प्रमोद भार्गव की कहानी : गंगा बटाईदार

SHARE:

अजीब पशोपेश में है गंगा बटाईदार ! गंगा बटाईदार कुछ बरस पहले तक अटलपुर का सबसे नामी-गिरामी बटाईदार हुआ करता था। हांलाकि उसका पूरा नाम गंग...

clip_image002

अजीब पशोपेश में है गंगा बटाईदार !

गंगा बटाईदार कुछ बरस पहले तक अटलपुर का सबसे नामी-गिरामी बटाईदार हुआ करता था। हांलाकि उसका पूरा नाम गंगाराम था, पर बटाईदारी खानदानी पेशा होने के कारण अनायास ही उसका नामाकरण हो गया गंगा बटाईदार ! यही नाम जनप्रिय होकर चलन में आ गया। गंगा से पहले उसके पिता रामलाल राव साहब के यहां लगभग बेगारी की विना पर बटाईदारी किया करते थे। बारह जिले और चौबीस परगने वाले ग्‍वालियर राज्‍य में 'राव' एक पदवी हुआ करती थी, जो राजघरानों के हित साधकों अथवा राजद्रोह की सार्म्‍थ्‍य रखने वाले ताकतवरों को दी जाया करती थी। पदवी से अलंकृत हो जाने के बाद कथित राव साहब शरणागत की अवस्‍था में राजा के जयकारे लगाने और उनके सूत्र वाहक की भूमिका में आ जाया करते थे। आजादी के बाद सरदार बल्‍लभ भाई पटेल के प्रयास व दबाव की सह-रणनीति के चलते राजशाही मध्‍यभारत में मर्ज हुई और फिर मध्‍यप्रदेश के अस्‍तित्‍व में आने के साथ ही राजतांत्रिक व्‍यवस्‍थाओं पर जनतांत्रिक व्‍यवस्‍थाऐं भारी पड़ती चली गईं। ऊंची कद-काठी के स्‍वाफाधारी राव साहब की ठसक अपनी हवेली की चाहरदीवारी के बीच जमीन-जायदाद को बचाए रखने का उपक्रम जारी रखते हुए कुंद होकर भारी अवसाद के प्रभाव में कुंठित होने लगी।

इस बदलते परिवेश का एक सुनहरे अवसर की तरह सबसे ज्‍यादा लाभ गांव के ब्राह्मण और कायस्‍थों के युवाओं ने उठाया। इन जातियों के किशोर होते छोकरों ने दूरदृष्‍टि से काम लेते हुए गांव में अध्‍ययन-अध्‍यापन के साधन न होने के बावजूद ईषागढ़ से प्राइमरी और पोहरी के आदर्श विद्यालय से अंग्रेजी मिडिल की सर्टिफिकेट परीक्षाऐं उत्तीर्ण कीं। तब पूरे नरवर जिले में (शिवपुरी आजादी के बाद जिला बना) अकेले पोहरी में ही माध्‍यमिक विद्यालय हुआ करता था। वहां के प्रसिद्ध स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी गोपाल कृष्‍ण पुराणिक ने ग्‍वालियर राज्‍य के अधीन पोहरी के कमोवेश उदार प्रवृत्ति व स्‍वराजवादी जमींदार मालोजी नरसिंहराव शितोले को विश्‍वास में लेकर पोहरी और भटनावर में बमुश्‍किल पाठशालाओं की नींव रखी। वरना, पढ़-लिखकर आम आदमी जागरूक न हो जाए इसलिए नए विद्यालय खोले जाने पर राजशाही में प्रतिबंध था।

बहरहाल इतिहास की पृष्‍ठभूमि में बहुत गहरे जाना हमारा ध्‍येय नहीं है इसलिए कहानी के मूलपाठ पर आते हैं........।

