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और नन्हीं सी जान बच गई फैजाबाद जिले में श्री अयोध्या जी नाम की एक नगरी है जो भगवान श्री रामचंद्र जी की जन्म भूमि होने से रामायण और हिंदुओं...

और नन्हीं सी जान बच गई

फैजाबाद जिले में श्री अयोध्या जी नाम की एक नगरी है जो भगवान श्री रामचंद्र जी की जन्म भूमि होने से रामायण और हिंदुओं के धार्मिक

ग्रंथों में बहुत मशहूर है ! यहीं से पवित्र सरयू नदी बहती है जिसका उल्लेख पुराणो में भी मिलता है ! कही साल पहले इस घाट के किनारे एक निर्धन पर विद्वान ब्राह्मण अपनी एक मात्र पुत्री व पत्नी के साथ रहता था ! ब्राह्मण का नाम ब्रह्म दत था ! वह गाँव गाँव में पूजा पाठ करके जो कुछ भी कमा लेता था उसी से अपने परिवार का पालन पोषण करता था ! पत्नी का नाम सुदक्षिणा था ! बड़ी सुशील, संतोषी, नम्र, मृदु भाषी और पतिव्रता थी ! घर को रौनक करने वाली एक छोटी सी गुड़िया थी जिसका नाम था चंद्र कला ! बड़ी सुंदर चुलबली सी थी ये चंद्र कला ! अपनी कलाओं से घर और घर के बाहर पूरे गाँव में हलचल मचा देती थी, रोने वालों को हंसा देती थी, वृद्ध असहाय लोगों मदद कर देती थी ! खुद हसंती थी औरों को भी हंसाती थी ! अभी उम्र केवल 7 साल की थी लेकिन काम किसी बड़ी होशियार लड़की जैसे करती थी ! पूरे गाँव की जान थी ये नन्हीं सी बालिका ! इसका ननिहाल सरयू के उस पार था ! नानी नाना - मामी मामा उसे बहुत चाहते थे इसलिए हर दूसरे तीसरे महीने वह नाव से अपने ननिहाल जाती थी ! इस बार भी ननिहाल से बुलावा आया और ये नन्नी गुड़िया अपनी माँ के साथ जाने के लिए तैयार हो गई ! बरसात के दिन थे, नदी में पानी बढ़ गया था, बारिश नहीं थी लेकिन हवाएँ चल रही थी ! नाव में काफ़ी लोग सवार थे, सभी को जल्दी थी पार जाने की, किसी प्रकार माँ बेटी भी नाव में सवार हो गये ! नदी का कलरव, हल्की ठंडी हवाएँ, नाव में बैठे लोगों के दिलों में एक उल्लास सा भर रहा था और उनके मुँह से संगीत के मधुर मधुर स्वर वातावरण में तैरने लगे ! सारे नाव के यात्री मस्त होकर गाने लगे ! चंद्र कला अपनी माँ के नज़दीक ही बैठी दोनों पाँवों को नाव से बाहर निकाल कर नदी के जल में छप छप करके बोटिंग का आनंद ले रही थी की अचानक एक मगर मच्छ कहीं से आया और उसने उस नन्हीं सी जान का पाँव अपने मजबूत जबड़े में ले लिया ! सारी नांव ज़ोर ज़ोर से हिलने लगी, लोगों में दहशत पैदा हो गई, अचानक ये क्या हो गया ! बचाने का कोई उपाय नहीं था ! उसकी माँ ने उसे मजबूती से पकड़ लिया था ! सारे लोग उसकी माँ को कहने लगे की छोड़ दो इस लड़की को नहीं तो कोई नहीं बचेगा ! माँ बेचारी ज़ोर ज़ोर से रो रही थी, वह कैसे छोड़ दे अपने जिगर के टुकड़े को मौत के मुँह में ! जब लोग ज़्यादा ही ज़ोर ज़बरदस्ती करने लगे तो उन लोगों के बीच में से एक 24 - 25 साल का नव जवान उठा जो अभी तक चुप चाप बैठा यह सब कुछ देख रहा था और उस लड़की के नज़दीक आकर बोला "नहीं लड़की को मत छोड़ना, यह तो हमारे गाँव की जान है, अगर यही चली जाएगी तो पूरा गाँव नीरस हो जाएगा," इतना कहते हुए उसने सबसे कहा "नाव को मजबूती से पकड़े रखो" ! उसके पास एक बड़ा डंडा था जिसके अगले भाग में बरछी जैसी नुकीली लोहे की नोक लगी थी ! उसने डंडा लेकर वह नुकीला सिरा उस विशाल काय मगर मच्छ की आँख में दे मारा ! मगर मच्छ ने दर्द के मारे लड़की का पाँव छोड़ दिया और बड़ी भयंकर आवाज़ करता हुआ नदी की विशाल जल राशी में खो हो गया ! नाव के सारे लोगों ने उस युवक को कंधे में उठा लिया ! भगवान को लाख लाख धन्यवाद दिया ! नाव कुशल पूर्वक नदी के पार पहुँच गयी ! लड़की को नई जिंदगी मिल गई !

