राजनारायण बोहरे की कहानी : विश्वास

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बाबू हरकचंद का ज़िंदगी भर का विश्‍वास एकाएक ढह गया। वे जब से म्‍युनिसपिल कमेटी की नौकरी में आये थे, ऐसा कभी नहीं हुआ था। उन्‍होंने अ...

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बाबू हरकचंद का ज़िंदगी भर का विश्‍वास एकाएक ढह गया।

वे जब से म्‍युनिसपिल कमेटी की नौकरी में आये थे, ऐसा कभी नहीं हुआ था। उन्‍होंने अपनी सारी ज़िंदगी शान से गुजारी है। बाज़ार में कभी किसी व्‍यापारी ने उनकी बात नहीं टाली। लेकिन आज सेठ गहनामल ने उनके विश्‍वास को एक ही झटके में गहरे से तोड़ दिया।

जब उनकी म्‍युनिसिपिल-कमेटी के पास नाके लगाने का अधिकार हुआ करता था तब कमेटी में हरक चंद जी ऐसी कुरसी पर थे कि वे नाकेदारों के कामकाज पर सीधे निगाह रखते थे। महसूल वसूली का काम उनके ही पास था। इसी वजह से क़स्‍बे के सारे व्‍यापारी उनका ख़ास ख्‍़याल रखा करते थे। उनने भी इस क़स्‍बे के हर व्‍यापारी पर खूब अहसान किये हैं।

चोरी -छिपे पूरा ट्रक भरके माल ले आये दुकानदारों को फाइल से उनने वे कागज- पत्‍तर कई बार बताए हैं, जिनके कारण दुकानदारों पर हजारों रूपया महसूल लग सकता था। जानकारी मिल जाने पर दुकानदारों ने कागज-पत्‍तर में लिखी चीजें अपने यहां दर्ज करलीं। सो दुकानदारों के हजारों रूपये बच गये, पर बदले में हरक बाबू ने कभी किसी से कोई अपेक्षा नहीं की। जिसने जो दिया प्रेम से ले लिया।नहीं दिया तो भी कोई पच्‍चड़ नहीं की। हां , इन सब कामों की वज़ह से बाज़ार में उनका इतना सम्‍मान जरूर था कि वे यदा-कदा बाजार से निकलते, दुकानदार उन्‍हे आवाज़ देकर बुला लेता और खूब मान देता। खुद उठ के उन्‍हे अपनी गद्दी पर बिठाता और नाश्‍ता-चाय-पान के बिना आने न देता। वे जब घर-गृहस्‍थी की कोई चीज़ खरीदते, मुंह से मांग के कोई उनसे सामान का मोल न लेता फिर भी वे न मानते , कम-ज्‍यादा थोड़े बहुत दाम देकर ही उठते।

कुछ बरस पहले सरकार ने सड़क यातायात को बिना बाधा चलने देने के लिये जब कुछ सुधार किये , तो सबसे पहले म्‍युनिस्‍पिलटी के नाके बंद कर दिये। अब सरकार को क्‍या पता कि म्‍युनिसपिल कमेटी के लिए नाके कितने जरूरी है ? जरूरी क्‍या हरक बाबू यह मानते हैं कि वे तो प्राणवायु थे, इन कमेटीयों के लिए। नाके क्‍या बंद हुये, नगरपालिका वालों के दिन फिर गये। बुरे दिन आ गये - कर्मचारियों के भी और संस्‍थाओं के भी।

नाकेदारों और किरानीयों के सारे ज़लवे खत्‍म हो गये। पहले बज़ट कम होना शुरू हुआ फिर दफ्‍तर में दरिद्रता के नजारे प्रकट हुये-घिसे-पुराने परदे, फटे-मेजपोश ,आधा-अधूरा उज़ाला और दिन में आने वाली चाय के घटते कपों से बाहर के लोग भी अंदाज़ा लगाने लगे कि म्‍युनिसपिल कमेटी की माली हालत इन दिनों पतली हो चली है। फिर तनख्‍वाह बंटना अनियमित हुआ , और वेतन न मिलने का क्रम कई-कई माह तक चलने लगा।