जैसे-जैसे ये ब्राह्मण और कायस्‍थ छोकरे प्राइमरी और मिडिल परीक्षाऐं उत्तीर्ण करते चले गए वैसे-वैसे परिवर्तित हो रही नई सत्ता में पटवारी एवं मास्‍टरी के सरकारी पदों पर नियुक्‍ति पाते भी चले गए। लिहाजा परिवर्तित प्रक्रिया से गुजर रहे शासन-प्रशासन की लाभकारी सभी जानकारियां इनके पास थीं और शासन-प्रशासन में इनकी पहुंच भी आसान हो गई थी। नतीजतन जब सीलिंग कानून के तहत जमींदार, जागीदार और राव साहबों के पास जो सैंकड़ों एकड़ जमीनें थीं उनको राजसात कर भूमिहीनों को पट्‌टे देने की कार्यवाही शुरू हुई तो इन नए नौकर-पेशाओं ने नामी-बेनामी, बालिग-नाबालिगों के नाम पट्‌टे लेकर ज्‍यादातर जमीनें बिना किसी होड़ के हथिया लीं। राव साहब तो कहीं ठसक को अनायास ही ठेस न पहुंच जाए इस अनिश्‍चित भय से हवेली के कुहासे से बाहर ही नहीं निकले।

गांव के नए नौकर-पेशाओं ने कुटिल चतुराई बरतते हुए इतनी उदारता जरूर बरती कि जितने भी अटलपुर के आसपास के गांवों में उनके जजमान थे उनको भी जमीनों के पट्‌टे करा दिए। इसी कार्यवाही के दौरान पंडित अयोध्‍याप्रसाद ने दस बीघा भूमि का पट्‌टा राव साहब की बटाईदारी छोड़ देने की शर्त पर रामलाल को भी करा दिया था। फिर क्‍या था रामलाल राव साहब की सिंध में डूबती नैया से छलांग लगाकर पंडित अयोध्‍याप्रसाद के चरणों में, ''अब तो महाराज तुमरैई संग लगके जा जीवन की वैतरणी पार होएगी.....।'' रामलाल वैसे भी पंडित जी का जजमान था। तब से रामलाल गांव में हाल ही में रौब-रूतबा गालिव कर लेने वाले पंडित जी का बटाईदार हो गया। रामलाल के स्‍वर्ग सिधारने के बाद उसके मसे फूट रहे बेटे गंगाराम ने बटाईदारी का यह काम बतौर विरासत हासिल किया।

माली हालत कभी भी संतोषजनक स्‍थिति में नहीं पहुंचने के बावजूद गंगा बटाईदार सब धन संतोष समाना की तर्ज पर पंडित जी की बटाईदारी करते हुए सुखी था। महाराज अयोध्‍याप्रसाद तो अब रहे नहीं। उनके बेटों ने खेती-बाड़ी का कामकाज संभाल लिया था। पंडित जी के मरने के बाद उनके लड़कों का गांव से नाता कम से कमतर होता चला गया। अब शिवपुरी में ही उन लोगों ने स्‍थायी ठौर बनवा लिए थे, वहीं से गांव की सत्ता का संचालन करते पुरखों की निशानी बनी रहे इसलिए खेती किसानी चल रही थी, वरना भाइयों में जमीन बेचकर धन बांट लेने की बात भी गाहे-बगाहे चल पड़ती थी।