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ये है किस्मत अपनी अपनी

ये है किस्मत अपनी अपनी, कौन कहाँ रह जाए !

कोई गाँव का गाँव में रहता कोई शहर आ जाए !

शहर में आके कोई कोई भाग्य अपना चमकाए,

कुछ ऐसे बदकिस्मत होते लेबर ही बन पाते !

कोई पढ़ लिखकर भी निपट गँवार कहलाता,

गाँव का अनपढ़ नेता बन कर फिर सांसद बन जाता !

इक भँवरा फूलों से खेले, एक काँटों में फँस जाए !

ये है किस्मत अपनी अपनी कौन कहाँ रह जाए !

एक जीवन का दाव जीतकर और ऊँचा उठ जाता,

एक उठ उठ कर भी गिर जाता फिर न उठने पाता !

एक अपने कर्मों के बल पर है साम्राज्य बनाता,

एक अपने दुष्कर्मों से ही अपना महल गिराता !

एक मुसाफिर राह भटक कर मंज़िल पहुँच न पाए,

ये है किस्मत अपनी अपनी कौन कहाँ रह जाए !

कोई सोते सोते ही स्वप्नों का नगर बसाता,

कोई अपनी मेहनत के बल वायुयान चलाता !

कोई काँटों भरे राह पर पैदल पैदल चलता,

कोई मखमली गद्दों पर रईस बनकर पलता !

कोई करोड़ों से है खेले कोई भूखा सो जाए,

ये है किस्मत अपनी अपनी कौन कहाँ रह जाए !

कोई किसी का धन लूट के धन कुबेर बन जाता,

कोई बिना अपराध के भी पुलिस की गोली खाता !

कभी कभी तो पोंगा पंडित बड़ा ही नाम कमाता,

कोई विद्वान होने पर भी दर दर ठोकर खाता !

ये कैसे प्रभु की माया, क्या क्या रंग दिखाए,

ये है किस्मत अपनी अपनी कौन कहाँ रह जाए !!

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जो जैसा करता है वैसा ही पाता है