भीतर-ही-भीतर हरकचंद ने अनुभव किया कि वे दुकानदार जो हरकचंद को अपना परिजन औेर आदरणीय माना करते थे , यकायक उनसे कन्‍नी काटने लगे हैं। चाय-पान की दुकान पर कोई व्‍यापारी खड़ा होता और हरकचंद वहां पहुंच जाते ,तो वहां खड़ा आदमी आंख बचा के वहां से खिसक लेता। रास्‍ते में आते-जाते भी व्‍यापारी यह कोशिश करते कि हरकचंद से दुआ-सलाम न करना पडे़ या तो मुंह फेर के खड़े हो जाते ,या वहां से दबे पांव किसी गली में खिसक लेते। जैसे नमस्‍कार कर लेने से कुछ घट जायेगा या लेना-देना पड़ जायेगा।

वे घर के लिए कोई ज़रूरी सामान खरीदने किसी दुकान पर अब जाते, तो दुकानदार नमस्‍कार तो करता , पर उनसे कभी बैठने या चाय-पानी लेने का आग्रह न करता। वे जो चीज़ ख़रीदना चाहते या तो सीधे-सीधे दुकानदार बाज़ार रेट से ज़्‍यादा क़ीमत बताता, या कह देता कि फलां चीज तो मेरे पास घटिया दरजे की है , आपके लायक नहीं है। मजबूर हरकचंद वह चीज़ दुकानदार के बताये ऊंचे दाम में खरीद लाते। सौदेबाजी या मोलभाव उनने जिन्‍दगी में कभी नहीं किया था ,दुकानदार खुद ही पहले उन्‍हे बाज़बी दाम लेकर चीजें देते रहे थे, सो वे अब भी उनसे मोलभाव नहीं करते थे। लेकिन चीजें महंगी आती तो घर पर पत्‍नी चिनमिन करने लगती थी। व्‍यापारियों का बदला हुआ रूप देख कर हरकचंद को बड़ा दुख हुआ-जिनके लिए वे रात दिन चिन्‍ता करते रहे, जिनके लिए अपने विभाग से उन्‍होने विश्‍वासघात किया, वे लोग भी इस तरह आंख फेर लेंगे,उन्‍हें ऐसी आशा न थी।

नगरपालिका का बज़ट घटा तो विकास कार्य प्रभावित हुए ,नेता जागे। उनने फिर से नाके खोले जाने या म्‍युनिस्‍पिल कमेटी को ज़्‍यादा बजट देने की मांग की। नेताओं और संस्‍थाओं की तमाम लिखा-पढ़ी के बाद राजधानी ने नगरपालिकाओं की फरियाद सुनी। फाइलें पहले धीमें चली , फिर दुलकी चाल चलीं, और यह खबर जब कस्‍बों-तहसीलों में स्‍थित कमेटियों तक पहुंची तो वहां से जीवनीशक्‍ति आना शुरू हुयी और फाइलें दौड़ने लगीं। बाद में तो ज़रूरत पड़ने पर फाइलों ने हवाई सफर भी किया। अंततः कमेटियों को दुबारा महसूल वसूलने की ताकत दे दी गयी। कमेटियों में ज़ोश जाग उठा।

हालांकि कमेटियों को सिर्फ आयात-निर्यात शुल्‍क वसूलने की छूट मिली थी। निर्देश आये थे, कि वे नाका लगा दें पर किसी वाहन को रोकें नहीं, व्‍यापारी स्‍वयं आकर जानकारी देगा। धीरे-धीरे काम शुरू हुआ, मंडी से बाहर जाने वाले माल की जानकारी से लेकर, फैक्‍ट्रीयों से भेजे गये माल की भी जानकारियां, प्रायः कमेटी में आने लगीं, और हरकचंद ने देखा कि व्‍यापारियों को भूले-बिसरे संबंध याद आने लगे। अब वे हरकचंद को दुबारा अपना आदमी मानने लगे। फिर वैसा ही मान-सम्‍मान और फिर वैसे ही संबंध दिखने लगे थे। वे फिर से आत्‍मीय हो गये। अब वे भूले -भटके किसी दुकान पर पहुंच जाते, तो दुकानदार उनका मांगा हुआ माल बाद में देते , चाय-पानी से सत्‍कार पहले करते।

