पिता का नाम रोशन करते हैं । किसी ज्ञानी ने भी कहा है कि वही जवानी, जवानी होती है जिसकी कोई न कोई कहानी जरूर हो । लेकिन कहानी तो बहुत छोटी चीज होती है । आजकल तो ऐसी-ऐसी घटनाएँ होती हैं कि पूरा प्रेम-ग्रन्थ ही रचा जा सकता है । अगर ज्ञानियों की मानें तो केवल इन्हीं लोगों की ही जवानी सार्थक होती है । बचपन खेलने में तथा  बुढापा अक्सर रोने में ही बीतता है ।  ऐसे में अगर जवानी ही सार्थक हो जाये तो क्या कम है  ?   कहा जाता है कि भारत कभी विश्व गुरू था और आज फिर से विश्व गुरू बनने कि ललक है । आज देश-समाज में पांडित्व बहुत तेजी से बढ़ ही रहा है तो विश्व गुरू बनने का सपना भी पूरा हो ही जायेगा । लेकिन उस समय बहुत निराशा होती है जब खुद माता-पिता ही समाज में नाक कटवाने का आरोप लगाकर अपने बच्चों के पांडित्व का निरादर करते हैं । पढाई-लिखाई छुड़ाने की धमकी देते हैं तथा कुछ लोग तो लड़कियों को नजरबंद भी कर देते हैं । जहाँ माता-पिता  को अपने बच्चों पर फक्र करना चाहिए । वहाँ ये सब नेकी के बदले बदी को ही दिखाता है ।

शर्मा जी का लड़का उनके लाख बार कहने पर भी कोई ब्यायाम नही करता । वे खुद एक छोटा-मोटा आधुनिक योगा केंद्र भी चलाते हैं । लेकिन डिस्को-डांस व सोंग देख-सुनकर उसमें एकाएक स्फूर्ति आ जाती है । हाथ पैर हिलाकर कूल्हे मटकाने लगता है । तब शर्मा जी को कुछ नहीं से कुछ ही अच्छा सोचकर जहाँ खुश होना चाहिए वहीं वे मन ही मन कुढ़ते हैं । निराश  हो जाते हैं । कहते हैं कि क्या होता जा रहा है आज के लड़कों-लड़कियों को ?

छोटे बच्चों के सरकारी शिक्षालय जबसे भोजनालय बनें तब से काफी सहुलियत हो गई । बच्चों को रोज टिफिन देने से ही राहत मिल गई । लोग बढ़ती ब्यस्तता व कामकाज के कारण चार-पॉँच बर्ष भी पूरा नहीं करने देते । पहले ही बच्चों को स्कूल भेजने लगते हैं । जो लोग अन्य आधुनिक सुविधाओं के लाभ नहीं उठा सकते उनके लिए कुछ घंटों की मोहलत ही काफी होती है । बच्चे सेकंड-थर्ड में पहुँच जाते हैं और पाठ कोई खोलते हैं, अंगुली कहीं और रखते हैं तथा पढ़ते कुछ और ही हैं । तब लोग शिक्षकों को कहते हैं कि केवल मुफ्त में वेतन व फीस लेते हैं । यह नहीं सोचते कि बेगार में आजकल कोई भी काम नहीं होता ।

इसी तरह एक अन्य महाशय कई साल से प्रोन्नति के लिए परेशान थे । लाख सिफारिश व जुगाड़ के बावजूद भी मैनेजर के कान में जूँ  तक नहीं रेंगी । पत्नी ने कहाँ कि तुमसे तो कुछ नहीं होता तो ये प्रोन्नति ही कैसे होगी । किसी तरह मैनेजर से मेल-जोल बढाया । उसने मैनेजर  की सुनी तथा मैनेजर ने उसकी । सिर्फ प्रोन्नति ही नहीं हुई बल्कि मैनेजर  मित्रवत हो गये । घर पर चाय-पानी के लिए भी आने-जाने लगे । अब ये महाशय पत्नी पर ही कीचड उछाल रहे हैं ।

लड़कों ने कॉलेज टीचर से कहा सर ! परीक्षा आ गई अभी तक तो आधा पाठ्यक्रम भी पूरा नहीं हुआ । सर जी बोले परेशान होने की बात नहीं है । पर्चा मैंने ही बनाया है । एक लड़की बोली लेकिन जिन्हें आगे कॉम्पटीशन में बैठना है उनके लिए मुश्किल होगी । सर जी बोले नेकी का जमाना ही नहीं है । हम आप लोगों की भलाई के लिए ही सोच रहे  थे । कॉम्पटीशन में बैंठने के लिए कमसे कम परीक्षा पास होना जरूरी है कि नहीं । जब पास ही नहीं होंगे तो क्या खाक बैठोगे कॉम्पटीशन में ?  लेकिन कोई बात नहीं जो लोग फेल होना चाहते हों उन्हें अभी और पढा सकता हूँ ।