राम दीन नाम का एक किसान था ! वह बहुत ही ईमानदार, मेहनती, भगवान को मानने वाला था ! उसकी पत्नी कंचन देवी भी बड़ी सीधी सादीपति की अनुगामी, कृष्ण भगवान की अनन्य भक्त थी ! सच्चे ईमानदार ईश्वर को मानने वालों का मददगार स्वयं वह अंतर्यामी होता है ! ज़मीन बाप दादों ने काफ़ी जोड़ रखी थी, समय पर बारिश हो जाती थी तो फसल भी अच्छी हो जाती थी ! वे संतोषी जीव थे, दुख सुख भगवान का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेते थे और सदा मुस्कराते रहते थे ! आम का एक शानदार बगीचा था, जो मौसम में खूब आम देता था, पूरा परिवार भी खाता था, खेतों में काम करने वाले मजदूर उनके बच्चे भी इन रसीले आमों का भरपूर मज़ा लेते थे ! बाकी बाजार में बिक्री के लिए भेजे जाते थे, इस तरह घर का खर्चा निकल जाता था ! यहाँ पर यह लोकोक्ति चरितार्थ होती है की किसान उस आम के बगीचे से फ़ायदा उठाता था, "आम के आम और गुठली के दाम", ! उसके दो लड़के थे, अजय और विजय ! बड़ा अजय अपने पिता जी के नक्श कदमों पर चलता था ! दोनों भाइयों ने स्नातक (बी ए) की डिग्री पास कर दी थी, तथा कृषि विज्ञान में डिप्लोमा ले रखा था ! दोनों लड़के जवान हो चुके थे और दोनो ही नयी नयी तकनीकी तरीके अपना कर वैज्ञानिक ढंग से खेती करना चाहते थे ! जहाँ बड़ा भाई, शांत स्वभाव, मृदु भाषी, सामाजिक कार्यों में सहयोग देने वाला था, वहीं दूसरा भाई विजय अक्खड़ स्वभाव का, झगड़ालू, लालची और स्वार्थी था ! पिता ने धीरे धीरे अपनी ज़िम्मेदारियाँ बड़े लड़के के कंधों पर डालनी शुरू करदी ! विजय घूमने घामने और गाँव के अनपढ़, असामाजिक कार्यों में लिप्त आवारा लड़कों की संगत में समय गँवाता था ! अब उसके व्यवहार में काफ़ी परिवर्तन आ गया था ! माँ बाप से भी वह सीधी मुँह बातें नहीं करता था ! घर के काम काज से दिल चुराता था ! बड़े लड़के की पत्नी सारदा बड़ी धर्म परायण पति को परमेश्वर मानने वाली, पढ़ी लिखी सद गुण सम्पन्न थी, वहीं छोटी बहू घमंडी, लालची और स्वावलंबी थी ! वह खुद काम चोर थी परंतु दूसरे कामों में भी नुकता चीनी करती थी ! सास ससुर का आदर तो दूर की बात उन्हें रोज सबेरे सबेरे खरी खोटी सुनाया करती थी तभी उसके दिल को चैन मिलता था और पूरा दिन मज़े से गुजरता था ! घर में हर समय क्लेश और अशान्ति रहने लगी ! बूढ़े बुढ़िया का स्वास्थ्य खराब रहने लगा और एक दिन दोनो ने इस संसार से कूच कर दिया और अंतरिक्ष में समा गए ! दोनों के जाने के बाद घर चूल्हा बरतन भांडे अलग अलग हो गये !

