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यशवन्त कोठारी का लघु व्यंग्य उपन्यास : यथा योग्य

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क्या हो रहा है प्रोफेसर ? स्टाफ रूम में घुसते हुए मैंने मित्र रामवीर सिंह से पूछा- अपनी प्रतिभा का अचार डाल रहे हैं। जरा बढ़िया डालन...

yashwant kothari new (Mobile)

क्या हो रहा है प्रोफेसर ? स्टाफ रूम में घुसते हुए मैंने मित्र रामवीर सिंह से पूछा-

अपनी प्रतिभा का अचार डाल रहे हैं।

जरा बढ़िया डालना, रिटारयमेंट तक चलाना है - मैंने हँसते हुए कहा और बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया।

रामवीर कुछ उदास-सा छत को ताकने लगा।

क्या बात है यार कुछ उदास हो।

मास्टरी में सिवाय उदासी के और बचा ही क्या है ? ये अफसरी तो है नहीं और न ही लेखन है कि जब मूड आया तब किया। बाकी मौज मजा मस्ती।

आखिर कुछ तो बताओ भी प्यारे लाल।

बताना करना क्या है यार।

शाम को घर आना। वहीं बात करेंगे।

मैं इस रचना का सर्जक यहाँ पर पाठकों से माफी मांगते हुए अवतरित होने की इजाजत चाहता हूँ। वास्तव में रामवीर सिंह और मैं लंगोटिया या (आप चाहें तो हाफ पेंटिया) दोस्त हैं, वह पढ़ कर स्थानीय प्राइवेट कॉलेज में छः सौ का प्रोफेसर हो गया और मैं साहित्य के अरण्य में रोदन करने लग गया मगर दोस्ती बरकरार है। जैसा कि आप जानते हैं, वो मुझे पुस्तकें, पत्रिकाएं उधार दे देता है और मांगता नहीं। मैं उसके लड़के को हिन्दी पढ़ा देता हूं और वापस पैसे नहीं लेता, ये मित्रता है। रामवीर सिंह वास्तव में मित्र है। मुसीबत हो या न हो उसे आप हमेशा अपने आसपास पायेंगे। कक्षा में भी उसका चिन्तन चलता रहता है। वह अधेड़ है, लम्बा कद, रंग सांवला और साफ दिल। चेहरा बुझा-बुझा-सा, आंखों में आत्मस्वाभिमान की पीड़ा। भावुक। लड़की देखकर बिदकने वाला। विनोदप्रिय और भूतपूर्व कवि। कुल मिलाकर उसकी छवि एक घमंडी और गंभीर व्यक्ति की है। स्टाफ में भी लोग यही सोचते हैं। मगर वो किसी की परवाह नहीं करता।

समझने दो सालों, मूर्खों को। वैसे उसकी प्रतिभा और कर्मठता का लोहा मैनेजमेंट और सेठजी जो कॉलेज के वास्तविक मालिक हैं भी मानते हैं। मगर एक बात से वे भी सख्त नाराज हैं कि रामवीर सिंह उनकी लड़की को घर आकर मुफ्त क्यों नहीं पढ़ाता।

यों रामवीर की बौद्धिकता में मुझे कोई शक नहीं लगा। वो एक आला दर्जे का निष्क्रिय किस्म का बुद्धिजीवी है, जिसे आप सामान्यतया पहचान नहीं पायेंगे।

वास्तव में रामवीर इस स्वार्थी और मक्कार दुनिया में मिसफिट है। वह अपनी बीबी से परेशान है जो हर समय उसे काट खाने को दौड़ती है। वह अपने लड़के से परेशान है जो तीन साल में थर्ड डिवीजन से मेट्रिक कर के पांच साल से बी.ए. में झख मार रहा है। उसे मोहल्ले की लड़कियों के पीछे ही घूमना पसन्द है।

प्रोफेसर रामवीर नई पीढ़ी के मास्टरों से भी परेशान हैं। जो अपना पूरा वेतन कपड़े बनवाने पर खर्च कर देने के बाद भी खुश दिखाई देते हैं।

रामवीर के अनुसार निकम्मों की कोई कमी नहीं है, एक ढूंढ़ों हजार मिलते हैं। हर दफ्तर पर कामचोरों का कब्जा है। ईमानदार का जीना मुहाल है। मैं यदा कदा उससे हालात से समझौता करने की सिफारिश करता तो वो बिफर पड़ता और फिर उसे संभालना मुश्किल हो जाता। ऐसे अवसरों पर मैं उसे अकेला छोड़ देता और फिर किसी दिन वो आकर मुझसे माफी मांग लेता और हम दोनों का जीवन फिर उसी तरह चलने लग जाता।

रामवीर जीवन के थपेड़े सहता चला जा रहा था, मगर मुझे अक्सर लगता था कि किसी न किसी रामवीर थक जाएगा और निराशा में परम सुख मानने वाला यह व्यक्ति कभी न कभी कुछ ऐसा अवश्य कर बैठेगा कि पूरी दुनियां की आंखें इसकी ओर लग जायेंगी। ऐसा ही विश्वास शायद उसे खुद को भी था।

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शाम को मैं उसके घर गया। घर क्या था, घर के नाम पर एक टप्पर, उसी के हिस्से में रसोई का इन्तजाम । अन्दर एक बन्द अन्धेरा कमरा, जिसमें हवा या रोशनी जाने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता। उसकी पत्नी शायद घर पर नहीं थी। उसने चाय के लिए पूछा मगर मैंने मना कर दिया।

कहो भाई कैसे याद किया ?

