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जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास : पी कहाँ (भाग 3)

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( पिछले अंक से जारी…) पु रानी स्‍मृतिओं ने जैसे नींद चुरा ली थी। बीती बात निरन्‍तर याद आ रहीं थीं। अगले दिन! तब जबकि वह राजकुंवरी के साथ...

(पिछले अंक से जारी…)

पुरानी स्‍मृतिओं ने जैसे नींद चुरा ली थी। बीती बात निरन्‍तर याद आ रहीं थीं।
अगले दिन!
तब जबकि वह राजकुंवरी के साथ शिकार पर गये थे। साथ में रावसाहब भी थे और दो पेशेवर शिकारी भी थे।
बताया गया था कि जंगल में एक भेड़िये का उत्‍पात है। जो आते जाते मुसाफिरों को भी परेशान करता है।
यह राह में ही जानकारी मिली कि राजकुंवरी को भी निशानेबाजी का अच्‍छा अभ्‍यास था। एक प्रतियोगिता में वह पुरुस्‍कृत भी हो चुकी थी।
अब आपस में कोई झिझक नहीं थी। एक जीपकार में रावजी और उनके शिकारी साथी थे दूसरी जीपकार में कुंवरसाहब को मालविका के साथ बैठाया गया था।
स्‍वयं मालविका जीप ड्राइव कर रही थी।
राह में कुछ बातें हुईं।
-‘राजकुमारी जी आज सुबह सुना . ... .आप बहुत सुन्‍दर गाती हैं।
-‘आप भी तो बहुत सुन्‍दर कविता करते हैं।'
-‘सुन्‍दर कहां . ... .बस यूं ही कुछ कह लेता हूं।'
-‘हम एक बात कहें कुंवरसाहब।'
-‘कहिये।'
-‘मैं पर्दे की ओट से देख रही थी आपने बहुत शराब पी।'
-‘मैंने कहा था न कि बुजुर्गों की सभी बुराईयां मुझ में हैं।'
-‘अगर मेरी सौगन्‍ध माने तो कहूं अधिक शराब मत पिया कीजिये। भाई कुंवर जी अधिक शराब पीने के कारण ही मर गये थे . ... .तब से . ... .।'
-‘जब आप मालकिन बनकर घर आयेंगी तब जैसा आप का हुक्‍म होगा मानूंगा।'
-‘इससे पहले भी आप मेरी सौगन्‍ध का ध्‍यान रखेंगे।'
-‘जो हुक्‍म . ... .।'
-‘यह हुक्‍म नहीं दासी की प्रार्थना है।'
दोनों की दृष्‍टि मिली।
यकायक जीप को ब्रेक लग गये।
-‘बस इतना ही मुझे आपसे कहना है कुंवर जी। मैं मन और तन से आपकी हो चुकी हूं।'
दृष्‍टि मानों एक दूसरे के मुख से हटना ही नहीं चाहती थी।
कुंवरसाहब ने अपने दोनों हाथ मालविका के कपोलों पर रख दिए।
विभोर हो राजकुंवरी ने आंखें मूंद लीं।
और कुंवरसाहब ने अपनी मंगेतर का माथा चूम लिया।
जीपकार फिर दौड़ने लगी।
जैसे रात, भोर और दोपहर की पहचान वर्षों की पहचान बन गई हो।
इसके बाद एक शिकार यात्रा आरम्‍भ हुई।
मचान आदि का कोई तकल्‍लुफ नहीं था। आगे आगे कुत्‍तों सहित पेशेवर शिकारी चले। फिर कुंवर और रावजी।
भेड़िये के स्‍थान का पूर्व अनुमान था।
उस स्‍थान को चारों कोनों से घेरा गया। दो कोनों पर शिकारी थे। एक कोने पर राव साहब और एक कोने पर कुंवरसाहब और मालविका।
शिकारी पोशाक बहुत फब रही थी मालविका पर।
भेड़िये को आड़ से निकालने के लिये शोर मचाया गया।
अतिथि के नाते पहला फायर करने का अवसर कुंवर जी के लिये था।
लगभग बीस मिनिट तक प्रतीक्षा करने के बाद भेड़िया मांद से निकला।
कुंवरसाहब को जैसे निशाना लगाने की प्रतीक्षा थी।
यूं भेड़िये पर चार रायफलें तनी हुई थीं।
-‘धायं . ... .।'
कुंवरसाहब ने पहला फायर किया।
सचमुच सभी ने निशानेबाजी का कमाल देखा। कुंवरसाहब द्वारा चलाई गई गोली भेड़िये का कपाल फोड़ गई।
मालविका तो जैसे निशाना देखकर दीवानी हो गई।
भेड़िया गोली खाकर कई फिट उंचा उछला और फिर धराशायी हो गया।
उसी क्षण मालविका सुध-बुध भूलकर अमरलता की तरह कुंवरसाहब से लिपट गई।
-‘बधाई है।'
सभी ने उन्‍हें मुक्‍त कंठ से बधाई दी। भेड़िया पास के उस गांव में भिजवा दिया गया जहां उसने एक बच्‍चे को जख्‍मी किया था। इस सूचना के साथ कि यह रावसाहब के भावी दामाद की रायफल का शिकार बना। प्रजा को दामाद साहब की भेंट।
शाम तक पिकनिक रही। बार बार खूबसूरत आंखों का उनकी ओर निहारना-कोई कैसे भूल जाए।
और फिर दूसरी रात।
कुंवरसाहब ने रात में राव साहब से कहा-‘मैं शराब नहीं पीयूंगा।'
-‘क्‍यों?'