सब कुल मिलाकर गंगा बटाईदार मजे में था। मालिकों के शिवपुरी में रहने के कारण वह आटे में नोन बराबर टांका भी मुनासिब मौका देख लगा लिया करता और महाराज की दम पर अपनी जाति-बिरादरी में रौब भी गांठे रखता। महाराज से गाढ़ी छनने के बूते ही उसकी सामाजिक और आर्थिक हैसियत सुरक्षित थी, इसलिए वह कहीं महाराज के आगे गलती फूट न पड़े इसलिए हर कदम फूंक-फूंक कर रखता। पर गंगा के ही संगी-साथी उसकी गरदन पर छुरी चलाने के नजरिये से वक्‍त बेवक्‍त शिवपुरी पहुंचकर महाराज को चुगलखोरी कर बरगला आते। कहते, 'महाराज सेमरी के गेंत में दस हजार को तो जाने घासई बेच दओ, जबकि तुमैं आठई हजार को बताओ है ? मुड़िया में एक सौ अठारह बोरी सोयाबीन निकरो, जबकि तुमैं एक सौ दस बोरी गिनाई। रातई रात आठ बोरा टंकार गओ। अबकी से महाराज जाए बदल देऊ। कोऊ और खों देके तो देखो पैदावार में कितेक फरक आवत है.....? नई तो पूरी जमीन ठेके पे उठा दो महाराज, एक मुश्‍त रकम मिलेगी और चोरी चकारी के झंझट से भी मुक्‍ति ?' शिवशंकर महाराज गंगा को शिवपुरी तलब करते। गंगा चिरौरी में कट्‌टा भर मक्‍के के भुट्‌टे तो कभी बूंटों (चना) का गट्‌ठर तो कभी भुना होरा-बालेंं लाकर पेश करता और महाराज के पैताने बैठ जाता। फिर महाराज खोद-खोद कर गंगा से संदिग्‍ध सवालों के जवाब मांगते ? गंगा खून-पसीने की ईमानदारी की कमाई की दुहाई देता। बाल-बच्‍चों की सौंगंध लेकर गंगाजलि उठाता। उसकी आंखें छलछला आतीं। महाराज भी गंगा की आंखों में दुख का पानी देख पसीज जाते। उन्‍हें लगता गांव के ईर्ष्‍यालु खेल बिगाड़ने के लिए उन्‍हें खोटी सलाह दे जाते हैं। आखिर में महाराज मुस्‍कुराकर गंगा को झिड़की देते, 'देख गंगा काम पूरी ईमानदारी से करिओ। आगे मोय शिकायत मिली तो मैं अगली बार से खेती ठेके पर ही उठांगो।' और लब्‍बोलुआव यह की बात आई गई हो जाती।

इधर पंडित अयोध्‍याप्रसाद का सबसे छोटा बेटा साकेत जब से इंदौर से एमबीए करके क्‍या लौटा है हर चीज में कुशल प्रबंधन को पैसा कमाने की कुंजी का फार्मूला बताने लगा है। उसने गांव की खेती को भी कुशल प्रबंधन के हाथों ठेके पर सौंप देने की वकालात की। चारों भाई मिल बैठे तो साकेत ने प्रबंधन के मार्फत बिना कोई जोखिम उठाए ज्‍यादा मुनाफे का गणित समझाया और जमीन अगली बरसात से ठेके पर उठा देने की बात इतने प्रभावकारी ढंग से कही कि सबसे बड़े भाई शिवशंकर को छोड़ अन्‍य तीनों भाईयों में खेती ठेके पर उठा देने के मुद्‌दे पर लगभग सहमति बन गई। शिवशंकर ने खेती की प्रकृति पर निर्भरता होने का बहाना लेकर गंगा को अधबटाई पर ही खेती चलती रहने की बात पूरी वजनदारी से रखी भी, पर जब उन्‍हें लगा कि भाईयों की पत्‍नियां भी धन के लालच में हस्‍तक्षेप करने पर उतारू हैं तो उन्‍होंने बड़प्‍पन से काम लेते हुये हथियार डाल दिए। शिवशंकर नहीं चाहते थे कि साकेत की शादी होने तक घर में फूट पड़ने की बात बाहर तक जाए।

मरता क्‍या न करता, तमाम मिन्‍नतें करने के बाद भी जब अधबटाई पर खेती उठा देने की बात नहीं बनी तो गंगा बटाईदार ने एक मुश्‍त साठ हजार की लिखा-पढ़ी कर खेती ठेके पर उठा ली। वरना दूसरे उसकी छाती पर मूंग दलने के लिये पेंसठ हजार से भी ऊपर में जमीन लेने को तैयार ही खड़े थे। साकेत के दखल के चलते इस मर्तबा लिखा-पढ़ी भी बकायदा स्‍टाम्‍प पेपर पर हुई। वरना, बड़े महाराज तो एक कोरे कागज के टुकड़़े पर लिखतम करते तो करते नहीं तो केवल कागज के निचले हिस्‍से पर उसके दस्‍तखत करा लिया करते थे। बड़े महाराज पर उसे विश्‍वास भी अटूट था, इसलिए कोरे कागज पर भी सालों से दस्‍तखत करते चले आने के बावजूद उसे कभी शक-सुबहा नहीं होती और वर्षा की शुरूआत के साथ ही बतर आने पर वह नए उत्‍साह और ऊर्जा में भरकर महाराज के टगर के खेतों की जुताई हल से करता और बड़े खेत किराये के टे्रक्‍टर से जुताता।