चलो अच्छा हुआ, तुम आ गये, वास्तव में यार तुमसे मिलने से मेरे मन में एक नई आशा का संचार होता है, और जीवन में व्याप्त विद्रूपता कम होती है।

ऐसी क्या बात है यार। मैं तो एक साधारण-सा कलम घसीट लेखक हूं। क्या तो मैं और क्या मेरा लेखन। पिद्दी न पिद्दी का शोरबा।

ऐसा नहीं है मेरे दोस्त, मैं जानता हूं कि तुम्हारे सीने में भी वही दर्द है, वही आग है, जो मेरे में है। आग से आग को राहत मिलती है।

अच्छा बताओ फिर मुझे आकाशवाणी जाना है।

यार काफी समय से मैं तुझे अपनी चीज दिखाना चाहता था।

क्या ?

मेरी डायरी।

मगर डायरी तो एक निजी और गोपनीय चीज है, वो तुम मुझे क्यों देना चाहते हों ?

काहे की व्यक्तिगत, लोग अपनी बीबी को बॉस को समर्पित कर देते हैं। मैं तो केवल डायरी दे रहा हूँ। तुम जानते हो, मेरे जीवन का हर पन्ना तुम्हारा पढ़ा हुआ है। तुमसे छिपा हुआ कुछ भी नहीं है। अतः मैं मेरी व्यक्तिगत डायरी तुम्हें सौंपता हूँ। तुम चाहो तो इसका उपयोग लेखन में कर सकते हो।

यहाँ मैं इन पक्तियों का लेखक एक बार फिर क्षमा याचना के साथ विघ्न डालना चाहूंगा। पाठक मित्रो ! इसके आगे की कहानी उसी डायरी से ली गई है तारीख़ों से क्या फरक पड़ता है, आप जो चाहे रख लें, फरक हकीकत से पड़ता है, और मैंने हकीकत को बदला नहीं है ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।

(1)

मेरे लेखक दोस्त का कहना है कि आदमी को तनावों से दूर करने के लिए डायरी लिखनी चाहिए, ताकि जो बातें वो किसी को न कह सके, उसे डायरी में उतार सके। मुझे उसकी बात जंच गई। मैंने कुछ महान, बड़े और बहुत बड़े लोगों की डायरियों को पढ़ा और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये डायरियां इसलिए महत्वपूर्ण हो गई क्योंकि इनके लेखक महान थे। महान बनने की मेरी कोई तमन्ना नहीं है और न ही मेरे में महान बनने की योग्यता ही है, लेकिन एक दिन डायरी लिखने के बाद मैंने स्वयं को काफी हल्का पाया तो तय किया कि जब भी मन उचाट हो जायेगा, डायरी से मन लगा लूंगा।

मुझे लगता है, हमारा देश महान है। इस पर राज्य करने वाले महान हैं।

जितने भी उच्च पदस्थ हैं सभी महान हैं। गिरे हुए इन्सान वे हैं, जो गरीब हैं, भूखे मर रहे हैं या जो ईमानदार हैं। इस देश में ईमानदार होना सबसे बडा गुनाह है और उससे भी बड़ा गुनाह है अध्यापक होना। मैं भी ईमानदार अध्यापक हूँ क्योंकि मुझे बेईमान होने को कोई अवसर नहीं मिल पाया है और आगे भी मेरी ईमानदारी खत्म होने के कोई आसार नहीं हैं।

मेरे कॉलेज का मैंनेजमेंट बहुत उदार है वो कभी वेतन नहीं बढ़ाता। कभी कुछ नहीं करता और ये उम्मीद करता है कि सब ठीक-ठाक चलता रहे।

चूंकि हमारा देश धर्म निरपेक्ष है, मैं भी स्वयं को धर्म निरपेक्ष मानता हूं। मैंने अपनी इस मान्यता को कुछ लोगों तक पहुंचाया। और परिणाम ये रहा कि लोगों ने मुझे भी पथ-भ्रष्ट मान लिया। कुछ लोगों का विचार है कि मैं धीरे-धीरे पागलपन की ओर बढ़ रहा हूँ, मैं उनसे असहमत हूँ क्योंकि जीनियसनेस में और मैडनेस में कोई खास फर्क नहीं है।

मैं एक मामूली समाज का मामूली सदस्य हूँ, मगर मेरे विचार से हमें और नीचे नहीं गिराया जा सकता।

(2)

पहले सोचता था कि डायरी का लेखन नियमित रूप से करूंगा। मगर इधर यह संभव नहीं हो सका। कारण ये रहा कि मुझे सस्पेंड कर दिया गया। सस्पेंशन के कारण कई प्रकार के थे। कुछ गुप्त कारण थे और कुछ प्रत्यक्ष कारण।

गुप्त कारण ये कि मैंने सेठजी की लड़की और प्रिन्सिपल के लड़के को नहीं पढ़ाया और.......प्रत्यक्ष कारण ये कि मैंने नियमित वेतन की मांग की थी। जो कि इस कॉलेज में एक अनहोनी घटना थी। प्राचार्य के अनुसार 'एक मास्टर की इतनी हिम्मत की वो वेतन मांगे ? यही क्या कम है कि हमने उसे नौकरी दे रखी है ?'

