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यशवंत कोठारी का आलेख – कला भूमि राजस्थान

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रंगीले राजस्थान के कई रंग है। कहीं मरूस्थली बालू पसरी हुई है तो कहीं अरावली की पर्वत श्रृंखलाएं अपना सिर ऊंचा किये हुए खड़ी हुई है। राजस्थ...

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रंगीले राजस्थान के कई रंग है। कहीं मरूस्थली बालू पसरी हुई है तो कहीं अरावली की पर्वत श्रृंखलाएं अपना सिर ऊंचा किये हुए खड़ी हुई है। राजस्थान में शौर्य और बलिदान ही नहीं साहित्य और संगीत की भी अजस्त्र धारा बहती रही है। संगीत और साहित्य के साथ साथ चित्र कलाओं ने मनुष्य की चिंतन शैली को बेहद प्रभावित किया है। आज हम चित्र कला के कमल वन में राजस्थानी चित्र कला का नयनाभिराम, मनमोहक तथा अनूठा संगम देखेंगे।

राजस्थान में चित्रकला :-

राजस्थान में चित्र कला का प्रारंभ लगभग चार शताब्दी पहले हुआ। मुगलकाल में चित्र कला उन्नत हुई, लेकिन औरंगजेब ने कलाकारों से राज्याश्रय छीन लिया और कलाकार इधर उधर भागने लगे। ऐसी स्थिति में राजपूतानों के रजवाडों और रावरों में इन कलाकारों को प्रश्रय मिला और चित्रकला राजस्थान में परवान चढ़ने लगी।

राजस्थान में चित्र कला के प्रारम्भिक काल में जैन शैली बहुत लोकप्रिय थी। गुजरात में भी उन दिनों जैन शैली का प्रभाव था, गुजरात से लगे होने के कारण मेवाड़ में जिस चित्र कला का विकास हुआ, वह जैन शैली से पूर्णतः प्रभावित थी।

अलग अलग भौगोलिक परिस्थितियों, विभिन्न परिवेशों के कारण जैन और मुगल शैली योग से राजस्थान में बिलकुल अलग किस्म की चित्रकला विकसित हुई। ये चित्र शैलियां जैन और मुगल शैली से प्रभावित होते हुए भी बिलकुल अलग ओर अनूठी थी। वास्तव में राजस्थान के चित्रकारों ने एक ऐसी चित्र धारा बहा दी कि विश्व आश्चर्य चकित रह गया।

प्रसिद्ध इतिहासकार अबुलफजल के अनुसार राजस्थानी चित्रकला वस्तुओं के बारें में हमारे ज्ञान से बहुत आगे हैं। हिन्दू धर्म के त्याग, तपस्या, सन्यास, कोमलता, श्रृंगार, पवित्रता, वियोग, शिकार, क्रोध, हास्य, आदि सभी का प्रतिनिधित्व इन चित्रों में हुआ है। राजस्थानी कलाकारों ने जीवन में धर्म और श्रृंगार दोनों को बराबर महत्व देते हुए चित्र बनाये। अजन्ता के चित्रों में जो आदर्श ह।, वे राजस्थानी चित्र शैलियों में भी है।

राजस्थान की अलग अलग रियासतों में अलग अलग कलाकारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी चित्र बनाएं और चित्रकला की नवीन शैलियां विकसित की। बराबर राज्याश्रय मिलने के कारण ये चित्र शैलियां प्रसिद्धि के शिखर तक पहुंची। अति महत्वपूर्ण शैलियों में निम्न चित्र शैलियां प्रमुख है- नाथद्वारा चित्र शैली, जैन चित्र शैली, मारवाड़ चित्र शैली, बूंदी चित्र शैली, जयपुर चित्र शैली, अलवर चित्र शैली, कोटा चित्र शैली, बीकानेर चित्र शैली, जैसलमेर चित्र शैली, मेवाड़ चित्र शैली किशनगढ़ चित्र शैली आदि।

नाथद्वारा चित्र शैली :-

वरिष्ठ लेखक कवि, सांसद बाल कवि वैरागी ने नाथद्वारा को चित्रकला का कमल वन कहा है। मैं इसे चित्रकला का नन्दन कानन कहना चाहूंगा। जब से होश संभाला है अपने मोहल्ले नई हवेली में आस पास घरों में चितराम का काम होते देखा है-सब कुछ श्री जी बावा की .पा। चितारों की गली हो या तपेलों या जाटों का पाइसा या चरण शर्मा की दूकान या विष्णू सोनी का घर या लीलाधरजी के स्टूडियो में हर तरफ कला, चित्र और श्री जी बावा के फोटू। नतमस्तक कहूं मैं इन कलाकारों के प्रति, रेवाशंकर जी हो सा हेम चन्द्र जी द्वारका जी या चरन् या विष्णू या फिर अन्य कलाकार, सभी की पेन्टिंग्स हमेशा से आकर्षित करती रही हैं।