लेकिन अब जब से गंगा स्‍टाम्‍प पेपर पर दस्‍तखत करके लौटा है तभी से उसका गला सूखा जा रहा हैं। तमाम कुशंकाऐं महूक की माखियों की तरह उसके सिर के इर्द-गिर्द भिनभिनाकर उसका सिर चकरा दे रही हैं। उसे लगा, जैसे माखियों का ढेर उसका खून चूसने में लग गया है। तमाम शंका कुशंकाओं से उबरने का उपक्रम करते हुए उसे बड़े महाराज डूबते को तिनके का सहारा महसूस हुए। उसके सूखते खून में आद्रता आई और कुछ रक्‍त संचार भी बढ़ा। उसके भीतर ही भीतर एकाएक उत्तरोतर प्रबल होते जा रहे आत्‍म-विश्‍वास ने उसे जाताया कि कुछ होनी-अनहोनी होगी तो महाराज संभाल लेंगे। बीते तीस-पैंतीस साल से वही तो डूबने को होती नैया को खेते चले आ रहे हैं।

साकेत का परिवार-कुटुम्‍ब में ही नहीं पूरे गांव और आसपास के चौदह गांवों में दखल बड़ रहा था। इन सभी गांवों में उनकी पुरोहिताई जागीर की तरह थी जो पारस्‍परिक निर्भरता और भरोसे की डोर से बंधी पिछली सदी से चली आ रही थी। महाराज शिवशंकर संबंध प्रगाढ़ बनाए रखने की जो परंपराऐं सालों-साल चली आ रही थीं उनका निर्वाह अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए बखूवी करते चले आ रहे थे। वे गाढ़े समय में जजमानों के काम भी आते। वक्‍त जरूरत दुखी-बीमारी, सगाई-ब्‍याह में किसी जजमान को रूपयों की जरूरत पड़ती तो रकम या खेत रहन रखकर दो प्रतिशत ब्‍याज की दर दे देते। कभी बिना रकम रखे भी दे देते। वक्‍त पर पैसा न लौटाने वाले किसान को भी थोड़ी बहुत खरी-खोटी सुनाकर भड़ास भर निकाल लेते, पर बैर पालकर संबंध विच्‍छेद कर लेने की स्‍थिति से बचे रहते, क्‍योंकि वे भलीभांति जानते थे कि जजमानों से उनकी भी प्रतिष्‍ठा जुड़ी हुई है। इसी समझदारी भरी चतुराई के चलते पूरे चौदह गांव की पुरोहिताई में आज तक उनका सम्‍मान बरकरार था और उनका पैसा भी कभी नहीं डूबा।

पर साकेत ने नफा-नुकसान के आधार पर संबंधों को तौलने की प्रक्रिया शुरू की। हाल ही में वह एक खाद बेचने वाली कंपनी की मार्केटिंग करने लगा। जिसमें सेलरी तो कम थी पर कमीशन आकर्षक था। इस बार खेती की दृष्‍टि से बरसात अच्‍छी हुई थी। खेतों में ज्‍वार, मक्‍का और सोयाबीन की फसलें लहलहा उठीं। खेतों में हरियाली देख गंगा बटाईदार की तबीयत भी हरी हो जाती। उसके मन में लड्‌डू फूट पड़ते। सोचता, 'ईश्‍वर की कृपा बनी रहे तो खरीफ की फसल पेंतीस-चालीस हजार की निकर ही आएगी और इतेकई रब्‍बी की फसल हो जाएगी। दसेक हजार का बंजर और परत पड़ी भूमि में वह घांस भी बेच ही लेगा। इतने में उस की पौ-बारह है। महाराज के साठ हजार चुकाके पच्‍चीस-तीस हजार की रकम बच गई तो जा जेठ-वैशाख में सयानी हो रही मोड़ी की कहीं ढंग-डोल को मोड़ा देख शादी कर देंगो। मोड़ी के ब्‍याह से मुक्‍ति पा लाई तो समझो कुंभ में डुबकी लगाय लई।'

