नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

आबिद सुरती की काली किताब

aabid surti kaali kitaab 

आबिद सुरती के 75 वें जन्म दिवस पर विशेष

आपको लाल किताब के बारे में मालूम होगा. क्या आपको पता है कि ऐसी ही एक काली किताब भी है? जी हाँ, और इसके लेखक हैं – अपने आबिद सुरती. आपके लिए पेश है पुस्तक काली किताब के चंद चुनिंदा अंश.

सबसे पहले, काली किताब पर धर्मवीर भारती की प्रस्तावना

“संसार की पुरानी पवित्र किताबें इतिहास के ऐसे दौर में लिखी गयीं जब मानव समाज को व्यवस्थित और संगठित करने के लिए कतिपय मूल्य मर्यादाओं को निर्धारित करने की जरूरत थी. आबिद सुरती की यह महत्वपूर्ण ‘काली किताब’ इतिहास के ऐसे दौर में लिखी गयी है, जब स्थापित मूल्य-मर्यादाएँ झूठी पड़ने लगी है और नए सिरे से एक विद्रोही चिंतन की आवश्यकता है ताकि जो मर्यादाओं का छद्म समाज को और व्यक्ति की अंतरात्मा को अंदर से विघटित कर रहा है, उसके पुनर्गठन का आधार खोजा जा सके. महाकाल का तांडव नृत्य निर्मम होता है, बहुत कुछ ध्वस्त करता है ताकि नयी मानव रचना का आधार बन सके. वही निर्ममता इस कृति के व्यंग्य में भी है...”

काली किताब पृष्ठ सं. 30 –

24. इसी विशाल सभा को संबोधित करते हुए यम-जमाल ने टेकरी पर खड़े होकर बतलाया 25. कि मेरे पिता शैतान ने अपनी ‘काली किताब’ के साथ मुझे तुम्हारे पास भेजा है 26. जिससे तुम खरे और खोटे का भेद समझो 27. और घरों में, रास्तों में तथा मंदिरों में शैतान के लिंग की स्थापना करो.

28. क्योंकि

29. जो कोई शैतान के एक लिंग की स्थापना करेगा उसकी आयु में एक वर्ष की वृद्धि हो जाएगी. ....31. और जो कोई सौ अथवा सौ से अधिक लिंगों की स्थापना करेगा वह अमर हो जाएगा.

काली किताब पृष्ठ सं. 31

15. तब-

16. यम जमाल ने सबको संबोधित कर कहा 17. कि जो घोड़े अपंग हो जाते हैं, 18. उन घोड़ों को दाग़ दिया जाता है; 19. क्योंकि वे घोड़े किसी काम के नहीं होते. 20. इसी तरह जो स्त्री-पुरूष वृद्ध हो जाते हैं वे किसी काम के नहीं रहते; 21. बल्कि वे युवकों की प्रगति रोकते हैं. 22. इतना ही नहीं वे समाज की प्रगति में भी बाधा बन जाते हैं.

23. इसीलिए-

24. ऐसे वृद्ध कि जो बोझ समान हैं,

25. उन्हें जीवित ही दफना दो...

काली किताब पृष्ठ सं. 79

15. तब देखो-

16. यम जमाल ने अन्तिम वाणी कही 17. कि अब तो समझो! 18. अभी भी समझ जाओ .... 31. इसलिए तुम ‘काली किताब’ में विश्वास रखो 32. और ‘काली किताब’ में दिखलाए गए मार्ग पर चलो 33. ‘काली किताब’ मानव मात्र के उद्धार के लिए स्पष्ट उक्तियों के साथ भेजी गयी है. 34. समझने वालों के लिए ‘काली किताब’ किसी आकाशीय पुस्तक की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है.

----.

काली किताब का पारायण आप भी करना चाहेंगे?

विवरण-

काली किताब

व्यंग्य उपन्यास

लेखक – आबिद सुरती

प्रकाशक – विवेक प्रकाशन, 592-बी, नेहरू गली , विश्वास नगर दिल्ली 32.

पृ 80, मू. रु. 6/- (1975 संस्करण)

10 टिप्पणियाँ

  1. 1975. हम तब स्कूल जाने लायक भी नहीं थे, तब की किताब. अब कहाँ मिलेगी, वह भी कंटिग चाय के भाव में. आबिद सुरती से माँगता हूँ.

    जवाब देंहटाएं
  2. यह उपन्यास एक जमाने में सारिका में धारावाहिक प्रकाशित हुआ तब पढ़ा था। बाद में इसे खरीद कर पढ़ा भी। आबिद सुरती का संपूर्ण साहित्य एक साथ प्रकाशित होने की योजना बननी चाहिए। वे एक महत्वपूर्ण रचनाकार हैं।

    जवाब देंहटाएं
  3. लेखक ने कहा कि "आउट ऑफ प्रिंट" है.
    मैं कहता हूँ स्केन कर रचनाकार पर डाल दो :) राजकमल को परेशानी होगी क्या?

    जवाब देंहटाएं
  4. क्रोध पर नियंत्रण स्वभाविक व्यवहार से ही संभव है जो साधना से कम नहीं है।

    आइये क्रोध को शांत करने का उपाय अपनायें !

    जवाब देंहटाएं
  5. @संजय बेंगाणी - कॉपीराइट धारक (लेखक और या प्रकाशक) की अनुमति के बगैर यह संभव नहीं है. आपकी लेखक से बातचीत हुई है, अगर आप उनसे इस बाबत अनुमति ले लें, तो यह काम किया जा सकता है.

    जवाब देंहटाएं
  6. काली किताब राजकमल वाले पेपरबैक में बेचते हैं !

    जवाब देंहटाएं
  7. ड्ब्बु जी का यह रूप भी पसन्द आया . एक जमाने मे धर्मयुग पीछे से पढना शुरु करते थे डब्बु जी के कारण .

    जवाब देंहटाएं
  8. धर्मयुग तो धरमयुग ही था.........

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.