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प्रमोद भार्गव का आलेख - बीमारियों को महामारी में बदलने का खेल

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भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में साधारण बीमारियों को महामारी में बदलने का खेल चल रहा है। यह खेल बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनियां अरबों-खरबों क...

pramod bhargav

भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में साधारण बीमारियों को महामारी में बदलने का खेल चल रहा है। यह खेल बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनियां अरबों-खरबों का कारोबार करने के लिए खेल रही हैं। हाल ही में कुछ ऐसी जानकारियां सामने आई हैं जिनसे खुलासा हुआ है कि संक्रमण रोगों की रोकथाम के लिए पिछले ढाई दशक से चलाए जा रहे टीकाकरण कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि में निजी कंपनियों का यह मुनाफे से जुड़ा कारोबार है। जिस स्‍वाइन फ्‍लू को महामारी माना जाकर पिछले एक साल से पूरी दुनिया में हल्‍ला मचा हुआ है, उससे अब तक केवल 60 लोगों के मरने की पुख्‍ता खबर है। जबकि बीते साल अप्रैल में जेनेवा में आयोजित एक आपात बैठक में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की महानिदेशक माग्रेट चाम ने कहा था कि स्‍वाइन फ्‍लू के कारण पूरी मानवता खतरे में है। हमारे केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भारत की एक तिहाई आबादी को इस बीमारी की चपेट में बताते हुए देश के हरेक जिले के लिए दस हजार खुराक दवा खरीद ली थी। एड्‌स, पोलियो हेपेटाइटिस-बी, बर्ड फ्‍लू, एंथ्रेक्‍स जैसी अनेक बीमारियों को जीव जगत के लिए महामारी का सुनियोजित खतरा जताकर दवा कंपनियां और स्‍वास्‍थ्‍य अमला लाभ के धंधे में लगे हैं।

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की कार्यशैली पर अब सवाल उठने लगे हैं। हाल ही में दिल्‍ली में इस संगठन की संपन्‍न हुई एक बैठक में एक अधिकारी ने खुद यह सच्‍चाई कबूली कि स्‍वाइन फ्‌लू को विश्‍वव्‍यापी महामारी घोषित करने का जो काम विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने किया है, वह झूठा था। ऐसा केवल बड़ी व विश्‍वस्‍तर पर दवा का व्‍यापार करने वाली कंपनियों को लाभ पहुंचाने के नजरिये से किया गया। दरअसल इस बीमारी के जो विशेषज्ञ इसके उपचार के प्रति जवाबदेह होने चाहिए थे, वे इसे महामारी घोषित करने में लगे थे, क्‍योंकि उनके कुछ दवा कंपनियों से व्‍यावसायिक संबंध थे। स्‍वाइन फ्‌लू के विश्‍वव्‍यापी हल्‍ले के बाद अब इस तथ्‍य की पुष्‍टि हो गई है कि इस कथित महामारी से कुल साठ मौंते हुई हैं। अमेरिका में कुल 4298 स्‍वाइन फ्‌लू के रोगी सामने आए, जिनमें से केवल इकत्‍तीस मौंते हुईं। इस रोग के लक्षण पाए तमाम रोगियों को तो बुखार तक नहीं आया। जबकि विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की महानिदेशक मार्ग्रेट चान ने इसे दुनिया की मानवता के लिए खतरा बताया था। इस खौफ के ऐलान के बाद करीब बीस दिन मेक्‍सिको शहर का कारोबार ठप्‍प रहा। हमारे देश के केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री गुलाम नवी आजाद ने भी बीते साल अगस्‍त में चेतावनी दी थी किं भारत की एक तिहाई आबादी इस बीमारी की चपेट में है। मीडिया ने इस बयान को प्रचारित कर पूरे देश को एक काल्‍पनिक बीमारी से डरा दिया था।

भारत में विभिन्‍न बीमारियों के उन्‍मूलन के दृष्‍टिगत राष्‍टव्‍यापी अभियान विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की देख-रेख में चलाए जा रहे हैं। पोलियो के सिलसिले में दावा किया गया था कि 2005 तक पोलियो को निर्मूल कर दिया जाएगा। लेकिन बीस सालों में करीब छह अरब डॉलर खर्चने के बावजूद देश को पोलियो के संक्रमण से छुटकारा नहीं मिला। अब तक पूरी दुनिया में पोलियो की खुराक लेने के बावजूद पोलियो संक्रमण से प्रभावित दो हजार से भी ज्‍यादा मामले सामने आ चुके हैं। भारत के अकेले उत्‍तर प्रदेश में 2005 में एक साथ 66 मामले सामने आए थे। बाद में इनकी संख्‍या बढ़कर 380 तक पहुंच गई थी।