राजस्थान में वैष्णव समाज का सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है नाथद्वारा और इतिहासकारों के अनुसार राजस्थान में श्रीनाथ जी के आगमन के साथ चितेरे भी आये। पिछबाई कला तो 500 वर्ष पुरानी है। तब दिल्ली पर औरंगजेब का शासन था। कट्टर भावनाओें और धर्म के प्रति अंधे अनुराग के कारण औरंगजेब ने प्रतिमाओें का खण्डन किया। इन अत्याचारों से त्रस्त और भयभीत होकर महाराज गोपीनाथ जी ने मेवाड़ के महाराजा से शरण मांगी। उदारमना महाराणा ने श्री जी बावा को नाथद्वारा में रखने की इजाजत दी और महाराज को अपना धर्मगुरू बनाया। श्रीनाथ जी की भक्त मण्डली के साथ मेवाड़ में सियाढ, के बाद श्रीनाथ जी की प्रतिष्ठा नाथद्वारा में हुई।

भक्त मण्डल में कई चित्रकार भी थं, जो अपनी कला साधना के बल पर श्री जी बावा की सेवा करने में जुट गये। राज्याश्रय भक्तों द्वारा निरन्तर खरीद और श्रीनाथ जी के आशीर्वाद से इस चित्र शैली का निरन्तर विकास होता रहा। विभिन्न रंगों की विषमताओं का समन्वय ही नाथद्वारा शैली की मौलिकता है। रंग सम्मिश्रित नहीं करते नाथ्द्वारा के कलाकार रंगों का समन्वय करते है। इस शैली में चेहरे का कट, नाक की विशेषता, आंखों का अलसायापन, ललाट की प्रमुखता, उरोजों का गोल उभार, नथ का मोती, अलकों की एक लम्बी लटकन, मंगल सूत्र की आब और कटि की क्षीणता का पूरा ध्यान रखा जाता है। पुरूष चित्रण का पता तो तिलक से ही लग जाता है। कुल मिलाकर संक्षेप में राजपूत शैली, मेवाड़ शैली, किशनगढ़ शैली, का अनोखा कॉकटेल है। नाथद्वारा शैली।

श्रीनाथ जी के चित्रों में श्रृंगार, ठोडी पर हीरा और फूलों का आधिक्य है। 35 हजार की छोटी आबादी वाले कस्बे नाथद्वारा में चित्रकला का इतना विराट वैभव विकसित हुआ इसका कारण प्रमुखतः यह रहा कि इस वैष्णव सताज में हाथ के बने चित्रों से ही पूजा का विधान रहा है।

म्ंदिर की धोली पटिया पर बैठकर यहां के चित्रकार अपने चित्रों को स्वयं ही ग्राहकों तक पहुंचाते रहे। छोटा-मोटा एक दो करोड़ का सालाना व्यापार है यह। इसके अलावा चित्रकार दशहरे, दिपावली व अन्य प्रमुख त्योंहारों पर मंदिर के विभिन्न हिस्सों यथा पानघर, फूलघर, दूधघर, गेणाघर खर्च भण्डार, कृष्ण भण्डार, नगारखना डोडिया आदि की दीवारों पर हाथी घोड़े, सिंह, हाथ बैल, गोरी, दीपक, बेलबूटे गमले, कदली वृक्ष आदि का चित्रण वषरें से करते रहे है।

स्च पूछा जाये तो पुष्टि मार्ग का मूल कर्म कृष्ण कन्हैया को रिझाना, और उसका गुणगान करना रहा है। श्रीनाथ जी को भी कृष्ण का अवतार मानकर ही उनकी पूजा अर्चना की जाती रही है।और उनमें निष्ठा व श्रद्धा का कभी अभाव नहीं रहा है। इसी क्रम में भगवान कृष्ण की लीलाओं का अंकन यहां की चित्रकला का मूल विषय रहा है।

कृष्ण जन्म से लगाकर, ब्रज की रासलीला गोचारण, भोजन, दैत्यों का संहार तथा गौपियों के साथ विभिन्न ढंगे से की गई ठिठोलियों का विषद चित्रण इस शैली का प्रमुख आग्रह रहा है। बारह मासों, छत्तीसराग-रागनियों तथा छः रागों के चित्र भी लम्बे समय तक इस शैली में बनाये जाते रहे है। नाथद्वारा शैली में बने चित्रों में सोने-चांदी का काम भी होता आया है। लगभग 500 चित्रकार इस व्यवसाय में लगे हुए हैं घरों पर महिलाएं व बच्चे भी इस काम में मदद करते है। बच्चे रंग घेालते है, ब्रश तैयार करते है और धीरे धीरे प्रशिक्षित होकर चित्रकार बन जाते हैं, इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी चित्रकार बनते चले जाते है। प्रमुख चित्रकारों ने खुबीरामजी, घनश्याम शर्मा, राजेन्द्र शर्मा, भंवरलाल शर्मा, रेवाशंकर शर्मा, जगदीश प्रसाद शर्मा, मदन लाल शर्मा, द्वारकालाल जांगीड, भंवर शर्मा, शंकर लाल, नरोत्तम शर्मा, बी.जी.शर्मा व कई अन्य हैं चित्रकार पीढी दर पीढी इस कार्य को करते रहते है। और अधिकांश चित्रकारों के पास सालों के रिकार्ड आर्डर बुक है। कई चित्रकार मिनिएचर का काम भी करते है। अर्थात पुराने चित्रों की जीर्णोंद्वार, इस कला में निष्णात रेवा शंकर जी अमेरिका भी हो आए है।