बड़ा लड़का सुबह खेतों में चला जाता मजदूरों से काम करवाता और ज़मीन से सोना उगवाता ! उसकी गाड़ी पटरी पर चल पड़ी ! गाँव में उसकी तारीफ़ होने लगी, उसकी योग्यता और खेतों संबंधी उसके तजुर्बे के कारण गाँव वालों ने उसे सर पॅंच बना दिया ! धीरे धीरे उसकी योग्यता और शालीन शांत व्यक्तित्व के कारण कही अन्य गावों में उसकी चर्चा होने लगी ! छोटा भाई सुबह ही यार दोस्तों के साथ मौज मस्ती करने चला जाता, मटरगस्ती करता और शाम को शराब के नशे में घर आकर बीबी से लड़ाई करता ! एक दिन तंग आकर उसकी बीबी अपने मायके चली गई ! खेत बंजर हो गये ! घर के भांडे बरतन बिक गये और धीरे धीरे खेत भी बिकने लगा ! जब बड़े भाई को इसकी भनक पड़ी उसने ज़मीन के नाम पर विजय को पूरे पचास लाख रुपए दे दिए ! विजय ने उन पचास लाख रुपयों से चोर डाकू लुटेरों से मिलकर ख़तरनाक हथियार और गोला बारूद खरीद कर अपने मकान के तहख़ाने में छिपा दिए ! उधर उसके ससुराल वालों ने उसके ऊपर अपनी पत्नी के ऊपर अत्याचार और जुल्मों के लिए केस कर दिया ! इससे क्रोधित होकर एक दिन अपने डकैत दोस्तों के साथ वह अपनी ससुराल गया और चाकू और बंदूक की नोक पर ससुराल वालों को डरा धमाका कर उसके विरुद्ध लगाए गए केस को कोर्ट से वापिस करवा लिया ! अब उसने मानवता से नाते रिश्ते सारे तोड़ दिए ! रात के अंधेरे में गाँव के आवारा, बेकार, पथ भ्रष्ट लड़कों के साथ मिलकर राहगीरों, मुसाफिरों को लूटना, उन्हें घायल कर देना और लूट के माल में से आधा अपने पास रख कर बाकी सभी में बाँट देता था ! इसने अपना गंग बना लिया और स्वयं गंग लीडर बन गया ! अब ये लोग लंबे हाथ सॉफ करने लगे ! रात को पड़ोसी गाँव के ज़मींदार के घर डकैती डाल दी, ज़मीदार के दो गार्डों को मार दिया और दो को घायल करके उसे तहख़ाने की कुंजी लेकर तहख़ाने से लाखों की पूंजी ले उड़े ! सुबह पुलिस आ गई, पुलिस अपने जासूसी कुत्तों की सहायता से विजय के मकान की ओर आ गये और अचानक छापा मार कर लूटी हुई रकम को अपने कब्ज़े में कर दिया ! दो गैंग के सदस्य पकड़े गये, विजय अन्य डकैतों के साथ भागने में कामयाब हो गया ! वह तो भाग गया लेकिन पुलिस को भेद मिल गया ! पुलिस ने उसके भाई को पूछ ताछ के लिए थाना बुला लिया ! यद्यपि थाने से जल्दी ही जान छूट गयी पर उसके सम्मान पर तो संदेह का दाग लग गया ! अब तो वह और बड़ी बड़ी डकैती डालने लगा यहाँ तक की अपने बड़े भाई के खड़ी फसलों को आग के हवाले करने लगा, तथा घर में डकैती डालने लगा ! अब बड़े भाई अपनी सज्जनता और मानवता पर पछताने लगे ! अगर उन्होंने ५० लाख रुपये अपने छोटे भाई को नहीं दिए होते तो उसे यह दिन नहीं देखना पड़ता ! न पुलिस थाने में जाकर किरकिरी होती ना खड़ी फसल बरबाद होती ! लेकिन अजय तो मेहनती था, इन घटनाओं से विचलित होने वाला नहीं था, उसने फिर अपना खोया रतवा वापिस ले लिया ! वह तो गाँव गलियों में और भी लोक प्रिय हो गया, लेकिन विजय डकैत बन कर कही मासूम ज़िंदगियों को हलाल करता रहा ! पुलिस शिकारी कुत्तों के साथ उसको ढूँढने में लग गयी ! अब वह भाग ने लगा और पुलिस उसके पीछे ! उसका गैंग अब भूखों मरने लगा, कुछ ने खुद कसी कर दीकुछ पकड़े गये और एक दिन विजय भी पुलिस के हत्ते चढ़ गया ! उसके साथ उसका पूरा गैंग पकड़ा गया ! उसमें कुछ पुलिस के मुखबिर बन गये और बाकियों को फाँसी की सज़ा हो गई ! उसके भाई अजय ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह कामयाब नहीं हुआ और विजय को फाँसी की सज़ा हुई ! अपनी आख़िरी इच्छा के बाबत उसने कहा, भय्या ने मुझे पचास लाख रुपये देते यह भी नहीं सोचा की हिन्दुस्तान ने भी तो पाकिस्तान को बड़े भाई का फर्ज़ निभाने के ऐवज में उसे पचास करोड़ रुपये दिए, उसने क्या किया वही मैंने भी किया ! रुपया की जगह उन्होंने मुझे सुधारने की कोशिश की होती तो आज यह दिन न आता ! आख़िरी वक्त में मैं अपने सज्जन भाई से मिलना चाहता हूँ ! उनकी चरण राज अपने माथे पर लगाना चाहता हूँ ! उसकी आख़िरी इच्छा का आदर किया गया और बड़े भाई ने उसे पहली और आख़िरी बार अपने आलिंगन पास में बाँध दिया. दोनों की आँखों से अविरल गति से आँसुओं का सैलाब निकल रहा था ! वहाँ खड़े तमाम क़ानूनविद, पुलिस अधिकारी और यहाँ तक फाँसी देने वाले की भी आँखें नम हो गयी

