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राकेश मालवीय का व्यंग्य : हां, मैं गधा हूं

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  मेरे प्रिय साले, सालियों गधे जीजाजी का नमस्कार स्वीकार करें। मैं आप सभी का आभारी हूं जो आप (मनुष्य जाति के लोगों ने) मुझ गधे को अपन...

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मेरे प्रिय साले, सालियों

गधे जीजाजी का नमस्कार स्वीकार करें।

मैं आप सभी का आभारी हूं जो आप (मनुष्य जाति के लोगों ने) मुझ गधे को अपना दामाद बनाना स्वीकार किया। जैसे कि सुधीजन पिछले कई दिनों से मेरी असली सूरत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, तो आपकी निरंतर कोशिशों का ही परिणाम है कि अब मैं अपनी हैसियत, असलियत जान गया हूं, हां मैं अब खुद को गदर्भराज समझने लगा हूं। दरअसल आप सभी बुद्धिमान, चतुरसुजान और मेधावी साले-साली ही इस मर्म को जान सकते हैं कि समाज में जीजा नाम के प्राणी की क्या बखत होती है। जीजा खुद को कितना ही महान समझता रहे पर उसकी इज्जत दो कौडी से ज्यादा की नहीं होती है। यह केवल इसी रिश्ते में संभव है कि जब मन किया दुलत्ती लगा दो। और बाद में बिगड़ा चौखटा देखकर बत्तीसी निकालकर हंसते रहो। ख्यात साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी उपन्यास में उल्लिखित सड़क पर पडी कुतिया की तुलना पहले कई चीजों से होती रही है। मैं यह कहता हूं कि जीजा भी ससुराल में पड़ा वह कुत्ता है जिसे जब चाहे, जो कोई चाहे, जैसा चाहे दो लातें चेंप सकता है।

इस निष्कर्ष पर मैं यू ही नहीं पहुंच गया। इसके पीछे लंबे अनुभवों का कारवां है। मुझे याद है वह दिन साली साहिबा जब मैं सारे कामकाज छोड़कर आपको लेने के लिए बस स्टैंड पहुंच गया था। भोला था, आपकी जादू भरी आवाज के आगे दिमाग काम करना बंद कर देता है, और आप इसी का बखूबी इस्तेमाल करना जानती भी हैं। अपनी माताजी और बहन को साथ लेकर हमसे मिलने और हालचाल जानने के लिए आप कितने शिद्दत के साथ आई थीं। एक पल को तो भरोसा ही नहीं हुआ, आखिर दो दिन पहले ही तो आपसे मिलकर लौटे थे हम। पर इसलिए कि आपको कोई परेशानी नहीं हो, हम अपने सभी काम को ऑफिस की खूंटी में टांगकर दौड़े-दौड़े चले आए। अपने परिचित ऑटो वाले को भी रास्ते से फोन करके पहुंचने के लिए ताकीद कर दिया। आश्चर्य आप क्या, आपकी छाया भी वहां दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी। जब आपकी तलाश करते-करते आंखें थक गईं तो फोन किया, आपने तो रिसीव किया नहीं, जब आपकी माताजी से बात हुई तो उन्होंने बताया कि वह तो साली हैं, और आज रंगपंचमी हैं तो मजाक कर रही थीं। जय हो ऐसे मजाक की और माताजी की भी। कब मजाक करना है, बड़े अच्छे से समझा रखा है। मैं उम्मीद कर रहा था, कि आपको इस बात के लिए जरूर ताकीद किया जाएगा, पर मैं भूल गया था कि गधों की हैसियत समाज में है ही क्या। या यूं भी कहें तब तक मुझे अपने गधेपने का पूरा-पूरा अहसास नहीं हो पाया था। खैर इस समाज में गधे की थोड़ी बहुत प्रतिष्ठा बची रहे इसलिए ऑटो वाले की जुबान भी कुछ रूपए देकर बंद कर दी और अब दूसरा ऑटो वाला खोजना शुरू कर दिया ताकि उसके सामने दोबारा नहीं जाना पड़े। बहुत धन्यवाद आपको।