कई कलाकारों को राज्य व राष्ट्र स्तरीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं, स्पान ताज आदि पत्रों में इन पर लेख छप चुके है। लेकिन नाथद्वारा की यह कला अब तेजी से व्यवसाय होती जा रही है, बड़े दूकानदार, बिचोलिए इन कलाकारों को ऊपर नहीं आने दे रहें।

पिछवाई-कला :-

श्रीनाथ जी के चित्रों के अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण है-वह है पिछवाई। वास्तव में श्रीनाथ जी की प्रतिमा के पीछे दीवारों को सजाने के लिए कपड़े पर मंदिर के आकार के अनुसार चित्र बनाये जाते है। ये पर्दों का काम करते है। यह नाथ द्वारा की अपनी मौलिकता हैं जो अन्य किसी शैली में नजर नहीं आती। पिछवाई का आकार कुछ भी हो सकता है, और मूल्य पांच सौ रू से लगातार 20,000 रू तक। इन पिछवाईयों में अधिकतर विभिन्न उत्सवों से सम्बन्धित होती है।

इन पिछवाईयों पर प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण भी काफी किया जाता है। गिरिराज पर्वत, गोपालन, रासलीलाएं, माखन खाते कृष्ण आदि इस शैली के आम विषय ब्रश बनाते है। प्रधान पर्वों की झाकियों के चित्र कई आकारों में बनते है। मंगला, ग्वाल, श्रृंगार, राज भोग आदि झाकियों के चित्रों की सर्वाधिक मांग रहती है।

1 मीटर गुणा 1.5 मीटर कपड़े पर श्रीनाथ जी का चित्रण काफी होता है। यह स्वरूप कहलाता है। इसके अलावा चितेरे, महत्वपूर्ण अवसरों यथा शादी, ब्याह, जनेऊ आदि अवसरों पर भित्ती चित्र भी बनाते है। इस चित्र शैली में सर्वप्रथम कागज या कपड़े पर कोयले से रेखकृति अंकित की जाती है। सुनहरे भाग को सोने या मृगान से बनाया जाता है। इसके बाद सफेद काम करके लाल व काला काम करते है। रंग लगाने के बाद कपड़ें या कागज को चिकने पत्थरों पर घोटकर उसका भुरभुरापन दूर किया जाता है। कपड़े की घुटाई ज्यादा महत्वपूर्ण है और कपड़े पर रंग भी ज्यादा पक्के लगाये जाते है।

आभूषण के चित्रण के मामले में कर्णफूल, कुण्डल, दुगदुनी, कन्दोरा कड़े, बंगडी, हथपान, हार, कांटा, लोंग, नथ, बोर, भुजबंद, अंगूठी, डोरा, गुटियां, झोला, आदि प्राथमिकता पाते है। हीरे भी बनाये जाते है। पुरूषों के मामले में मेवाडी पगडी अंगरखी, धोती, जूते, खडाऊ, आदि प्रमुखता से अंकित किये जाते है।

महिलाओं के लिए साड़ी, कांचली, घाघरा, आदि प्रमुखता से अंकित किये जाते है। फूलों का श्रृंगार भी लोकप्रिय है। राधा को बनाते समय कुछ लोग नवीन वस्त्र व आभूषण भी प्रयूक्त कर देते है। जानवरों में बैल, तोता, सारस, मछलियां, सर्ज, बगुला आदि का चित्रण होता है। फूलों में कमल, गुलाब, कदम्ब, आम मोलश्री आदि प्रमुखता पाते है।

पिछवाई कला में दो सौ वर्ष पूर्व रामचन्द्र बाबा चित्रकार हुए। बाद में विट्ठल व चम्पालाल हुए। इस कला में खेमराज जी भी प्रसिद्ध थे।

जैन चित्र शैली :-

जैन समाज की अपनी धार्मिक परम्पराएं, मान, मर्यादाएं है और उसी के अनुरूप जैन चित्र शैली का विकास हुआ है। चौबीस तीर्थंकरों का जीवन चरित्र, मंदिर, चरित्र, काव्य, आदि को आधार मानकर इस शैली में चित्र बनाये जाते है। इस कला का आधार गुजरात था। इसी परम्परा का विकास बाद में राजस्थान में भी हुआ। यहां भी सैकड़ों सचित्र जैन, प्राकृत पाली, ग्रन्थ लिखे गये जिनमें बहुत से चित्र बने। राय