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वे चले गये

वे चले गए बिना कुछ कहे,

की तुम क्या करोगे, जब हम न रहें ?

माता पिता पत्नी पुत्र दरवाजे पर कान लगाए हैं,

की कब घंटी बजेगी और हमारा बेटा आएगा,

हमने शत्रु को मार गिराया आके हमें बताएगा !

पूरी रात बीत गई उनका लाड़ला नहीं आया,

तिरंगे में लिपटी एक गाड़ी उसकी अर्थी लाया !

हत्यारे थे माओवादी, गद्दारों ने सैनिक मारा,

क्यों न जालिम नेताओं को जाकर तुमने ललकारा ?

माता पिता की सूनी आँखें अंतरिक्ष को देख रहे हैं,

"कितना निष्ठुर है रे तू"

मनमोहन नहीं श्री कृष्ण से कहा !

पत्नी का सुहाग उजड़ गया, बच्चा बाप बिहीन हुआ,

आत्मा की शान्ति के लिए, सारी बिरादरी करती दुवा !

ये किस्सा सैनिक परिवारों का, जो नक्सलियों ने मारे हैं,

थे यमदूत गद्दारों के भारत माँ के प्यारे हैं !

नमन करो देश वासियों उनकी कुरबानी रंग लाएगी,

नष्ट हो जाएँगे दुष्ट दरिंदे फिर भारत माँ मुस्कराएगी !

दिया है अपना आज देश को, कल यहाँ खुशहाली हो,

आएँगे भी फिर सुभाष भगतसिंह हरी भरी हर डाली हो !

नयी संसद, नये नेता नया बसंत फिर आएगा,

देश का बच्चा बच्चा जालिम को ये संदेश भिजवाएगा,

"सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,

देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है!"

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा ! (भगतसिंह)

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वह कौन थी

घनी अंधेरी रात, आसमान घन्ने बादलों से ढका था, कभी दिल दहलाने वाली बिजली कड़क रही थी ! पहाड़ी रास्ता उबड़ खाबड़, करीब दो मील का घना जंगल ! एक तरफ उँची खड़ी चट्टान और दूसरी ओर गहरी घाटी .! घाटी में चस्मा बड़े बेग से भयंकर आवाज़ करते हुए बह रहा

था ! जरा सी भी असावधानी हुई की २००० हज़ार फीट गहरी खाई तक जाने में कोई रुकावट नहीं थी ! हाथ में टार्च भी नहीं था ! दर असल उन दिनों मेरी पोस्टिंग कारगिल में थी ! बड़ी मसकत करने के बाद एक महीने की छूटी मिली थी और मुझे घर जाने की जल्दी थी, कारण एक बहूत ही निकट तम दोस्त की शादी में शामिल होना था ! यह नज़दीकी दोस्त कमल किशोर था ! हम दोनों साथ ही पढ़े और साथ साथ ही हम दोनों ने एक ही दिन अपना कैरियर सेना में भरती शुरू किया ! वैसे हम दोनों एक ही भरती दफ़्तर में भरती हुए थे लेकिन रेजीमेंट अलग अलग मिल गई ! वह सिगनल में और मैं इन्फैट्री में चला गया ! अलग अलग होने के बावजूद हम एक दूसरे को पत्र व्यवहार करते रहते थे ! वह मेरी शादी में आया था और मुझे भी किसी भी कीमत पर उसकी शादी में सामिल होना था !