-‘यंू ही।'
राव साहब मुस्‍कराए। केवल इतना कहा-‘ठीक है, यह तो जनाब पीने वालों की महफिल है। आप शौक से आराम करें।'
इसका अर्थ था साथ साथ भोजन के लिये भी आग्रह नहीं है। कुंवरसाहब ने कुछ देर अपनी सास से बातें की और उपर अपने कमरे में चले आए।
कमरा जैसे बदला बदला था।
सोफों के गिलाफ और बिस्‍तरे की चादर तथा सभी पर्दे बदल दिए गए थे।
कल सभी कुछ हरा था, आज गुलाबी।
मेज पर गुलाबी मेजपोश। दो शराब के प्‍याले और सोने की छोटी सी सुराही।
कमरे का रंग गुलाबी, मालविका का परधिान गुलाबी।
-‘बहुत खूब।' कुंवरसाहब मालविका की ओर देखकर मुस्‍कराए।
-‘क्‍या खूब?'
-‘गुलाबी बहार।' कस्‍तूरी मृग अपनी ही नाभी में छुपी कस्‍तूरी की गंध से व्‍याकुल होकर धैर्य खो देता है। वन में खोजता फिरता है कि गंध स्‍थल कहां है। शायद जीवन भर गंध स्‍थल नहीं जान पाता। हम कस्‍तूरी मृग जैसे अबोध नहीं हैं। कुछ देर बहार की तलाश में भटके जरुर परन्‍तु फिर बहार को पा ही लिया-हम महल में भटक रहे थे और बहार इस कमरे में थी।'
-‘तशरीफ रखिये।'
-‘ओह हां। लेकिन यह सब किस लिए?'
-‘आपके लिये।'
-‘क्‍या कहने हैं, जब मैं जीता हूं तो यह कहते हैं कि मरना होगा-और जब मैं मरता हूं तो कहते हैं कि जीना होगा। हुजूर मैंने तो राव साहब से भी इन्‍कार कर दिया कि मैं नहीं पियूंगा।'
-‘ठीक किया।'
-‘लेकिन अब?'
-‘आप सिर्फ दो पैग लेंगे। हमारे साथ, हमारे हाथों से।'
-‘हुक्‍म बजा लाउंगा। वैसे मैंने यह तय किया था अब नहीं पियूंगा।'
-‘कैसे कहें कुंवरसाहब कि हमारी सौगन्‍ध का इतना आदर करके आपने हमें बिना मोल खरीद लिया है।'
-‘बिक तो हम गए सरकार।'
दृष्‍टि मिली और दोनों हंस पड़े।
तभी छम छमा छम की आवाज सुनकर दोनों चौंक पड़े।
दासी केतकी आई थी। भला दासी को क्‍या शर्म और झिझक। कमरे में प्रविष्‍ट होकर कुंवरसाहब को आदाब बजाया और अपनी घाघरी घुटनों तक उठाकर बोली-‘राजकुंवरी जी देखिए मैले घुंघरु आपको पसन्‍द नहीं थे न-आज इन्‍हें सुनार से उजलवा लिए हैं। कहिए तो बांध दूं पांवों मेंं कुंवरसाहब भी जान लेंगे कि आप कितना अच्‍छा नाचती हैं। कोई मजाक है! धन्‍नो बाई ने सिखाया है।'
-‘हट यहां से।' आंखें तरेर कर मालविका बोली-‘रख कर आ इन्‍हें ।'
कुंवरसाहब ने टोका-‘शायद आप हमारे सामने नाचना पसन्‍द नहीं करेंगी। हम आपको मजबूर नहीं करेंगे। लेकिन घुंघरु बंधवाने में क्‍या हर्ज है। चलेंगी तो छनछनाएंगे। हमें अच्‍छा लगेगा।'
मालविका आग्रह टाल नहीं सकी थी।
दासी केतकी ने तुरन्‍त ही मालविका के पांवों में घुंघरु बांध दिए। फिर शरारत से मुस्‍कराती हुई चली गई।
