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जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास – पी कहाँ

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कौन जाने पावस ऋतु में पी कहाँ पुकारने वाले पपीहे की व्‍यथा क्‍या होती है ! कौन जाने ... . .और कैसे जाने ! सागर, वह जो अपनी गहराई सदा छुपा...


कौन जाने पावस ऋतु में पी कहाँ पुकारने वाले पपीहे की व्‍यथा क्‍या होती है !
कौन जाने ... . .और कैसे जाने !
सागर, वह जो अपनी गहराई सदा छुपाये रखे। दीपक, वह जो जले . . . तिल तिल जलने पर भी जिसके उर अन्‍तर में अंधेरा रहे।
अपना-अपना भाग्‍य ही तो है।
पपीहा वह जो पावस में, तब जबकि सूर्य में प्रकाश को दलबादल अंधकार में उमड़ घुमड़ कर बदल दे, पुकारे - पी कहाँ।
जो सुने वह पपीहे की व्‍यथा से सहज करुणा से भर भर जाये।
पी कहाँ-कुंवर साहब के जीवन की, जीवन के एक विशेष भाग की कहानी है।
पपीहा कहानी का प्रतीक नहीं है-कहानी की प्रतीक है पपीहे की पुकार-पी कहाँ।
पी कहाँ-प्रियतम को पुकारती हुई एक मार्मिक पुकार। उसे पुकारती हुई करुण ध्‍वनि जिसे मन सबसे अधिक चाहता हो, प्‍यार करता हो।
हम सभी जा रहे हैं, या जिन्‍दगी के साथ-साथ चल रहे हैं, या घिसट रहे हैं। सभी प्रियतम को पुकार रहे हैं-पी कहाँ!
प्रियतम वह जो सर्वाधिक प्रिय हो।
और ऐसा बहुत कम होता है कि पुकारने से, प्रयत्‍न से सर्वाधिक प्रिय वस्‍तु हम में से कोई पा ले।
माना कि चाहत का शाब्‍दिक बोध है-महत्‍वाकांक्षा। मानव मन का क्‍या, कितने सपने पूरे हो सकते हैं। कोई बालक खेलने को चांद खिलौना मांगे तो कहाँ से मिले, कैसे मिले। प्रेम दीवानी मीरा के लिए वैद्‌य सांवरिया कहाँ से आते। कौन जाने विद्‌यापति को लखिमा, चण्‍डीदास को विनोदिनी निरन्‍तर सम्‍बोधन के बाद भी मिली या नहीं।
परन्‍तु जो चाहत, जो महत्‍वाकांक्षा तृष्‍णा नहीं है वह मन को छूती है।
बलिदान में भी तो आनन्‍द होता है। अगर न होता तो बलिदान शब्‍द का निर्माण नहीं होता।
पी कहाँ पुकारने वाले पपीहे का दर्द चाहे हम न समझें, परन्‍तु इस कथा के नायक कुंवरसाहब की व्‍यथा सहज है और मानवीय तो है ही।
जागीरदार वंश के कुंवरसाहब के मन का मानव चाहे अपने उपर व्‍यवहार का कैसा भी मुलम्‍मा चढ़ायें, वह मन से शासक नहीं हैं। मन से, बुद्धि से वह सहज मानव हैं, और कवि हैं।