जम्मू से कोटद्वार तो गाड़ी समय पर आगई थी, कोटद्वार में कुछ पुराने साथी मिल गये, घर के लिए सामान खरीदा, इस तरह काफ़ी देर हो गई ! शाम पाँच बजे की बस मिली, उसने सात बजे हमारे गाँव के अड्डे पर पहुँचा दिया ! इस समय सूरज छिप चुका था, रात की चादर बिछने लगी थी ! यहाँ से मेरा गाँव तीन मील उतराई पर पड़ता था ! दो मील का घना जंगल ! यहाँ के गाँव वालों ने मुझे रोकने की भी कोशिश की लेकिन मेरी तो धून थी की किसी भी तरीके से गाँव पहुँचना है ! जैसे जैसे मैं जंगल में उतरने लगा अंधेरा ज़्यादा घना होने लगा ! आसमान में बादल, ऊल्लू की बड़ी कर्कश आवाज़, जगन में पेड़ों पर चढ़े बंदर लंगूर भयानक आवाज़ करते हुए जंगली जानवरों, हिरण काक्ड, सूवर और अन्यों को चेतावनी दे रहे थे की आस पास में कहीं हिंसक बाघ है और वह कहीं भी धावा बोल सकता है ! ऐसे डरावने माहौल में कोई कितना भी निडर आदमी हो, उसका दिल भी दहल सकता था ! फिर मैं, सही कहूँ डर मैं भी गया था, लेकिन "मैं एक फ़ौजी सैनिक हूँ, " मेरे आत्म विश्वास को बल दे रहा था ! कुछ दूर तो मैं बिना किसी परेशानी के चलता रहा, लेकिन फिर अचानक घूप अंधेरा हो गया और मुझे कुछ भी नहीं दिखाई दिया ! ऐसी हालत में मेरा एक भी कदम फिसल सकता था और आगे क्या होगा, सोच सोच कर दिल बैठने लगा ! मैं एक विशाल शिला का सहारा लेकर बैठ गया ! सोचने लगा की अगर ये कालिमा ऐसे ही रहेगी और कहीं बारिश ने अपना रंग दिखा दिया तो फिर क्या होगा ! अचानक मेरे आगे एक सफेद साड़ी में लिपटी हुई कोई छाया नज़र आई ! वह बड़ी तेज़ी से आगे आगे जा रही थी और मैं, "बहते को तिनके का सहारा" यंत्रवत उसके पीछे पीछे चलने लगा ! ना उसने पलट कर पीछे देखा और न मैंने ही उसे कोई बात की ! हम दोनों मौन जंगली उबड़ खाबड़ रास्तों को पार करते जा रहे थे ! कब दो मील का जंगली रास्ता तय हो गया पता भी नहीं चला ! मेरी गाँव की सरहद शुरू हो चुकी थी ! आगे का रास्ता साफ सुथरा था ! आसमान के बादल भी छँटने लगे थे ! कभी कभी चाँदनी भी बादलों से निकल कर मेरे जैसे भूले भटकों को रास्ता दिखाने लगी ! आगे देखा वह सफेद साड़ी में लिपटी हुई छाया गायब हो चुकी थी ! मैंने चारों ओर नज़र दौड़ाई लेकिन वह कहीं नज़र नहीं आई ! मैं तो सकुशल घर पंहुच गया , लेकिन मैं आज भी अपने से यह सवाल पूछ रहा हूँ की वह कौन थी जिसने मुझे उस जंगल से बाहर निकालने में मदद की और बिना एक शब्द कहे गायब हो गई !

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टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. Kahani, aalekh aur kavitayen sabhi ek saath padhene ko mili bahut achha laga......
    Bahut shubhkamnayne

    जवाब देंहटाएं
  2. rawatji aapki kahani ewam kawitayen kafi dilchasp aur prernadayak hain dhanyawad.likhte rahiye isse manoranjan ke sath Gyan bhi badhta hai.
    ashok kumar dubey

    जवाब देंहटाएं
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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: हरेन्द्रसिंह रावत की रचनाएँ
हरेन्द्रसिंह रावत की रचनाएँ
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