परेशानी के इस दौर में सब कुछ अनियमित और अस्त-व्यस्त है। पत्नी का रोना-धोना जारी ही रहता है। आजकल देश की जो हालत है, अकाल की जो स्थिति है, उसे देखते हुए, नल, बिजली, गैस, पैट्रोल, सब्जी, दूध कब साथ छोड़ दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। बस हृदय नियमित रूप से धड़क रहा है। जन आन्दोलनों के चलते सरकार परेशान है। सुबह अखबार खोलूं या रेडियो सभी जगह एक जैसी नीरस उबाऊ स्थिति।

कुछ मरे, कुछ घायल और चोरी डकैती के अलावा अखबारों में आता ही क्या है ?

मगर इन सब से बचने का कोई रास्ता भी तो नहीं है।

एक मास हो गया, मगर अभी तक मुझे चार्ज शीट नहीं दी गई। कुछ अखबार हल्ला मचा रहे हैं और शायद मुझे बिना चार्ज शीट वापस रख लिया जावे। अगर ऐसा हो गया तो शायद एक आश्चर्य होगा, और इस देश में आश्चर्य होते ही रहते हैं।

(3)

कल पड़ोस में रामदीन मर गया। आप पूछेंगे उसे क्या बीमारी थी। मेरा जवाब है - गरीबी। गरीबी कैंसर से ज्यादा बड़ी बीमारी है। आज बस इतना ही। क्योंकि आज ही रामदीन की विधवा को भीख मांगते भी देखा।

(4)

आज मुझे वापस नौकरी में ले लिया गया।

परिस्थितियों का मारा मैं सब कुछ सहन करता रहूंगा क्योंकि यही मेरी नियति है। इससे बचा नहीं जा सकता।

घर आने पर पत्नी ने राशन का झोला थमा दिया, मगर अभी वेतन कहां मिला है। लेखा शाखा वाले वेतन बिल बनाने के लिए भी चाय-पानी मांगते हैं। मगर मैं एक निलम्बित अध्यापक यह सब कैसे कर सकता हूं ? बनिए को उधार के लिए कहा है। आज मुझे जीवनानंद दास की कविता याद हो आई-

घर, बच्चे, प्रेम स्त्री का अर्थ,

कीर्ति नहीं है।

कुछ है हमारे अन्दर,

रक्त में

जो हमें भीतर से खाली करता है।

करता है क्लांत

और यह क्लांति मुरदाघर में भी है।

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एक बढ़ा उल्लू

बरगद की डाल पर बैठ

थरथराता है। ----

मुझे लगा है कि यह बूढ़ा उल्लू मैं हूं। मुझे अपने माहौल में छाई अन्धेरी काली रात को दूर करना चाहिए। या फिर --- या फिर इसी में समा जाना चाहिए। क्या किया जाये, जिया जाए या मरा जाए ?

इसी दौरान उप चुनाव हुआ। मुझमें अनन्त निराशा व्याप्त थी। मैं चुनाव में भी निराश और अनासक्त था, मगर सोचा शायद कुछ नया हो जाए।

राष्ट्र के कर्णधार, समानता, भाईचारा, राष्ट्रीय एकता के नारे लगा रहे थे। एक उपेक्षित विधवा की तरह लगता था कस्बा छोटा और निराश। चुनाव के इन दिनों में देश को बचाने के लिए एक साथ इतने स्वर हवा में तैरने लगे थे, कि लगने लगा कि देश का भविष्य सुरक्षित है।

उपचुनाव के लिए ही एक कम शक्ति का दूरदर्शन रिले केन्द्र भी लग गया और शहर के ग़रीबों पर चित्रहार और धारावाहिकों की मार पड़ने लगी। अचानक देश खूबसूरत सोने की चिड़िया-सा लगने लगा, मगर ज्यों ही टी.वी. की क़ीमतों की बात चलती लगता आसमान काला स्याह है धूप के कतरे कहीं ऊपर की अट्टालिकाओं ने रोक रखे हैं। साफ और खुशबूदार हवा मेरी और मेरे जैसे लाखों करोड़ों की किस्मत में नहीं है।

(5)

अपने ही अंगरक्षकों की गोलियों ने राष्ट्र-नेतृत्व को ग्रस लिया। एक बार फिर अन्धेरा। महाप्रयाण। हे ईश्वर !

तू कहां है ?

ये क्या हो रहा है ?

हम सब मौन क्यों हैं ?

क्या मौन और चुप की दहाड़ नहीं होती ?