और अब . . .।
आगे आइये और इस कथा के नायक से परिचय प्राप्‍त कीजिये-सामने देखिये।
कुंवरसाहब की लाल कार शहर में प्रविष्‍ट हुई।
शहर का नाम मत पूछिए। समझ लीजिए कि उत्‍तर प्रदेश के किसी जिले का शहर है। ऐसा शहर जिसमें डिग्री कालेज भी हैं जिला हस्‍पताल भी। प्राचीन इतिहास की कहानी कहती हवेलियां भी हैं। और आधुनिक इमारतें भी। जिला अदालत है। छोटे-छोटे उद्‌योग-धन्‍धे हैं। संक्ष्‍ोप में यह कि जनसंख्‍या के अनुसार यह केवल नगर है-महानगर नहीं।
सुविधा के लिए समझ लीजिए कि नगर का नाम है-रंगपुर।
नगर के आसपास दूर-दूर तक फैले देहात हैं। बारह मील दूर नदी है। नदी का नाम समझ लीजिए गंगा है।
कुंवरसाहब का परिचय। कद लम्‍बा, बदन भरा हुआ। यूं उनके पिता राजा साहब कहाते थे परन्‍तु वास्‍तव में जागीरदार थें जागीर मिट गई, परन्‍तु आदत के अनुसार लोग कुंवरसाहब के पिता को राजा साहब कहते रहे और नाम के सूरज प्रकाश कुंवरसाहब कहलाते रहे। कुंवरसाहब के पिता राजा साहब पिछले वर्ष स्‍वर्गवासी हुए-परम्‍परागत राजा साहब की विधवा अब भी रानी साहिबा कहलाती हैं।
जैसा कि आमतौर से ताल्‍लुकेदारों में होता था-शासन किसानों पर करते थे और रहते शहर में थे- कुंवरसाहब की महल जैसी हवेली इस नगर में थी। कुल मिलाकर अब दो नौकर थे, पहली पीढ़ी में बीस हुआ करते थे।
परिवार संक्षिप्‍त था, वह स्‍वयं उनकी मां रानी साहिबा। कुंवरसाहब की बड़ी बहन भी, वो जो विवाहित थी। दूर एक नगर में।
अक्‍सर कुंवरसाहब बाहर आते जाते रहते थे। मामले मुकदमों में-कवि सम्‍मेलनों में! हां, कुंवरसाहब कवि थे और राजस्‍थान की एक रियासत के भूतपूर्व राजा की पुत्री रानीगढ़ी की राजकुंवरी कुंवरसाहब की मंगेतर थी . . .अब!
आज कुंवरसाहब रानीगढ़ी से लौट रहे थे। लाल कार पर पीले रंग की एक पर्त सी चढ़ गई थी-रेत की पर्त।
कुंवरसाहब केम्‍ब्रिज यूनीवर्सिटी लन्‍दन के स्‍नातक थे। तीन वर्ष पहले जब लन्‍दन से लौटे थे तब बाहर से शहर में आते तो कार राह में तीन जगह रुकती थी।
एक विलायती शराब के विक्रेता के यहां, दूसरी राधा के कोठे के नीचे, तीसरा और अन्‍तिम पड़ाव गुप्‍ता जी की दुकान पर। गुप्‍ता जी थे पुस्‍तक विक्रेता।
पिछले एक वर्ष कुंवरसाहब ने शराब छोड़ दी थी। विवाह के बाद वह भले नागरिक के रुप में रहना चाहते थे।
परन्‍तु आज!