हरकचंद मन के बड़े साफ थे , उनने बीच के समय में आयी दुकानदारों की बेरूख़ी और अपरिचय को भुला दिया और फिर से सामान्‍य हो कर जीने लगे। सबकी तरह नगरसेठ गहनामल भी जो पिछले कई दिनों से हरकचंद को भुला चुका था, अब ज्‍यादा आत्‍मीयता से हरकचंद से मिलने लगा। वे जहां भी दिख जाते, गहनामल उनके गले लग-लग जाता,उन्‍हे खूब सम्‍मान देता। हरक चंद ने अनुभव किया कि इसका कारण शायद वे कई-कई किराना ,कपड़ा , और कनफैक्‍शनरी की दुकानें हैं, जो अपनी जेवर दुकान के अलावा गहनामल के परिजनों ने पिछले दिनों खोली हैं , और जिनमें बिना हिसाब-किताब का अनाप-शनाप माल दूसरे प्रदेश से आता रहता है। दूसरा कारण तो गहनामल का शायद वह कारखाना भी होगा ,जो रोज के रोज ढेरों जालियां ,दरवाजे , खिड़की वगैरह लोहे का सामान उगलता है ,और जिसे प्रतिदिन मैटाडोर-टैम्‍पो में भर के प्रदेश के बाहर भेजा जाता है। लेकिन सब कुछ जानते-बूझते भी हरकचंद ने अपने मन में कोई बात नहीं रखी और वे पूर्ववत गहनामल समेत सबसे प्रेम से मिलने लगे।

अचानक फिर व्‍यवस्‍था बदली , और प़द्धति में परिवर्तन आया। खेत में खड़े बिजूका से वे बेजान नाके भी हट गये। योंकि अब महसूल फिर से दुकानदारों की दया पर निर्भर हो गया था सो व्‍यापारियों का व्‍यवहार भी बदलने लगा था। बस कुछ दिन पहले की ही बात है यह।

तभी यह घटना घटी।

उनके ऑफिस में कई सालों से यह परंपरा थी ,कि दीपावली के त्‍यौहार के उपलक्ष्‍य में पूरे स्‍टाफ को चांदी के सिक्‍के उपहार में दिये जाते थे। ये सिक्‍के पहले तो कमेटी के कमाऊ-पूत नाकेदारों से अनुदान वसूल कर बाजार से क्रय किये जाते थे , फिर नाके बन्‍द हुए और नाकेदार कमजोर हो गये तो उनने हाथ उठा दिये। इस कारण अभी बाद के बरसों में स्‍टाफ के सब लोग मिलजुलकर कुछ चन्‍दा इकट्ठा करने लगे थे, और उस एकत्र धन में से एकमुश्‍त चांदी के सिक्‍का खरीद लाया करते थे। इस महीने दिवाली का त्‍यौहार था। दीपावली की अमावस्‍या महीने के आखिरी सप्‍ताह में पड़ रही थी ,और म्‍युनिस्‍पिल-कमेटी घाटे में थी, सो किसी कर्मचारी को एक तारीख को तनख्‍वाह नहीं मिल सकी। अब स्‍थिति यह बनी, कि बीते हुए कल को यह सिक्‍के बंटना थे और उस दिन किसी की गांठ में फूटी-कौड़ी तक न थी , सो सब चिंतित थे। तब किसी ने सलाह दी ,कि फिलहाल गहनामल की दुकान से उधारी में सिक्‍के उठवा लिये जायें और उपहार समारोह संपन्‍न कर लिया जाये। बाद में जब तनख्‍वाह आ जायेगी तो उधारी चुक जायेगी। अब समस्‍या यह थी, कि गहनामल के पास उधारी का संदेश कौन भेजे ? सबने एक मत से निर्णय लिया कि बाबू हरकचंद ही अपने नाम से यह संदेश भेजें , तो बाबू हरक चंद ने चपरासी मुन्‍नालाल को सिक्‍के लेने गहनामल की दुकान पर भेज दिया था। हालांकि हमेशा की तरह यूनियन सेक्रेटरी सिंग बाबू ने इस बात का विरोध किया था कि कर्मचारियों के किसी सार्वजनिक काम में किसी व्‍यापारी का अहसान क्‍यों लिया जाये। लेकिन उनकी बात किसी ने नहीं सुनी , और मुन्‍ना चपरासी को भेज दिया गया।

मुन्‍नालाल उल्‍टे पांव वापस लौटा। हैरानी से सबने पूछा-काहे मुन्‍ना, क्‍या हुआ भाई !