होती है।

चुप की दहाड़ सबसे बड़ी होती है। अब लिखने को क्या बचा है ? देश अशान्त है, आग की लपटें उठ रही है, लगता है सब कुछ समाप्त हो जायेगा। एक बूढ़ा बरगद जब गिरता है तो धरती गूंजती है, मगर यह तो भूकंप है, और इसे रोकना क्या संभव है ? मगर निराशा क्यों ? हर काली और अंधेरी रात के बाद सूरज आता है, पूरब की रोशनी में संसार चमकता है। रक्त की हर बूंद देश के काम आने की बात वे कहती थीं आज सार्थक भी हो गया। वे चली गईं मगर देश को मजबूत कर गईं। एक युवा सूरज फिर उगा है।

(6)

जरूरी काम से जिला मुख्यालय जाना पड़ा। प्राइवेट बस में बकरियों के झुण्ड की तरह भरा गया था। छत पर सवारियों की संख्या अन्दर से भी ज्यादा थी। रास्ते में बस की चेकिंग हुई। स्वाभाविक था, कि हमें रास्ते में उतार दिया जाता। सब बस से उतरे। मैं पैदल चलकर अपना काम कराने की कोशिश में लग गया।

जब तक बस में था, कलेजा मुंह को आ रहा था, क्योंकि बस का ड्राइवर अनाड़ी था। वह एक प्रयोग कर रहा था, बिना ब्रेक के शहर पहुंचने का, जैसे वह गाड़ी नहीं देश को चला रहा हो या किसी प्राइवेट स्कूल को।

जिला मुख्यालय पर न बाबू थे न अफसर। अफसर बाथरूम में थे और बाबू चाय पी रहे थे या सिगरेट का धुँआँ उड़ा रहे थे। कामकाज की नीति बिल्कुल स्पष्ट थी। इस हाथ दो उस हाथ लो। मेरे पास को कुछ नहीं था, अतः खाली हाथ वापस आया।

घर आकर लेटने को मन चाह रहा था कि हमारे आर्यपुत्र घर पधारे। आज कोई एक महीने बाद उनकी शक्ल के दर्शन हुए थे। एक बेतरतीब लापरवाही और अक्खड़पन उनके चेहरे पर था। मेरी कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वे ही बोल पड़े-

'पापा'

'हूँ'

'एक पोर्टेबल टी.वी. ले लो।'

'किससे ले लें, पैसे कहां हैं ?

'आप तो बस हर समय पैसों का रोना रोते हैं।'

'और किसे रोऊं ?'

'आपने हमारे लिए किया ही क्या है ?'

'तो तुम कुछ कर दिखाओ।'

'ठीक है कल ही ले आऊँगा।'

'क्या बीवी ?'

'नहीं टी.वी.।'

'और पैसे ?'

'आपसे नहीं मागूंगा।'

'तो ?'

'मैंने और मम्मी ने कुछ बचाया है, उसी में से।'

'मगर और भी कुछ जरूरी काम है।'

'आप तो बस'........पत्नी बीच में बोल पड़ी।

'और देश इक्कीसवीं सदी में जा रहा है और बिना टी.वी. के इक्कीसवीं सदी में जाना मुमकिन नहीं।............आर्यपुत्र उवाच।'

मैं निरुतर, परेशान, करवट बदल कर लेट गया।

घर में एक छोटा मिनी पोर्टबल, ब्लेक एण्ड वाइट टी.वी. आ ही गया। सच पूछो दोस्त तो उस दिन मुझे भी थोड़ी खुशी हुई। चलो मनोरंजन का एक साधन तो हुआ। मगर मैं जल्दी ही बुझ गया, क्योंकि यह मेरा विचार नहीं था। पत्नी अगर मुझसे कहती तो क्या मैं ही कुछ करके टी.वी. नहीं लाता। मगर बस.......यही तो भारतीय दाम्पत्य की नियति है।

इन दिनों मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। डॉक्टर के पास इस डर से नहीं जाता कि कहीं कोई बड़ी बीमारी न बता दें या फिर कोई लम्बा नुस्खा लिख दें तो क्या करूंगा। वैसे अस्वस्थ रहना मेरे लिए एक आवश्यक कर्मकाण्ड है, स्वस्थ रहना यदा-कदा ही संभव हो पाया है, और नौकरी और शादी के बाद तो अक्सर अस्वस्थ ही रहता हूं। औसत भारतीय की तरह मेरी अर्थ व्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों ही खराब रहते हैं। सरकारें आईं सरकारें गईं वादे हुए, आश्वासन मिले, मगर अकाल की तरह अस्वास्थ्य ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा।

पानी की कीमत अब जाकर पता चली है कि तीन दिन में एक दिन पानी। रात में 2 बजे से 3 बजे तक। पूरा घर एक साथ पानी भरे तो भी पूरा नहीं पड़ता। ऐसे में यदि कोई पानी का एक गिलास भी अतिरिक्त पी जाए तो लगे हमें लूट रहा है। क्या आजादी के चालीस वर्षों बाद भी हम एक गिलास पानी को ही तरसते रहेंगे। हे प्रभु ! ये क्यों हो रहा है ?