-‘भौंपू।' बूढ़े ड्राइवर भजनलाल को कुंवरसाहब भौंपू कहा करते थे।
-‘जी हुजूर।'
-‘मुन्‍शी फारसी की दुकान पर कार रोकना।'
मुन्‍शी फारसी का अर्थ था मुन्‍शी गिरधारी लाल सक्‍सेना। विलायती शराब के विक्रेता।
कुंवरसाहब की आज्ञा सुनकर भौंपू चौंका नहीं।
उसने बाजार में ठीक मुन्‍शी फारसी की दुकान के आगे कार रोक दी।
मुन्‍शी जी दुकान छोड़कर लपके आए।
-‘नमस्‍ते कुंवरसाहब।'
-‘बोतल।'
-‘हम तो कुंवरसाहब के दर्शनों के लिए तरस गये। एक साल के बाद . ... .।'
तुरन्‍त ही बोतल हाजिर हुई।
वहीं अन्‍य सामग्री भी। सोड़ा, कुछ नमकीन वगैरह।
कार में बैठे बैठे ही कुंवरसाहब ने लगभग आधी बोतल खाली कर दी।
पर्स खोला और सौ का नोट मुन्‍शी फारसी की ओर बढ़ा दिया।
-‘इस वक्‍त शायद खुले रुपये नहीं हैं हुजूर! पैसे फिर आ जायेंगे।'
-‘यह नोट अपने पास रख लो मुन्‍शी जी। अभी से उधार की आदत मत डालो। एक दिन सपने में हमने देखा कि हम कंगाल होकर तुम्‍हारी दुकान के सामने मर गए . ... .।'
-‘ईश्वर आपको हजार वर्ष तक सलामत रक्खे।'
-‘सुबह का सपना झूठ नहीं होता। जहां तक हजार वर्ष जीने की बात है ऐसी भद्‌दी गाली हमें मत दीजिए . ... .भौंपू।'
और कार स्‍टार्ट हो गई।
आदेश की आवश्‍यकता नहीं थी। कार राधा के कोठे पर आकर रुकी।
कुंवरसाहब की कार हार्न सारा शहर पहचानता था। जैसा कि नियम था, हार्न सुनकर शहर की सबसे नामी कोठे वाली गायिका स्‍वयं नीचे आई।
रुप ऐसा कि दूर दूर तक नामी था।
अन्‍दाज ऐसे थे कि तमाशबीन मर मिटते थे।
यह भी कहा जाता था कि राधा कुंवरसाहब को दोनों हाथों से लूट रही है।
राधा ने दरवाजा खोला-‘आदाब अर्ज है कुंवरसाहब।'
-‘अच्‍छी हो?'
-‘आपकी मेहरबानी है . ... .तशरीफ ले चलिये।'
-‘बहुत थके हैं हम।'
-‘मैं साथ चलूं हुजूर।'
-‘नहीं। शुक्रिया।'
सदा की भांति पर्स खुला, सौ का नोट राधा की तरफ बढ़ा।
-‘आदाब।'
-‘जीती रहो . . .भौंपू।'
-‘जरा देर तो ठहरिये हुजूर। पान आ रहा है।'
-‘अच्‍छा।'
बोतल मुंह से लगाकर कुंवरसाहब ने कुछ घूंट ली। राधा की गोरी कलाई बढ़ी। अभी-अभी नौकर ने तश्‍तरी में पान लाकर दिया था।
कुंवरसाहब ने पान लिया-‘भौंपू चलो।'
कार चल पड़ी।
राह चलतों के लिए, दुकानदारों के लिए न राधा अजूबा थी, न कुंवरसाहब। यह रोज की बात थी।
और फिर गुप्‍ता जी की दुकान!
हर ओर सजे हुए रंग बिरंगे पुस्‍तक आवरण। पत्र पत्रिकाएं आदि।
गुप्‍ता जी भी अपने आप में एक विशेष चरित्र थे। बी ए शिक्षित गुप्‍ता जी बहुत अच्‍छे व्‍यापारी थे। क्‍या मजाल कि ग्राहक उनकी पकड़ से छूट कर चला जाए।
साधारण गृहस्‍थ मित्रों के लिए गुप्‍ता जी आदर्श व्‍यक्‍ति थे-जैसे चतुर व्‍यापारी थे वैसी चतुराई से जिन्‍दगी भी जी रहे थे। विवाह नहीं किया था इसलिये बाल बच्‍चों की जिम्‍मेदारी से दूर थे। थोड़ी सी झिझक के साथ गुप्‍ता जी यह स्‍वीकार करते थे कि तीन स्‍त्रियों से उनका सम्‍बन्‍ध है। एक इस नगर में, दूसरी दूसरे नगर में और तीसरी तीसरे नगर में। तीनों विधवा। काम धंधों से फुरसत मिली तो जिधर इच्‍छा हुई उधर निकल गए। किसी की ब्‍याहता जैसी जिम्‍मेदारी नहीं और वैसे सब ठीक! साथ बांधकर बैठने की मूर्खता से दूर। उनका निवास स्‍थान बाकायदा स्‍त्री वर्जित पुरुष स्‍थान था। पुरुष भी ऐसे जो चिलम गांजे के प्रेमी हों-रात में खासा जमावड़ा रहता था।
गुप्‍ता जी और कुंवरसाहब की दोस्‍ती पुरानी थी। हद से ज्‍यादह बेतकल्‍लुफी थी। एक दूसरे के गहरे शुभचिन्‍तक थे।
और आज . ... .।
कुंवरसाहब गाड़ी से उतरे लड़खड़ाते हुए दुकान में प्रविष्‍ट हुए-‘हुजूर गुप्‍ता साहब।'
-‘हुजूर कुंवरसाहब . ... .कई दिन बाद कहाँ से सवारी आ रही है?'