कृष्णदास इस शैली को अपभ्रंश मानते थे। जैन लघु चित्रों की परम्परा अपना अलग वैशिष्टय रखती है। इन चित्रों का कथ्य, शिल्प, रंग विधान अन्य शैलियों से सर्वथा अलग है। यह परम्परा अजन्ता की बोद्ध शैली के निकट हैं। इन चित्रों की अपनी चिन्तन शैली है। अपने अलग मूल्य है, और इस कारण ये अलग महत्व रखते है। इन चित्रों में ललाट चाडों कान की लो लम्बी, नाक सधी हुई होती है। आंखे गोल और बडी पाई गई है।

इन चित्रों में विशालता का प्रतिपादन विशेष रूप से होता है। केश लम्बे, जूडे बंधे हुए होते है। पुरूषों में दाढ़ी को दो बराबर भागों में बांटा जाता है। 3 रोज उन्नत और पुष्ट बनाये जाते है। वास्तव में राजस्थान की प्राचीनतम शैलियों मेंसे एक जैन शैली हैं ये चित्र पन्द्रहवीं सदी से प्राप्त होते है।

इन चित्रों के चित्रकार, उदयपुर, बीकानेर, जोधपुर, नाकोड़ा, देलवाड़ा, रणकपुर, आदि स्थानों पर रहते थे। जैन शैली के चित्र अगरचन्द नाहटा, बनारस कला भवन, माती चन्द खजान्ची के पास संग्रहीत है। श्रृंगार भावनाओं का चित्रण भी जैन शैली में किया जाता था। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार जैन चित्रों का संयोजन सम्पूर्ण और सुदृढ़ है। रंगों का समायोजन दर्शनीय होतो है।

जैन चित्रों में ज्योतिष, सामुद्रिक, तंत्र मंत्र, और यंत्र शास्त्रों का भी वर्णन मिलता है। इन चित्रों के विषयों में प्रमुख है-चौदह स्वप्न, चौबीस तीर्थकर, जन्म, इन्द्र सभा, क्षीरसमुद्र, पदम सरोवर, त्रिशला पूर्ण कलश, तृष्णा क्रोध, कल्प वृक्ष आदि इस शैली में मोर, शेर, हाथी, कलश, चामर, लता, मेघ, कछुआ, बन्दर, सांप, तोता, रथ, हरिण आदि का भी चित्रण मिलता है।

नीला, हिंगुल, पीला, सुनहरा, तथा रजत पूर्ण रंगों का प्रयोग काफी ज्यादा होता था। इन चित्रों की रेखाएं पतली, अर्ध चन्द्राकार होती है। वास्तव में ये रेखा-प्रधान चित्र है। यति-समुदाय के जैन चित्रों के क्षेत्र आज भी काफी शोध की संभावनाएं हैं।

मारवाड़ चित्र - शैली :-

अरावली की पर्वत माला के पश्चिम में बसा मारवाड़, रेगिस्तानी इलाका है जो शायद कभी हरा भरा रहा होगा। इस इलाके में दसवीं सदी से पन्द्रहवीं सदी तक की कृतियों में चित्रांकन मिलते है।

वास्तव में मारवाड़ चित्र शैली मुगल ओर स्थानीय अपभ्रंश शैली के सम्मिश्रण से विकसित हुई। सन् की निर्मित एक रागमाला इस शैली का प्राचीनतम चित्र है। पाली की रणमाला में ग्रामीण कला का प्रमाण है। मारवाड़ शैली पर मुगल शैली का प्रभाव है, इसमें चित्र अधिक सरल सुन्दर और मुखर बनते है। इनमें रेखाएं भंगिमाएं रंगों का संयोजन भी सुन्दर है। कहीं कहीं पर विदेशी प्रभाव भी है। सन् से मारवाड़ शैली का महत्वपूर्ण काल शुरू होता है। महाराजा मानसिंह स्वयं कला प्रेमी थे और उन्होंने इस शैली को राज्याश्रय दिया। इस दौरान कुचामन, घाणेराव, नागौर, पाली, जालौर, आदि स्थानों पर चित्र शालाएं बनी और बडी भारी मात्रा में चित्रों का निर्माण हुआ।

इन चित्रों में रंग गहरे है और विलास के प्रतीक है। मारवाड़ शैली के विषय अन्य शैलियों से अलग है। राधाकृष्ण के चित्र कम बने ओर जो बने उनमें जयदेव के गीत गोविन्द को आधार माना गया है।