शादी से पहले कभी सोचा नहीं था कि भाई यह भी करना पड़ेगा। पर ठीक है दो चार दिन में हमने इस प्रहसन को जैसे-तैसे मेमोरी से रगड़-रगड़कर साफ किया बावजूद इसके आपके मुंह से सॉरी सुनने को तरस गए। ठीक है भाई गदर्भराज को सॉरी सुनने की इच्छा रखना यानी दिन में ख्वाब देखना सरीखा मामला है।

जीवन जैसे-तैसे फिर पटरी पर आने लगा था और हम गधत्व से मनुष्यत्व की ओर बढ़ रहे थे कि एक दिन फिर अचानक आपका मन फिर कुलबुलाया और आपने अपने गधाजी मतलब जीजाजी को छेड़ने का मन बना लिया। जीजा-साली अधिनियम के सेक्शन टू बी में अंर्तनिहित अपने अभिव्यक्ति और मजाक का अधिकार करते हुए आपने हमें शॉर्ट मैसेज भेजा। इसमें बाकायदा आपने अपनी कल्पनाशक्ति का प्रयोग करते हुए हमारी सूरत उकेरी थी। इस तस्वीर को देखने के बाद हम अपनी औकात समझ गए। हम यह भी समझ गए कि आपकी बड़ी दीदी यानी हमारी प्रिय पत्नीजी की बातों का भी आप पर कोई असर नहीं होने वाला है। हमने चाहा कि इन सब बातों से हम पिताश्री को अवगत करा दें, लेकिन यही सोचकर कि शायद आपको डांटा हमने यह एक्शन लेना उचित नहीं समझा। इसके बावजूद आप आज तक हमें जब चाहे दुलत्तियां मारते आ रहे हैं,

हालांकि दुलत्तियां मारना हम गधों का मौलिक अधिकार है, लेकिन भूमंडलीकरण और ग्लोबलाइजेशन के दौर में जब संचार क्रांति अपने चरम की तरफ बढ़ रही है तब सांस्कृतिक साम्यवाद और तादात्म्य स्थापित होने से इंकार नहीं किया जा सकता।

इस पूरे दौर में जो है वह नहीं है और जो नहीं है वह है की बात को भी समझा जाना चाहिए। मतलब गधे के भेष में मनुष्य भी हो सकते हैं और मनुष्य के भेष में गधे भी। खैर आप जैसे मनुष्य शिरोमणि लोग कहां इन बातों को समझ पाएंगे। इन अनुभवों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर भी पहुंच गए हैं कि जीजा नाम के असामाजिक प्राणी को ससुराल में सम्मान पाने की इच्छा बिलकुल भी नहीं रखनी चाहिए।

पर आपको बता दें कि गधा एक ईमानदार प्राणी है। उसके अंदर मालिक और अपने लोगों के प्रति जैसी निश्छलता, सेवा और मेहनत का भाव होता है वह दूसरे प्राणियों में दूर-दूर तक नजर नहीं आता है। उस बेचारे पर कितना ही बोझ लाद दिया जाए कभी मना नहीं करता। वह भूखे रहकर भी काम करता है, गिर-पड़कर भी बोझ ढोता है पर वह खुद कभी किसी पर बोझ नहीं बनता। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा गधा हो जिसकी भूख के कारण मौत हुई हो, इसके बावजूद कि वह सूखी घास पहले खाता है और हरी बाद में, यह उसकी दूरदृष्टि ही कही जा सकती है या फिर परोपकारी भावना और देखिए कितने मनुष्य हर दिन भू,ख से तड़प-तड़प कर मर जाते हैं, क्योंकि वह मेहनत नहीं करते। कोई जादू होने की उम्मीद में वक्त निकालते रहते हैं। पर मेरी प्रवृत्ति दिमाग नहीं होने के बावजूद भी ऐसी ही है। गधे की तारीफ इसलिए कि मैं कभी निराशा में नहीं जीता। हां मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैं बेवकूफ हूं, नासमझ हूं,। पर यह कहने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है कि मैं गधा हूं।

आपका

जीजाजी

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Rakesh Malviya
Journalist
Coordinator-Media Initiative
Vikas Samvad.
Bhopal.

www.patiyebaji.blogspot.com

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रचनाकार: राकेश मालवीय का व्यंग्य : हां, मैं गधा हूं
राकेश मालवीय का व्यंग्य : हां, मैं गधा हूं
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