इसके बाद दो दो पैग हुए। कुंवरसाहब को मालविका ने अपने हाथों से पिलाई, स्‍वयं ने कुंवरसाहब के हाथों से पी।
मालविका का रंग और निखरा। उसने कुंवरसाहब से खाने का अनुरोध किया।
-‘हमें भूख नहीं है।'
-‘यह क्‍या बात हुई।'
-‘कुछ नाराजगी भी है। बेहतर यह हो कि आप हमसे खाने के लिए न कहें और हम आपसे न गीत सुनाने को कहेंगे और न नाचने को।'
-‘आप बड़े वो हैं।' वह इठला उठी।
-‘अब जो हैं वहीं हैं। कैसे बदल जाएं। सही बात यह है कि हम रुठ गए हैं।'
-‘हम मना लेंगे।'
-‘हमारी शर्त है।'
-‘मान लेंगे सरकार आपकी शर्त भी। आपके हाथों बेदाम बिक जो गए हैं।' मालविका उठकर खड़ी हो गई।
ठीक कुंवरसाहब के सम्‍मुख खड़ी होकर वह बोली-‘आपका वर्षा गीत . ... .।'
-‘वही गीत क्‍यों? क्‍या बहुत अधिक पसन्‍द है?'
-‘बहुत ही अधिक . ... .सुनिये . ... .।'
साज बने चांदी के उजले घुंघरु। ताल बने नृत्‍यमग्‍न पांव मालविका ने गाया-
लाज लजीली नवल वधू सी ओढ़े हरी चुनरिया,
ले अंगड़ाई धरती जागी ढलती देख दुपहरिया ।
जब जब सावन भादों बरसे पवन चली पुरवाई,
जब जब पड़ी फुहार आंगना याद तुम्‍हारी आई।
नृत्‍य सहित मालविका ने गीत का एक छन्‍द गाया और कुंवरसाहब मोहित हो गए। नाचती मालविका को आवेश वश उन्‍होंने अपनी बांहों में भर लिया।
परन्‍तु दूसरे ही क्षण चौंक कर उन्‍होंने पूछा-‘क्‍या हमसे गलती हुई?'
-‘नहीं तो।' मादक मालविका ने कहा।
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क्‍या वह चेहरा भूला जा सकेगा?
मलविका का चेहरा!
तब जब कुंवरसाहब प्रथम बार रानी गढ़ी से लौट रहे थे।
मालविका उनके साथ राजस्‍थान की सीमा तक साथ आई थी। उसकी कार पीछे-पीछे ड्राईवर लेकर आ रहा था। और कुंवरसाहब के साथ बैठ कर आई। राजस्‍थान की सीमा रेखा थी।
-‘बस कुंवरसाहब।'
-‘गाड़ी रोको भौंपू।'
कुंवरसाहब ने आदेश दिया था।
यह दिन का तीसरा पहर था। मालविका फलास्‍क में चाय तथा तीसरे पहर के नाश्‍ते के लिये सभी वस्‍तुएं तैयार कर लाई थी।
सीमा चौकी के निकट ही एक पेड़ के नीचे चाय आदि का आयोजन हुआ।
-‘अब हमें इजाजत दीजिए राजकुंवरी जी। आधी रात के बाद घर पंहुचना होगा।'
कुंवरसाहब की बात सुनकर मालविका ही आंखें डबडबा आईं थीं।
-‘राजकुंवरी।'
वह रो पड़ी थी।
-‘राजकुंवरी जी।'
-‘जाइए, नमस्‍कार।' इतना कहकर दोनों हाथों से मुंह ढांपकर वह सड़क से दूर वृक्षों के कुंज की ओर चली गई।
पीछे पीछे जाकर कुंवरसाहब ने अपने हाथों से मालविका के आंसू पोंछे।
-‘कब आइएगा?'
-‘जब आपका हुक्‍म होगा।'
-‘आप हमें बहुत याद आएंगे।'
-‘क्‍या कहें . ... .मजबूरी जो है। आपके ही तो पण्‍डित जी कहते हैं कि इस वर्ष विवाह न हो सकेगा।'
-‘पण्‍डित जी को आप गोली नहीं मार सकते?'