मूल रूप से देखा जाए तो मारवाड़ी शैली के चित्रों का आधार ढोला मारू, भूमलदे, निहालदे जैसी लोक-कथाएं है। इस शैली की मानव-आकृति लम्बी-चौडी और खूबसुरत है। दाढ़ी-मूंछ भी है। कमर पर कमर बंद होता है। पुरूषों के अलंकरणों में सरपेंच, जुबदा, मोती की माला, कटार, ढाल, तलवार, तर्रा, कलंगी आदि है। स्त्रियां भी लम्बी चौडी, तगड़ी और खूबसूरत बनाई जाती थी। बाल काले घने और नितम्ब तक लम्बे होते थे।

मेहन्दी रचे हाथों के साथ-साथ आंख खंजन जैसी होती है। पोशाक के रूप रंगीन कसूमल रंग बहुत लोकप्रिय था। लहंगा, चोली, कांचली, लूगडी ज्यादा बनती थी। पैरों में मखमली जूती होती थी। आभूषणों में मोतियों की माला टीका, लोंग, नथ, टेवटा, गलसरी, कंठी, आदि बनाये जाते थे। आम का वृक्ष, ऊंट, घोडा कुत्ता आदि भी इन चित्रों में प्रमुखता पाते थे।

बून्दी शैली :-

इस शैली का उद्भव और विकास कोटा के वास की रियासत बून्दी में हुआ था। राजस्थानी संस्कृति का पूर्ण विकास इस शैली में दृष्टिगोचर होता है। इन चित्रों के विषय वीरता, और श्रृंगार के साथ साथ है। नायिका भेद के चित्रों को भी स्थान मिला है। इस शैली के मूल में तीव्र कल्पना शक्ति है। मूक रेखाओं से यथार्थ के धरातल को उकेरा गया है। बून्दी के चित्रों में शिकार उत्सव सवारी दरबार आदि ज्यादा बनाये बये है। कृष्ण रास को भसी पूरा स्थान मिला है। कृष्ण लीला और कविताओं को आधार बनाकर भी अस शैली में काफी चित्र बनायें गये है। इन चित्रों में रेखाओं का महत्व रंगों से भी ज्यादा है। इन चित्रों में आकृतियां लम्बी और स्मार्ट होती थी। स्त्रियों के मुख पर अधरों से स्मित हास्य झलकता है। पुरूषों की आकृति में नीचे को झुकी पगडियां होती थी। चित्रों के विषय राग, नायिका भेद, ऋतुएं, बारह मासा,

कृष्ण लीला आदि होते थे। वर्षा के चित्र भी बहुत सुन्दर बनते थे। वर्षा के अलावा ग्रीष्म, शीत, होली आदि के चित्र भी बहुत बने है।

होली के चित्रों में पिचकारियां भारती युवतियां, रसिकजन और बोराएं युवामन बनाये गये है। बून्दी कला शैला के चित्रों में लाज हिंगुल आकाश सोने का आलेपन ज्यादा किया जाता है। चित्रों में सोने और चांदी का बारीक काम उसकी सुन्दरता में चार चांद लगा देते है। सफेद रंग से भवन बनाये जाते है। बूंदी शैली में चित्रित नारी सौन्दर्य भी अद्भुत है।

जयपुर चित्र शैली :-

सन् से तक आमेर व जयपुर में कलाकारों ने जिस शैली का विकास किया वहीं जयपुर शैली तेजी से एक बड़े भूभाग में प्रचलित हो गई। जयपुर राज्य की पुरानी आमेर थी वहां से जब जयपुर राजधानी आई तो कलाकार भी साथ आए और जयपुर शैली विकसित होने लगी। लम्बे इतिहास को छोड़ दे तो उस दौरान भित्ति चित्रों तथा पोट्रेटों का निर्माण भी काफी हुआ। बाद में विदेशी प्रभाव से प्राचीन कला का हास जयसिंह सेकिण्ड व रामसिंह के समय हुआ।

राजा प्रतापसिंह के शासन के दौरान महाभारत, रामायण, कृष्ण लीला, दुर्गापाठ, आदि विषयों पर सैकड़ों चित्र बने। राग माला, गीत माला, गीत गोविन्द आदि पर भी चित्र बनाये गये। इस शैली में सैकड़ों व्यक्ति चित्र बने। काम सूत्र पर भी चित्र बनाये गये। इसमें गहरे लाल रंग से हाशिये बनाये जाते थे। यह बहुत चमकदार रंग होता था। सफेद, लाल, हरा, पीला, नीला, रंग भी बहुत ज्यादा प्रयुक्त होता था। जस्ते का उपयोग भी किया जाता था। सुनहरी काम हेतु सोने का प्रयोग होता था।

जयपुर शैली में चित्रित पुरूषों और स्त्रियों की लम्बाई, अच्छे अनुपात में बनाई जाती थी। पुरूषों में मूंछें और लम्बी केश राशि होती थी। दाढ़ी बहुत कम होती थी नारी पात्रों का शरीर सुगठित, सुडौल और लम्बे केशों से युक्त होता था। चेहरा अण्डाकार नाक सुडोल और अधर पतले चित्रित किये जाते थे। चन्दन का लेप, मेहन्दी आदि का प्रयोग भी होता था। आभूषणों में तुर्रा, कलंगी, सेहरा, लोंग, बाली, आदि तथा गले में माला, कठी होती थी।