गंगा बटाईदार अपनी घरवाली और बाल बच्‍चों के साथ दिन-दिन भर निंदाई गुड़ाई में लग खून-पसीना एक करता रहता। उसे जिन खेतों में फसल कमजोर जान पड़ी उनमें उसने घर के पीछे की खुड़िया में घूरे के बहाने पूरे साल तैयार हो रही खाद को खेतों में डालने की तैयारी शुरू कर दी। घूरा क्‍या था गाय-बैल, भैंसों का गोबर मूत था जो बिना कोई पूंजी खरच किए सड़ - गलकर उम्‍दा किस्‍म की खाद में तब्‍दील हो गया था।

गंगा तीन-चार गाड़ी ही खेतों में गोबर-खाद डाल पाया था कि जीप में सवार साकेत गांव आ धमका। उसके साथ थे सहकारी बैंक के दो कर्मचारी और दो खाद कंपनी के एजेंट। एक के कंधे पर माइक टंगा था। खाद की गुणवत्ता जाहिर करने वाली प्रचार सामग्री भी उनके पास थी। आसमानी के चबूतरे पर टीम ने मदारियों की तरह मजमा लगाया और बेचे जाने वाले खाद के चमत्‍कारिक गुणों का चासनी चढ़ी बोली में बखान किया। किसानों को बताया गया, जिस सोयाबीन की फसल आप एक बीघा में दो क्‍विंटल ले रहे हैं, इस खाद को खेतों में डालने के बाद पैदावार दोगुनी से भी ज्‍यादा लेंगे। मसलन एक बीघा में चार से पांच क्‍विंटल उपज ! एक ही साल में बारे न्‍यारे।

साकेत के साथ होने के कारण लोगों को भरोसा जल्‍दी बैठ गया। सहकारी बैंक के कर्मचारी साथ थे ही, सो हाथों-हाथ बैंक सोसायटियों के जरिये खाद उधारी पर दे देने का सिलसिला शुरू हो गया। जिन किसानों ने न-नुकुर की उन्‍हें साकेत ने रिश्‍तों से तौलकर भुना लिया। गंगा भी बैंक सेे कर्ज लेकर खाद लेने को तैयार नहीं था, पर साकेत ने भविष्‍य में संबंध खत्‍म कर देने का जो भय दिखाया तो बेचारा सहमत हो गया। दस हजार का खाद उसके सिर मढ़ दिया गया। वह भी उसकी भूमि स्‍वामी वाली जमीन की भू-अधिकार एवं ऋण पुस्‍तिका पर।

खेतों में खाद लेने के बाद पन्‍द्रह दिन बीते तो गंगा को ही क्‍या सभी किसानों को लगा, ठगे गए। खाद के असर के बाद तो पौधा तेजी से बढ़ने के साथ फैलना था, पर हुआ उल्‍टा। पौधे बौने रह गए। पत्तियां पीली पड़ गईं और सोयाबीन की फलियों में पूरे दाने नहीं पड़े। बाद में खोजबीन करने पर पता चला कि साकेत जिस खाद कंपनी का एजेंट था उसकी बिक्री ही मध्‍यप्रदेश में प्रतिबंधित थी। पर कंपनी ने कृषि विभाग के अधिकारियों, सहकारी बैंक के प्रबंधकों और खाद विक्रेताओं से सांठगांठ कर पूरे इलाके में टनों नकली खाद बेचकर खुद तो बारे न्‍यारे कर लिए पर कर्ज किसानों के सिर चढ़ा दिया। उड़ती-उड़ती गांव में यह भी खबर फैली कि इस खाद बेचने के गोरख धंधे में साकेत का लाखों का कमीशन बना। बहरहाल तहसीलदार से लेकर कलेक्‍टर तक तमाम शिकवे - शिकायतें हुईं। पर परिणाम शून्‍य। जांच जारी है...।