-‘जरुर मार सकता हूं। लेकिन उसके हिमायती रावसाहब हैं उनका क्‍या करुं?'
-‘हमें अभी अपने साथ ले चलिए।'
-‘मुझे कब इन्‍कार है।'
अनायास ही राजकुंवरी मुस्‍करा दी-‘आपके इलाके में यह होगा कि कुछ लोग कहेंगे कुंवरसाहब राजस्‍थान से एक स्‍त्री को भगा लाए हैं। हमारे इलाके में लोग कहेंगे राजकुंवरी भाग गई।'
-‘बेशक कहेंगे। लेकिन राजकुंवरी जी इस बदनामी में भी खास मजा रहेगा।'
-‘जाइए मैं नहीं बोलती। आपको हंसी सूझ रही है। कुंवरसाहब सचमुच एक साल की लम्‍बी प्रतीक्षा तो हमें घुला घुला कर मार देगी।'
-‘हम राजकुंवरी साहिबा के हुजूर में दो महीने बाद फिर आयेंगे।'
-‘सच?'
-‘हम वायदा करते हैं कि साल में छः बार आपके हुजूर में हाजिर होंगे।'
-‘सच कह रहे हैं न?'
-‘बिल्‍कुल सच। छः बार आने का हमारे पास बाकायदा बहाना है।'
-‘बहाना क्‍या है हम भी तो सुनें।'
-‘देखिए अब है अक्‍तूबर का महीना। गर्व की बात नहीं है हमारी भूमि गंगा मां की भूमि है। वहां आपका एक बाग है।'
-‘ओह!'
-‘नवम्‍बर में अमरुद पकेंगे। बहाना है कि नवम्‍बर में अमरुद की सौगात लेकर आपकी खिदमत में हाजिर हुए हैं। अमरुद की खास पौध इलाहाबाद से मंगवाई थी, आप पसन्‍द करेंगी।'
-‘बहुत खूब। नवम्‍बर के बाद जनवरी!'
-‘जनवरी में आपके कालेज का कवि सम्‍मेलन होता है।'
-‘वाकई . ... .फिर मार्च।'
-‘मार्च में राजा के बाग में बेर लगते हैं वह सौगात लेकर आयेंगे।'
-‘फिर मई?'
-‘मई में हमारे खेतों में खरबूजा पकता है।'
-‘लाजवाब! फिर जुलाई।'
-‘राजा के बाग में अट्‌ठाइस प्रकार के आम हैं।'
-‘इसके बाद सितम्‍बर!'
-‘कश्‍मीर का सीजन है। वहां मुलाकात होगी।'
-‘दिल को चैन मिला।'
-‘सितम्‍बर के बाद फिर नवम्‍बर की बात सुने बिना कैसे चैन मिलेगा राजकुंवरी जी। नवम्‍बर में आकर हम रावजी से कहेंगे कि ।'
-‘क्‍या कहियेगा।'
-‘आप ही कहिए।'
-‘नहीं आप कहिए।'
-‘कहेंगे कि वर्ष भर की कैद पूरी हो गई अब तो हमारी अमानत हमें दे दीजिये।'
-‘ओह!'
-‘अब इजाजत है?'
-‘जी।'
-‘आइए।'
कुंवरसाहब ने मालविका का हाथ थाम लिया।
उधर दोनों कारों के ड्राईवर आतुर थे। विशेषकर भौंपू उसे तो अभी बहुत दूर जाना था।
पहले कुंवरसाहब ने मालविका को गाड़ी में बैठाया था।
तब हवा तेज चल रही थी। मालविका के यत्‍न से संवारे हुए केश अस्‍त व्‍यस्‍त हो गए थे। बार-बार चेहरे पर लटें झूल झूल जाती थीं।
वह आकुल चेहरा!
क्‍या वह चेहरा भूला जा सकेगा।
मलविका ने जैसे कुंवरसाहब पर जादू कर दिया था।
लौटकर कुंवरसाहब ने जब शराब छोड़ देने की बात रानी मां से कही थी तो वह सुनकर सुखद आश्‍चर्य से कुछ क्षण पुत्र को निहारती रही थीं।
गुप्‍ता जी तो विश्‍वास ही न कर सके थे।
और कुंवरसाहब के कवि मित्र ।
सबसे अधिक पीड़ा हुई कुंवरसाहब के मित्रों को। पहले तो रतनपुर पैलेस में कवियों के लिये सुरा सरिता बहती थी। एक कवि ने तो कह दिया-‘कुंवरसाहब आपने तो तौबा कर ली। यह तो कहिए कि हम जैसे बिना झोली के फकीर अब कहां जायें?'