रामसिंह के शासन में वेशभूषाओं पर अंग्रेजी प्रभाव शुरू हो गया। जयपुरी चित्रों में उद्यान भी बहुत बनाये गये। पेड़ पौधों, पशु- पक्षीयों व बन्दरों का बारीक चित्रण पाया जाता है। कागज व भित्ति चित्रों पर फूल, वृक्ष लताएं पौधे आदि बहुत ज्यादा चित्रित किये गये है। पशुओं में चीता, हाथी, शेर, भेड़, बकरी, कुत्ता, बिल्ली, ऊंट, घोड़ा, सांभर रीछ, गिलहरी, आदि का भी बडा स्वाभाविक चित्रण किया गया है। मोर बतख, कौआ, कोयल, व मुगल शैली के अन्य प्रभावों का भी प्रयोग हुआ है। इस शैली की तकनीक अनोखी रही है। बाद में जाकर जयपुर शैली चित्रकला की एक महत्वपूर्ण शैली रही है।

अलवर चित्र शैली :-

वास्तव में अलवर शैली, जयपुर और दिल्ली शैली के मिश्रण से बनी है। इन शैलियों की छाप अलवर शैली पर स्पष्ट दिखाई देती है। कई विद्वान इस शैली को मुगलशैली की प्रतिछाया मानते है। इस शैली के विषयों में राधा-कृष्ण, वेश्या जीवन तथा अंग्रेजी जीवन पद्धति है। शिकार सम्बन्धी चित्र भी इस शैली में बाद में बनाये गये। इस शैली में हरा और नीला रंग अधिक प्रयुक्त किया जाता है। रंग बाहर के देशों से आते थे। इस शैली की वसलियां बहुत सुन्दर बनाती थी। चमड़े पर भी काम होता था।

इस शैली में औरत व पुरूष आकृतियों में आंखे गोल, होठ पतले तथा पान से सने दिखाए जाते थे। स्त्रियों की चोटी ऊपर जाकर नीचे लटकती हुई दिखाई गई है। नाक में नथ और कानों में बालियां चित्रित की जाती थी। पांवों में पाइजेब भी बनाये जाती थी। स्त्रियां पायजामा, कुर्ता और चोली में बनाई जाती थी। राधा-कृष्ण के चित्रों में परम्परागत विधान होता था। पुरूषों के गले में रूमाल, सर पर टोपी या साफा होता था। प्रकृति का चित्र भी इस शैली में किया जाता था। इस शैली पर मथुरा, दिल्ली और जयपुर शैलियों का काफी प्रभाव रहा।

कोटा चित्र शैली :-

इस शैली के चित्रों में भावों की गहनता, विषयों का अनकूल अंकन, सौन्दर्य एवं लावण्य का योजनानुसार निरूपण पाया जाता है। कोटा शैली के लघुचित्र कलाकारों की कल्पना को रूप देते है। दरबारी दृश्य, जुलूस, कृष्ण लीला, बारहमासा, राग रागनियां, युद्ध, शिकार आदि इस शैली के प्रमुख विषय रहे है। श्रीकृष्ण लीला के चित्रों में पुष्टिमार्त्रीय परम्परागत का विकास हुआ है। दशावतार की झांकियां भी दिखाई गई हैं। गोपियां, उद्धव, श्रीकृष्ण - बलराम आदि विषय भी चित्रित हुए हैं। युद्ध सम्बन्धी चित्रों में क्रोधित चेहरे, शोणित नयन, युद्धरत भावावेश भी है। शिकार के चित्रों में दुर्गम स्थानों पर शेर बाघ व अन्य आखेटों का वर्णन है। इन शिकार चित्रों में नारियों व रानियों को भी शिकार करते हुए दिखाया गया है।

मधुमालती की कथा, ढोलामारू के प्रेम प्रसंग तथा इसी प्रकार के अन्य विषयों पर भी चित्र बनाये गये हैं। इस शैली में पुरूषों को वृषभ, उन्नत और मांसल देहधारी चित्रित किया गया है। आभूषणों में मोती का प्रयोग ज्यादा है। स्त्री चित्रण में लम्बी नाक, पीनअधर, क्षीणकटि बनाई जाती थी। कपोल सुन्दर, कदली सम जंघाए आदि कोटा शैली की विशेषताएं रही हैं। रंगों में हरा पीला और नीला रंग बहुतायत से प्रयुक्त होता था। वास्तव में कोटा शैली अलवर शैली से मिलती है।

बीकानेर चित्र शैली :-

अनूपसिंह के शासन काल के दौरान बीकानेर शैली परवान चढ़ी। तत्कालीन कलाकारों ने स्थानीय, प्रौढ़ और परिमार्जित कला शैली का विकास किया।