गंगा ने फसल काटकर खलिहान में लाकर दांय करने के बाद तौली तो बमुश्‍किल तीस बोरी ही निकली। दाना भी खराब था, झुर्रियों युक्‍त ! तुषार के मारे दाने जैसा, जो अगली फसल के लिए बीज के काबिल कतई नहीं था। अच्‍छा होता तो उसकी घरवाली अगले साल बोने के लायक बीज कुठीला में भरकर जतन से रख देती। बांकी सोयाबीन गंगा बदरवास मण्‍डी ले जाकर बेच आता। अब तो गंगा के लिये मुश्‍किलें और बढ़ गइंर् लगती हैं ? ठेके पर खेती उठाकर बड़ी भूल की उसने ? अधबटाई से होती तो हानि का पूरा ठींकरा उसके सिर तो न फूटता ? महाराज और वह आधा-आधा उठाते ? साकेत ने रचनई ऐसी रची कि जमीन ठेके पर उठाना उसकी लाचारी थी ? फिर मुए ने खाद और जबरन सिर-माथे लाद दओ। कैसे चुकायेगा साठ हजार.....? बैंक का कर्जा अलग से....। पर गंगा अभी से हार मान गया तो रब्‍बी की खेती कैसे करेगा....? अभी तो जैसे पूरा पहाड़ उसके सामने है..., चढ़ाई के लिए हिम्‍मत तो भरनी हो पड़ेगी।

नस्‍ल अच्‍छी नहीं होने के कारण गंगा को सोया का मण्‍डी में वाजिब दाम नहीं मिला। गंगा को उम्‍मीद भी यही थी इसलिए ज्‍यादा निराशा नहीं हुई। सात सौ पचास क्‍विंटल के मान से सोया बिका। तीस क्‍विंटल सोया के बाईस हजार पांच सौ रूपये उसकी गांठ में थे। जिनसे उसे खेतों में किराये के ट्रेक्‍टर से जुताई कराकर चने की बोनी करनी थी, और सिंचाई भी करानी थी। डीजल पंप तो उसके पास था, पर वह क्‍या सूखा चलता है ? उसकी टंकी में तेल तो चाहिए ही, सो उसका इंतजाम भी इसी राशी से करना था। जो उसे बड़ा ही मुश्‍किल जान पड़ रहा था। जान सांसत में थी। फिल्‍हाल अपने हाल को भगवान भरोसे छोड़कर गंगा ने रब्‍बी की फसल के लिए खेतों को हांकने की तैयारी शुरू कर दी।

दो बार हैरो चलवाकर खेत कामीदा बनाने के बाद उसने अगली सुबह ड्रिल मशीन से बीज डालने का मन बना लिया। घरवाली से वह सुबह ही कह आया था कि कुठीले से बीज निकालकर आंगन में फैलाकर जरा हवा खिला देना, सींड़ जाती रहेगी।

सांझ ढले घर में घुसा तो चौखट से उसका सिर फूटा। अशगुन ने उसे अंदेशे ने घेर लिया। आंगन में दीवार से मुंह छिपाये घर वाली रोने लगी थी। वह आसन्‍न संकट की दस्‍तक ठीक से समझ पाता इससे पहले ही बेटी ने बुरी खबर देकर माथा ठनका दिया, ''दद्‌दा, बीज के चने में तो घुन लग गओ..।''

गंगा ने झुककर मुट्‌ठी भर दाना उठाया। उसे हथेली पर फैलाया तो गंगा को जैसे सांप सूंघ गया, 'दाना बीज के काबिल का कतई नहीं रह गया था।' गंगा के घर मातम मना। किसी ने हलक में अन्‍न का दाना तक नहीं डाला। पानी पी-पीकर सूखी रात बमुश्‍किल गुजारी। गंगा से तो जैसे किस्‍मत ही रूठने लगी है।