-‘जाने कहाँ कहाँ से। जैसे धक्‍के खाना ही जिन्‍दगी का मकसद है।'
-‘समझा . ... .।' गुप्‍ता जी चौंके, फिर मुस्‍कराए।
-‘क्‍या?'
-‘यही कि आज छनी है।'
-‘ओह!' कुंवरसाहब भी चौंके। जैसे यह अब याद आया कि गुप्‍ता जी से भी शराब छोड़ने का वायदा किया था। जबान कुछ लड़खड़ा रही थी।
-‘माफी नहीं चाहूंगा। जुर्म किया है सजा मिले।'
दुकान में चार ग्राहक भी थे। धीमे स्‍वर में पुरानी बात को टालते हुए गुप्‍ता जी ने नई बात की-‘कुछ पियेंगे . ... .काफी . ... .या कुछ ठंडा . ... .?'
-‘नहीं। शुक्रिया।'
-‘कुछ नई किताबें आई हैं, दूं?'
-‘सुबह भिजवा देना।'
-‘मैं आउंगा रात में।'
-‘आज नहीं कल आइयेगा। आज बहुत थका हूं . ... .।'
-‘हूं।' गुप्‍ता जी ने पैनी नजर डाली कुंवरसाहब पर-‘थके भी हो और उदास भी। कोई खास बात है क्‍या?'
-‘नहीं तो।'
-‘कुछ तो है। मेरी नजर आपके मामले में धोखा नहीं खा सकती।'
-‘नई चार लाइनें लिखी हैं, सुनोगे . ... .।'
-‘जरुर ।'
-‘सुनो -
जिन्‍दगी क्‍या है, क्‍या बताउं मैं,
एक गूंगे का ख्‍वाब हो जैसे ।
या किसी सूद खोर बनिए का,
उलझा उलझा हिसाब हो जैसे ।
और!
इससे पूर्व कि गुप्‍ता जी सराहना करें, अथवा कुछ और कहें!
कुंवरसाहब डगमगाते हुए कार तक पंहुचे और बोले-‘भौंपू चलो।'
(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 3
  1. बेनामी10:52 pm

    वाह!
    ओम प्रकाश जी के जासूसी उपन्यासों से अलग रुप वाली रचना पढ़ना सुखद है।
    धन्यवाद रवि जी,
    क्या पूरा उपन्यास अपलोड करेंगे?
    बेसब्री से इंतजार है अगली किस्त का

    जवाब देंहटाएं
  2. आप ने यह बहुत अच्छा काम आरंभ किया है। यह उपन्यास मेरा पढ़ा हुआ है। वे एक ख्यातनाम जासूसी उपन्यासकार थे। उन्हों ने सामाजिक समस्याओं और इतिहास पर भी उपन्यास लिखे हैं। नजीर अकबराबादी के जीवन पर लिखा उन का उपन्यास दूसरा ताजमहल तो अद्वितीय है। उन के प्रत्येक उपन्यास में सामाजिक जीवन मूल्यों के लिए स्थान होता था। मैंने बहुत कुछ उन के उपन्यासों से सीखा।

    जवाब देंहटाएं
  3. shukriya unke upanayas ko yaha padhwane ke liye,
    pahli kisht bhi padh li aur yah bhi, ab agli ki pratikshaa hai

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास – पी कहाँ
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