इसी दौरान इस जानकारी की पुष्‍टि हुई थी कि देश के 12 राज्‍यों के 87 जिले पोलियो के बीषाणुओं से ग्रसित हैं। इससे मुक्‍ति के उपायों को तलाशने की बजाय नई अवधारणा गढ़ी गई कि वीषाणु की प्रकृति पर नियंत्रण के लिए तकरीबन 10 खुराक दवा पिलाई जाए। लिहाजा अब पांच साल की उम्र तक के बच्‍चों को दवा पिलाने का अनवरत सिलसिला शुरु हो गया। जबकि जरुरत यह थी कि दवा पिलाने के बाद पोलियो के मामले क्‍यों सामने आ रहे हैं इसकी जड़ों को खंगाला जाए। क्‍योंकि इसी समय पोलियो की दवा बिवकॉल के सिलसिले में इसकी गुणवत्‍ता को लेकर सवाल उठाए गए थे। पोलियो वेक्‍सीन में पंजाब में कीड़े तक पाए गए थे। पंजाब सरकार की चिट्‌ठी के जवाब में केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने 24 अप्रैल 2006 के पत्र में हवाला भी दिया था कि बिवकॉल नामक दवा में कीड़े हैं इसलिए उंची गुणवत्‍ता की दवा तैयार कराकर पोलियों की खुराक पिलाई जाए। दवा में कीड़े पाने की असलियत सामने आती इससे पहले बुलंदशहर में दवा का निर्माण कर रही इस कंपनी के दवा नमूनों को ही बदल दिया गया। दिल्‍ली के ओखला क्षेत्र में पेनेशिया नाम की कंपनी भी पोलियो भी दवा बनाने का काम करती है। इन दवा निर्माण कंपनियों के साथ शर्त जुड़ी होती है कि इनके संयंत्र ऐसे क्षेत्रों में लगे हों जहां दो किलोमीटर के दायरे में अन्‍य कोई निर्माण न हो, जिससे इसके विषाणु न पनपें। लेकिन दोनों ही कंपनियों के संयंत्र मानव बस्‍तियों के बीच स्‍थापित हैं। बहरहाल स्‍तरहीन दवा का निर्माण और उसकी खुराक की खपत का सिलसिला जारी हैं।

दरअसल हमारे देश में ऐसी नीतियां अमल में लाई जा रही हैं जो स्‍तरहीन दवा उद्योग को प्रोत्‍साहित करने वाली हैं। इस ऐवज में पिछले कुछ सालों के भीतर भारत सरकार की उन दवा कंपनियों को भी हतोत्‍साहित करने की कोशिश की गई जो पोलियो व अन्‍य महामारियों के उचित गुणवत्‍ता वाले सस्‍ते टीके तैयार करती हैं। इन कंपनियों को बंद कर देने तक की साजिश रची गई। लेकिन कंपनियों में सेवारत कर्मचारियों और संसद में हल्‍ला मचने पर कंपनियों की तालाबंदी रोकी गई। अलबत्‍ता इतना जरुर किया गया कि सरकारी दवा निर्माण कंपनियों में उन टीकों का उत्‍पादन बंद कर दिया गया जिनकी खपत टीकाकरण मुहिम के अंतर्गत देशव्‍यापी होती थी। इसके बाद निजी क्षेत्र की कंपनियों को लाभ पहुंचाने के नजरिये से पांच महामारियों का एक टीका पेंटावेंलेंट बनाने की योजना भी बनाई गई। हालांकि विरोध के चलते अभी इस योजना पर भी अमल संभव नहीं हो सका।

स्‍वाइन फ्‌लू, पोलियो, एड्‌स,, एंथे्रक्‍स और हेपेटाइटिस बी की तुलना में तपेदिक मसलन टीबी एक ऐसी जानलेवा बीमारी है, जिसके प्रभाव से करीब 17 लाख लोग हर साल मारे जाते हैं। टीबी के जीवाणु माइक्रो बैक्‍टीरियम ट्‌यूबरक्‍लोसिस के संक्रमण से ग्रस्‍त करीब एक लाख महिलाओं को उनके पति छोड़ देते हैं। केन्‍द्र सरकार भी इस पर काबू के लिए करीब तीन सौ करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च करती है। इसके बावजूद इस वास्‍तविक बीमारी पर रोकथाम के उचित उपायों की बजाय उन काल्‍पनिक बीमारियों को महामारियों में तब्‍दील करने का हौवा खड़ा करते रहते हैं, जिनसे तपेदिक के मुकाबले बहुत ही कम लोग काल कवलित होते हैं। हालांकि अब भारतीय वैज्ञानिकों ने एमटीबी के जीनोम की पहचान कर उन सभी चार हजार कोशिकाओं को चिन्‍हित कर लिया है जो इसकी जड़ में हैं। अब तक केवल एक हजार कोशिकाओं की ही वैज्ञानिकों को जानकारी थी। इस नए अनुसंधान से यह उम्‍मीद जगी है जब दवा क्षेत्र में चल रहे मुनाफे के कारोबार से तपेदिक की दवाओं का निर्माण और उपचार को अलग रखा जाएगा। लेकिन बीमारियों को काल्‍पनिक महामारी बना देने की मुहिम से देश को कैसे छुटकारा मिले, यह सवाल बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के मजबूत वर्चस्‍व के चलते यथावत है।

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. इस देश में जब तक ,देश भर से इमानदार लोगों को ढूंढ़ कर सामाजिक जाँच में लगाकर हर सरकारी निति ,खर्चों,घोटालों की सामाजिक जाँच नहीं करायी जाने लगेगी तबतक इस देश की व्यवस्था में सुधर नहीं होने वाला / आपके इस बिचारोत्तेजक रचना के लिए आपका धन्यवाद / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /

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  2. honesty project democracy ji ki baat ne prabhavit kiya
    acchi jaankari di aapne

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: प्रमोद भार्गव का आलेख - बीमारियों को महामारी में बदलने का खेल
प्रमोद भार्गव का आलेख - बीमारियों को महामारी में बदलने का खेल
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