(7)

पांच वर्षों के लगातार अकाल के कारण बंजर पड़ी फटी धरती के सीने में लगी आग अब धीरे-धीरे बुझ रही है। बारिश ने इस बार हमें राहत दी है। मेरा स्वास्थ्य भी सुधर गया है और अखबारों में जांच रपटों की भरमार हो गयी है। राहत कार्यों में घपलों की चर्चा होती तो है, मगर ज्यादा नहीं। कुछ बुद्धिजीवी और अखबार अपना राग अलापते रहते है। आम आदमी खुश नजर नहीं आता है। सभी घपलेबाज एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना बन्द कर चुके हैं, वे अपने सिद्धान्तों पर अटल है। अपनी छवि को सुधार रहे हैं और देश तेजी से इक्कीसवीं सदी की ओर जा रहा है। कल स्टॉफ रूम में वर्माजी कह रहे थे-

'अरे भाई सीधी-सी बात है, यू टेल मी दी मेन एण्ड आई विल टेल यू दी रूल।'

मैंने कहा-'आप ठीक कहते हैं वर्माजी, हर व्यक्ति के लिए अलग कानून होता है। आदमी-आदमी में बड़ा फर्क होता है। सुख दुःख में भी बड़ा अन्तर है। जनता के सुख-दुःख से बिल्कुल अलग होते हैं और बेचारी जनता की स्मृति भी तो बड़ी कमजोर होती है।'

'ठीक है यार राजनीति पर बात करके ही अगर काम चल जाए, तो आपस में गाली-गलौज की क्या जरूरत है।'

शायद वर्माजी ठीक कहते हैं बातचीत का मुख्य विषय ही राजनीति हो गया। साहित्य, संस्कृति, कला और लोक संस्कृति तो हाशिए पर चले गये हैं। साल भर में सड़कों की मरम्मत में जो व्यय होता है उसका पांच-दस प्रतिशत संस्कृति पर भी सरकार खर्च कर देती है बस.........हो गया काम पूरा।

साहित्य के नाम पर कई अकादमियां हैं, मगर इनका बजट बस वेतन जितना ही और कुछ बच गया तो मिल बांटकर खा गये।

कभी-कभी कोई आई.ए.एस. अफसर कविता लिख दे तो उसे अकादमी मील का पत्थर मान लेती है बस............। सांस्कृतिक केन्द्रों पर अफसर तंत्र का कब्जा और कलाकार बेचारा बोरूंदा, या कीर की चौकी या कपासन या नाथद्वारा में बैठकर अपनी किस्मत को रोता है।

कुछ चलते पुर्जे बुद्धिजीवियों ने एक नया नारा लगाया है, सभी अकादमियों को एक जगह इकट्ठा करो।

अरे भाई क्यों, बेचारियों को अलग-अलग स्थानों पर पड़ा रहने दो। एक जगह करके क्या अचार डालना है ? यह मांग चूंकि बुद्धिजीवियों की है, अतः उपेक्षा से मर जायेगी क्योंकि व्यवस्था जानती है, मुर्गे के बांग देने से सवेरा नहीं होता और बुद्धिजीवी के चिल्लाने से काम नहीं होता।

(8)

कल मेरे कॉलेज में हड़ताल हो गई। स्वाभाविक भी था। कॉलेज के एक छात्र को कुछ गुंडों ने मारा था। गुंडे और कोई नहीं कॉलेज के भूतपूर्व छात्र थे। कारण साफ था-एक लड़की, जिस पर दोनों पक्ष अपना हक जताना चाह रहे थे।

ऐसे मामलों में सेठजी और प्रिन्सिपल याने मुनीमजी बड़ी समझदारी करते हैं। उन्होंने कॉलेज को एक माह के लिए बन्द कर दिया। कई खर्चे बच गये। मितव्ययिता और किसे कहते हैं ?

हड़ताल, नारेबाजी, तोड़-फोड़ और घेराव का दौर चला। लाठी भी चली। शहर में गुण्डों के बजाय पुलिस का आतंक छा गया। क्योंकि तोड़-फोड़ में पुलिस वाले के भी लग गई। पुलिस हिंसक जानवर की तरह भड़क उठी। पूरी व्यवस्था गड़बड़ा गई। पुलिस कार्यवाही के खिलाफ छात्रों ने नगर बन्द का आह्वान किया जो सफल भी रहा।

सम्बन्धित छात्रा ने कॉलेज और उसके परिवार ने नगर छोड़ दिया। और बेचारे क्या करते ?