इसका विकास सत्रहवीं व अठारहवीं सदी में हुआ। इस शैली पर पंजाब संस्कृति का काफी प्रभाव रहा। मुगल शैली का प्रभाव भी इस शैली पर पड़ा। इन चित्रों के प्रमुख विषय-पोट्रेट, दरबार, शिकार, राग रागनियां आदि रहे हैं। फववारे सजावट, भागवत कथा आदि पर भी चित्र बने हैं। इस शैली में आकाश को सुनहरे छत्तों से युक्त, बादलों से भरा हुआ दिखाया गया है। इन सभी चित्रों में पीले रंग को प्रमुखता दी गई है। कहीं कहीं यह जोधपुर (मारवाड़) शैली से भी मिलती हुई है। पुरूष आकृति व नारी आकृतियां लगभग मुगल शैली या मारवाड़ शैली जैसी ही बनाई जाती थी। अनूपसिंह के अलावा रायसिंह व कर्णसिंह के शासन काल में भी इस शैली का विकास हुआ। इन चित्रों में रेखाओं की गति, रंगों का सुन्दर प्रयोग और सहजता प्रमुख है।

जैसलमेर चित्र शैली :-

इस शैली के बहुत कम चित्र उपलब्ध हैं और इसी कारण इस शैली का परिचय कम हुआ है। इन चित्रों में रंग, आकृति और भाव विधान कलापूर्ण और सजीव है।

पत्थरों की कला के लिए प्रसिद्ध जैसलमेर की चित्रकला पर मारवाड शैली का प्रभाव ज्यादा नहीं पड़ा। इस शैली के चित्रों में पुरूषों के मुख पर दाढ़ी, मूंछ तेज, ओज दिखाई पड़ता है। शरीर मजबूत और शक्तिशाली बनाया जाता है। नारी चित्रों में मुख यौवन से ओतप्रोत, सुन्दर और कला पूर्ण है। आकर्षक अंगुलियां तथा नख से शिख तक सुन्दर लगती है।

इन चित्रों में रंगों के बजाय कला पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था। इसी कारण कम रंगों से ज्यादा अच्छे और प्रभावी चित्र बनाये गये। जो सजीव लगते थे। महाराजा हरराज, अखैसिंह और मूलराज के शासन काल में इस शैली का विकास हुआ।

मेवाड़ चित्र शैली :-

राजस्थान में चित्रकला का उद्भव व विकास मेवाड शैली से ही शुरू हुआ है। चितौड़, चावंड, उदयपुर, नाथद्वारा आदि स्थानों पर मेवाड़ शैली पल्लवित हुई। राणा कुम्भा, राणा सांगा, राणा प्रताप, अमरसिंह, राजसिंह, आदि राणाओें ने मेवाडी चित्र कला को आगे बढ़ाया। आयड़ (उदयपुर) में मेवाड़ चित्र शैली का प्रथम चित्र मिला है। कुम्भलगढ़ में भी इस शैली के चित्र मिलते है। चावंड मेवाडी चित्रकला का प्रमुख स्थल था। इस शैली के चित्रों पर जैन व गुजराती शैलियों का प्रभाव है। इस शैली में रेखाएं मोटी, भारी और रूक्ष पाई गयी है।

प्रकृति का चित्रण भी काफी हुआ है। इस शैली के ज्यादातर चित्र पुस्तकों पर बने हैं। रामायण, सूरसागर, रसिकप्रिया, बिहारी, बारहमासा आदि के चित्र काफी प्रसिद्ध हुए। इस शैली के चित्रों में तड़क भड़क नहीं है। सादे लाल और काले रंग से चित्र बनाये गये है। मेवाड़ चित्र शैली पर भी शोध की काफी संभावनाएं हैं।

किशनगढ़ चित्र शैली :-

किशनगढ़ का नाम आते ही नागरीदास की बणी-ढ़ाणी का ध्यान आ जाता है। वास्तव में किशनगढ़ शैली अपने आप में अपूर्व अद्वितीय और रस सिद्ध है। कृष्ण भक्ति को आधार बनाकर कवि नागरी दास ने शर्सकता और भावुकता से परिपूर्ण बणी ठणी से किशनगढ़ शैली ने प्रसिद्धि पाई। राजा किशनसिंह ने इस काम को अन्जाम दिया।

राजा सांवत सिंह या नागरीदास ने इस कला को शिखर पर पहुंचा दिया। नागरीदास ने विहार चन्द्रिका रसिकरत्नावली तथा मनोरथ मंजरी नामक काव्य ग्रंथ रचकर प्रसिद्धि पाई। बल्लभ संप्रदाय में दीक्षित होकर भी वे अपनी वासवान बणी ठणी के सौन्दर्य से नहीं बच सके। और आज भी किशनगढ़ के कलाकार बणी ठणी का चित्रण कर अपनी कला को सार्थक करते है।