और कुंवरसाहब ने अपनी गलती सुधार ली। कवि मित्रों के पीने की व्‍यवस्‍था कर देते थे।
शराब छोड़ देना कुंवरसाहब के जीवन में बहुत बड़ा इन्‍कलाब था।
लेकिन पूरे वर्ष में कुंवरसाहब ने चार बार मालविका के हाथ से शराब पी बस!
अपने वायदे के अनुसार वह प्रति दूसरे माह रानीगढ़ी जाते रहे।
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तब शायद रात के बारह बजे थे, या बारह से कुछ अधिक। कुंवरसाहब के कमरे की पश्‍चिमी खिड़की से चांद झांक रहा था।
यादों की नींद ने जैसे करवट ली।
-‘कोई है ?'
-‘हाजिर हुजूर!' नौकर बाहर से ही बोला।
नौकर आया। उसकी ओर देखे बिना ही उन्‍होंने कहा-‘भौंपू को बुलाओ।'
भौंपू सो चुका था। आने में देर हुई। परन्‍तु अपने मालिक की वह जितनी इज्‍जत करता था उतना ही स्‍नेह भी।
जब आया तो बाकायदा तैयार होकर। वर्दी से लैस।
-‘बाजार चले जाओ। मेरा मतलब है राधा के कोठे पर। उससे कहना कि कुंवरसाहब ने कार भेजी है। फौरन बुलाया है।'
तभी जैसे दीवार घड़ी ने टोका-टन !
साढ़े बारह बजे थे।
-‘सुनो भौंपू ।'
-‘सरकार।'
-‘रहने दो। शायद इस वक्‍त वह सो चुकी होगी। जगाना और बुलाना, नहीं रहने दो।'
-‘जैसे हुजूर मुनासिब समझें।'
-‘हम कुछ समझ ही तो नहीं पा रहे हैं भौंपू। हमारा तो समझ लो कि दिमाग खराब हो गया है। नींद नहीं आ रही है और शायद आएगी भी नहीं लेकिन जाओ भौंपू। इस समय राधा को बुलाना ठीक नहीं होगा। जाओ . ... .।'
-‘भौंपू लौट गया।'
कुंवरसाहब ने लाइट बुझा कर सोने का उपक्रम किया।
परन्‍तु नींद तो निष्‍ठुर प्रिया की भांति रुठ गई थी।
वही बीते अतीत की बातें।
मस्‍तिष्‍क के दृश्‍य पर एक के बाद एक।
मालविका के लिये कुंवरसाहब ने शराब छोड़ दी थी।
प्रत्‍येक दूसरे दिन कुंवरसाहब मालविका को पत्र लिखते थे।
शराब छूट गई और बहुत कुछ छूट गया परन्‍तु राधा नहीं छूटी।
कुंवरसाहब ने मन से राधा को छोड़ना चाहा था, परन्‍तु राधा के स्‍नेह और आदर के बंधन इतने मजबूत थे कि उन्‍हें तोड़ा नहीं जा सका।
राधा !
जैसे वह निगरानी रखती थी कि कुंवरसाहब कब बाहर से नगर में आए।
एक दिन वह लौटे तो राधा के सन्‍देशवाहक ने आकर कहा-‘हुजूर कुंवरसाहब राधा ने सलाम भेजा है। कहा है कि दीदार को आंखें तरस गईं।'
सन्‍देश वाहक को टालते हुए कह दिया-‘आएंगे।'
अगले सप्‍ताह सन्‍देश फिर मिला।
कुंवरसाहब ने फिर टाल दिया।
चौथे दिन संदेश वाहक फिर आया। अबकी बार वह राधा का पत्र लाया था। लिखा था-हुजूर क्‍या ऐसे ही तड़पाते रहिएगा। यहां आने में हिचक हो तो बन्‍दी को पैलेस में आकर सलाम बजाने का हुक्‍म मिले !
कुंवरसाहब ने लिखा-जरुर आएंगे।
परन्‍तु कुंवरसाहब गये नहीं और एक दिन !