छात्र नेताओं ने स्थानीय नेताओं की मदद से राज्य स्तर पर हड़ताल करने की सोची। मगर बात बनी नहीं। चुनाव हो चुके थे। स्थानीय नेता पांच साल के लिए व्यस्त और मस्त थे।

प्रान्तीय राजधानी का चक्कर भी छात्रों ने लगा लिया। कुछ नहीं हुआ।

इधर एक मास पूरा हो जाने के कारण सेठजी ने कॉलेज खोलने की घोषणा कर दी। धीरे-धीरे कॉलेज फिर चल पड़ा। परिस्थितियां सामान्य बन गई। छात्र नेता भी अन्यत्र व्यस्त हो गये। बात, आई गई हो गयी, मगर बेचारी उस छात्रा का फिर कुछ पता नहीं चला। छात्र नेताओं ने कॉलेज में खेल-कूद, वाद-विवाद जैसे सांस्कृतिक गतिविधियों की मांग की और इसी में काफी समय निकल गया।

वैसे भी ये सर्दियों के दिन, छोटे और मनहूस होते हैं। न तो पढ़ाने में मन लगता था और न पढ़ने में। सब कुछ बेकार और बेमानी लगता था। दरअसल हम सभी अपने-अपने टुकड़ों में व्यस्त हो गये। जो समझदार हो गये वे इन टुकड़ों में जिन्दगी का रस ढूंढने लग गये और जो नहीं समझे वे कष्ट भुगतते रहे।

इधर महंगाई ने सुरसा की तरह मुंह खोल दिया है। इस चिन्ता के सामने सभी चिन्ताएं गोण और घटिया दर्जें की लगने लगीं। महंगाई हमारे से भी ज्यादा तेजी से इक्कीसवीं सदी में जा रहा रही थी और हम सभी असहाय निरुपाय यह सब देख रहे थे।

बेचारी व्यवस्था क्या-क्या करे ? एक चीज के भावों पर नियन्त्रण करने की कोशिश करती तब दूसरी दस चीजों के भाव बढ़ जाते। विरोधी चिल्लाते और भाव बढ़ते रहते।

सारे देश में एक चीज थी-महंगाई। महंगाई मार गई............। हम सभी देवी महंगाई से त्रस्त थे।

मेरे जैसे अल्प वेतन भोगी, अनियमित वेतन पाने वालों से ज्यादा दुःखी और कौन होगा ? यही सोचते-सोचते सो गया। रात को एक बुरा सपना भी देखा, एक समन्दर में एक नाव भंवर में फंसकर उलट गई। मैं अन्दर तक डर गया हूं।

(9)

कल के अखबारों में राजधानी के प्रमुख बुद्धिजीवियों पर कायराना कातिलाना हमले का समाचार प्रमुखता से छापा गया था। देश का बौद्धिक वर्ग उबलता रहा। हर कोई एक-दूसरे को नपुंसक और शिखंडी कहता रहता। मगर इन सब से क्या होता है। पिटा हुआ बुद्धिजीवी अपने लेखन को सार्थक समझ रहा था। और इस उम्मीद में था कि शायद इस बार अकादमी उसे ही पुरस्कृत करे।

जो पिट नहीं सके वे शायद इस इन्तजार में थे कि अगली बार उनका लेखन भी सार्थक सिद्ध होगा।

लेकिन करें क्या ? गरीबी सारे साहित्यिक और सांस्कृतिक मूल्यों को मार देती है। नैतिकता और बौद्धिकता से ज्यादा जरूरी चीज है पेट की भूख। पेट की आग और इसे एक छोटे से बच्चे से लगाकर हर कोई समझता है। हर कोई अमर होना चाहता है, और अमरता का आसान नुस्खा ये है कि लिखकर छपा लो। शायद सभी बुद्धिजीवी यही समझते हैं और यही कर रहे हैं।

आज की परिस्थितियों में जिन्दा रहना होने के बराबर ही है वरना इन परिस्थितियों में कौन जिन्दा रह सकता है ?

यह डायरी लेखन आत्मपीड़ा है। आत्मप्रवंचना है। आत्महत्या की तरह है। क्या डायरी लेखन से आज तक कोई सुधार हुआ है। आत्म-निरीक्षण से भी क्या होता है। आत्मा ही मर जाए तो फिर क्या किया जा सकता है ?

शायद हम सभी के साथ यही हुआ है। हमारी आत्माएं मर गई हैं और जमीर किसी के पास गिरवी रखा हुआ है, रेहन रखा हुआ पौरुष कैसा होता है ? यह सब जानते हैं।

शायद मैंने ही कभी लिखा था,

सारा भय, सारी तनहाई, सारा अन्धेरा

मेरे लिए छोड़ दिया है,

इन लोगों ने,

और,

ऊपर से हंसते हैं।

अट्टहास करते हैं।

मेरी मूर्खताओं, विद्रूपताओं का मजाक उड़ाते हैं।

मेरे यदि कोई नया पंख

निकलता भी है,

तो ये उसे कतर डालते हैं।

कहीं अकेला मिल जाता हूँ

तो मेरी पीठ में छुरा भोंक देते हैं।

समूह में मेरी टांग खींचते हैं।

मैं चुपचाप सह जाता हूँ।

इस उम्मीद में कि कभी पूरी अवाम उठेगी और

इस सब बातों का बदला लेगी।

बुद्धिजीवी होना एक अभिशाप है, एक प्रसिद्ध लेखक के अनुसार व्यवस्था कभी सभी को पढ़ा-लिखा नहीं देखना चाहती, क्योंकि यदि सभी पढ़-लिख गए तो राज करना मुश्किल हो जायगा।

(10)