प्रकृति चित्रण, पशु-पक्षियों का चित्रण इस शैली की विशेषता रहा है। झील में खेलते पक्षी, नौकाएं आदि भी चित्रों में काफी बनाई जाती थी। भवनों, फव्वारों, कदली वृक्षों, कदम्ब वृक्षों व कमल दल भी काफी ज्यादा बनाये जाते थे।

इस शैली के चित्रों में अंकन की विशिष्टता, होती थी और इसी कारण किशनगढी शैली अनूठी है। नारी आकृतियों के चित्रण में जितनी सावधानी किशनगढ़ शैली में रखी जाती है, शायद ही कहीं अन्य शैली में होगी।

नागरीदास की प्रेमिका बणी ठणी को राधा के रूप में अंकित किया जाता है। नारी के कोमल शरीर से खेलती लंबी केश राशि, काजल युक्त आकर्षक आँखें, पीनअधर, क्षीणकटि, दीर्ध नासिका उन्नत ललाट विकसित और खिले उरोज ये सभी किशनगढ़ शैली की विशेषताएं हैं।

यह शैली कागज शैली से प्रभावित भी है। सफेद गुलाबी रंगों का ज्यादा प्रयोग होता था। लाल हरा व नीला रंग भी प्रयुक्त होते थे। इस शैली का प्रसिद्ध चित्र बणी ठणी ही है। किशनगढ़ चित्र शैली सबसे प्रसिद्ध शैली रही है। राधा कृष्ण, प्रकृति चित्रण श्रृंगार बोध के इतने सुन्दर चित्र अन्य किसी भी शैली में शायद ही बनते हैं।

राजस्थान की चित्र शैलियां में नाथद्वारा, मारवाड औार किशनगढ़ की शैलियां ही सर्वाधिक चर्चित, प्रसिद्ध और सम्पन्न रही है। अन्य शैलियों पर एक दूसरे के प्रभाव इतने अधिक रहे हैं। कि उन्हें स्वतंत्र शैलियां मानना ही कई बार न्यायोचित नहीं लगता।

आज राजस्थानी शैलियों के चित्र भारत के ही नहीं विदेशों के पच्चीसों संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। सैकड़ों दुर्लभ चित्र नष्ट हो रहे है। आवश्यकता है कि इस और प्रयास हो और इन चित्रों की सूरक्षा के साथ साथ इन पर खोज, शोध और लेखन हो ताकि अतीत की यह धरोहर हमारा मस्तक और ऊंचा कर सकें।

राजस्थानी चित्र कला के लिये सामग्री

चित्रकला के लिये ब्रश, रंग व कागज की आवश्यकता रहती है। पूर्व में पक्के रंग पत्थरों, पेड़-पौधों आदि से प्राप्त किये जाते थे। अब रंग बाजार में उपलब्ध होते है। कागज व पिछवाई हेतु कपड़ा प्रयुक्त होता है। कागज चिकना, और मोटा ठीक रहता है। हाथीदांत पर भी चित्र बनाये जाते है।

चित्र कला में प्रयुक्त होने वाले ब्रश, नाथद्वारा के कलाकार स्वयं बनाते है। अधिकांश कलाकार ब्रश गिलहरी एवं बकरी के बालों से बनाते थे। मोटे काम के लिये सूअर व घोड़े की बर्दन के बाल काम में आते थे।

कबूतरों, चिड़ियों एवं जलजीवों के परों से परगजे तैयार कर बालों को तागे से बांधकर बैठाया जाता था। जीवित गिलहरी को पकड़ कर उसकी दुमके बाल काटकर छोटे बड़े ब्रश बनाये जाते थे।

बाजारों में मिलने वाले ब्रशों का ज्यादा प्रयोग नहीं किया जाता। सुनहरी काम हेतु सोने के बरक, चांदी के बरक व जस्ते का प्रयोग भी होता था। ब्रश की डंडी भी विशेष रूप से बनती है। घरों में बच्चे और औरतें रंगों को घोलकर तैयार करते है।

आभार :- इस आलेख को तैयार करने में निम्न ग्रंथों से सामग्री ली गई है।

राजस्थान की लघुचित्र शैलियां, राजस्थान की चित्रकला, मूर्ति कला, मेवाड़ की चित्रांकन परम्परा आदि।

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यशवन्त कोठारी

86,लक्ष्मी नगर ब्रहमपुरी बाहर,जयपुर-302002

फोनः-0141-2670596

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. राजस्थान की चित्र-कला सबसे समृद्ध चित्र कला है. बहुत बढिया आलेख. आभार. बहुत सी नई बातें जानने को मिलीं.

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  2. sargarvit aalekh hai.kaafi achcha laga.thanks

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: यशवंत कोठारी का आलेख – कला भूमि राजस्थान
यशवंत कोठारी का आलेख – कला भूमि राजस्थान
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