खबर मिली कि बाहर सड़क पर रिक्‍शा खड़ी है। राधा आई है।
और जैसे कुंवरसाहब की तपस्‍या भंग हो गई।
उन्‍होंने राधा को बुलवा लिया। राधा दोपहर को आई थी और आधी रात को लौटी, उस रात कोठे पर मुजरा नहीं हुआ।
दस बजे के बाद कुंवरसाहब राधा को सैर के लिए ले गए। इससे पहले और बातें ही होती रही थीं। महत्‍वपूर्ण बातें क्‍लब की फुलवारी में हुईं।
-‘कुंवरसाहब . ... .।'
-‘जी साहब।'
-‘हमें कुछ कहना है।'
-‘जरुर कहिए।'
-‘कल हमने बेशर्मी साधकर गुप्‍ता जी की दुकान में पांव रक्‍खा। उनसे आपकी नाराजगी की वजह जाननी चाही। वह कह रहे थे कि आपने अपनी दुल्‍हन से वायदा किया है कि शराब नहीं पियेंगे, कोठे पर नहीं जायेंगे।'
कुंवरसाहब मौन रहे।
-‘बताइए न, क्‍या गुप्‍ता जी ठीक कह रहे थे।'
-‘किसी हद तक।'
-‘अब हम अपनी तरफ से कुछ कहने की इजाजत चाहेंगे।'
-‘कहो।'
-‘क्‍या हमने कभी हाथ बढ़ाकर आपसे रुपया पैसा मांगा है?'
-‘बात बेमतलब है।'
-‘बात का मतलब है कुंवरसाहब। किस्‍मत से कौन लड़े। किस्‍मत में ही तो लिखा है कि हम कोठे पर बैठें। बाजारु औरत कहलाएं। यह सब किस्‍मत की बातें हैं।'
-‘ठीक कहती हो।'
-‘लेकिन एक औरत हमेशा औरत ही रहती है। घर की रानी बने चाहे कोठे की नाचने वाली। औरत हर हालत में औरत ही रहती है। वह बे जबान गाय नहीं बन सकती। औरत के भी दिल और दिमाग होता है। वह भी कुछ चाहती है और कुछ नहीं चाहती।'
-‘अच्‍छा . ... .अच्‍छा राधा। अब यह सब पुराण बन्‍द भी करो।'
-‘आज मुझे कह ही लेने दीजिए न ! अपनी अपनी नजर ही तो है। मैंने आपको कुंवरसाहब के रुप में कभी नहीं देखा। मैंने आपको देखा है कवि के रुप में। आप कवि के रुप में मेरे यहां आएं।'
-‘आउंगा राधा, आउंगा।'
-‘आपके कवि रुप में मेरी पुरानी दोस्‍ती है। जायज बात कर रही हूं नाजायज नहीं। मैंने आपके गीत गाए हैं . ... .और . ... .।'
कुंवरसाहब को ऐसा लगा जैसे राधा एक शक्‍तिशाली चुम्‍बक है जो निरन्‍तर उन्‍हें अपनी ओर खींचने की क्षमता रखती है। कुंवरसाहब को आने का वादा करना पड़ा। यूं ही नहीं, राधा के सिर पर हाथ रखकर उन्‍होंने उससे वादा किया।
और वह अक्‍सर जाते रहे। अक्‍सर राधा भी पैलेस में आती रही।
लोग कहते थे कि राधा कुंवरसाहब को दोनों हाथों से लूट रही है। परन्‍तु वास्‍तविक परिस्‍थिति कुछ और ही थी।
यह कुंवरसाहब की शान के खिलाफ था कि वह राधा के कोठे पर जाएं और कुछ दें नहीं।
दूसरी ओर जब भी कुंवरसाहब उसे कोठे पर कुछ देते तो वह लेने से इन्‍कार कर देती और वह नोट फेंक कर चले आते। परन्‍तु कोठे से नीचे या कहीं और जब वह कुछ देते तो वह इन्‍कार नहीं करती-कुंवरसाहब की इज्‍जत का भी तो सवाल था।
जब भी कुंवरसाहब रानीगढ़ी से लौटते तो कई दिन राधा के कोठे पर नहीं जाते थे। परन्‍तु जब चार पांच दिन बीत जाते तो अधीर हो जाते !
एक बार नहीं कई बार राधा ने कुंवरसाहब के लिए अग्‍नि परीक्षा दी थी और खालिस कुन्‍दन बनकर निकली थी।
एक बार नुमाइश में !
राधा शहर के बहुत बड़े रईसजादे के साथ नुमाइश में आई थी। यकीनन वह कुंवरसाहब से कई गुना बड़ा आसामी था। चीनी मिल और न जाने क्‍या क्‍या उसकी सम्‍पत्‍ति थी।
एक कवि ने राधा को उस रईसजादे के साथ देख लिया।
उसने कुंवरसाहब से कहा-‘कुंवरसाहब राधा को तो आपके डेरे में होना चाहिये। वह उसके साथ . ... .।'
कुंवरसाहब ने ड्राईवर भौंपू को भेज दिया-‘जाओ राधा को बुला लाओ।'
भौंपू ने सन्‍देश राधा को दिया।
राधा ने रईसजादे से इजाजत मांगी।
रईसजादे की कुंवरसाहब से कुछ लगती भी थी। उसने पूछा-‘जाना चाहती हो?'