कई दिनों से शामें, अजीब उदासी में बीत रही थीं। कुछ बिल्कुल ही नाकारा दिन होते हैं। धूसरे-धूसरे से, जो स्वयं तो चुप रहते हैं, मगर परम्परा और पर्यावरण का सत्यानाश कर जाते हैं। ये दिन कुछ ऐसे ही थे।

उदासी को दूर करने के लिए एक पोश कॉलोनी के पार्क में घूमने निकल गया। शहर का यह भाग बहुत ही खूबसूरत है। चौड़ी चिकनी सड़कें, हरा-भरा लान, खूबसूरत पौधे और बहुत ही खूबसूरत जोड़े।

पार्क को देखकर कहीं नहीं लगता कि प्रदेश में अकाल या पानी की कमी है। इसका प्रमुख कारण है, पार्क में अफसर, उच्च व्यापारी या राजनीति के गणमान्य लोग ही आते हैं।

एक कोने में रखी बेंच पर मैं बैठ गया हूँ।

पास की बेंच पर कुछ युवा लोग बतिया रहे हैं।

'यार लोगों ने गांधी बाबा के नाम पर क्या-क्या नहीं किया। अब तो स्थिति ये है कि गांधी की प्रासंगिकता खादी में सिमट गई है।'

'खादी में भी कहां यार। रेशमी खादी, खूबसूरत खादी की कल्पना तो शायद गांधी ने भी नहीं की होगी। वैसे आज गांधी जीवित होते तो क्या करते ?

'करते क्या ? कही अनशन करते। या फिर कुछ और करते या कुछ भी नहीं करते। नई पीढ़ी गांधी को भूल चुकी है।'

'भूली नहीं है पार्टनर, गांधीजी को खुद आज का गांधीवाद समझ में नहीं आता।'

सभी मिलकर हंसे।

पार्क में बैठना एक खुशनसीबी है, मगर कब तक। हर तरफ हरियाली है, मगर किस कीमत पर। कई बार लगता है, साफ ताजी हवा पर भी टैक्स लगने वाला है। खूबसूरत पौधे या फूल देखते-देखते पता नहीं कब कोई टैक्स मांग ले। और कब टैक्स नहीं मिलने पर बेचारा फूल बदरंग या खुशबूहीन हो जाए।

रात का अन्धेरा बढ़ रहा था। नियोन लाइटों की रोशनी में शहर नहा रहा था। सड़कों पर वाहन तेजी से गुजरने लगे। शाम होते ही शहर रात की बांहों में खो जाता है और मैं घर जाकर नींद की बाहों में खो जाता हूँ।

(11)

आज स्टॉफ रूम में भयानक काण्ड हो गया। हुआ यों कि कॉलेज में एक कवि सम्मेलन का प्रस्ताव हुआ। मैंने विरोध किया कि सस्ते, भोंडे, चुटकलों और कविता में बड़ा फर्क होता है। मगर लोग-बाग माने नहीं। सभी लोग हास्य और फुलझड़ियों का मजा लेना चाहते थे।

मैंने कहा.........'यह हास्य रस नहीं हास्यास्पद रस का कवि-सम्मेलन होगा।'

बस फिर क्या था। सब चिल्ला पड़े। जान बचाकर भागा। फिर सोचा......मुझे क्या.......कविता की तमीज कितनों को होती है ? शायद धूमिल ने सही लिखा था।

कविता से रोटी तो तुम भी नहीं पाओगे, मगर कविता पढ़ोगे तो रोटी सलीके से खाओगे। मगर ये बेवकूफ तथाकथित बुद्धिजीवी रोटी और कविता में फर्क नहीं कर सकते।

कवि सम्मेलन हुआ और खूब हुआ। स्थानीय कवियों की संख्या ज्यादा थी, और श्रोता कम थे। सेठजी, मुनीमजी और प्रिन्सिपल ने भी कविताऐं पढ़ी। खूब दाद पाईं, मैं एक कोने में उदास पड़ा रहा। मेरे जाने के बाद शायद स्टॉफ रूम में मेरी शान में कसीदे पढ़े गये। मुझे घमण्डी, बेवकूफ और अहंकारी भी कहा गया।

(12)

घर की स्थिति पूर्ववत नाजुक है। पिताजी की मृत्यु के समय मैं नहीं जा पाया था, मां बीमार है, सोचता हूं, चला जाऊँ, नहीं तो दुनिया क्या कहेगी ? मगर दुनिया की चिन्ता क्यों और कब तक। जब सब कुछ गलत ही गलत हो रहा है तो किस चीज के सही होने की उम्मीद रखना ही व्यर्थ है। आज तक मां के इलाज के लिए कुछ नहीं भेज पाया, न ही मां को शहर ला सका। अपनी नाकामी और अयोग्यता पर आंसू तो बहाए जा सकते हैं, मगर आंसू समाधान नहीं करते।

पत्नी से पूछा.......तो तुनक कर बोली, 'आपकी मां है, आप जैसा चाहो करो।'

आर्य पुत्र से बात की तो जवाब मिला-

'ओह ग्रांड मां। बुढ़ापा है और आप भी शायद सठियाने की उम्र के हैं। मां आप की हैं आप जानो।' और आर्य पुत्र सीटी बजाते निकल गए।

आस्था-अनास्था के घेरे में फंसा मैं जाने का निश्चय करता हूं कि तार आया...........माताजी चल बसीं। सोचा, अब जाने से क्या होगा। गांव वालों ने क्रिया कर्म कर दिया होगा।

नियति के इस वार से मैं बौखला गया। आखिर कोई मां-बाप बेटे से पिण्डदान की उम्मीद तो करते ही हैं। मगर स्वार्थ की इस दुनिया में यह भी कहां संभव है। लगता है मैं दार्शनिक हो रहा हूं। मेरे प्रभु मुझे बताना क्या दर्शन यही है ?