साकेत अब एक जेनेटिक मोडीफाइड शीड बनाने वाली बहुराष्‍ट्रीय कंपनी की मार्केटिंग करने लगा था। उसे जब पता चला कि वह नकली खाद बनाने वाली कंपनी में काम कर रहा है और इस गोरख धंधे में पुलिस उसे भी आरोपी बना सकती है तो तत्‍काल उसने खुद को कंपनी से अलग कर लिया। लेकिन नई कंपनी में नकली खाद भी बड़ी मात्रा में बेचने का हुनर रखने का दावा कर उसने नई नौकरी जल्‍दी ही हासिल कर ली। अब उसकी सेलरी भी ज्‍यादा थी और कमीशन भी। यह कंपनी अनुवांशिक तौर पर विकसित किए गए बीजों का निर्माण कर वितरण करती थी। इन बीजों को खेत में डालने से उपज कई गुना बढ़ जाने की गारंटी कंपनी के दलाल जताते।

अगले ही दिन कंपनी के दो और साथियों के साथ चमचमाती ऐसी कार से साकेत गांव आ पहुंचा। उसने फिर मजमा लगाया। एक सुन्‍दर से बॉक्‍स में, सुन्‍दर से डिब्‍बों में बडे ही सुन्‍दर से बीज थे। मस्‍त और चिकने। चना-बीज की कई किस्‍में...। जो आज से पहले अटलपुर के किसानों ने न सुनी थीं, न देखी थीं।

गांव वालों ने जब नकली खाद की चर्चा उठाई तो साकेत ने बड़ी ही विनम्र साफगोई से सफाई दी, 'मुझे कतई जानकारी नहीं थी कि खाद नकली है। वरना मैं अपने ही गांव में नकली खाद बेचता ? अपने ही खेतों में नकली खाद डलवाता ? मेरे और आपके बीच कई सदियों पुराने ताल्‍लोकात हैं, क्‍या इन्‍हें जरा से नफा के लिये बलि चढ़ा देता....?'

सब शांत। संतुष्‍ट...। खुसुर-फुसुर हुई, 'नामी घर को लरका है, जान बूझ के थोरे ही नकली खाद बेचो होगो...? बाके संग भी धोकोई भओ होगो'। इन कानाफूसियों ने साकेत का धोखाधड़ी का दाग जैसे धो दिया। साकेत ने इलाके के पूरे चौदह गांवों में क्‍विंटलों चना और गेहूं का जेनेटिक मोडीफाइड बीज बेचा। गंगा ने भी दस बीघा जमीन बाबू बनिया के यहां गिरवी रखकर जरूरत के मुताबिक बीज खरीदा।

इलाके के किसानों के साथ फिर धोखा हुआ। उपज के जो दावे किए गए थे वे खरे नहीं उतरे। किसान फिर ठगे गए। गंगा बटाईदार भी ठगा गया। उस पर तो दोहरी मार पड़ी थी। दोनों ही फसलें चौपट। तिस पर भी बुरी तरह फंस चुका कर्ज के जंजाल में। महाराज के पूरे साठ हजार बकाया। बैंक का खाद कर्ज और बनिया के बीज की उधारी। गंगा को लगा तोते हाथ से उड़ चुके हैं। किसान की जिंदगी खेत-खलिहान के आसरे कटती है लेकिन अब खेत बचेंगे न खलिहान। प्राण बचे रहें यही बौत है ? खेत की बाबू बनिया को रजिस्‍ट्री कराकर ही उसे कर्जों से मुक्‍ति का एकमात्र रास्‍ता सूझता दिखाई दे रहा था।

----

प्रमोद भार्गव

पत्रकार

शाही निवास, शंकर कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन. 473551

फोन- 07492-404863, 233882

----

जीवन-परिचय

c

नाम ः प्रमोद भार्गव

पिता का नाम ः स्‍व. श्री नारायण प्रसाद भार्गव

जन्‍म दिनांक ः 15 अगस्‍त 1956

जन्‍म स्‍थान ः ग्राम अटलपुर, जिला-शिवपुरी (म. प्र.)

