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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - वे और अकादमी

yashwant kothari new (Mobile)

वे एक मामूली हिन्दी अध्यापक थे। महान् बनना चाहते थे, सो अकादमी में घुस गये। वे अब महान् साहित्यकार हो गये। अकादमी भी उनको पाकर धन्य हो गई। उन्होंने कविता लिखी। कविता महान् हो गई। उन्होंने सम्पादन किया। सम्पादकी महान् हो गई। उन्होंने आयोजन किये। आयोजन कृतार्थ हो गये।
मगर मैंने महसूस किया उनके अकादमी में घुसने से एक हलचल हुई। थोड़े दिनों बाद उनके सौभाग्य और अकादमी के दुर्भाग्य से उपाध्यक्ष का निधन हो गया। उन्होने अपनी बंसी टेरी और वे अकादमी के उपाध्यक्ष हो गये। कुछ दिनों के बाद अकादमी के दुर्भाग्य और उनके सौभाग्य से अकादमी अध्यक्ष भी स्वर्ग सिधार गये, अब वे अकादमी के अध्यक्ष हो गये। जैसे उनके दिन फिरे, किसी के नहीं फिरे। अब वे महान् साहित्यकार, प्रबुद्ध अध्यक्ष, चिन्तक, विचारक, कवि सब कुछ एक साथ हो गये। वे किसी प्रकाशक की दुकान पर चढ़ जाते। प्रकाशक महान् हो जाता। वे किसी नवोदित के सिर या पीठ पर हाथ रख देते, नवोदित महान् हो जाता। उन्होने एकाध महिला को मित्र बनाया महिलाएं महान् हो गई।
उन्होंने साहित्यिक समारोह में वक्तव्य और अकादमी की रपटें पढ़ी, रपटें महान् हो गई। जो उन्होंने लिखा सो महान् बाकी सब कूड़ा -करकट। यहां तक कि गांधी और नेहरू पर लिखा भी कूड़ा कचरा साबित कर दिया उन्होंने। धन्य है वे। जब अध्यक्ष हो गये तो अपने प्रकाशक के लिए भी कुछ करना था क्योंकि अध्यक्षता अस्थायी चीज है, प्रकाशन लाभप्रद व्यवसाय है, सो उन्होने अपने प्रकाशक को अकादमी प्रकाशनों का एकमात्र वितरक नियुक्त कर दिया। प्रकाशक धन्य हुआ। अध्यक्ष जी के चेले चाटे बन गये। वे मठाधीश हो गये। अपने मठ में बैठते । चेलों से समाचार लिखवाते, चीफों के लिए दावतें करते और मुझे देखकर मुंह बिचकाते। मैं नमस्कार की कोशिश करता, वे पीठ फेर लेते। मैं एक घटिया कलम घिस्सू, गैर हिन्दी वाला, वे महान् स्वयं के लेखन से स्वयं आक्रान्त।
मैं बचकाना, बच्चा लेखक, मेरा लेखन कूड़ा करकट, उनका लेखन कालजयी क्लासिक। उनकी मूछें बड़ी और ऊंची मेरी बात छोटी और मूछें नीची।
वे राजधानी आते। राजधानी महान् और कृतार्थ हो जाती। वे सचिवालय जाते सचिवालय धन्य हो जाता। महानता के इस मुखौटे के नीचे उनका घटिया और तृतीय श्रेणी का राजनीतिक व्यक्तित्व। वे साहित्यकारों में नेता और नेताओं में साहित्यकार। लिखा कम। छपा उससे भी कम। मगर चर्चित ज्यादा करवाया। चर्चित होने के सभी नुस्खों का भरपूर उपयोग किया। सम्पादकों, अफसरों, मित्रों, रिश्तेदारों, परिचितों, भाई, भतीजों को खूब रेवड़ियां बांटी और रेवड़ियां खा खाकर वे इनकी विरूदावलि गाने लग गये। वे हमेशा चर्चा के केन्द्र में रहे। स्थानीय से प्रान्तीय, प्रान्तीय से राष्ट्रीय, राष्ट्रीय से अन्तराष्ट्रीय स्तर तक उठते चले गये। लेखन गौण रह गया। पीछे छूट गया। स्तर उठता गया। मानवता मरती गयी। वे संसार के किनारे पर पहुंच गये। अब सोचने लगे। मगर अब क्या हो सकता था।
मैंने एक बार फिर कोशिश करने के लिहाज से उन्हें पुनःनमस्कार किया। इस बार वे मुस्कराये। मैं कृतार्थ हो गया। बातचीत शुरू करना ही चाहता था कि उन्होंने मेरी ओर से पीठ फेर ली। मैं अपमानित होकर पुनःव्यंग्य की शरण में आ गया।
उनका एक शिष्य यह देख रहा था। उसने चारों तरफ मेरी उपेक्षा का ढिंढोरा पीट दिया। सबकेा ज्ञात हो गया कि अध्यक्ष जी मुझे पसन्द नहीं करते। सब मेरे से घृणा करने लग गये।
मैं अपना अस्वीकृत सखेद अभिवादन लिये अकादमी के द्वार पर खड़ा हो गया। शायद कभी ये बंद दरवाजे खुलें, मैं अन्दर घुस सकूं। मगर बंद गली के दरवाजे कभी नहीं खुलते।

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यशवन्त कोठारी
86,लक्ष्मी नगर ब्रहमपुरी बाहर,जयपुर-302002
फोनः-0141-2670596

ykkothari3@yahoo.com

2 टिप्पणियाँ

  1. यशवन्त कोठारीजी की लेखनी को प्रणाम !
    क्या चित्र खींचा है !
    सारी महान विभूतियों को नकेल डाल कर सामने ला खड़ा किया ।
    व्यंग्य व्यंग्य के साथ साथ लाइव टेलिकास्ट भी हो गया !…लेकिन शर्म उनको आती नहीं ,न मौत । क्योंकि खाल भी है उनकी गैंडे की और अवतार भी है वे रक्त बीज के ।
    पुनः आदरणीय कोठारीजी को नमन !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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