चलो माँ के चले जाने से गांव की चिन्ता तो कम हुई।

मैं यह सोच कर निश्चिन्त हुआ और सो गया।

(13)

कल कस्बे में एक जीप उलट गई। हादसे में तीन मर गये। जिलाधीश ने मृतकों को एक-एक हजार रुपये की अनुग्रह राशि दी। इसी दिन राजधानी के पास रेल दुर्घटना हुई, मृतकों को दस-दस हजार मिले। दुर्भाग्य से कल रात को ही एक हवाई विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ, मृतकों को एक-एक लाख मिले। हे ईश्वर यह कैसा न्याय है ? न्याय शास्त्र के प्रणेताओं जवाब दो।

अब कुछ नहीं लिखा जायगा।

(14)

कस्बे में इन दिनों बड़ा कोलाहल है। एक भगवानजी पधारे हैं। कस्बे में चारों तरफ रौनक है। लोग दर्शनों के लिए भाग रहे हैं और मैं सोच रहा हूं हमारे देश में कितने जीवित भगवान हैं हरेक का अपना आदर्श, अपना अलग आश्रम और अपना धर्म। धर्म और अध्यात्म के नाम पर देश में आप कुछ भी कर सकते हैं, सब जायज है। सब झेला जा सकता है। धर्म प्राण जनता अपने प्राण देकर भी धर्म की रक्षा करेगी। नहीं तो भगवान शाप देंगे। मगर कुछ ही दिनों बाद सुनने को मिला कि भगवान के आश्रमों पर छापा पड़ा और भगवान को विदेश भागते हुए, पकड़ लिया। भगवान के साथ उनकी शिष्याएँ भी जेल में कीर्तन कर रहीं हैं।

हे भगवान ! कितने भगवान ! इतने भगवानों का क्या करना है। भगवान तो एक ही काफी है।

(15)

परीक्षाओं के दिन आ गये। वास्तव में ये दिन अध्यापकों की परीक्षा के होते हैं। ट्यूशनजीवी अध्यापक तो परीक्षा हालों में ड्यूटी से येन-केन प्रकारेण बच जाते हैं, मगर मेरे जैसे सामान्य अध्यापक के लिए बचना बड़ा मुश्किल था। परीक्षा भवन में जाना छात्रों को नकल से रोकना आदि कार्य किसी विश्व-विजय से कम न थे। हॉल में जीवित जाना तो संभव था, मगर वहां से छात्र-वर्ग से बच कर जीवित आना अत्यन्त मुश्किल था।

मैं अपनी आदत का मारा, फिर गलती कर बैठा। सहयोगी अध्यापकों की सलाह को नहीं मानते हुए मैंने मुनीमजी की लड़की को नकल करते हुए पकड़ लिया। लड़की ने मेरे ऊपर बलात्कार का आरोप लगा दिया।

प्रिन्सिपल ने अवसर की नजाकत को समझते हुए परीक्षा हॉल में आने से मना कर दिया। तंग आकर मैंने स्वयं केस बनाना उचित समझा।

मगर केस को फारवर्ड तो प्रिन्सिपल को ही करना था। उन्होंने फारवर्ड करने के बजाय मुझे घर चले जाने को कहा, मैं घर पर आ गया। बैठा ही था कि चपरासी एक कागज दे गया।

'इस महाविद्यालय को आपकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं है।'

-प्राचार्य

मैं निढ़ाल पड़ गया।

परीक्षा-हॉल मेरे लिए संक्रमण काल सिद्ध हुआ। यह वज्रपात मेरे से शायद सहन न हो सकेगा।

(16)

पाठक मित्रो ! डायरी मैंने पढ़ ली है, और रामवीर तब से घर से गायब है। आज उसके पुत्र ने बताया कि पापा की लाश नदी में मिली है। आप बताएं यह सब क्यों हुआ ? यह डायरी जो एक जिंदा इतिहास है, जानी-पहचानी हकीकत है, इस हकीकत के लिए क्या हम सभी जिम्मेदार नहीं है ? हरेक की जिम्मेदारी यथा-योग्य अवश्य होती है। शायद आप मेरी बात से सहमत होंगे ? जवाब देंगे।

(17)

ईश्वर रामवीर की आत्मा को शान्ति दे। आमीन।

0 0 0

यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@yahoo.com

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रचनाकार: यशवन्त कोठारी का लघु व्यंग्य उपन्यास : यथा योग्य
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