-‘हां।'
-‘एक फैसला करके जाना होगा।'
-‘हां। आज से तुम्‍हारा किसी एक के साथ सम्‍बन्‍ध रहेगा . ... .मेरे साथ या कुंवरसाहब के साथ।'
राधा ने एक क्षण भी नहीं सोचा। मुस्‍करा कर बोली-‘तो फैसला हो गया। मैं जा रही हूं।'
और राधा कुंवरसाहब के डेरे पर पंहुच गई।
डेरे में कुंवरसाहब के कई और मित्र भी थे। राधा वह सब बातें कुंवरसाहब को नहीं बतानी चाहती थी, परन्‍तु भौंपू तो भौंपू ठहरा उसने वहां हुई सब बातें बता दीं।
-‘यह तुमने अच्‍छा नहीं किया राधा।'
-‘क्‍या अच्‍छा नहीं किया?'
-‘भई हम तो गए जमाने के आदमी हैं। ऐसे कुएं का पानी पीते हैं जिसके स्‍त्रोत बन्‍द हो चुके हैं। चन्‍दनलाल तो बहती नदी हैं।'
-‘जी।' शरारत की सी मुद्रा में वह मुस्‍करा दी
-‘तुम्‍हें नहीं आना चाहिए था।'
-‘सलाह के लिए शुक्रिया।'
-‘हमने तो यहां तक सुना था कि वह तुम्‍हारे लिए नई कालोनी में कोठी बनवाने का इरादा रखते हैं।'
-‘अब बस भी कीजिए हुजूर।'
-‘लेकिन कोठी?'
-‘हमें हमारा कोठा मुबारक।'
यह बातें अकेले में तो हुई नहीं थीं, कुंवरसाहब के कई और मित्र भी डेरे में थे। राधा के बारे में अब तक जो सभी ने सुना था और सुन कर जो विचार बनाये थे उन्‍हें यह सुनकर आश्‍चर्य हुआ।
वहां एक और भी कुंवर उपस्‍थित थे, कुंवर दलजीत सिंह ! शिकार के बहुत प्रेमी थे। और कुंवरसाहब की ननिहाल के रिश्‍ते से भाई लगते थे।
उन्‍होंने टोका-‘बाई जी ।'
-‘राधा कहिए न . ... .।'
-‘यूं ही सही। राधा जी हम बात फिर उठाने को मजबूर हैं। शायद आपको हमारी बात पसन्‍द न आए। लेकिन हमने जमाना देखा है। जब कुंवरसाहब आपको खुद मौका दे रहे हैं तो आपको उन साहब के पास चले जाना चाहिए।'
-‘क्‍यों?'
-‘इसलिए कि मैं मुंह देखी नहीं साफ बात कहने का आदी हूं।'
-‘तो कहिए न !'
-‘पहले आप अपनी हकीकत जानिए। जानती हैं तो समझिए।'
-‘आप समझाइए।'
-‘आपने माना है कि आप कोठे वाली हैं।'
-‘जवानी चार दिन की होती है।'
-‘ठीक।'
-‘जब तक जवानी है सभी कच्‍चे धागे में बन्‍धे खिंचे चले आते हैं। जवानी न रहेगी तो ग्राहक भी न रहेंगे, जिन्‍दगी का क्‍या पता। जिन्‍दगी बिताने के लिए चाहिए पैसा, और जहां से पैसा मिले बटोरना चाहिए-जवानी साथ नहीं देगी, जिन्‍दगी रहेगी तो पैसा साथ देगा।'
-‘कुछ और?'
-‘क्‍या आप हमारी बात को गलत साबित कर सकती हैं?'
-‘जी हां।'
-‘कैसे?'
-‘मैं कोठे वाली हूं, थोड़ी सी दौलत शायद बिखेर सकती हूं इज्‍जत नहीं।'
-‘ठीक।'
-‘मीरा ने जिस कृष्‍ण की साधना की वास्‍तव में वह पत्‍थर की मूर्ति थी।'
-‘क्‍या मतलब?'