एक तिवारी जी जो मेंरे पड़ोसी भी हैं एक दिन बोले कि आप लिखते भी हैं । मैंने कहा तो कौन सा तीर मार रहा  हूँ । हर कोई लिखता है । विधार्थियों को भी न चाहते हुए भी लिखना पड़ता है । वे बोले कि मेरा मतलब है कि आप लेखक भी हैं । तब मुझे पता चला कि आजकल ऐसे भी लेखक होते हैं जिन्हें खुद ही पता नहीं होता कि वे लेखक भी हैं । तब भला दूसरे क्या जानेंगे ? किसी महात्मा ने सच ही कहा था खुद को समझों कि आप क्या हैं ?  अगर आदमी यह समझ ले कि वह क्या है, क्यों है ? तो सारे प्रश्न समझ जाये । समझने के लिए कुछ शेष न रहे । किसी से कुछ पूछने या बताने की  जरूरत ही न रहे कि वह कितना असीमित , समझ से परे व अनंत महिमायुक्त है । लेकिन आज दूसरों से ही फुर्सत नहीं मिलती तो अपने लिए किया ही क्या जाये ?  चलो कम से नेकी ही होती है । तिवारी जी जैसे लोग जिनके बिचारो में समता होती है लेकिन संकीर्णता नहीं । उनके मत से हर लिखने वाला लेखक होता है । जो कुछ लिखता है उसका लेखक । अगर तिवारी जी अपने आप तक ही सीमित रखते तो भी ठीक था । परन्तु ये लोगों से भी बताते रहते हैं कि मैं लिखता भी हूँ । वैसे सबको पता है कि यह काम मैंने बचपन से ही शुरू कर दिया था फिर भी पता नहीं क्यों इनकी यह नेकी मुझे  बदी ही लगती है ।

नेता चिम्मनलालजी अपने सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि ' स्थिर सरकार ' बताते हैं । आगामी आम चुनाव में भी इनका यही मुख्य मुद्दा होगा । बिगत वर्षों में समय और समस्याएं तो आगे बढ़ती रही हैं लेकिन इनकी सरकार कुलमिलाकर स्थिर  रही है । संकट तो बहुत आये,  अनिश्चितता का माहौल बना रहा । इसलिए ही इन्होंने गठबंधन की एक जुटता में ही अपनी सारी शक्ति लगा दी । अब लोग कह रहे हैं कि सरकार ने कोई काम नहीं किया । ' देन हुतौ सो दै चुके विप्र न जानी गाथ ' वाली बात है । आखिर स्थिर सरकार भी न देते तो मध्यावधि चुनाव होते, महँगाई वैसे ही आशमान छू रही है तब तो और जहमत हो जाती । लेकिन लोग नेकी के बदले बदी देने के आदी हो चुके हैं तो किया ही क्या जाये ?

डॉक्टर को लोग भगवान कहते हैं । दीगर है कि ज्ञानियों को भगवान हैं भी कि नहीं इसमें भी शंका है । कहते हैं कि एक छोटे-मोटे ओपरेशन के दौरान मरीज की किडनी ही गायब हो गई । उस समय  तो पता नहीं चला । कुछ दिनों बाद पता चला या कुछ दिन बाद ही गायब हुई कौन जाने ?   इसके बावजूद  भी आरोप डॉक्टर के ऊपर ही लगाया जाने लगा । कहाँ गायब हुई, किससे हुई कुछ कहा नहीं जा सकता ? जैसे यदि कोई साइकिल चालक जानबूझकर ही किसी मोटरसाइकिल चालक से टकरा जाये तो भी दोष देने वाले मोटरसाइकिल चालक को ही दोष देंगे । वैसे ही शरीर से कुछ गायब हो जाने पर डॉक्टर को दोष देना होता है । आजकल अक्सर लोगों का दिल गायब  हो जाता हैं । कोई कहता है कहीं खो गया । कोई कहता हैं किसी ने चुरा लिया । हो सकता है  किसी का दिल किसी नर्स ने या डॉकटरनी अथवा डॉक्टर ने चुरा लिया हो । लेकिन हर केस में यही होता है कहना बिल्कुल गलत हैं । ऐसे में डॉक्टर पर ही आरोप लगाना उचित प्रतीत नहीं होता । यह मानकर चलना चाहिए कि डॉक्टर जो भी मरीज के शरीर से गायब करता है मरीज के भलाई के लिए ही करता है । मरीज न समझ सके वह बात दूसरी है । भारत में हर किसी की किडनी तो बदली नहीं जा सकती और अनेकों लोग हर वर्ष किडनी के खराबी से मर जाते हैं । ऐसे में यदि डॉक्टर मरीज कि माली हालत देखकर ' न रहेगा बांस न बनेगी बासुरी ' के तर्ज पर किडनी गायब ही कर दे तो क्या बुरा है ? लेकिन वही बात बारबार कहने से कोई फायदा नहीं है । लगता है आज के जमाने का मूल मन्त्र ' कर बुरा तो हो भला ' और ' कर भला तो हो बुरा ' हो गया है । अतः नेकी करोगे तो बदी मिलना तय है ।

इस तरह अनेक घटनाएँ हैं जो नेकी के बदले बदी वाली कहावत को चरितार्थ करती हैं । इसमें दो राय नहीं है कि नेकी के बदले बदी ही मिलती है । फिर भी नेकी करने वाले महान लोग  'निंदा अस्तुति उभय सम '  को अपने जीवन का आदर्श मानते हुए जी जान से समर्पित रहते हैं ।

                                                       - एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र. ) ।

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2 टिप्पणियाँ

  1. बहुत खूब पाण्डेय जी को बधाई

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  2. पाण्डेय जी का यह व्यंग्य दुधारी तलवार की तरह है जो डॉक्टर को भी लपेटता है और मरीज़ को प्रेमी प्रेमिका को भी और उनके माँ -बाप को भी । बधाई ।

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