मुन्‍ना बहुत नाराज था , बोला-‘आयंदा कृपा करना। मुझे अपनी बेइज़्‍ज़ती कराने वहां मत भेजना। पचास ग्राहकों के सामने गहनामल ने सिक्‍के देने से साफ इन्‍कार कर दिया। बोले , हमारे यहां उधार नहीं मिलता !‘

हरकचंद को काटो तो खून नहीं। भला ऐसा कैसे संभव है ! उनने असमंजस की मानसिकता में गहनामल के यहां फोन लगाया। फोन पर गहनामल ही मिले। ताज्‍जुब , कि फोन पर भी उनका यही जवाब था-‘माफ करना यार ,अपन ने उधारी बंद कर दी है।‘

हरकचंद ने समझाने की कोशिश की-‘अरे यार कौन साल दो-साल के लिये उधारी करना है ,दो-तीन दिन में सारा रूपया चुका देंगे। न हो तो मेरे नाम से लिखलो तुम ये रकम। मुझ पर तो विश्‍वास है न !‘

पर गहनामल साफ नट गया ‘क्षमा करना भाई ,हमने तय किया है कि उधार करना ही नहीं है।‘

यह सुनकर बाबू हरकचंद को करारा झटका लगा। वे खड़े न रह सके, टेलीफोन रखके पास रखी कुरसी पर बैठ गये।

सिंग बाबू बगल में खड़े थे , वे सारा माज़रा समझ गये। उनने चपरासी से पानी मंगाया और हरक बाबू से बोले -‘छोड़ो ये उपहार-पुपहार का झमेला। मैं तो बहुत पहले से कह रहा हूँ कि इस तरह चन्‍दा करके आपस में सिक्‍के बांट लेना बिलकुल उचित नहीं है। काहे का उपहार है यह ! ये तो वो ही किस्‍सा हुआ कि कोई बूढ़ा शेर किसी सूखी हड्डी को चचोर के अपना खून निकाल ले और खून के खारे पन में उसी सूखी हड्डी से निकले खून के स्‍वाद की कल्‍पना करके व्‍यर्थ ही खुश होता रहे। और दिल छोटा मत करो, हो सकता है गहनामल तुम्‍हारी आवाज पहचान न पाया हो।‘

बाबू हरक चंद का मन पहले तो झटके से बुझ सा गया था ,लेकिन अब सिंग की इस बात ने उन्‍हे बड़ा दिलासा दिया। उनने शांति से ठण्‍डा पानी पिया और चुप बैठ गये।

कार्यालय के दूसरे लोग सक्रिय हुए। पता नहीं कहां से कैसे बंदोबस्‍त हुआ , पर शाम तक सिक्‍के भी आ गये और बाकायदा बांट भी दिये गये। हरकचंद शाम को घर लौटे तो उनका उदास चेहरा देख के ,पड़ोसिनों से घिरी बैठी पत्‍नी तत्‍परता से उठके उनके पास आ गयी-‘काहे विनोद के पापा ,क्‍या हुआ ?‘

-‘कुछ नहीं ‘वे उदास बने बोले।

-‘नहीं कुछ तो हुआ है। आप ऐसे कभी नहीं रहते। गली में घुसते ही मोहल्‍ले पड़ौस के लोगों से बोलते-बतियाते घर आते हो और आज सूटमंतर बने चले आये। तुम्‍हें हमारी सोंह, सही बताओ ! क्‍या हुआ ?‘

मजबूर हरकचंद ने गहनामल वाली घटना सुनाई और रूआंसे हो के बोले-मुझे गहनामल के बदल जाने का दुःख नही है ,बस तक़लीफ इत्‍ती-सी है कि जिस रोजी-रोटी से हमारे पेट भरते हैं, हमने इन टुच्‍चे व्‍यापारियों के लिये बिना किसी बड़े लालच के, उसी से दग़ा की।‘

-‘काहे की दगा ? अरे आपने कौन कमेटी का लाख दो-लाख का हरजाना कर

दिया ? बस, केवल हजार दो-हजार का महसूल ही तो घटा होगा। ये क्‍यों नहीं सोचते कि, तुम्‍हारी इसी कमेटी के चेयरमैन और बडे अफसर तो म्‍युनिस्‍पिल-कमेटी के लाखों रूपया डकार जाते हैं।‘