शिक्षा ः स्‍नात्‍कोत्तर (हिन्‍दी साहित्‍य)

रूचियां ः लेखन, पत्रकारिता, पर्यटन, पर्यावरण, वन्‍य जीवन तथा इतिहास एवं पुरातत्‍वीय विषयों के अध्‍ययन में

विशेष रूचि।

प्रकाशन ः प्‍यास भर पानी (उपन्‍यास), मुक्‍त होती

औरत, पहचाने हुए अजनबी, शपथ-पत्र एवं

लौटते हुए (कहानी संग्रह), शहीद बालक

(बाल उपन्‍यास) सोन चिरैया सफेद शेर,

चीता, संगाई, शर्मिला भालू, जंगल के

विचित्र जीव जंतु (वन्‍य जीवन) घट रहा है

पानी(जल समस्‍या) इन पुस्‍तकों के अलावा

हंस, समकालीन भारतीय साहित्‍य,वर्तमान

साहित्‍य, प्रेरणा, संवेद, सेतु, कथा परिकथा,

धर्मयुग, जनसत्ता, नवभारत टाइम्‍स,

हिन्‍दुस्‍तान राष्‍ट्रीय सहारा, नईदुनियां,

दैनिक भास्‍कर, दैनिक जागरण,

लोकमत समाचार, राजस्‍थान पत्रिका,

नवज्‍योति,पंजाब केसरी, दैनिक ट्रिब्‍यून,

रांची एक्‍सप्रेस, नवभारत, साप्‍ताहिक

हिन्‍दुस्‍तान, कादम्‍बिनी, सरिता, मुक्‍ता, सुमन

सौरभ, मेरी सहेली, मनोरमा, गृहशोभा, गृहलक्ष्‍मी, आदि पत्र पत्रिकाओं में

अनेक लेख एवं कहानियां प्रकाशित।

सम्‍मान ः 1. म.प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा वर्ष 2008

का बाल साहित्‍य के क्षेत्र में चंद्रप्रकाश

जायसवाल सम्‍मान। 2. ग्‍वालियर साहित्‍य अकादमी द्वारा

साहित्‍य एवं पत्रकारिता के लिए डॉ.

धर्मवीर भारती सम्‍मान।

3. भवभूति शोध संस्‍थान डबरा

(ग्‍वालियर) द्वारा ‘भवभूति अलंकरण'।

4. म.प्र. स्‍वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकरी

संगठन भोपाल द्वारा ‘सेवा सिंधु सम्‍मान'।

5. म.प्र. हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन,

इकाई-कोलारस (शिवपुरी) साहित्‍य एवं

पत्रकारिता के क्षेत्र में दीर्घकालिक सेवाओं

के लिए सम्‍मानित।

6. भार्गव ब्राह्मण समाज, ग्‍वालियर द्वारा

साहित्‍य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में

सम्‍मानित।

अनुभव ः जनसत्ता की शुरूआत से 2003 तक

शिवपुरी जिला संवाददाता।

नईदुनियां ग्‍वालियर में 1 वर्ष ब्‍यूरो प्रमुख,

शिवपुरी।

उत्तर साक्षरता अभियान में दो वर्ष निदेशक

के पद पर।

संप्रति ः जिला संवाददाता आज तक (टी.वी.

समाचार चैनल)

संपादक -शब्‍दिता संवाद सेवा, शिवपुरी

दूरभाष ः 07492-232008, 232007 मोबा.

09425488224

संपर्क ः शब्‍दार्थ, 49 श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.)

ई-मेल - PramodSVP997@rediffmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्रमोद भार्गव की कहानी : गंगा बटाईदार
प्रमोद भार्गव की कहानी : गंगा बटाईदार
http://lh4.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/S8qXwPZJKaI/AAAAAAAAHws/g6HrK7TADPc/clip_image002_thumb.jpg?imgmax=800
http://lh4.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/S8qXwPZJKaI/AAAAAAAAHws/g6HrK7TADPc/s72-c/clip_image002_thumb.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2010/04/blog-post_3230.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2010/04/blog-post_3230.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content