-‘क्‍या कोई कह सकता है कि कृष्‍ण भक्‍ति में मीरा को आनन्‍द नहीं मिला।'
-‘भक्‍तों और तपस्‍वीयों की बात और होती है।'
-‘भक्‍ति और तप पर किसी का इजारा नहीं होता। मीरा ने जिस कृष्‍ण की भक्‍ति की थी वह तो मूर्ति थे, मैं मनुष्‍य रुपी कृष्‍ण की भक्‍त हूं।'
-‘घाटे में रहोगी।'
-‘भक्‍ति व्‍यापार नहीं है। सुख की व्‍याख्‍या नहीं की जा सकती। कभी-कभी महलों में भी सुख नहीं मिलता। अगर महलों में सुख होता तो रानी पिंगला और राजा भृतहरि को कोई न जानता। सुख होता है मन के सन्‍तोष से। कौन कहता है कि मखमल से लदा राजा सुखी है और कौन कह सकता है कि चिथड़ों में लिपटा बैरागी दुखी है . ... .।'
कुंवर दलजीत तो हतप्रभ रह गया। कोठे वाली इतनी गूढ़ बात इतने सहज ढंग से कह जाएगी उसने सोचा भी न था।
दलजीत की स्‍थिति भांपते हुए कुंवरसाहब बोले-‘छोड़ो भाई . ... .कहां किस बहस में पड़ गए। राधा तो पागल है।'
राधा मुस्‍कराई-‘पागल नहीं हूं कुंवरसाहब, दीवानी हूं किसी की दीवानी।'
-‘जो भी हो रहो, हमें एतराज नहीं है। हमने झोंक में तुम्‍हें बुला जरुर लिया- सच्‍ची बात तो यह है कि जब यहां सभी लोग इकट्‌ठे होते हैं तो मजुवा के दही बड़े और रामू की पकौड़ी जरुर खाते हैं।यह खायेंगे और तुम देखती रहोगी।'
-‘मैं क्‍यों देखती रहूंगी?'
-‘तेल और खटाई की चीजें हैं न, इन्‍हें खाने से क्‍या आवाज खराब नहीं होती?'
राधा हंस दी।
कुंवरसाहब भी तो बहस को टालना ही चाहते थे।
राधा बोली-‘कुंवरसाहब एक बात का हमें पक्‍का विश्‍वास है, आप अगर अपने हाथ से हमें जहर भी देंगे तो अमृत हो जाएगा। जो खिलाइएगा हम सभी कुछ खा लेंगे . ... .अगर अपने हाथ से खिलाएंगे तो . ... .।'
एक कवि बोले-‘यह भी होगी, कुंवरसाहब आज यह भी होगी।'
और फिर बातचीत का यह विषय बदला गया।
हंसी दिल्‍लगी की और बातें चल पड़ीं। गीत और गजल के चर्चे होने लगे।
इसके बाद . ... .।
रईसजादे ने राधा से सम्‍बन्‍ध समाप्‍त कर दिया। कुंवरसाहब ने किसी से यह कभी नहीं सुना कि राधा को उस सम्‍बन्‍ध के टूटने का मलाल है।
यह बात थी मार्च की। मई में कुंवरसाहब को मौसमी बुखार हुआ। कई दिन तेज बुखार में रहे। दिन में नौकरों की देखभाल रहती थी और रात में राधा आ जाती थी, सारी रात जागती थी।
बुखार के बाद स्‍वास्‍थ्‍य लाभ करके कुंवरसाहब जब कोठे पर पंहुचे तो तीसरा पहर था। उस समय दिल्‍ली के एक व्‍यापारी के लिए मुजरा चल रहा था।
-‘अब मुजरा नहीं होगा।'
शायद इस जिद के कारण काफी आर्थिक हानि हुई राधा को। यहां तक कि कुंवरसाहब ने भी कहा कि मुजरा जारी रहे परन्‍तु राधा अपने नाम की एक ही जिद्‌दी थी।
कुंवरसाहब ने पूछा-‘यह तुम्‍हें क्‍या हो गया है राधा?'
-‘शायद कुछ हो ही गया है . ... .नाम राधा है न। इसीलिए राधा का भाग्‍य लेकर जन्‍मी हूं। सतयुग की राधा तो बांसुरी की धुन दूर से ही सुनकर सुधबुध खो देती थी। मैं कल युग की राधा जब निकट से अपने कृष्‍ण को देखूं तो मुझे कैसे कुछ न हो?'
मालविका और राधा !
मालविका के लिए शराब तो छूट गई थी परन्‍तु राधा नहीं छूटी थी।
शायद इसलिये कि राधा में कुछ गुण थे। गुणों के समूह ने मिलकर चुम्‍बक का निर्माण किया था।
राधा . ... .मालविका !
मालविका . ... .राधा !!
केवल राधा।
मालविका तो अब सपना हो गई थी।

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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रचनाकार: जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास : पी कहाँ (भाग 3)
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