-‘अरे तुम भी , आदमी को अपना काम देखना चाहिये।‘

-‘बस अपना दी देखते रहो। दूसरों की तरफ से आंख मूंद लो।‘

-‘वो नहीं कह रहा।‘

-‘तो क्‍या कह रहे हो , चलो ये मन खराब करने की बातें मत करो , उठ के हाथ मुंह धोओ, चाय पियो ‘- कहती पत्‍नी ने उनका हाथ पकड़ के उन्‍हे उठा लिया था। लेकिन हरक बाबू के मुंह पर कल से मुसकान ऐसी गायब हुई कि लौटी नहीं।

आज भी वे उदास से बैठे थे।

उनकी कुरसी बड़े हॉल में है, भीतर आने वाले हरेक आदमी की सबसे पहले उन्‍ही पर नज़र पड़ती है। हर साल सरदियों में जड़ी-बूटी बेचने के लिये आने-वाले बड़े साफे वाले आदिवासी सरदारसिंह मोगिया ने यकायक दफ्‍तर में प्रवेश किया , और आते ही जोरदार स्‍वर में उसने हरक बाबू को संबोधित किया-‘बाबूजी, जै राम जी की !‘

फीके से स्‍वर में हरक बाबू ने अभिवादन का जवाब दिया। फिर जाने किस प्रेरणा से बोल उठे-‘आज तुम जाओ भैया , यहां किसी आदमी को तनख्‍वाह नहीं मिली है, सब पैसे-धेले को परेशान हैं। कोई तुम्‍हारी दवाई कहां से खरीदेगा ?‘

सरदार मोगिया ऐसे मौके कई जगह झेल चुका है , वह हंसते हुए बोला-‘आपसे रूपया कौन मांग रहा है बाबूजी ! हर बरस की तरह इस बार भी पूरी दवाई उधार दे दूंगा , आप चिन्‍ता क्‍यों करते हैं ?‘

‘हर बार सिर्फ महीने भर की बात होती थी , इस बार त्‍यौहार का समय है ,सो हरेक के पास ख्‍़ार्च ज्‍यादा है। अबकी बार चुकारा लम्‍बा खिंच जायेगा।‘

‘तो भी कोई बात नही है बाबूजी। आप लोग कहां भागे जा रहे हैं ? ‘सरदार आज दवा बेचने की क़सम खाके आया था।

‘अरे यार तुम तो पीछे ही पड़ गये।‘

‘नहीं बाबूजी , आपके बच्‍चे हैं हम ! आप जैसे बड़े लोगों के भरोसे ही तो हमारा सारा कारोबार चलता है। हम तो अरज कर सकते है, पीछे काहे पडेंगे !‘ कहता सरदार विनम्रता की मूर्ति बन गया था।

हरक बाबू फीकी सी हंसी हंस के बोले -‘दे दे यार जो तुझसे दवा लेना चाहे।‘

फिर तो ऑफिस के दर्जन भर से ज्‍यादा लोगों ने सरदार से जड़ी-बूटियां लीं , और वह प्रसन्‍न मन से पुड़िया बांधता चला गया। हरक बाबू ने हिसाब पूछा तो पता चला कि कुल मिला के पांच हजार रूपये की उधारी हो गयी है।

वे चौंके-गहनामल से तो सिर्फ हम सिर्फ एक हजार रूपये की उधारी मांग रहे थे , फिर भी उसे विश्‍वास न हुआ , और यह बेचारा ख़ानाबदोस आदमी बिना हिचक के पांच हजार की उधारी बांट रहा है।

यह छोटी सी बात कई वृत्‍त बनाती हुई उनके मन के ताल में फैलती जा रही थी। और उन्‍हे ठीक से समझ में आ रहा था कि सेठ गहनामल बाज़ार में बैठा है, वह हर चीज़ बाज़ार की नज़र से देखता है, जबकि सरदार जीवन से जुड़ा आदमी है।

मनुष्‍यता पर उनका यकीन जैसे फिर बहाल हो रहा था।

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राजनारायण बोहरे

एल 19 हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी

दतिया मध्‍यप्रदेश

नाम

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: राजनारायण बोहरे की कहानी : विश्वास
राजनारायण बोहरे की कहानी : विश्वास
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